हिंदी भाषा का उद्भव और विकास

हिंदी भाषा का जन्म और विकास

दुनिया के भाषा-परिवार और हिंदी दुनियाभर में करीब 3,000 भाषाएं बोली जाती हैं, जिन्हें अध्ययन के लिए 13 बड़े भाषा-परिवारों (जैसे द्रविड़, चीनी, भारोपीय आदि) में बांटा गया है। हमारी हिंदी भाषा भारोपीय (भारत-यूरोपीय) भाषा-परिवार का हिस्सा है।

भारोपीय भाषा-परिवार
नामकरण व मूल स्थान: भारत और यूरोप तथा उनके आसपास के इलाकों में बोले जाने के कारण इसे 'भारोपीय' कहा जाता है। इस परिवार के लोगों का मूल निवास कहाँ था, इसे लेकर मतभेद हैं, लेकिन सबसे प्रचलित मान्यता के अनुसार यूराल पर्वत के दक्षिण-पूर्व में स्थित 'ब्रांदेश्ताइन' (किरगीज के मैदान) को इनका मूल स्थान माना जाता है।
दो मुख्य शाखाएँ: भारोपीय परिवार आगे चलकर दो प्रमुख वर्गों में बँट गया:
कैंतुम: इसमें तोखारियन, केल्टिक, जर्मनिक, इटालिक, ग्रीक और इलीरियन जैसी भाषाएं आती हैं।
सतम्: इसमें अल्बानियन, आर्मीनियन, बाल्टोस्लाविक, थेसो-फ्रीजियन और भारत-ईरानी भाषाएं शामिल हैं।

भारत-ईरानी (आर्य शाखा) और उसका विभाजन सतम् वर्ग की 'भारत-ईरानी' शाखा को 'आर्य शाखा' भी कहते हैं। इस समूह के लोग जब अपने मूल स्थान से निकले, तो कुछ ईरान की तरफ चले गए, कुछ कश्मीर व आसपास बस गए, और कुछ भारत के मैदानी इलाकों में आ पहुँचे। इसी आधार पर भारत-ईरानी शाखा तीन भागों में बँट गई:
ईरानी
दरद
भारतीय आर्यभाषा

भारतीय आर्यभाषा का इतिहास ईरानी और दरद समूहों से अलग होकर भारतीय आर्य लगभग 1500 ई.पू. के आसपास भारत के उत्तर-पश्चिम सीमा से दाखिल हुए। यहीं से भारत में आर्यभाषा की शुरुआत मानी जाती है। भारतीय आर्यभाषा के इस लगभग 3,500 साल लंबे सफर को तीन काल-खंडों में बांटा जाता है:
प्राचीन भारतीय आर्यभाषाएँ: 1500 ई.पू. से 500 ई.पू.
मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषाएँ: 500 ई.पू. से 1000 ई.
आधुनिक भारतीय आर्यभाषाएँ: 1000 ई. से अब तक

प्राचीन भारतीय आर्यभाषाएँ (1500 ई.पू. से 500 ई.पू.) भारत में आगमन के बाद आर्यों ने यहाँ के मूल निवासियों के संपर्क में आकर एक नई भाषा-शैली विकसित की। इसका सबसे पुराना रूप वैदिक संहिताओं में देखने को मिलता है, जिनकी रचना 1200 ई.पू. से 900 ई.पू. के बीच मानी जाती है। इस भाषा को संस्कृत कहा गया (हालाँकि 'संस्कृत' शब्द का पहला लिखित प्रयोग महर्षि वाल्मीकि की 'रामायण' में मिलता है)।

प्राचीन संस्कृत के दो रूप मिलते हैं:
वैदिक संस्कृत (1500 ई.पू. से 800 ई. पू. तक)
लौकिक संस्कृत (800 ई.पू. से 500 ई. पू. तक)

भाषा का काल-क्रम विभाजन

भारतीय आर्य भाषाओं का विकास तीन चरणों में हुआ है:
प्राचीन भारतीय आर्य भाषाएँ (1500 ई.पू. से 500 ई.पू.):
वैदिक संस्कृत (1500 ई.पू. से 800 ई.पू.): इसमें वेद, उपनिषद और ब्राह्मण ग्रंथ रचे गए।
लौकिक संस्कृत (800 ई.पू. से 500 ई.पू.): महर्षि पाणिनि ने ‘अष्टाध्यायी’ के माध्यम से इसका व्याकरण स्थिर किया।
मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषाएँ (500 ई.पू. से 1000 ई.):
पहली प्राकृत / पालि (500 ई.पू. से 1 ई.): यह आम जनता की भाषा थी। बुद्ध के उपदेश और बौद्ध ग्रंथ (जातक, धम्मपद आदि) इसी भाषा में हैं। इसे ‘मागधी’ भी कहा जाता है।
दूसरी प्राकृत / प्राकृत (1 ई. से 500 ई.): क्षेत्र के आधार पर इसके अनेक रूप बने, जैसे- शौरसेनी, पैशाची, महाराष्ट्री, अर्धमागधी, मागधी आदि।
तीसरी प्राकृत / अपभ्रंश (500 ई. से 1000 ई.): जब प्राकृत भाषा के रूप में बिगाड़ आया, तो उसे 'अपभ्रंश' या 'अवहट्ठ' कहा गया। यह प्राचीन प्राकृत और आधुनिक हिंदी के बीच की कड़ी है।
आधुनिक भारतीय आर्य भाषाएँ (1000 ई. से अब तक):
अपभ्रंश से हिंदी, सिंधी, लहंदा, पंजाबी, गुजराती, मराठी, बंगला, उड़िया, असमी आदि आधुनिक भाषाओं का विकास हुआ।
प्रमुख आधुनिक आर्य भाषाएँ एवं लिपि
भाषामुख्य क्षेत्रलिपि
हिंदी उत्तर और मध्य भारत देवनागरी
पंजाबी पंजाब गुरुमुखी
सिंधी सिंध क्षेत्र / पाकिस्तान फ़ारसी आधारित
गुजराती गुजरात गुजराती
मराठी महाराष्ट्र देवनागरी
नेपाली नेपाल देवनागरी

हिंदी भाषा का उपभाषा और बोली वर्गीकरण

हिंदी का विकास मुख्य रूप से तीन अपभ्रंशों (शौरसेनी, अर्धमागधी, मागधी) से हुआ है:
पश्चिमी हिंदी (शौरसेनी अपभ्रंश से):
खड़ी बोली, ब्रज, बांगरू, बुंदेली, कन्नौजी, दक्खिनी।
पूर्वी हिंदी (अर्धमागधी अपभ्रंश से):
अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी।
राजस्थानी (शौरसेनी अपभ्रंश से):
मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूँढाड़ी, हाड़ौती, मेवाती, मालवी, बागड़ी।
पहाड़ी:
पश्चिमी पहाड़ी, गढ़वाली, कुमाऊँनी।
बिहारी (मागधी अपभ्रंश से):
भोजपुरी, मैथिली, मगही।
'हिंदी' शब्द का शाब्दिक अर्थ
'हिंदी' शब्द का संबंध संस्कृत के 'सिंधु' शब्द से है।
इरानियों के उच्चारण में 'स' का 'ह' तथा 'ध' का 'द' हो जाने से 'सिंधु' शब्द 'हिंदू' और आगे चलकर 'हिंद' बना।
'हिंद' में ई-प्रत्यय लगाने से 'हिंदी' शब्द बना, जिसका अर्थ है— "हिंद का या हिंद की भाषा"।
विश्व के भाषा-परिवार में हिंदी का स्थान
हिंदी 'भारोपीय' (भारत-यूरोपीय) भाषा-परिवार की भाषा है।
भारोपीय की 'केंतुम्' शाखा के अंतर्गत 'भारत-ईरानी' उपशाखा से संस्कृत और आगे चलकर हिंदी का विकास हुआ।

प्रश्न 1: पालि भाषा किसे कहते हैं और इसके मुख्य साहित्य कौन-से हैं? उत्तर: प्रथम प्राकृत भाषा को 'पालि' भाषा कहा जाता है। गौतम बुद्ध के उपदेश और बौद्ध साहित्य (जैसे- जातक, धम्मपद, मिलिंदपन्हो, महावंश) पालि भाषा में ही लिखे गए हैं।

प्रश्न 2: अपभ्रंश भाषा का क्या अर्थ है? उत्तर: जब प्राकृत भाषा के रूप में परिवर्तन आया और व्याकरण ढीला पड़ा, तो बिगड़े हुए रूप को पण्डितों ने 'अपभ्रंश' कहा। यह प्राचीन प्राकृत और आधुनिक हिंदी के बीच की कड़ी है।

प्रश्न 3: हिंदी शब्द की व्युत्पत्ति किस शब्द से हुई है? उत्तर: हिंदी शब्द का मूल आधार संस्कृत का 'सिंधु' शब्द है। फारसी/ईरानी प्रभाव के कारण सिंधु से 'हिंदू' -> 'हिंद' -> 'हिंदी' बना।

प्रश्न 4: पूर्वी हिंदी के अंतर्गत कौन-कौन सी बोलियाँ आती हैं? उत्तर: पूर्वी हिंदी के अंतर्गत 3 मुख्य बोलियाँ आती हैं— अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी।

प्रश्न 5: पंजाबी भाषा की लिपि का क्या नाम है? उत्तर: पंजाबी भाषा की लिपि 'गुरुमुखी' है।
'हिंदी' शब्द की व्युत्पत्ति एवं अर्थ
(क) शब्द की व्युत्पत्ति

