हिंदी भाषा का उद्भव और विकास

हिंदी भाषा का जन्म और विकास

दुनिया के भाषा-परिवार और हिंदी दुनियाभर में करीब 3,000 भाषाएं बोली जाती हैं, जिन्हें अध्ययन के लिए 13 बड़े भाषा-परिवारों (जैसे द्रविड़, चीनी, भारोपीय आदि) में बांटा गया है। हमारी हिंदी भाषा भारोपीय (भारत-यूरोपीय) भाषा-परिवार का हिस्सा है।

भारोपीय भाषा-परिवार
नामकरण व मूल स्थान: भारत और यूरोप तथा उनके आसपास के इलाकों में बोले जाने के कारण इसे 'भारोपीय' कहा जाता है। इस परिवार के लोगों का मूल निवास कहाँ था, इसे लेकर मतभेद हैं, लेकिन सबसे प्रचलित मान्यता के अनुसार यूराल पर्वत के दक्षिण-पूर्व में स्थित 'ब्रांदेश्ताइन' (किरगीज के मैदान) को इनका मूल स्थान माना जाता है।
दो मुख्य शाखाएँ: भारोपीय परिवार आगे चलकर दो प्रमुख वर्गों में बँट गया:
कैंतुम: इसमें तोखारियन, केल्टिक, जर्मनिक, इटालिक, ग्रीक और इलीरियन जैसी भाषाएं आती हैं।
सतम्: इसमें अल्बानियन, आर्मीनियन, बाल्टोस्लाविक, थेसो-फ्रीजियन और भारत-ईरानी भाषाएं शामिल हैं।

भारत-ईरानी (आर्य शाखा) और उसका विभाजन सतम् वर्ग की 'भारत-ईरानी' शाखा को 'आर्य शाखा' भी कहते हैं। इस समूह के लोग जब अपने मूल स्थान से निकले, तो कुछ ईरान की तरफ चले गए, कुछ कश्मीर व आसपास बस गए, और कुछ भारत के मैदानी इलाकों में आ पहुँचे। इसी आधार पर भारत-ईरानी शाखा तीन भागों में बँट गई:
ईरानी
दरद
भारतीय आर्यभाषा

भारतीय आर्यभाषा का इतिहास ईरानी और दरद समूहों से अलग होकर भारतीय आर्य लगभग 1500 ई.पू. के आसपास भारत के उत्तर-पश्चिम सीमा से दाखिल हुए। यहीं से भारत में आर्यभाषा की शुरुआत मानी जाती है। भारतीय आर्यभाषा के इस लगभग 3,500 साल लंबे सफर को तीन काल-खंडों में बांटा जाता है:
प्राचीन भारतीय आर्यभाषाएँ: 1500 ई.पू. से 500 ई.पू.
मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषाएँ: 500 ई.पू. से 1000 ई.
आधुनिक भारतीय आर्यभाषाएँ: 1000 ई. से अब तक

प्राचीन भारतीय आर्यभाषाएँ (1500 ई.पू. से 500 ई.पू.) भारत में आगमन के बाद आर्यों ने यहाँ के मूल निवासियों के संपर्क में आकर एक नई भाषा-शैली विकसित की। इसका सबसे पुराना रूप वैदिक संहिताओं में देखने को मिलता है, जिनकी रचना 1200 ई.पू. से 900 ई.पू. के बीच मानी जाती है। इस भाषा को संस्कृत कहा गया (हालाँकि 'संस्कृत' शब्द का पहला लिखित प्रयोग महर्षि वाल्मीकि की 'रामायण' में मिलता है)।

प्राचीन संस्कृत के दो रूप मिलते हैं:
वैदिक संस्कृत (1500 ई.पू. से 800 ई. पू. तक)
लौकिक संस्कृत (800 ई.पू. से 500 ई. पू. तक)

भाषा का काल-क्रम विभाजन

भारतीय आर्य भाषाओं का विकास तीन चरणों में हुआ है:
प्राचीन भारतीय आर्य भाषाएँ (1500 ई.पू. से 500 ई.पू.):
वैदिक संस्कृत (1500 ई.पू. से 800 ई.पू.): इसमें वेद, उपनिषद और ब्राह्मण ग्रंथ रचे गए।
लौकिक संस्कृत (800 ई.पू. से 500 ई.पू.): महर्षि पाणिनि ने ‘अष्टाध्यायी’ के माध्यम से इसका व्याकरण स्थिर किया।
मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषाएँ (500 ई.पू. से 1000 ई.):
पहली प्राकृत / पालि (500 ई.पू. से 1 ई.): यह आम जनता की भाषा थी। बुद्ध के उपदेश और बौद्ध ग्रंथ (जातक, धम्मपद आदि) इसी भाषा में हैं। इसे ‘मागधी’ भी कहा जाता है।
दूसरी प्राकृत / प्राकृत (1 ई. से 500 ई.): क्षेत्र के आधार पर इसके अनेक रूप बने, जैसे- शौरसेनी, पैशाची, महाराष्ट्री, अर्धमागधी, मागधी आदि।
तीसरी प्राकृत / अपभ्रंश (500 ई. से 1000 ई.): जब प्राकृत भाषा के रूप में बिगाड़ आया, तो उसे 'अपभ्रंश' या 'अवहट्ठ' कहा गया। यह प्राचीन प्राकृत और आधुनिक हिंदी के बीच की कड़ी है।
आधुनिक भारतीय आर्य भाषाएँ (1000 ई. से अब तक):
अपभ्रंश से हिंदी, सिंधी, लहंदा, पंजाबी, गुजराती, मराठी, बंगला, उड़िया, असमी आदि आधुनिक भाषाओं का विकास हुआ।
प्रमुख आधुनिक आर्य भाषाएँ एवं लिपि
भाषामुख्य क्षेत्रलिपि
हिंदी उत्तर और मध्य भारत देवनागरी
पंजाबी पंजाब गुरुमुखी
सिंधी सिंध क्षेत्र / पाकिस्तान फ़ारसी आधारित
गुजराती गुजरात गुजराती
मराठी महाराष्ट्र देवनागरी
नेपाली नेपाल देवनागरी