'हिंदी' शब्द का मूल संबंध संस्कृत के 'सिंधु' शब्द से है।
ईरानियों (फ़ारसी भाषियों) के उच्चारण नियम के अनुसार 'स' का उच्चारण 'ह' तथा 'ध' का उच्चारण 'द' किया जाता था (जैसे: सड़क \rightarrow हड़का, सीरा \rightarrow हीरा)।
इसके कारण सिंधु नदी के पूर्व में रहने वाले लोगों और उनके क्षेत्र को 'हिंद' कहा गया।
'हिंद' शब्द में फ़ारसी का 'ई' प्रत्यय जोड़ने से 'हिंदी' शब्द की निष्पत्ति हुई, जिसका प्रारंभिक अर्थ था— "हिंद (भारत) का या भारत की भाषा"।
(ख) 'हिंदी' शब्द के मुख्य चार अर्थ
व्यापक (भौगोलिक) अर्थ: प्राचीन काल में सिंधु नदी के पूर्व के पूरे भू-भाग और उससे संबंधित वस्तुओं/लोगों के लिए इस शब्द का प्रयोग होता था।
सामान्य अर्थ (13वीं से 18वीं शताब्दी): मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और पंजाब क्षेत्र में बोली जाने वाली विभिन्न क्षेत्रीय बोलियों के समूह को हिंदी कहा गया।
विशिष्ट (मानक) अर्थ: 19वीं शताब्दी से यह अर्थ सर्वाधिक प्रचलित हुआ। आज हिंदी भारत संघ की राजभाषा, भारत के 10 राज्यों (उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली) और अंडमान-निकोबार की आधिकारिक भाषा है। यह मुख्यतः खड़ी बोली के साहित्यिक एवं परिमार्जित रूप का प्रतिनिधित्व करती है।
भाषावैज्ञानिक अर्थ: भाषाविज्ञान की दृष्टि से हिंदी उत्तर भारत में बोली जाने वाली 5 उपभाषाओं एवं 22 बोलियों के समूह (Cluster) का प्रतिनिधित्व करने वाली एक स्वतंत्र भाषा है।
हिंदी भाषा का ऐतिहासिक विकासक्रम

हिंदी भाषा का विकासक्रम निम्नलिखित चरणों में विभाजित है:

अपभ्रंश से हिंदी तक के विकास क्रम को और अधिक स्पष्ट, सटीक और प्रमाणिक रूप में व्यवस्थित कर दिया गया है। आप इसे सीधे अपनी कॉपी में उत्तर या नोट्स के रूप में लिख सकते हैं।
हिंदी का वास्तविक विकास क्रम

हिंदी भाषा का विकास एक सीधी श्रृंखला में हुआ है। सबसे पहले वैदिक संस्कृत से लौकिक संस्कृत बनी, फिर आम जन की प्राकृत भाषाएँ आईं और अंत में अपभ्रंश से modern हिंदी का जन्म हुआ।वैदिक संस्कृत ──► लौकिक संस्कृत ──► पालि (प्रथम प्राकृत) ──► प्राकृत (द्वितीय प्राकृत) ──► अपभ्रंश (तृतीय प्राकृत / अवहट्ठ) ──► प्रारंभिक हिंदी ──► आधुनिक हिंदी

1. काल-क्रमानुसार विकास के चरण
(1) प्राचीन भारतीय आर्य भाषाएँ (1500 ई.पू. से 500 ई.पू.)
वैदिक संस्कृत (1500 ई.पू. – 800 ई.पू.): वेदों, उपनिषदों और ऋचाओं की भाषा।
लौकिक संस्कृत (800 ई.पू. – 500 ई.पू.): रामायण, महाभारत और पाणिनि के व्याकरण ('अष्टाध्यायी') द्वारा नियमबद्ध भाषा।
(2) मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषाएँ (500 ई.पू. से 1000 ई.)
पालि / प्रथम प्राकृत (500 ई.पू. – 1 ई.): महात्मा बुद्ध के उपदेश और बौद्ध साहित्य (त्रिपिटक, जातक कथाएँ)।
प्राकृत / द्वितीय प्राकृत (1 ई. – 500 ई.): भगवान महावीर के उपदेश और जैन साहित्य। क्षेत्रीय आधार पर इसके विविध रूप (शौरसेनी, मागधी, अर्धमागधी आदि) प्रचलित हुए।
अपभ्रंश / अवहट्ठ / तृतीय प्राकृत (500 ई. – 1000 ई.): प्राकृत भाषा का परिवर्तित/अपभ्रंश रूप, जो पुरानी हिंदी और प्राकृत के बीच की संक्रमणकालीन कड़ी है।
(3) आधुनिक भारतीय आर्य भाषाएँ (1000 ई. से अब तक)
प्रारंभिक/पुरानी हिंदी (1000 ई. – 1500 ई.): अपभ्रंश के विभिन्न रूपों से हिंदी की बोलियों का जन्म।
मध्यकालीन हिंदी (1500 ई. – 1800 ई.): अवधी और ब्रजभाषा का स्वर्ण काल (तुलसीदास, सूरदास)।
आधुनिक हिंदी (1800 ई. से अब तक): खड़ी बोली हिंदी का मानक, साहित्यिक और राजभाषा के रूप में विकास।
2. अपभ्रंशों से हिंदी की उपभाषाओं का विकास (सटीक वर्गीकरण)

हिंदी की 5 उपभाषाएँ और उनकी बोलियाँ मुख्य रूप से तीन अपभ्रंशों से निकली हैं: ┌──► शौरसेनी अपभ्रंश ──► पश्चिमी हिंदी, राजस्थानी, पहाड़ी │ अपभ्रंश (Apabhramsha) ──┼──► अर्धमागधी अपभ्रंश ──► पूर्वी हिंदी │ └──► मागधी अपभ्रंश ──► बिहारी हिंदी

1. शौरसेनी अपभ्रंश
पश्चिमी हिंदी: खड़ी बोली (कौरवी), ब्रजभाषा, बुंदेली, कन्नौजी, हरियाणवी (बांगरू)।
राजस्थानी: मारवाड़ी, जयपुरी (ढूँढाड़ी), मेवाती, मालवी।
पहाड़ी: गढ़वाली, कुमाऊँनी, पश्चिमी पहाड़ी।
2. अर्धमागधी अपभ्रंश
पूर्वी हिंदी: अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी।
3. मागधी अपभ्रंश
बिहारी हिंदी: भोजपुरी, मैथिली, मगही।

हिंदी का विकास मुख्य रूप से शौरसेनी, अर्धमागधी तथा मागधी अपभ्रंशों से हुआ है।

प्रश्न: हिंदी की जननी (मूल भाषा) किसे माना जाता है? उत्तर: हिंदी की मूल जननी संस्कृत भाषा है, जबकि हिंदी का सीधा (निकटतम) विकास अपभ्रंश से हुआ है।

प्रश्न: अवधी और ब्रजभाषा का विकास किस-किस अपभ्रंश से हुआ है? उत्तर:

अवधी का विकास अर्धमागधी अपभ्रंश (पूर्वी हिंदी) से हुआ है।
ब्रजभाषा का विकास शौरसेनी अपभ्रंश (पश्चिमी हिंदी) से हुआ है।
काल-विभाजन (हिंदी के 1000 वर्षों का इतिहास)
प्रारंभिक काल (आदिकाल): 1000 ई. से 1500 ई.
मध्यकाल (भक्तिकाल एवं रीतिकाल): 1500 ई. से 1800 ई.
आधुनिक काल: 1800 ई. से अब तक
3. हिंदी के जन्मकाल पर विद्वानों के विचार
आचार्य रामचंद्र शुक्ल: अपभ्रंश या 'प्राकृताभास हिंदी' के पद्यों का सबसे पुराना पता 7वीं शताब्दी के सिद्ध बौद्धों की रचनाओं में मिलता है। मुंज और भोज के समय (विक्रम संवत् 1050 / लगभग 993 ई.) पुरानी हिंदी का पूर्ण विकास हो चुका था।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी: हेमचंद्राचार्य (1088-1172 ई.) द्वारा वर्णित अपभ्रंश की 'ग्राम्य' भाषा ही आगे चलकर देशी भाषाओं (हिंदी) में विकसित हुई।
डॉ. धीरेंद्र वर्मा: 1000 ई. के आसपास मध्यकालीन आर्यभाषा अपभ्रंश ने परिवर्तित होकर आधुनिक आर्यभाषाओं का रूप ग्रहण कर लिया।
चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी': 7वीं से 11वीं शताब्दी तक अपभ्रंश की प्रधानता रही, जो आगे चलकर 'पुरानी हिंदी' में परिणत हो गई।
डॉ. भोलानाथ तिवारी: भाषा का विकास अचानक नहीं होता; अतः व्यावहारिक एवं साहित्यिक साक्ष्यों के आधार पर हिंदी भाषा का आरंभ 1000 ई. के आसपास ही माना जाना सर्वथा उपयुक्त है।
4. प्रारंभिक काल (1000 ई. से 1500 ई.) की भाषिक विशेषताएँ