हिंदी भाषा का उपभाषा और बोली वर्गीकरण

हिंदी का विकास मुख्य रूप से तीन अपभ्रंशों (शौरसेनी, अर्धमागधी, मागधी) से हुआ है:
पश्चिमी हिंदी (शौरसेनी अपभ्रंश से):
खड़ी बोली, ब्रज, बांगरू, बुंदेली, कन्नौजी, दक्खिनी।
पूर्वी हिंदी (अर्धमागधी अपभ्रंश से):
अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी।
राजस्थानी (शौरसेनी अपभ्रंश से):
मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूँढाड़ी, हाड़ौती, मेवाती, मालवी, बागड़ी।
पहाड़ी:
पश्चिमी पहाड़ी, गढ़वाली, कुमाऊँनी।
बिहारी (मागधी अपभ्रंश से):
भोजपुरी, मैथिली, मगही।
'हिंदी' शब्द का शाब्दिक अर्थ
'हिंदी' शब्द का संबंध संस्कृत के 'सिंधु' शब्द से है।
इरानियों के उच्चारण में 'स' का 'ह' तथा 'ध' का 'द' हो जाने से 'सिंधु' शब्द 'हिंदू' और आगे चलकर 'हिंद' बना।
'हिंद' में ई-प्रत्यय लगाने से 'हिंदी' शब्द बना, जिसका अर्थ है— "हिंद का या हिंद की भाषा"।
विश्व के भाषा-परिवार में हिंदी का स्थान
हिंदी 'भारोपीय' (भारत-यूरोपीय) भाषा-परिवार की भाषा है।
भारोपीय की 'केंतुम्' शाखा के अंतर्गत 'भारत-ईरानी' उपशाखा से संस्कृत और आगे चलकर हिंदी का विकास हुआ।

प्रश्न 1: पालि भाषा किसे कहते हैं और इसके मुख्य साहित्य कौन-से हैं? उत्तर: प्रथम प्राकृत भाषा को 'पालि' भाषा कहा जाता है। गौतम बुद्ध के उपदेश और बौद्ध साहित्य (जैसे- जातक, धम्मपद, मिलिंदपन्हो, महावंश) पालि भाषा में ही लिखे गए हैं।

प्रश्न 2: अपभ्रंश भाषा का क्या अर्थ है? उत्तर: जब प्राकृत भाषा के रूप में परिवर्तन आया और व्याकरण ढीला पड़ा, तो बिगड़े हुए रूप को पण्डितों ने 'अपभ्रंश' कहा। यह प्राचीन प्राकृत और आधुनिक हिंदी के बीच की कड़ी है।

प्रश्न 3: हिंदी शब्द की व्युत्पत्ति किस शब्द से हुई है? उत्तर: हिंदी शब्द का मूल आधार संस्कृत का 'सिंधु' शब्द है। फारसी/ईरानी प्रभाव के कारण सिंधु से 'हिंदू' -> 'हिंद' -> 'हिंदी' बना।

प्रश्न 4: पूर्वी हिंदी के अंतर्गत कौन-कौन सी बोलियाँ आती हैं? उत्तर: पूर्वी हिंदी के अंतर्गत 3 मुख्य बोलियाँ आती हैं— अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी।

प्रश्न 5: पंजाबी भाषा की लिपि का क्या नाम है? उत्तर: पंजाबी भाषा की लिपि 'गुरुमुखी' है।
'हिंदी' शब्द की व्युत्पत्ति एवं अर्थ
(क) शब्द की व्युत्पत्ति

'हिंदी' शब्द का मूल संबंध संस्कृत के 'सिंधु' शब्द से है।
ईरानियों (फ़ारसी भाषियों) के उच्चारण नियम के अनुसार 'स' का उच्चारण 'ह' तथा 'ध' का उच्चारण 'द' किया जाता था (जैसे: सड़क \rightarrow हड़का, सीरा \rightarrow हीरा)।
इसके कारण सिंधु नदी के पूर्व में रहने वाले लोगों और उनके क्षेत्र को 'हिंद' कहा गया।
'हिंद' शब्द में फ़ारसी का 'ई' प्रत्यय जोड़ने से 'हिंदी' शब्द की निष्पत्ति हुई, जिसका प्रारंभिक अर्थ था— "हिंद (भारत) का या भारत की भाषा"।
(ख) 'हिंदी' शब्द के मुख्य चार अर्थ
व्यापक (भौगोलिक) अर्थ: प्राचीन काल में सिंधु नदी के पूर्व के पूरे भू-भाग और उससे संबंधित वस्तुओं/लोगों के लिए इस शब्द का प्रयोग होता था।
सामान्य अर्थ (13वीं से 18वीं शताब्दी): मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और पंजाब क्षेत्र में बोली जाने वाली विभिन्न क्षेत्रीय बोलियों के समूह को हिंदी कहा गया।
विशिष्ट (मानक) अर्थ: 19वीं शताब्दी से यह अर्थ सर्वाधिक प्रचलित हुआ। आज हिंदी भारत संघ की राजभाषा, भारत के 10 राज्यों (उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली) और अंडमान-निकोबार की आधिकारिक भाषा है। यह मुख्यतः खड़ी बोली के साहित्यिक एवं परिमार्जित रूप का प्रतिनिधित्व करती है।
भाषावैज्ञानिक अर्थ: भाषाविज्ञान की दृष्टि से हिंदी उत्तर भारत में बोली जाने वाली 5 उपभाषाओं एवं 22 बोलियों के समूह (Cluster) का प्रतिनिधित्व करने वाली एक स्वतंत्र भाषा है।
हिंदी भाषा का ऐतिहासिक विकासक्रम