इस काल में सिद्धों, नाथों, जैन आचार्यों तथा अमीर खुसरो, विद्यापति, कबीर और चंदबरदाई जैसे कवियों की रचनाओं में प्रारंभिक हिंदी का स्वरूप प्रकट हुआ।
क्षेत्रअपभ्रंश की स्थितिप्रारंभिक हिंदी की स्थिति (परिवर्तन)
ध्वनि (Sounds) केवल 8 स्वर थे (अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ओ)। 2 नए विकसित स्वर 'ऐ' और 'औ' जुड़ गए।
स्पर्श व्यंजन थे। च, छ, ज, झ ध्वनियाँ स्पर्श-संघर्षी हो गईं।
'ड़' और 'ढ़' ध्वनियाँ नहीं थीं। 'ड़' और 'ढ़' नए उत्क्षिप्त व्यंजनों का विकास हुआ।
द्वित्व व्यंजनों (जैसे- कम्म) का प्रयोग अधिक था। द्वित्व व्यंजन एकल व्यंजनों में बदलने लगे (जैसे- कम्म \rightarrow काम)।
व्याकरण (Grammar) भाषा संश्लेषणात्मक/संयोगात्मक अधिक थी। भाषा विश्लेषणात्मक/वियोगात्मक होने लगी; परसर्गों (कारक चिह्नों) और सहायक क्रियाओं का प्रयोग शुरू हुआ।
नपुंसक लिंग के अवशेष विद्यमान थे। नपुंसक लिंग समाप्त हो गया; केवल पुल्लिंग और स्त्रीलिंग दो लिंग शेष रहे।
शब्द-भंडार (Vocabulary) तद्भव शब्दों का आधिक्य था। भक्ति आंदोलन के प्रभाव से तत्सम शब्दों का प्रयोग बढ़ा। मुसलमानों के आगमन से अरबी-फ़ारसी के शब्द आने लगे।

5. मध्यकाल (1500 ई. से 1800 ई.) की भाषिक विशेषताएँ

यह काल राजनीतिक दृष्टि से मुग़ल शासन तथा साहित्यिक दृष्टि से भक्तिकालीन एवं रीतिकालीन काव्य का स्वर्ण युग रहा। इस काल में अवधी (जायसी, तुलसीदास) और ब्रजभाषा (सूरदास, बिहारी, घनानंद) अपने चरम उत्कर्ष पर पहुँचीं।
मुख्य भाषिक एवं व्याकरणिक परिवर्तन:
अ-कार लोप (ध्वनि परिवर्तन): शब्दों के अंत तथा मध्य में आने वाले मूल व्यंजन के 'अ' स्वर का लोप होने लगा।
उदा. राम \rightarrow राम्‍, जप ता \rightarrow जपता, का म \rightarrow काम, जन ता \rightarrow जनता।
विदेशी ध्वनियों का समावेश: अरबी-फ़ारसी के संपर्क से पाँच नई ध्वनियाँ क, ख, ग, ज़, फ़ (नुक्ता युक्त) हिंदी में व्यापक रूप से प्रयुक्त होने लगीं।
व्याकरणिक स्पष्टता: भाषा पूरी तरह वियोगात्मक हो गई। कर्ता कारक के 'ने' परसर्ग तथा सहायक क्रियाओं (है, था, थे, होंगे) का प्रयोग स्पष्ट और नियमित हो गया।
परीक्षा-उपयोगी महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1: 'हिंदी' शब्द मूलतः किस भाषा का शब्द है और इसका ऐतिहासिक आधार क्या है? उत्तर: 'हिंदी' शब्द मूलतः फ़ारसी भाषा का शब्द है। इसका ऐतिहासिक आधार संस्कृत का 'सिंधु' शब्द है, जिसे ईरानी लोग 'हिंदू' या 'हिंद' कहते थे।

प्रश्न 2: भाषावैज्ञानिक दृष्टि से हिंदी भाषा का क्या अर्थ है? उत्तर: भाषाविज्ञान की दृष्टि से हिंदी भारत के विशाल भू-भाग में बोली जाने वाली 5 उपभाषाओं (पश्चिमी हिंदी, पूर्वी हिंदी, राजस्थानी, बिहारी, पहाड़ी) और उनकी 22 बोलियों के समूह को व्यक्त करने वाली एक एकीकृत भाषा है।

प्रश्न 3: अपभ्रंश से प्रारंभिक हिंदी में प्रवेश करते समय कौन-कौन से दो नए स्वर विकसित हुए? उत्तर: अपभ्रंश के 8 मूल स्वरों के अलावा प्रारंभिक हिंदी में 'ऐ' और 'औ' दो नए स्वर विकसित हुए।

प्रश्न 4: मध्यकालीन हिंदी की दो प्रमुख साहित्यिक भाषाओं के नाम और उनके प्रतिनिधि कवियों के नाम लिखिए। उत्तर:
अवधी: मलिक मोहम्मद जायसी, गोस्वामी तुलसीदास।
ब्रजभाषा: सूरदास, नंददास, बिहारी, घनानंद।



प्रश्न 5: हिंदी भाषा का जन्मकाल लगभग कब से स्वीकार किया जाता है? उत्तर: सर्वसम्मति एवं भाषावैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर हिंदी भाषा का जन्मकाल 1000 ईस्वी के आसपास माना जाता है।
हिंदी का आधुनिक काल (1800 ई. से अब तक)

1800 ई. के बाद ब्रिटिश शासन के प्रसार और स्वतंत्रता आंदोलन के संघर्ष से हिंदी एक सशक्त, व्यावहारिक और राष्ट्रीय चेतना की भाषा बनी। भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग, छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद तथा नई कविता के माध्यम से इसका अभूतपूर्व विकास हुआ।
आधुनिक काल की भाषिक एवं व्याकरणिक विशेषताएँ
ध्वनिगत परिवर्तन:
अरबी-फ़ारसी के प्रभाव से क, ख, ग, ज़, फ़ ध्वनियाँ आईं। अंग्रेज़ी के प्रभाव से 'ऑ' स्वर (जैसे: डॉक्टर, ऑफ़िस) तथा 'ड्र' संयुक्त व्यंजन (जैसे: ड्राइवर, ड्रिल) हिंदी में समाहित हुए।
ऐ और औ स्वर मानक हिंदी में मूल स्वर के रूप में उच्चारित होते हैं, जबकि पूर्वी बोलियों में ये संयुक्त स्वर (अइ, अउ) के रूप में बोले जाते हैं।
व्याकरणगत परिवर्तन:
हिंदी पूर्णतः वियोगात्मक (विश्लेषणात्मक) भाषा बन चुकी है।
प्रिंट, मीडिया और शिक्षा के माध्यम से इसका मानक व्याकरण सुनिश्चित हो चुका है।
गद्य के तीव्र प्रसार से वाक्य संरचना अधिक विविध और स्पष्ट हो गई है।
शब्द-भंडार:
तत्सम, तद्भव, देशज और अरबी-फ़ारसी के साथ-साथ पुर्तगाली, फ़्रांसीसी, डच और अंग्रेज़ी के हज़ारों शब्द शामिल हुए।
आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के लिए 5 लाख से अधिक तकनीकी शब्दों का निर्माण किया गया है।
अपभ्रंश, हिंदी की उपभाषाएँ और बोलियाँ (22 बोलियों का विवरण)

हिंदी मुख्य रूप से 5 उपभाषाओं और 22 बोलियों का एक समूह (Cluster) है:
अपभ्रंश का रूपउपभाषा समूहप्रमुख बोलियाँ
शौरसेनी अपभ्रंश 1. पश्चिमी हिंदी खड़ीबोली, ब्रजभाषा, बांगरू, बुंदेली, कन्नौजी, दक्खिनी
शौरसेनी अपभ्रंश 2. राजस्थानी मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूँढाड़ी, हाड़ौती, मेवाती, वागड़ी, मालवी
शौरसेनी अपभ्रंश 3. पहाड़ी गढ़वाली, कुमाऊँनी, पश्चिमी पहाड़ी
अर्धमागधी अपभ्रंश 4. पूर्वी हिंदी अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी
मागधी अपभ्रंश 5. बिहारी मैथिली, भोजपुरी, मगही