हिंदी भाषा का विकासक्रम निम्नलिखित चरणों में विभाजित है:

अपभ्रंश से हिंदी तक के विकास क्रम को और अधिक स्पष्ट, सटीक और प्रमाणिक रूप में व्यवस्थित कर दिया गया है। आप इसे सीधे अपनी कॉपी में उत्तर या नोट्स के रूप में लिख सकते हैं।
हिंदी का वास्तविक विकास क्रम

हिंदी भाषा का विकास एक सीधी श्रृंखला में हुआ है। सबसे पहले वैदिक संस्कृत से लौकिक संस्कृत बनी, फिर आम जन की प्राकृत भाषाएँ आईं और अंत में अपभ्रंश से modern हिंदी का जन्म हुआ।वैदिक संस्कृत ──► लौकिक संस्कृत ──► पालि (प्रथम प्राकृत) ──► प्राकृत (द्वितीय प्राकृत) ──► अपभ्रंश (तृतीय प्राकृत / अवहट्ठ) ──► प्रारंभिक हिंदी ──► आधुनिक हिंदी

1. काल-क्रमानुसार विकास के चरण
(1) प्राचीन भारतीय आर्य भाषाएँ (1500 ई.पू. से 500 ई.पू.)
वैदिक संस्कृत (1500 ई.पू. – 800 ई.पू.): वेदों, उपनिषदों और ऋचाओं की भाषा।
लौकिक संस्कृत (800 ई.पू. – 500 ई.पू.): रामायण, महाभारत और पाणिनि के व्याकरण ('अष्टाध्यायी') द्वारा नियमबद्ध भाषा।
(2) मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषाएँ (500 ई.पू. से 1000 ई.)
पालि / प्रथम प्राकृत (500 ई.पू. – 1 ई.): महात्मा बुद्ध के उपदेश और बौद्ध साहित्य (त्रिपिटक, जातक कथाएँ)।
प्राकृत / द्वितीय प्राकृत (1 ई. – 500 ई.): भगवान महावीर के उपदेश और जैन साहित्य। क्षेत्रीय आधार पर इसके विविध रूप (शौरसेनी, मागधी, अर्धमागधी आदि) प्रचलित हुए।
अपभ्रंश / अवहट्ठ / तृतीय प्राकृत (500 ई. – 1000 ई.): प्राकृत भाषा का परिवर्तित/अपभ्रंश रूप, जो पुरानी हिंदी और प्राकृत के बीच की संक्रमणकालीन कड़ी है।
(3) आधुनिक भारतीय आर्य भाषाएँ (1000 ई. से अब तक)
प्रारंभिक/पुरानी हिंदी (1000 ई. – 1500 ई.): अपभ्रंश के विभिन्न रूपों से हिंदी की बोलियों का जन्म।
मध्यकालीन हिंदी (1500 ई. – 1800 ई.): अवधी और ब्रजभाषा का स्वर्ण काल (तुलसीदास, सूरदास)।
आधुनिक हिंदी (1800 ई. से अब तक): खड़ी बोली हिंदी का मानक, साहित्यिक और राजभाषा के रूप में विकास।
2. अपभ्रंशों से हिंदी की उपभाषाओं का विकास (सटीक वर्गीकरण)

हिंदी की 5 उपभाषाएँ और उनकी बोलियाँ मुख्य रूप से तीन अपभ्रंशों से निकली हैं: ┌──► शौरसेनी अपभ्रंश ──► पश्चिमी हिंदी, राजस्थानी, पहाड़ी │ अपभ्रंश (Apabhramsha) ──┼──► अर्धमागधी अपभ्रंश ──► पूर्वी हिंदी │ └──► मागधी अपभ्रंश ──► बिहारी हिंदी

1. शौरसेनी अपभ्रंश
पश्चिमी हिंदी: खड़ी बोली (कौरवी), ब्रजभाषा, बुंदेली, कन्नौजी, हरियाणवी (बांगरू)।
राजस्थानी: मारवाड़ी, जयपुरी (ढूँढाड़ी), मेवाती, मालवी।
पहाड़ी: गढ़वाली, कुमाऊँनी, पश्चिमी पहाड़ी।
2. अर्धमागधी अपभ्रंश
पूर्वी हिंदी: अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी।
3. मागधी अपभ्रंश
बिहारी हिंदी: भोजपुरी, मैथिली, मगही।

हिंदी का विकास मुख्य रूप से शौरसेनी, अर्धमागधी तथा मागधी अपभ्रंशों से हुआ है।

प्रश्न: हिंदी की जननी (मूल भाषा) किसे माना जाता है? उत्तर: हिंदी की मूल जननी संस्कृत भाषा है, जबकि हिंदी का सीधा (निकटतम) विकास अपभ्रंश से हुआ है।