उपभाषाओं एवं बोलियों का विस्तृत विवरण
(I) पश्चिमी हिंदी की बोलियाँ
खड़ीबोली (कौरवी / हिंदुस्तानी):
क्षेत्र: मेरठ, बिजनौर, मुज़फ़्फ़रनगर, सहारनपुर, दिल्ली, देहाती क्षेत्र।
विशेषता: लल्लूलाल ने 1803 में इसे 'खड़ीबोली' नाम दिया। यही बोली आज की मानक हिंदी (Standard Hindi) का मुख्य आधार बनी।
बांगरू (हरियाणवी):
क्षेत्र: हरियाणा (करनाल, रोहतक, हिसार) तथा दिल्ली के ग्रामीण क्षेत्र।
विशेषता: शुष्क/उच्च भूमि क्षेत्र (बांगरू) के कारण यह नाम पड़ा। इसमें लोक-साहित्य प्रचुर मात्रा में है।
ब्रजभाषा (अंतर्वेदी):
क्षेत्र: मथुरा, आगरा, अलीगढ़, एटा, मैनपुरी, बरेली, तथा राजस्थान के भरतपुर, धौलपुर।
विशेषता: मध्यकाल की सबसे प्रमुख साहित्यिक बोली। सूरदास, मीराबाई, रसखान, बिहारी, घनानंद तथा भारतेंदु की रचनाओं की भाषा रही।
बुंदेली:
क्षेत्र: बुंदेलखंड (झांसी, जालौन, हमीरपुर, छतरपुर, सागर, ग्वालियर)।
विशेषता: केशवदास, पद्माकर और जगनिक (आल्हाखंड) इस क्षेत्र के प्रमुख कवि हैं।
कन्नौजी:
क्षेत्र: फ़ारुख़ाबाद, कन्नौज, इटावा, कानपुर, पीलीभीत।
विशेषता: यह ब्रजभाषा से अत्यधिक समानता रखती है।
दक्खिनी (दक्खिनी हिंदी):
क्षेत्र: हैदराबाद, बीजापुर, गोलकुंडा, महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के क्षेत्र।
विशेषता: उत्तर भारत के सैनिकों/मुसलमानों द्वारा दक्षिण पहुँचने पर इसका विकास हुआ। कुली कुतुबशाह और मुल्ला वजही इसके मुख्य रचनाकार रहे।
(II) पूर्वी हिंदी की बोलियाँ
अवधी:
क्षेत्र: लखनऊ, अयोध्या (फ़ैज़ाबाद), उन्नाव, रायबरेली, गोंडा, प्रतापगढ़, प्रयागराज।
विशेषता: मलिक मोहम्मद जायसी (पद्मावत) और गोस्वामी तुलसीदास (रामचरितमानस) के महाकाव्यों की अमर भाषा।
बघेली:
क्षेत्र: रीवाँ, सतना, शहडोल, सीधी, जबलपुर।
विशेषता: इसे अवधी की ही उपबोली भी माना जाता है।
छत्तीसगढ़ी:
क्षेत्र: रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, सरगुजा, रायगढ़, बस्तर।
विशेषता: छत्तीसगढ़ राज्य की सांस्कृतिक और लोक-साहित्य की प्रमुख भाषा।
(III) बिहारी उपभाषा की बोलियाँ
मैथिली:
क्षेत्र: दरभंगा, मधुबनी, मुज़फ़्फ़रपुर, पूर्णिया, भागलपुर।
विशेषता: महान कवि विद्यापति (विद्यापति पदावली) की भाषा। इसे संविधान की 8वीं अनुसूची में भी स्थान प्राप्त है।
भोजपुरी:
क्षेत्र: वाराणसी, गोरखपुर, बलिया, गाज़ीपुर, आज़मगढ़, छपरा, सिवान, भोजपुर।
विशेषता: देश-विदेश में सर्वाधिक बोली जाने वाली हिंदी की बोली; इसका लोक-साहित्य और सिनेमा अत्यंत समृद्ध है।
मगही:
क्षेत्र: पटना, गया, हज़ारीबाग, नालंदा।
विशेषता: प्राचीन 'मगध' साम्राज्य के भू-भाग की बोली।
(IV) पहाड़ी उपभाषा की बोलियाँ
गढ़वाली:
क्षेत्र: उत्तराखंड का गढ़वाल मंडल (टिहरी, पौड़ी, चमोली, उत्तरकाशी)।
विशेषता: केदारखंड क्षेत्र की प्रमुख लोक-भाषा।
कुमाऊँनी:
क्षेत्र: उत्तराखंड का कुमाऊँ मंडल (अल्मोड़ा, नैनीताल, पिथौरागढ़)।
विशेषता: गुमानी पंत और शिवदत्त सती द्वारा रचा गया विशाल लोक-साहित्य।
पश्चिमी पहाड़ी:
क्षेत्र: हिमाचल प्रदेश (शिमला, मण्डी, चम्बा, कुल्लू, लाहुल-स्पीति)।
विशेषता: पूर्व में इसकी लिपि टाकरी थी, अब यह देवनागरी में लिखी जाती है।
(V) राजस्थानी उपभाषा की बोलियाँ
मारवाड़ी:
क्षेत्र: जोधुपर, बीकानेर, नागौर, पाली, जैसलमेर, बाड़मेर, जालोर।
विशेषता: ऐतिहासिक रूप से 'मरुभाषा' (कुवलयमाला 778 ई.)। इसकी साहित्यिक शैली को 'डिंगल' कहा जाता है। इसमें 'ण' और 'ळ' ध्वनियों का बाहुल्य होता है।
मेवाड़ी:
क्षेत्र: उदयपुर, चित्तौड़गढ़, राजसमंद, भीलवाड़ा।
विशेषता: 'मेवाड़' (मेदपाट) क्षेत्र की बोली; इसमें 'ऐ' और 'औ' का उच्चारण 'ए' और 'ओ' जैसा होता है।
ढूँढाड़ी (जयपुरी):
क्षेत्र: जयपुर, दौसा, टोंक, अजमेर।
विशेषता: ढूँढ नदी के क्षेत्र की बोली। संत दादू दयाल का साहित्य इसी में है। इसमें सहाय क्रिया के रूप में छै, छूँ, छा का प्रयोग होता है।
हाड़ौती:
क्षेत्र: कोटा, बूंदी, झालावाड़, बाराँ।
विशेषता: हाड़ा राजवंश के प्रभुत्व वाले क्षेत्र की बोली।
मेवाती:
क्षेत्र: अलवर, भरतपुर, गुड़गाँव (हरियाणा) का मेवात क्षेत्र।
विशेषता: यह पश्चिमी हिंदी और राजस्थानी के बीच सेतु का कार्य करती है।
वागड़ी:
क्षेत्र: डूंगरपुर और बाँसवाड़ा (वागड़ क्षेत्र)।
विशेषता: इस बोली पर गुजराती भाषा का स्पष्ट प्रभाव देखा जाता है।
मालवी:
क्षेत्र: मालवा क्षेत्र— झालावाड़ (राजस्थान), इंदौर, भोपाल, उज्जैन, रतलाम (मध्य प्रदेश)।
विशेषता: सोंधवाड़ी, निमाड़ी और रतलामी इसकी मुख्य उपबोलियाँ हैं।
अभ्यास प्रश्नोत्तरी

प्रश्न 1: मानक हिंदी का विकास किस बोली से हुआ है? उत्तर: मानक हिंदी (Standard Hindi) का विकास शौरसेनी अपभ्रंश की खड़ीबोली (कौरवी) से हुआ है।

प्रश्न 2: 'डिंगल' शैली किस बोली का साहित्यिक रूप है? उत्तर: डिंगल शैली मुख्य रूप से मारवाड़ी बोली की साहित्यिक एवं वीर-रसात्मक रचना शैली है।

प्रश्न 3: मैथिली बोली के सबसे प्रसिद्ध कवि कौन हैं? उत्तर: मैथिली बोली के सबसे प्रसिद्ध और कालजयी कवि विद्यापति हैं।



प्रश्न 4: राजस्थानी भाषा की उस बोली का नाम बताइए जिस पर गुजराती का सबसे गहरा प्रभाव है? उत्तर: डूंगरपुर और बाँसवाड़ा क्षेत्र की वागड़ी बोली पर गुजराती का सबसे गहरा प्रभाव है।

दिए गए पृष्ठों के आधार पर हिंदी का मानक रूप, इसकी शैलियाँ और भाषागत विशेषताओं के विस्तृत नोट्स नीचे प्रस्तुत हैं:
हिंदी का मानक रूप

हिंदी के मुख्य रूप से दो रूप हैं:
क्षेत्रीय 22 बोलियों का संकुल
मानक हिंदी (हिंदी का केंद्रवर्ती रूप)
उद्भव एवं विकास
बीम्ज़, ग्रियर्सन, सुनीतिकुमार चटर्जी तथा धीरेंद्र वर्मा के अनुसार मानक रूप कौरवी (खड़ीबोली) से विकसित हुआ है।
भोलानाथ तिवारी का मत है कि यह हरियाणवी, ब्रज और दिल्ली की खड़ीबोली का मिश्रित रूप है, जो दिल्ली में फ़ारसी की छाया में विकसित हुआ।
संवैधानिक स्थिति: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343(1) में खड़ीबोली रूप को संघ की राजभाषा और देवनागरी को इसकी लिपि माना गया है। संविधान के भाग 17 (अनुच्छेद 343 से 351) तथा 8वीं अनुसूची में इसे स्थान प्राप्त है।
हिंदी की प्रमुख शैलियाँ

मानक हिंदी की विभिन्न शैलियाँ (हिंदी, उर्दू, रेख़्ता, हिंदुस्तानी आदि) प्रचलित हैं:
उर्दू:
इसका मूल अर्थ 'शाही शिविर या खेमा' है।
इसमें अरबी-फ़ारसी शब्दावली की प्रधानता होती है।
यह संविधान की 8वीं अनुसूची में सम्मिलित है तथा उत्तर प्रदेश व बिहार की दूसरी राजभाषा है।
रेख़्ता:
इसका अर्थ 'बनाना या मिलाना' है।
हिंदी व्याकरण में अरबी-फ़ारसी शब्दावली मिलाकर बनाई गई शैली। स्त्रियों द्वारा बोली जाने वाली इस मिश्रित भाषा को रेख़्ती कहा गया।
हिंदुस्तानी:
हिंदी और उर्दू के बीच की सरल भाषा।
1926 के कांग्रेस अधिवेशन में पुरुषोत्तमदास टंडन तथा महात्मा गांधी द्वारा इसे बढ़ावा दिया गया।
हिंदवी / हिंदुओं की भाषा:
प्राचीन हिंदी के लिए अमीर ख़ुसरो के समय से प्रयुक्त नाम। संस्कृत शब्दावली युक्त रूप को हिंदवी/हिंदुई और अरबी-फ़ारसी युक्त रूप को हिंदुस्तानी कहा गया।
मानक हिंदी की भाषागत विशेषताएँ


स्वरों का उच्चारण: 'ऐ' तथा 'औ' का उच्चारण मूल स्वर के रूप में होता है (अइ या अउ के रूप में नहीं)।
अ-स्वर का लुप्त होना: शब्द के मध्य में स्थित 'अ' स्वर का उच्चारण कभी-कभी लुप्त हो जाता है; जैसे: जंता (जनता), काम्ना (कामना)।
ध्वनि भेद: 'स' तथा 'श' व्यंजनों का अलग-अलग स्पष्ट उच्चारण।
अर्द्धस्वर: 'य' तथा 'व' का प्रयोग अर्द्धस्वरों की तरह होता है (य का ज या व का ब में परिवर्तन नहीं होता)।
व्यंजन गुच्छ एवं द्वित्व: शुद्ध उच्चारण (जैसे: पट्टी, खट्टी) तथा द्वित्व का सटीक प्रयोग (जैसे: मिट्टी, खड्डा)।
कारक चिह्न:
भूतकाल में सकर्मक क्रिया आने पर 'ने' कर्ता कारक चिह्न का प्रयोग।
संबंधसूचक के रूप में 'का' का प्रयोग।
क्रिया रूप: भूतकालिक कृदंतों में आकारांत (पढ़ा, चला) तथा भविष्यकाल में 'गा' रूप (पढ़ेगा, चलेगा) का प्रयोग।
आकारांत बहुलता: संज्ञा, विशेषण व क्रिया पदों में आकारांत रूप की प्रधानता (जैसे: लड़का, बड़ा, गया, खेलना)।
तिर्यक एकवचन: आकारांत पुल्लिंग संज्ञाओं का तिर्यक एकवचन एकारांत हो जाता है (जैसे: लड़के ने पढ़ा, बड़े लड़के ने पढ़ा)।
लिंग-वचन संगति: संज्ञा, विशेषण और क्रियाओं में लिंग व वचन के अनुसार परिवर्तन होता है (जैसे: बड़ा लड़का पढ़ता है / बड़ी लड़की पढ़ती है)।

अभ्यास प्रश्न -
भारतीय आर्य भाषाओं का सही विकास क्रम क्या है?उत्तर: वैदिक संस्कृत -> लौकिक संस्कृत -> पालि -> प्राकृत
पूर्वी हिंदी वर्ग के अंतर्गत कौन-सी बोली नहीं आती है?उत्तर: ब्रजभाषा (यह पश्चिमी हिंदी की बोली है)
प्रारंभ में 'पिंगल' नाम किस बोली के लिए प्रयुक्त होता था उत्तर: ब्रजभाषा
मानक हिंदी का मुख्य आधार कौन-सी बोली है? उत्तर: खड़ीबोली
'पूर्वी हिंदी' उपभाषा का उद्भव किस अपभ्रंश से हुआ है? उत्तर: अर्धमागधी अपभ्रंश
भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में वर्तमान में कितनी भाषाएँ शामिल हैं?- उत्तर: 22 भाषाएँ
छत्तीसगढ़ी किस उपभाषा वर्ग की बोली है?- उत्तर: पूर्वी हिंदी
ब्रजभाषा का विकास किस अपभ्रंश से हुआ है? - उत्तर: शौरसेनी अपभ्रंश
भारतीय संविधान के किन अनुच्छेदों में राजभाषा संबंधी प्रावधानों का उल्लेख है?- उत्तर: अनुच्छेद 343 से 351 तक
संविधान के अनुच्छेद 351 में किस विषय का वर्णन है?- उत्तर: हिंदी भाषा के विकास के लिए निर्देश
'मगही' किस उपभाषा वर्ग की बोली है?- उत्तर: बिहारी हिंदी
वर्तमान हिंदी का प्रचलित या मानक रूप कौन-सा है?- उत्तर: खड़ीबोली
अवधी किस उपभाषा वर्ग की बोली है?- उत्तर: पूर्वी हिंदी
छत्तीसगढ़ी बोली किस उपभाषा वर्ग के अंतर्गत आती है?- उत्तर: पूर्वी हिंदी
'भोजपुरी - पूर्वी हिंदी' युग्म गलत क्यों है? उत्तर: क्योंकि भोजपुरी 'बिहारी हिंदी' उपभाषा की बोली है।
'ढूँढाड़ी' (जयपुरी) बोली राजस्थान के किस क्षेत्र में प्रचलित है?उत्तर: जयपुर-टोंक क्षेत्र
पश्चिमी हिंदी और राजस्थानी के बीच की कड़ी कौन-सी बोली मानी जाती है? - उत्तर: मेवाती
'ब्रजभाषा - पश्चिमी उपभाषा - अर्द्धमागधी अपभ्रंश' युग्म असंबद्ध क्यों है?- उत्तर: क्योंकि ब्रजभाषा का विकास 'शौरसेनी अपभ्रंश' से हुआ है, अर्द्धमागधी से नहीं।
हिंदी दिवस किस तिथि को मनाया जाता है?- उत्तर: 14 सितंबर (14 सितंबर 1949 को राजभाषा का दर्जा मिलने के कारण)।
खड़ीबोली को 'कौरवी' नाम किस विद्वान ने दिया था?- उत्तर: राहुल सांकृत्यायन।
मारवाड़ी बोली की साहित्यिक शैली को किस नाम से जाना जाता है?- उत्तर: डिंगल।
हिंदी भाषा की लिपि कौन-सी है?- उत्तर: देवनागरी लिपि।
मैथिली बोली को संविधान की 8वीं अनुसूची में किस संवैधानिक संशोधन द्वारा जोड़ा गया?- उत्तर: 92वें संविधान संशोधन (2003) द्वारा।
'उर्दू' शब्द का मूल शाब्दिक अर्थ क्या है?- उत्तर: शाही शिविर या खेमा।
हिंदी की किस बोली पर गुजराती भाषा का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है?- उत्तर: वागड़ी बोली पर।

कक्षा - 10 - हिंदी व्याकरण - सन्धि

कक्षा - 10 | हिंदी व्याकरण: संधि

संधि की परिभाषा

जब दो शब्द आपस में मिलते हैं, तो पहले शब्द के अंतिम वर्ण और दूसरे शब्द के पहले वर्ण के मिलने से जो परिवर्तन (विकार) होता है, उसे संधि कहते हैं।

  • उदाहरण:
    • हिम + आलय = हिमालय ('अ' + 'आ' = 'आ')
    • सत् + आनंद = सदानंद

संधि के भेद (प्रकार)

संधि मुख्य रूप से तीन प्रकार की होती है:

  1. स्वर संधि
  2. व्यंजन संधि
  3. विसर्ग संधि

स्वर संधि (कक्षा 10 के पाठ्यक्रम अनुसार)

परिभाषा: दो स्वरों के आपस में मिलने से जो परिवर्तन होता है, उसे स्वर संधि कहते हैं।

स्वर संधि के मुख्य 4 भेद पाठ्यक्रम में शामिल हैं:

(i) दीर्घ संधि

  • नियम: यदि ह्रस्व या दीर्घ स्वर (अ, इ, उ) के बाद वही समान स्वर आए, तो दोनों मिलकर दीर्घ (आ, ई, ऊ) हो जाते हैं।
  • उदाहरण:
    • पुस्तक + आलय = पुस्तकालय (अ + आ = आ)
    • कवि + ईश्वरः = कवीश्वरः (इ + ई = ई)
    • भानु + उदयः = भानूदयः (उ + उ = ऊ)

(ii) गुण संधि

  • नियम: यदि 'अ' या 'आ' के बाद 'इ/ई', 'उ/ऊ' या 'ऋ' आए, तो वे क्रमशः ए, ओ, अर् में बदल जाते हैं।
  • उदाहरण:
    • महा + ईशः = महेशः (आ + ई = ए)
    • सूर्य + उदयः = सूर्योदयः (अ + उ = ओ)
    • देव + ऋषिः = देवर्षिः (अ + ऋ = अर्)

(iii) यण संधि

  • नियम: यदि 'इ/ई', 'उ/ऊ' या 'ऋ' के बाद कोई असमान (अलग) स्वर आए, तो इ/ई का 'य', उ/ऊ का 'व' और ऋ का 'र' हो जाता है।
  • उदाहरण:
    • इति + आदि = इत्यादि (इ + आ = या)
    • सु + आगतम् = स्वागतम् (उ + आ = वा)
    • यदि + अपि = यद्यपि (इ + अ = य)

(iv) अयादि संधि

  • नियम: यदि 'ए, ऐ, ओ, औ' के बाद कोई भी स्वर आए, तो ए का अय्, ऐ का आय्, ओ का अव और औ का आव् हो जाता है।
  • उदाहरण:
    • ने + अनम् = नयनम् (ए + अ = अय्)
    • नै + अकः = नायकः (ऐ + अ = आय्)
    • पो + अनम् = पवनम् (ओ + अ = अव्)
    • पौ + अकः = पावकः (औ + अ = आव्)

परीक्षा अभ्यास (महत्वपूर्ण सन्धि-विच्छेद)