प्रश्न: अवधी और ब्रजभाषा का विकास किस-किस अपभ्रंश से हुआ है? उत्तर:

अवधी का विकास अर्धमागधी अपभ्रंश (पूर्वी हिंदी) से हुआ है।
ब्रजभाषा का विकास शौरसेनी अपभ्रंश (पश्चिमी हिंदी) से हुआ है।
काल-विभाजन (हिंदी के 1000 वर्षों का इतिहास)
प्रारंभिक काल (आदिकाल): 1000 ई. से 1500 ई.
मध्यकाल (भक्तिकाल एवं रीतिकाल): 1500 ई. से 1800 ई.
आधुनिक काल: 1800 ई. से अब तक
3. हिंदी के जन्मकाल पर विद्वानों के विचार
आचार्य रामचंद्र शुक्ल: अपभ्रंश या 'प्राकृताभास हिंदी' के पद्यों का सबसे पुराना पता 7वीं शताब्दी के सिद्ध बौद्धों की रचनाओं में मिलता है। मुंज और भोज के समय (विक्रम संवत् 1050 / लगभग 993 ई.) पुरानी हिंदी का पूर्ण विकास हो चुका था।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी: हेमचंद्राचार्य (1088-1172 ई.) द्वारा वर्णित अपभ्रंश की 'ग्राम्य' भाषा ही आगे चलकर देशी भाषाओं (हिंदी) में विकसित हुई।
डॉ. धीरेंद्र वर्मा: 1000 ई. के आसपास मध्यकालीन आर्यभाषा अपभ्रंश ने परिवर्तित होकर आधुनिक आर्यभाषाओं का रूप ग्रहण कर लिया।
चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी': 7वीं से 11वीं शताब्दी तक अपभ्रंश की प्रधानता रही, जो आगे चलकर 'पुरानी हिंदी' में परिणत हो गई।
डॉ. भोलानाथ तिवारी: भाषा का विकास अचानक नहीं होता; अतः व्यावहारिक एवं साहित्यिक साक्ष्यों के आधार पर हिंदी भाषा का आरंभ 1000 ई. के आसपास ही माना जाना सर्वथा उपयुक्त है।
4. प्रारंभिक काल (1000 ई. से 1500 ई.) की भाषिक विशेषताएँ

इस काल में सिद्धों, नाथों, जैन आचार्यों तथा अमीर खुसरो, विद्यापति, कबीर और चंदबरदाई जैसे कवियों की रचनाओं में प्रारंभिक हिंदी का स्वरूप प्रकट हुआ।
क्षेत्रअपभ्रंश की स्थितिप्रारंभिक हिंदी की स्थिति (परिवर्तन)
ध्वनि (Sounds) केवल 8 स्वर थे (अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ओ)। 2 नए विकसित स्वर 'ऐ' और 'औ' जुड़ गए।
स्पर्श व्यंजन थे। च, छ, ज, झ ध्वनियाँ स्पर्श-संघर्षी हो गईं।
'ड़' और 'ढ़' ध्वनियाँ नहीं थीं। 'ड़' और 'ढ़' नए उत्क्षिप्त व्यंजनों का विकास हुआ।
द्वित्व व्यंजनों (जैसे- कम्म) का प्रयोग अधिक था। द्वित्व व्यंजन एकल व्यंजनों में बदलने लगे (जैसे- कम्म \rightarrow काम)।
व्याकरण (Grammar) भाषा संश्लेषणात्मक/संयोगात्मक अधिक थी। भाषा विश्लेषणात्मक/वियोगात्मक होने लगी; परसर्गों (कारक चिह्नों) और सहायक क्रियाओं का प्रयोग शुरू हुआ।
नपुंसक लिंग के अवशेष विद्यमान थे। नपुंसक लिंग समाप्त हो गया; केवल पुल्लिंग और स्त्रीलिंग दो लिंग शेष रहे।
शब्द-भंडार (Vocabulary) तद्भव शब्दों का आधिक्य था। भक्ति आंदोलन के प्रभाव से तत्सम शब्दों का प्रयोग बढ़ा। मुसलमानों के आगमन से अरबी-फ़ारसी के शब्द आने लगे।

5. मध्यकाल (1500 ई. से 1800 ई.) की भाषिक विशेषताएँ

यह काल राजनीतिक दृष्टि से मुग़ल शासन तथा साहित्यिक दृष्टि से भक्तिकालीन एवं रीतिकालीन काव्य का स्वर्ण युग रहा। इस काल में अवधी (जायसी, तुलसीदास) और ब्रजभाषा (सूरदास, बिहारी, घनानंद) अपने चरम उत्कर्ष पर पहुँचीं।
मुख्य भाषिक एवं व्याकरणिक परिवर्तन:
अ-कार लोप (ध्वनि परिवर्तन): शब्दों के अंत तथा मध्य में आने वाले मूल व्यंजन के 'अ' स्वर का लोप होने लगा।
उदा. राम \rightarrow राम्‍, जप ता \rightarrow जपता, का म \rightarrow काम, जन ता \rightarrow जनता।
विदेशी ध्वनियों का समावेश: अरबी-फ़ारसी के संपर्क से पाँच नई ध्वनियाँ क, ख, ग, ज़, फ़ (नुक्ता युक्त) हिंदी में व्यापक रूप से प्रयुक्त होने लगीं।
व्याकरणिक स्पष्टता: भाषा पूरी तरह वियोगात्मक हो गई। कर्ता कारक के 'ने' परसर्ग तथा सहायक क्रियाओं (है, था, थे, होंगे) का प्रयोग स्पष्ट और नियमित हो गया।
परीक्षा-उपयोगी महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1: 'हिंदी' शब्द मूलतः किस भाषा का शब्द है और इसका ऐतिहासिक आधार क्या है? उत्तर: 'हिंदी' शब्द मूलतः फ़ारसी भाषा का शब्द है। इसका ऐतिहासिक आधार संस्कृत का 'सिंधु' शब्द है, जिसे ईरानी लोग 'हिंदू' या 'हिंद' कहते थे।