क्र. सं.शब्दसंधि-विच्छेदसंधि का नाम
1पुस्तकालयःपुस्तक + आलयःदीर्घ संधि
2रमेशःरमा + ईशःगुण संधि
3इत्यादिइति + आदियण संधि
4नदीशःनदी + ईशःदीर्घ संधि
5यद्यपियदि + अपियण संधि
6सूर्योदयःसूर्य + उदयःगुण संधि
7कवीश्वरःकवि + ईश्वरःदीर्घ संधि
8उपेन्द्रःउप + इन्द्रःगुण संधि
9स्वागतम्सु + आगतम्यण संधि
10परमार्थःपरम + अर्थःदीर्घ संधि
11महोत्सवःमहा + उत्सवःगुण संधि
12भवनम्भो + अनम्अयादि संधि
13रवीन्द्रःरवि + इन्द्रःदीर्घ संधि
14नयनम्ने + अनम्अयादि संधि
15विद्यार्थीविद्या + अर्थीदीर्घ संधि
16महीशःमही + ईशःदीर्घ संधि
17देवर्षिःदेव + ऋषिःगुण संधि
18नायकःनै + अकःअयादि संधि
19देवालयःदेव + आलयःदीर्घ संधि
20मदनोत्सवःमदन + उत्सवःगुण संधि
21भानूदयःभानु + उदयःदीर्घ संधि
22लघ्वाकृतिलघु + आकृतियण संधि
23तथैवतथा + एववृद्धि संधि
24नवोढानव + ऊढागुण संधि
25नायिकानै + इकाअयादि संधि
26पवनम्पो + अनम्अयादि संधि
27पावकःपौ + अकःअयादि संधि
28हिमालयःहिम + आलयःदीर्घ संधि
29महेशःमहा + ईशःगुण संधि
30मध्वरिःमधु + अरिःयण संधि

व्यंजन संधि 

परिभाषा: जब किसी व्यंजन का मेल किसी स्वर या व्यंजन के साथ होता है, तो उससे जो परिवर्तन (बदलाव) आता है, उसे व्यंजन संधि कहते हैं।

  • सरल उदाहरण:
    • सत् + जन = सज्जन (त् + ज = ज्ज)
    • उत् + लास = उल्लास (त् + ल = ल्ल)
    • दिग् + गंज = दिग्गज

🔹 व्यंजन संधि के प्रमुख नियम एवं उदाहरण:

  1. वर्ग के पहले वर्ण का तीसरे वर्ण में बदलना:
    • (क → ग, च → ज, त → द, प → ब)
    • दिक् + अंबर = दिगंबर
    • वाक् + ईश = वागीश
    • अच् + अंत = अजंत
  2. 'त्' से संबंधित नियम:
    • उत् + नति = उन्नति
    • सत् + चित् = सच्चित्
    • जगत + नाथ = जगन्नाथ
  3. 'म्' से संबंधित नियम:
    • सम + योग = संयोग
    • सम + हार = संहार
    • सम + विधान = संविधान

विसर्ग संधि (Visarga Sandhi)

परिभाषा: जब विसर्ग ( : ) के बाद कोई स्वर या व्यंजन आने पर विसर्ग में जो परिवर्तन होता है, उसे विसर्ग संधि कहते हैं।

  • सरल उदाहरण:
    • निः + धन = निर्धन (विसर्ग 'र्' में बदला)
    • मनः + हर = मनोहर (विसर्ग 'ओ' में बदला)

विसर्ग संधि के प्रमुख नियम एवं उदाहरण:

  1. विसर्ग का 'ओ' हो जाना:
    • नमः + ते = नमस्ते
    • तपः + बल = तपोबल
    • मनः + रथ = मनोरथ
  2. विसर्ग का 'र्' हो जाना:
    • निः + आशा = निराशा
    • दुः + बल = दुर्बल
    • निः + उपाय = निरुपाय
  3. विसर्ग का 'श, ष, स' हो जाना:
    • निः + छल = निश्छल
    • निः + फल = निष्फल
    • नमः + ते = नमस्ते
  4. विसर्ग का लोप (गायब) हो जाना:
    • निः + रोग = निरोग (पहला स्वर लंबा हो जाता है)
    • निः + रस = नीरस

अभ्यास हेतु महत्वपूर्ण उदाहरण (परीक्षा के लिए)

क्र. सं.शब्दसंधि-विच्छेदसंधि का नाम
1दिगंबरदिक् + अंबरव्यंजन संधि
2वागीशवाक् + ईशव्यंजन संधि
3सज्जनसत् + जनव्यंजन संधि
4उल्लासउत् + लासव्यंजन संधि
5जगन्नाथजगत + नाथव्यंजन संधि
6संतोषसम् + तोषव्यंजन संधि
7संविधानसम् + विधानव्यंजन संधि
8निराहारनिः + आहारविसर्ग संधि
9दुर्बलदुः + बलविसर्ग संधि
10मनोरथमनः + रथविसर्ग संधि
11तपोबलतपः + बलविसर्ग संधि
12निष्फलनिः + फलविसर्ग संधि
13नमस्तेनमः + तेविसर्ग संधि
14नीरसनिः + रसविसर्ग संधि

निबन्ध रचना

निबंध-लेखन क्या है? निबंध गद्य साहित्य का एक प्रमुख रूप है, जिसे 'एस्से' (Essay) भी कहते हैं। 'निबंध' शब्द का अर्थ है—अच्छी तरह बंधा हुआ। इसमें किसी भी विषय पर अपने विचारों को एक सीमित आकार में, स्पष्ट और क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत किया जाता है। भाषा का सरल, सटीक और विषय के अनुकूल होना एक अच्छे निबंध की पहचान है।

एक अच्छे निबंध की मुख्य बातें (विशेषताएं)

  • क्रमबद्धता और स्पष्टता: विचार एक-दूसरे से जुड़े हों और भाषा पढ़ने में आसान व व्याकरण के अनुसार सही हो।
  • रूपरेखा बना कर लिखना: लिखने से पहले मुख्य बिंदुओं (आउटलाइन) का ढांचा तैयार कर लें।
  • सटीक शब्दावली: फालतू की बातें दोहराने से बचें और शब्द-सीमा का ध्यान रखें।
  • प्रभावशाली प्रस्तुति: निबंध को आकर्षक बनाने के लिए सही जगहों पर कहावतों, मुहावरों या सुविचारों (कोटेशन) का प्रयोग करें।
  • निष्कर्ष: अंत में पूरे निबंध का संक्षिप्त सार (उपसंहार) ज़रूर दें।

निबंध के तीन मुख्य अंग

  1. शुरुआत (भूमिका/प्रस्तावना): यह हिस्सा बहुत आकर्षक होना चाहिए ताकि पाठक की रुचि बने। शुरुआत किसी सूक्ति, कविता या विषय से जुड़ी मुख्य बात से कर सकते हैं।
  2. मुख्य भाग (विस्तार): यहाँ विषय की पूरी जानकारी दी जाती है। अपने विचारों को छोटे-छोटे अनुच्छेदों (पैराग्राफ) या उप-शीर्षकों (Sub-headings) में बांटकर लिखें।
  3. समापन (उपसंहार): यह निबंध का अंतिम हिस्सा है, जहाँ पूरे विषय का निचोड़ दिया जाता है और आप अपनी राय भी व्यक्त कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए एक विषय और उसकी रूपरेखा: विषय: साइबर अपराध के बढ़ते कदम / सूचना प्रौद्योगिकी में बढ़ते अपराध

रूपरेखा (संकेत बिंदु):

  1. प्रस्तावना (भूमिका)
  2. साइबर अपराध क्या है और इसके दुष्प्रभाव
  3. इसे रोकने के लिए सरकारी प्रयास
  4. रोकथाम के लिए व्यक्तिगत सुझाव
  5. निष्कर्ष (उपसंहार)

1. साइबर अपराध: कारण, बचाव और समाधान

1. प्रस्तावना (भूमिका) आज का दौर डिजिटल तकनीक और इंटरनेट का है। जैसे-जैसे इंटरनेट ने हमारे दैनिक कामकाज को आसान बनाया है, वैसे ही ऑनलाइन ठगी और अपराध के मामले भी तेजी से बढ़े हैं। चंद पैसों के लालच में आपराधिक प्रवृत्ति वाले लोग डिजिटल माध्यमों का गलत फायदा उठाकर साइबर क्राइम को अंजाम दे रहे हैं।

2. साइबर अपराध क्या है और इसके प्रभाव कंप्यूटर, मोबाइल या इंटरनेट के जरिए किसी व्यक्ति के साथ धोखाधड़ी, ब्लैकमेलिंग या गैर-कानूनी गतिविधि करना साइबर अपराध कहलाता है। इसमें अपराधियों द्वारा पर्सनल डाटा चोरी करना, बैंक खातों से पैसे उड़ाना या सोशल मीडिया पर किसी की छवि खराब करना शामिल है। इस प्रकार की ठगी से लोग न सिर्फ आर्थिक रूप से टूटते हैं, बल्कि वे भारी मानसिक तनाव का शिकार भी हो जाते हैं।

3. सरकार द्वारा किए गए प्रयास साइबर अपराध पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने कई जरूरी कदम उठाए हैं:

  • पोर्टल: राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल शुरू किया गया है, जहाँ पीड़ित सीधे अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
  • हेल्पलाइन: ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी की तुरंत शिकायत दर्ज कराने और ठगे गए पैसों को फ्रीज करवाने के लिए हेल्पलाइन नंबर 1930 जारी किया गया है।

4. साइबर अपराध से बचाव के उपाय

  • मजबूत पासवर्ड: अपने ऑनलाइन खातों के पासवर्ड कठिन रखें और उन्हें समय-समय पर बदलते रहें।
  • गोपनीयता: किसी के साथ भी अपने ओटीपी (OTP), पिन (PIN) या पासवर्ड शेयर न करें।
  • पुराने डिवाइस बेचते समय सावधानी: फोन या लैपटॉप बेचने से पहले अपना अकाउंट पूरी तरह से लॉग-आउट करके डाटा डिलीट कर दें।
  • लालच से बचें: लॉटरी या अचानक पैसे मिलने वाले फर्जी कॉल्स और लिंक से दूर रहें।
  • एंटीवायरस: कंप्यूटर और मोबाइल में हमेशा रजिस्टर्ड एंटीवायरस का प्रयोग करें।