प्रश्न 2: भाषावैज्ञानिक दृष्टि से हिंदी भाषा का क्या अर्थ है? उत्तर: भाषाविज्ञान की दृष्टि से हिंदी भारत के विशाल भू-भाग में बोली जाने वाली 5 उपभाषाओं (पश्चिमी हिंदी, पूर्वी हिंदी, राजस्थानी, बिहारी, पहाड़ी) और उनकी 22 बोलियों के समूह को व्यक्त करने वाली एक एकीकृत भाषा है।

प्रश्न 3: अपभ्रंश से प्रारंभिक हिंदी में प्रवेश करते समय कौन-कौन से दो नए स्वर विकसित हुए? उत्तर: अपभ्रंश के 8 मूल स्वरों के अलावा प्रारंभिक हिंदी में 'ऐ' और 'औ' दो नए स्वर विकसित हुए।

प्रश्न 4: मध्यकालीन हिंदी की दो प्रमुख साहित्यिक भाषाओं के नाम और उनके प्रतिनिधि कवियों के नाम लिखिए। उत्तर:
अवधी: मलिक मोहम्मद जायसी, गोस्वामी तुलसीदास।
ब्रजभाषा: सूरदास, नंददास, बिहारी, घनानंद।



प्रश्न 5: हिंदी भाषा का जन्मकाल लगभग कब से स्वीकार किया जाता है? उत्तर: सर्वसम्मति एवं भाषावैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर हिंदी भाषा का जन्मकाल 1000 ईस्वी के आसपास माना जाता है।
हिंदी का आधुनिक काल (1800 ई. से अब तक)

1800 ई. के बाद ब्रिटिश शासन के प्रसार और स्वतंत्रता आंदोलन के संघर्ष से हिंदी एक सशक्त, व्यावहारिक और राष्ट्रीय चेतना की भाषा बनी। भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग, छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद तथा नई कविता के माध्यम से इसका अभूतपूर्व विकास हुआ।
आधुनिक काल की भाषिक एवं व्याकरणिक विशेषताएँ
ध्वनिगत परिवर्तन:
अरबी-फ़ारसी के प्रभाव से क, ख, ग, ज़, फ़ ध्वनियाँ आईं। अंग्रेज़ी के प्रभाव से 'ऑ' स्वर (जैसे: डॉक्टर, ऑफ़िस) तथा 'ड्र' संयुक्त व्यंजन (जैसे: ड्राइवर, ड्रिल) हिंदी में समाहित हुए।
ऐ और औ स्वर मानक हिंदी में मूल स्वर के रूप में उच्चारित होते हैं, जबकि पूर्वी बोलियों में ये संयुक्त स्वर (अइ, अउ) के रूप में बोले जाते हैं।
व्याकरणगत परिवर्तन:
हिंदी पूर्णतः वियोगात्मक (विश्लेषणात्मक) भाषा बन चुकी है।
प्रिंट, मीडिया और शिक्षा के माध्यम से इसका मानक व्याकरण सुनिश्चित हो चुका है।
गद्य के तीव्र प्रसार से वाक्य संरचना अधिक विविध और स्पष्ट हो गई है।
शब्द-भंडार:
तत्सम, तद्भव, देशज और अरबी-फ़ारसी के साथ-साथ पुर्तगाली, फ़्रांसीसी, डच और अंग्रेज़ी के हज़ारों शब्द शामिल हुए।
आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के लिए 5 लाख से अधिक तकनीकी शब्दों का निर्माण किया गया है।
अपभ्रंश, हिंदी की उपभाषाएँ और बोलियाँ (22 बोलियों का विवरण)

हिंदी मुख्य रूप से 5 उपभाषाओं और 22 बोलियों का एक समूह (Cluster) है:
अपभ्रंश का रूपउपभाषा समूहप्रमुख बोलियाँ
शौरसेनी अपभ्रंश 1. पश्चिमी हिंदी खड़ीबोली, ब्रजभाषा, बांगरू, बुंदेली, कन्नौजी, दक्खिनी
शौरसेनी अपभ्रंश 2. राजस्थानी मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूँढाड़ी, हाड़ौती, मेवाती, वागड़ी, मालवी
शौरसेनी अपभ्रंश 3. पहाड़ी गढ़वाली, कुमाऊँनी, पश्चिमी पहाड़ी
अर्धमागधी अपभ्रंश 4. पूर्वी हिंदी अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी
मागधी अपभ्रंश 5. बिहारी मैथिली, भोजपुरी, मगही

उपभाषाओं एवं बोलियों का विस्तृत विवरण
(I) पश्चिमी हिंदी की बोलियाँ
खड़ीबोली (कौरवी / हिंदुस्तानी):
क्षेत्र: मेरठ, बिजनौर, मुज़फ़्फ़रनगर, सहारनपुर, दिल्ली, देहाती क्षेत्र।
विशेषता: लल्लूलाल ने 1803 में इसे 'खड़ीबोली' नाम दिया। यही बोली आज की मानक हिंदी (Standard Hindi) का मुख्य आधार बनी।
बांगरू (हरियाणवी):
क्षेत्र: हरियाणा (करनाल, रोहतक, हिसार) तथा दिल्ली के ग्रामीण क्षेत्र।
विशेषता: शुष्क/उच्च भूमि क्षेत्र (बांगरू) के कारण यह नाम पड़ा। इसमें लोक-साहित्य प्रचुर मात्रा में है।
ब्रजभाषा (अंतर्वेदी):
क्षेत्र: मथुरा, आगरा, अलीगढ़, एटा, मैनपुरी, बरेली, तथा राजस्थान के भरतपुर, धौलपुर।
विशेषता: मध्यकाल की सबसे प्रमुख साहित्यिक बोली। सूरदास, मीराबाई, रसखान, बिहारी, घनानंद तथा भारतेंदु की रचनाओं की भाषा रही।
बुंदेली:
क्षेत्र: बुंदेलखंड (झांसी, जालौन, हमीरपुर, छतरपुर, सागर, ग्वालियर)।
विशेषता: केशवदास, पद्माकर और जगनिक (आल्हाखंड) इस क्षेत्र के प्रमुख कवि हैं।
कन्नौजी:
क्षेत्र: फ़ारुख़ाबाद, कन्नौज, इटावा, कानपुर, पीलीभीत।
विशेषता: यह ब्रजभाषा से अत्यधिक समानता रखती है।
दक्खिनी (दक्खिनी हिंदी):
क्षेत्र: हैदराबाद, बीजापुर, गोलकुंडा, महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के क्षेत्र।
विशेषता: उत्तर भारत के सैनिकों/मुसलमानों द्वारा दक्षिण पहुँचने पर इसका विकास हुआ। कुली कुतुबशाह और मुल्ला वजही इसके मुख्य रचनाकार रहे।
(II) पूर्वी हिंदी की बोलियाँ
अवधी:
क्षेत्र: लखनऊ, अयोध्या (फ़ैज़ाबाद), उन्नाव, रायबरेली, गोंडा, प्रतापगढ़, प्रयागराज।
विशेषता: मलिक मोहम्मद जायसी (पद्मावत) और गोस्वामी तुलसीदास (रामचरितमानस) के महाकाव्यों की अमर भाषा।
बघेली:
क्षेत्र: रीवाँ, सतना, शहडोल, सीधी, जबलपुर।
विशेषता: इसे अवधी की ही उपबोली भी माना जाता है।
छत्तीसगढ़ी:
क्षेत्र: रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, सरगुजा, रायगढ़, बस्तर।
विशेषता: छत्तीसगढ़ राज्य की सांस्कृतिक और लोक-साहित्य की प्रमुख भाषा।
(III) बिहारी उपभाषा की बोलियाँ
मैथिली:
क्षेत्र: दरभंगा, मधुबनी, मुज़फ़्फ़रपुर, पूर्णिया, भागलपुर।
विशेषता: महान कवि विद्यापति (विद्यापति पदावली) की भाषा। इसे संविधान की 8वीं अनुसूची में भी स्थान प्राप्त है।
भोजपुरी:
क्षेत्र: वाराणसी, गोरखपुर, बलिया, गाज़ीपुर, आज़मगढ़, छपरा, सिवान, भोजपुर।
विशेषता: देश-विदेश में सर्वाधिक बोली जाने वाली हिंदी की बोली; इसका लोक-साहित्य और सिनेमा अत्यंत समृद्ध है।
मगही:
क्षेत्र: पटना, गया, हज़ारीबाग, नालंदा।
विशेषता: प्राचीन 'मगध' साम्राज्य के भू-भाग की बोली।
(IV) पहाड़ी उपभाषा की बोलियाँ
गढ़वाली:
क्षेत्र: उत्तराखंड का गढ़वाल मंडल (टिहरी, पौड़ी, चमोली, उत्तरकाशी)।
विशेषता: केदारखंड क्षेत्र की प्रमुख लोक-भाषा।
कुमाऊँनी:
क्षेत्र: उत्तराखंड का कुमाऊँ मंडल (अल्मोड़ा, नैनीताल, पिथौरागढ़)।
विशेषता: गुमानी पंत और शिवदत्त सती द्वारा रचा गया विशाल लोक-साहित्य।
पश्चिमी पहाड़ी:
क्षेत्र: हिमाचल प्रदेश (शिमला, मण्डी, चम्बा, कुल्लू, लाहुल-स्पीति)।
विशेषता: पूर्व में इसकी लिपि टाकरी थी, अब यह देवनागरी में लिखी जाती है।
(V) राजस्थानी उपभाषा की बोलियाँ
मारवाड़ी:
क्षेत्र: जोधुपर, बीकानेर, नागौर, पाली, जैसलमेर, बाड़मेर, जालोर।
विशेषता: ऐतिहासिक रूप से 'मरुभाषा' (कुवलयमाला 778 ई.)। इसकी साहित्यिक शैली को 'डिंगल' कहा जाता है। इसमें 'ण' और 'ळ' ध्वनियों का बाहुल्य होता है।
मेवाड़ी:
क्षेत्र: उदयपुर, चित्तौड़गढ़, राजसमंद, भीलवाड़ा।
विशेषता: 'मेवाड़' (मेदपाट) क्षेत्र की बोली; इसमें 'ऐ' और 'औ' का उच्चारण 'ए' और 'ओ' जैसा होता है।
ढूँढाड़ी (जयपुरी):
क्षेत्र: जयपुर, दौसा, टोंक, अजमेर।
विशेषता: ढूँढ नदी के क्षेत्र की बोली। संत दादू दयाल का साहित्य इसी में है। इसमें सहाय क्रिया के रूप में छै, छूँ, छा का प्रयोग होता है।
हाड़ौती:
क्षेत्र: कोटा, बूंदी, झालावाड़, बाराँ।
विशेषता: हाड़ा राजवंश के प्रभुत्व वाले क्षेत्र की बोली।
मेवाती:
क्षेत्र: अलवर, भरतपुर, गुड़गाँव (हरियाणा) का मेवात क्षेत्र।
विशेषता: यह पश्चिमी हिंदी और राजस्थानी के बीच सेतु का कार्य करती है।
वागड़ी:
क्षेत्र: डूंगरपुर और बाँसवाड़ा (वागड़ क्षेत्र)।
विशेषता: इस बोली पर गुजराती भाषा का स्पष्ट प्रभाव देखा जाता है।
मालवी:
क्षेत्र: मालवा क्षेत्र— झालावाड़ (राजस्थान), इंदौर, भोपाल, उज्जैन, रतलाम (मध्य प्रदेश)।
विशेषता: सोंधवाड़ी, निमाड़ी और रतलामी इसकी मुख्य उपबोलियाँ हैं।
अभ्यास प्रश्नोत्तरी