5. निष्कर्ष (उपसंहार) इंटरनेट हमारे लिए एक बेहतरीन साधन है, लेकिन इसका सही इस्तेमाल हमारी सतर्कता पर निर्भर करता है। यदि हम थोड़ी सी सावधानी और जागरूकता बरतें, तो साइबर क्राइम जैसे खतरों से आसानी से खुद को सुरक्षित रख सकते हैं।

2. कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI): वरदान या अभिशाप

1. प्रस्तावना (भूमिका) इंसान को दुनिया का सबसे बुद्धिमान प्राणी माना जाता है, जिसने अपनी समझ से अनगिनत विज्ञान के आविष्कार किए हैं। इसी सोच का आधुनिक रूप है 'कृत्रिम बुद्धिमत्ता' (Artificial Intelligence - AI)। यह एक ऐसी तकनीक है जो मशीनों को इंसानों की तरह सोचने और निर्णय लेने के योग्य बनाती है। आज यह विषय पूरी दुनिया में चर्चा का केंद्र बना हुआ है।

2. AI की शुरुआत और प्रसार कृत्रिम बुद्धिमत्ता का अर्थ है—कंप्यूटर या रोबोट को इंसानी दिमाग की तरह कार्य करने के लिए तैयार करना। इस तकनीक की शुरुआत 1950 के दशक में मानी जाती है, जिसके विकास में 'जॉन मैकार्थी' का योगदान बेहद खास रहा। आज स्वास्थ्य, शिक्षा, ऑटोमोबाइल और अंतरिक्ष विज्ञान जैसे हर क्षेत्र में इसका इस्तेमाल हो रहा है।

3. AI के प्रभाव (लाभ एवं हानि)

  • लाभ (वरदान): एआई के जरिए कठिन से कठिन काम चुटकियों में हो जाते हैं। यह मानवीय गलतियों की गुंजाइश को कम करता है और चिकित्सा व अनुसंधान के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला रहा है।
  • हानि (अभिशाप): एआई पर अत्यधिक निर्भरता से लोगों के रोजगार पर संकट आ सकता है। इसके अलावा, यदि इसका गलत हाथों में दुरुपयोग हुआ, तो यह गोपनीयता और सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

4. सुधार हेतु सुझाव

  • एआई के सही और सीमित उपयोग के लिए वैश्विक स्तर पर कड़े नियम बनाए जाने चाहिए।
  • इस तकनीक का इस्तेमाल इंसान के विकल्प के तौर पर नहीं, बल्कि इंसानी काम को आसान बनाने वाले मददगार के रूप में होना चाहिए।

5. निष्कर्ष (उपसंहार) कृत्रिम बुद्धिमत्ता इंसान द्वारा बनाया गया एक शक्तिशाली टूल है। यह हमारे लिए वरदान साबित होगी या अभिशाप, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम इसका उपयोग मानव कल्याण के लिए करते हैं या विनाश के लिए।

आत्मनिर्भर भारत

प्रस्तावना: किसी भी व्यक्ति या राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी स्वावलंबिता होती है। शास्त्रों में भी कहा गया है कि दूसरों पर निर्भर रहने से दुख मिलता है, जबकि अपने पैरों पर खड़े होना ही सच्चा सुख है। भारत का इतिहास गवाह है कि यहाँ की कला, हस्तशिल्प और संस्कृति में आत्मनिर्भरता हमेशा से मौजूद रही है। अपनी इसी समृद्ध परंपरा को आधुनिक युग में आगे बढ़ाने की दिशा में एक अहम कदम है—'आत्मनिर्भर भारत'।

अभियान की शुरुआत और इसके मुख्य आधार: देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 12 मई 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'आत्मनिर्भर भारत अभियान' की घोषणा की। इस अभियान का मुख्य मकसद भारत को निर्माण और सेवा के क्षेत्र में दुनिया में अग्रणी बनाना है। इसके विकास के पाँच प्रमुख आधार तय किए गए हैं—मजबूत अर्थव्यवस्था, उन्नत इंफ्रास्ट्रक्चर (बुनियादी ढाँचा), आधुनिक तकनीक पर आधारित सिस्टम, सशक्त जनसांख्यिकी (युवा आबादी), और मांग व आपूर्ति श्रृंखला का सही उपयोग।

आत्मनिर्भरता से होने वाले लाभ: जब कोई देश आत्मनिर्भर बनता है, तो वह केवल अपनी जरूरतें पूरी नहीं करता बल्कि विश्व मंच पर भी एक सशक्त राष्ट्र के रूप में उभरता है। इस अभियान से स्वदेशी उद्योगों को प्रोत्साहन मिल रहा है, जिससे युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर बन रहे हैं। विदेशी सामानों के आयात पर निर्भरता कम होने से देश का धन देश में ही सुरक्षित रहता है, जिससे भारत की आर्थिक स्थिति संकट के समय में भी स्थिर बनी रहती है।

वैश्विक स्तर पर भारत का उदाहरण: भारत ने अतीत से लेकर वर्तमान तक हर परिस्थिति में अपनी आत्मनिर्भरता का लोहा मनवाया है। प्राचीन काल में जहाँ हमारी कृषि और पशुपालन व्यवस्था इसका प्रमाण थी, वहीं आधुनिक समय में जब कोरोना महामारी का संकट आया, तो भारत ने पीपीई किट, वेंटिलेटर और स्वदेशी वैक्सीन का रिकॉर्ड समय में निर्माण करके पूरी दुनिया को अचंभित कर दिया। भारत ने न केवल अपनी जरूरतों को पूरा किया, बल्कि अन्य देशों को भी वैक्सीन और दवाइयाँ भेजकर अपनी क्षमता का परिचय दिया।

निष्कर्ष: आत्मनिर्भरता केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि हर नागरिक की सोच और जीवनशैली का हिस्सा बननी चाहिए। जब हम स्थानीय (लोकल) उत्पादों को प्राथमिकता देंगे, तभी देश का उद्योग मजबूत होगा। आर्थिक और सामाजिक स्तर पर आत्मनिर्भर बनकर ही भारत एक बार फिर विश्व गुरु बनने और विश्व पटल पर अपनी पहचान को और अधिक सुदृढ़ करने के सपने को साकार कर सकता है।

युवा वर्ग और फैशन

1. प्रस्तावना: फैशन का शाब्दिक अर्थ किसी काम को करने या पहनने का एक खास तरीका या शैली होता है। मनुष्य खुद को सुंदर, आकर्षक और सभ्य दिखाने के लिए हमेशा से अलग-अलग प्रकार की वेशभूषा और सजावट का सहारा लेता आया है। जब तक फैशन मर्यादा में रहकर व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारता है, तब तक यह कला का एक हिस्सा माना जाता है। लेकिन जब यह केवल दिखावे का जरिया बन जाता है, तो इसके नकारात्मक परिणाम भी सामने आने लगते हैं।

2. पश्चिमी सभ्यता और फैशन का बढ़ता चलन: 20वीं शताब्दी के बाद से पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव से हमारे खान-पान, रहन-सहन और पहनावे में काफी बदलाव आया है। सिनेमा, टेलीविजन और सोशल मीडिया के कलाकारों के पहनावे को युवा पीढ़ी तेजी से अपनाती है। महंगे ब्रांडेड कपड़े, जूते और आधुनिक परिधान पहनना आजकल एक नया ट्रेंड बन गया है, जिससे हमारा समाज और खासकर नई पीढ़ी गहराई से प्रभावित हो रही है।

3. आधुनिक फैशन का बदलता स्वरूप: आजकल फैशन केवल कपड़ों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सौंदर्य प्रसाधनों (कॉस्मेटिक्स), बातचीत के तरीके और जीवनशैली का भी हिस्सा बन चुका है। विज्ञापनों और इंटरनेट के जरिए नए-नए ट्रेंड्स बहुत जल्दी लोकप्रिय हो जाते हैं। कई बार पुरानी पीढ़ी को यह अंधानुकरण हमारी संस्कृति और मर्यादा के विपरीत लगता है, जिससे वैचारिक मतभेद भी पैदा होते हैं। इसके बावजूद युवा वर्ग नए बदलावों को अपनाने में पीछे नहीं रहता।

4. समाज पर प्रभाव: भारत जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश में हर राज्य की अपनी पारंपरिक वेशभूषा और पहचान है। हालाँकि, पश्चिमी परिधानों के बढ़ते प्रभाव ने लोगों के पहनावे में नयापन जरूर लाया है, लेकिन इससे स्थानीय पहचान पर असर पड़ा है। सही मायने में फैशन ऐसा होना चाहिए जो हमारी संस्कृति का सम्मान करते हुए अवसर के अनुकूल हो, न कि केवल दूसरों को प्रभावित करने का एक साधन।

5. निष्कर्ष (उपसंहार): फैशन आधुनिक जीवनशैली का एक अभिन्न अंग बन चुका है जो व्यक्ति के आत्मविश्वास और सोच को भी दर्शाता है। यह जरूरी है कि युवा वर्ग फैशन का चयन समझदारी से करे। किसी भी प्रवृत्ति का अंधानुकरण करने के बजाय अपनी सभ्यता और मर्यादा के भीतर रहकर खुद को प्रस्तुत करना ही सच्चा फैशन है।

मातृभाषा और उसका महत्त्व

1. मातृभाषा का अर्थ एवं परिभाषा: मातृभाषा का साधारण अर्थ है—वह भाषा जिसे बच्चा सबसे पहले अपनी माँ, परिवार और आस-पड़ोस से सीखता है। जन्म के बाद जिस सामाजिक परिवेश में बालक बड़ा होता है, वहाँ बोली और समझी जाने वाली भाषा ही उसकी मातृभाषा बनती है। यह व्यक्ति की अभिव्यक्ति का सबसे स्वाभाविक और सहज माध्यम है।