प्रश्न 1: मानक हिंदी का विकास किस बोली से हुआ है? उत्तर: मानक हिंदी (Standard Hindi) का विकास शौरसेनी अपभ्रंश की खड़ीबोली (कौरवी) से हुआ है।

प्रश्न 2: 'डिंगल' शैली किस बोली का साहित्यिक रूप है? उत्तर: डिंगल शैली मुख्य रूप से मारवाड़ी बोली की साहित्यिक एवं वीर-रसात्मक रचना शैली है।

प्रश्न 3: मैथिली बोली के सबसे प्रसिद्ध कवि कौन हैं? उत्तर: मैथिली बोली के सबसे प्रसिद्ध और कालजयी कवि विद्यापति हैं।



प्रश्न 4: राजस्थानी भाषा की उस बोली का नाम बताइए जिस पर गुजराती का सबसे गहरा प्रभाव है? उत्तर: डूंगरपुर और बाँसवाड़ा क्षेत्र की वागड़ी बोली पर गुजराती का सबसे गहरा प्रभाव है।

दिए गए पृष्ठों के आधार पर हिंदी का मानक रूप, इसकी शैलियाँ और भाषागत विशेषताओं के विस्तृत नोट्स नीचे प्रस्तुत हैं:
हिंदी का मानक रूप

हिंदी के मुख्य रूप से दो रूप हैं:
क्षेत्रीय 22 बोलियों का संकुल
मानक हिंदी (हिंदी का केंद्रवर्ती रूप)
उद्भव एवं विकास
बीम्ज़, ग्रियर्सन, सुनीतिकुमार चटर्जी तथा धीरेंद्र वर्मा के अनुसार मानक रूप कौरवी (खड़ीबोली) से विकसित हुआ है।
भोलानाथ तिवारी का मत है कि यह हरियाणवी, ब्रज और दिल्ली की खड़ीबोली का मिश्रित रूप है, जो दिल्ली में फ़ारसी की छाया में विकसित हुआ।
संवैधानिक स्थिति: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343(1) में खड़ीबोली रूप को संघ की राजभाषा और देवनागरी को इसकी लिपि माना गया है। संविधान के भाग 17 (अनुच्छेद 343 से 351) तथा 8वीं अनुसूची में इसे स्थान प्राप्त है।
हिंदी की प्रमुख शैलियाँ

मानक हिंदी की विभिन्न शैलियाँ (हिंदी, उर्दू, रेख़्ता, हिंदुस्तानी आदि) प्रचलित हैं:
उर्दू:
इसका मूल अर्थ 'शाही शिविर या खेमा' है।
इसमें अरबी-फ़ारसी शब्दावली की प्रधानता होती है।
यह संविधान की 8वीं अनुसूची में सम्मिलित है तथा उत्तर प्रदेश व बिहार की दूसरी राजभाषा है।
रेख़्ता:
इसका अर्थ 'बनाना या मिलाना' है।
हिंदी व्याकरण में अरबी-फ़ारसी शब्दावली मिलाकर बनाई गई शैली। स्त्रियों द्वारा बोली जाने वाली इस मिश्रित भाषा को रेख़्ती कहा गया।
हिंदुस्तानी:
हिंदी और उर्दू के बीच की सरल भाषा।
1926 के कांग्रेस अधिवेशन में पुरुषोत्तमदास टंडन तथा महात्मा गांधी द्वारा इसे बढ़ावा दिया गया।
हिंदवी / हिंदुओं की भाषा:
प्राचीन हिंदी के लिए अमीर ख़ुसरो के समय से प्रयुक्त नाम। संस्कृत शब्दावली युक्त रूप को हिंदवी/हिंदुई और अरबी-फ़ारसी युक्त रूप को हिंदुस्तानी कहा गया।
मानक हिंदी की भाषागत विशेषताएँ


स्वरों का उच्चारण: 'ऐ' तथा 'औ' का उच्चारण मूल स्वर के रूप में होता है (अइ या अउ के रूप में नहीं)।
अ-स्वर का लुप्त होना: शब्द के मध्य में स्थित 'अ' स्वर का उच्चारण कभी-कभी लुप्त हो जाता है; जैसे: जंता (जनता), काम्ना (कामना)।
ध्वनि भेद: 'स' तथा 'श' व्यंजनों का अलग-अलग स्पष्ट उच्चारण।
अर्द्धस्वर: 'य' तथा 'व' का प्रयोग अर्द्धस्वरों की तरह होता है (य का ज या व का ब में परिवर्तन नहीं होता)।
व्यंजन गुच्छ एवं द्वित्व: शुद्ध उच्चारण (जैसे: पट्टी, खट्टी) तथा द्वित्व का सटीक प्रयोग (जैसे: मिट्टी, खड्डा)।
कारक चिह्न:
भूतकाल में सकर्मक क्रिया आने पर 'ने' कर्ता कारक चिह्न का प्रयोग।
संबंधसूचक के रूप में 'का' का प्रयोग।
क्रिया रूप: भूतकालिक कृदंतों में आकारांत (पढ़ा, चला) तथा भविष्यकाल में 'गा' रूप (पढ़ेगा, चलेगा) का प्रयोग।
आकारांत बहुलता: संज्ञा, विशेषण व क्रिया पदों में आकारांत रूप की प्रधानता (जैसे: लड़का, बड़ा, गया, खेलना)।
तिर्यक एकवचन: आकारांत पुल्लिंग संज्ञाओं का तिर्यक एकवचन एकारांत हो जाता है (जैसे: लड़के ने पढ़ा, बड़े लड़के ने पढ़ा)।
लिंग-वचन संगति: संज्ञा, विशेषण और क्रियाओं में लिंग व वचन के अनुसार परिवर्तन होता है (जैसे: बड़ा लड़का पढ़ता है / बड़ी लड़की पढ़ती है)।

अभ्यास प्रश्न -
भारतीय आर्य भाषाओं का सही विकास क्रम क्या है?उत्तर: वैदिक संस्कृत -> लौकिक संस्कृत -> पालि -> प्राकृत
पूर्वी हिंदी वर्ग के अंतर्गत कौन-सी बोली नहीं आती है?उत्तर: ब्रजभाषा (यह पश्चिमी हिंदी की बोली है)
प्रारंभ में 'पिंगल' नाम किस बोली के लिए प्रयुक्त होता था उत्तर: ब्रजभाषा
मानक हिंदी का मुख्य आधार कौन-सी बोली है? उत्तर: खड़ीबोली
'पूर्वी हिंदी' उपभाषा का उद्भव किस अपभ्रंश से हुआ है? उत्तर: अर्धमागधी अपभ्रंश
भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में वर्तमान में कितनी भाषाएँ शामिल हैं?- उत्तर: 22 भाषाएँ
छत्तीसगढ़ी किस उपभाषा वर्ग की बोली है?- उत्तर: पूर्वी हिंदी
ब्रजभाषा का विकास किस अपभ्रंश से हुआ है? - उत्तर: शौरसेनी अपभ्रंश
भारतीय संविधान के किन अनुच्छेदों में राजभाषा संबंधी प्रावधानों का उल्लेख है?- उत्तर: अनुच्छेद 343 से 351 तक
संविधान के अनुच्छेद 351 में किस विषय का वर्णन है?- उत्तर: हिंदी भाषा के विकास के लिए निर्देश
'मगही' किस उपभाषा वर्ग की बोली है?- उत्तर: बिहारी हिंदी
वर्तमान हिंदी का प्रचलित या मानक रूप कौन-सा है?- उत्तर: खड़ीबोली
अवधी किस उपभाषा वर्ग की बोली है?- उत्तर: पूर्वी हिंदी
छत्तीसगढ़ी बोली किस उपभाषा वर्ग के अंतर्गत आती है?- उत्तर: पूर्वी हिंदी
'भोजपुरी - पूर्वी हिंदी' युग्म गलत क्यों है? उत्तर: क्योंकि भोजपुरी 'बिहारी हिंदी' उपभाषा की बोली है।
'ढूँढाड़ी' (जयपुरी) बोली राजस्थान के किस क्षेत्र में प्रचलित है?उत्तर: जयपुर-टोंक क्षेत्र
पश्चिमी हिंदी और राजस्थानी के बीच की कड़ी कौन-सी बोली मानी जाती है? - उत्तर: मेवाती
'ब्रजभाषा - पश्चिमी उपभाषा - अर्द्धमागधी अपभ्रंश' युग्म असंबद्ध क्यों है?- उत्तर: क्योंकि ब्रजभाषा का विकास 'शौरसेनी अपभ्रंश' से हुआ है, अर्द्धमागधी से नहीं।
हिंदी दिवस किस तिथि को मनाया जाता है?- उत्तर: 14 सितंबर (14 सितंबर 1949 को राजभाषा का दर्जा मिलने के कारण)।
खड़ीबोली को 'कौरवी' नाम किस विद्वान ने दिया था?- उत्तर: राहुल सांकृत्यायन।
मारवाड़ी बोली की साहित्यिक शैली को किस नाम से जाना जाता है?- उत्तर: डिंगल।
हिंदी भाषा की लिपि कौन-सी है?- उत्तर: देवनागरी लिपि।
मैथिली बोली को संविधान की 8वीं अनुसूची में किस संवैधानिक संशोधन द्वारा जोड़ा गया?- उत्तर: 92वें संविधान संशोधन (2003) द्वारा।
'उर्दू' शब्द का मूल शाब्दिक अर्थ क्या है?- उत्तर: शाही शिविर या खेमा।
हिंदी की किस बोली पर गुजराती भाषा का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है?- उत्तर: वागड़ी बोली पर।

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