2. रचनात्मक विकास में योगदान: बालक जितनी तेजी और सहजता से अपनी मातृभाषा में किसी बात को समझ सकता है, उतनी आसानी से किसी अन्य भाषा को नहीं सीख पाता। भाषाविदों और वैज्ञानिकों का भी मानना है कि शुरुआती शिक्षा मातृभाषा में होने से बच्चे की सोचने-समझने और रचनात्मक क्षमता का स्वाभाविक विकास होता है। इसी कारण नई शिक्षा नीति में भी प्राथमिक शिक्षा के साथ-साथ विज्ञान व अन्य विषयों की शिक्षा मातृभाषा में देने पर जोर दिया गया है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी सही कहा है—

"निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को शूल॥"

3. मातृभाषा और राष्ट्रभाषा: भारत अनेकताओं में एकता का देश है, जहाँ सैकड़ों बोलियाँ और मातृभाषाएँ बोली जाती हैं। हमारे संविधान में 22 प्रमुख भाषाओं को मान्यता दी गई है। इनमें से हिंदी भारत में सबसे ज्यादा बोली और समझी जाने वाली भाषा है, जिसे संविधान में राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। यह विभिन्न प्रदेशों को आपस में जोड़ने का काम करती है। अपनी-अपनी क्षेत्रीय मातृभाषाओं का सम्मान करने के साथ-साथ हिंदी को भी उसका उचित स्थान मिलना आवश्यक है।

4. निष्कर्ष (उपसंहार): मातृभाषा केवल बातचीत का साधन नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक पहचान और जड़ों से जोड़कर रखती है। यह व्यक्ति के भीतर आत्मविश्वास जगाती है और विचारों को सही रूप देती है। इसलिए हमें अपनी मातृभाषा पर गर्व करना चाहिए और अपनी भाषाई विरासत को सहेजते हुए अन्य सभी मातृभाषाओं का भी पूरा सम्मान करना चाहिए।

इंटरनेट की उपयोगिता

1. प्रस्तावना: आज के आधुनिक युग में इंटरनेट सूचना और संचार क्रांति का सबसे सशक्त माध्यम बन चुका है। यह दुनिया भर के कंप्यूटरों और डिजिटल उपकरणों को आपस में जोड़ने वाला एक ऐसा अदृश्य जाल है, जिसने दूरियों को खत्म कर दिया है। इसके माध्यम से कोई भी जानकारी पलक झपकते ही प्राप्त की जा सकती है।

2. ज्ञान और सूचना का अटूट भंडार: इंटरनेट ज्ञान का एक विशाल समुद्र है। किसी भी विषय की जानकारी, कठिन सवालों के जवाब या दुनिया के किसी भी कोने में घटी घटना की खबर इंटरनेट पर तुरंत उपलब्ध हो जाती है। इसके साथ ही, सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स के ज़रिए लोग देश-विदेश में बैठे अपनों से बिना किसी अतिरिक्त खर्च के आसानी से जुड़े रहते हैं।

3. शिक्षा और विद्यार्थी जीवन में भूमिका: विद्यार्थियों के लिए इंटरनेट एक बेहतरीन शिक्षक साबित हो रहा है। ई-बुक्स, ऑनलाइन क्लासेस और ट्यूटोरियल्स की मदद से छात्र घर बैठे ही अपनी पढ़ाई पूरी कर सकते हैं। जो पुस्तकें या अध्ययन सामग्री महंगी होने के कारण हर किसी की पहुँच में नहीं होतीं, वे इंटरनेट पर आसानी से पढ़ी और डाउनलोड की जा सकती हैं।

4. इंटरनेट के विविध लाभ:

  • घर बैठे सुविधाएँ: ऑनलाइन बैंकिंग, रेलवे व टिकट बुकिंग, होटल आरक्षण और शॉपिंग जैसी सुविधाओं ने समय और श्रम दोनों की बचत की है।
  • रोजगार के अवसर: इंटरनेट ने वर्क फ्रॉम होम और ऑनलाइन फ्रीलांसिंग के जरिए लाखों लोगों के लिए कमाई के नए रास्ते खोले हैं।
  • विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग: व्यापार, चिकित्सा, मौसम विज्ञान और सरकारी कार्यकाजों में पारदर्शिता व गति लाने के लिए इंटरनेट अत्यंत उपयोगी है।

5. दुरुपयोग और हानियाँ: सुविधाओं के साथ-साथ इंटरनेट के कुछ खतरे भी हैं। ऑनलाइन धोखाधड़ी (साइबर क्राइम), पर्सनल डाटा की चोरी और बैंक खातों से पैसों की हेराफेरी जैसी घटनाएँ बढ़ रही हैं। इसके अलावा सोशल मीडिया पर अफवाहें फैलाना और इंटरनेट की लत के कारण किताबों व शारीरिक गतिविधियों से दूरी बनना भी इसके दुष्परिणाम हैं।

6. आधुनिक जीवन में महत्व: आज के दैनिक जीवन में इंटरनेट केवल एक विकल्प न होकर एक बुनियादी जरूरत बन गया है। दफ्तर के काम से लेकर मनोरंजन और ज्ञान प्राप्त करने तक, हर जगह इसकी उपयोगिता बनी हुई है।

7. निष्कर्ष (उपसंहार): इंटरनेट तकनीक का एक ऐसा अनोखा वरदान है जिसने पूरी दुनिया को एक परिवार की तरह जोड़ दिया है। यह एक उपयोगी साधन है, लेकिन इसका लाभ तभी मिलेगा जब हम इसका इस्तेमाल समझदारी, सतर्कता और सही दिशा में करेंगे।

मोबाइल फोन : वरदान या अभिशाप

प्रस्तावना: विज्ञान के नए आविष्कारों ने इंसानी जिंदगी को पूरी तरह बदलकर रख दिया है, जिसमें से मोबाइल फोन सबसे बड़ा साधन बनकर उभरा है। इसने दूरियों को खत्म करके संचार के क्षेत्र में एक नई क्रांति ला दी है। आज के दौर में यह केवल बातचीत का जरिया नहीं रहा, बल्कि हमारी हर छोटी-बड़ी जरूरत को पूरा करने का सबसे सशक्त और आसान माध्यम बन चुका है।

लाभ और उपयोगिता: मोबाइल फोन ने हमारे जीवन को बेहद सुविधाजनक बना दिया है। इसके जरिए देश-विदेश में बैठे किसी भी व्यक्ति से कुछ ही सेकंड में कॉल या वीडियो कॉल के माध्यम से संपर्क किया जा सकता है। घर बैठे ऑनलाइन पेमेंट करना, बैंक खाते का प्रबंधन, बिल जमा करना, ऑनलाइन टिकट बुकिंग और शॉपिंग जैसी सुविधाएँ अब चुटकियों में हो जाती हैं। विद्यार्थियों के लिए यह एक ऑनलाइन क्लासरूम की तरह है, जहाँ पढ़ाई से जुड़ी हर सामग्री आसानी से मिल जाती है। इसके अलावा कैलकुलेटर, घड़ी, टॉर्च, समाचार और मनोरंजन के साधन भी इसमें समाहित हैं।

दैनिक जीवन में भूमिका: पुराने समय में जिस काम के लिए चिट्ठियाँ भेजी जाती थीं या लंबी लाइनों में खड़ा होना पड़ता था, वही काम अब मोबाइल से घर बैठे मिनटों में हो जाता है। आज हर वर्ग के व्यक्ति के पास मोबाइल का होना इसकी अनिवार्यता और उपयोगिता को साबित करता है। यह समय की बचत करने के साथ-साथ हर परिस्थिति में मददगार साबित होता है।

दुष्प्रभाव और हानियाँ: ज़रूरत से ज़्यादा और गलत इस्तेमाल के कारण मोबाइल कई समस्याएँ भी पैदा कर रहा है। खासकर युवा वर्ग और बच्चे गेमिंग तथा सोशल मीडिया की लत के कारण अपना कीमती समय नष्ट कर देते हैं, जिससे उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है। घंटों स्क्रीन पर लगे रहने से आँखों की रोशनी कमज़ोर होना, नींद न आना और मानसिक तनाव जैसी शारीरिक व मानसिक समस्याएँ बढ़ रही हैं। साथ ही, इसके गलत इस्तेमाल से ऑनलाइन ठगी और साइबर अपराध भी तेज़ी से बढ़ रहे हैं।

निष्कर्ष: मोबाइल फोन अपने आप में न तो पूरी तरह वरदान है और न ही अभिशाप; यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम इसका इस्तेमाल किस प्रकार करते हैं। यदि इसका उपयोग संयम और सही कार्य के लिए किया जाए, तो यह जीवन का सबसे उपयोगी साथी है। वहीं इसके प्रति की गई लापरवाही हमारे स्वास्थ्य और समय दोनों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है।

विद्यार्थी जीवन में अनुशासन

"अनुशासन से है जीवन बनता, अनुशासन राष्ट्रों का जीवन है। यह शिक्षित जन का तन मन धन है॥"

प्रस्तावना: जीवन के हर क्षेत्र में नियमों का पालन करना ही अनुशासन कहलाता है। सही समय पर जागना, पढ़ना, भोजन करना और अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से पूरा करना अनुशासन के ही रूप हैं। केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि संपूर्ण प्रकृति भी अनुशासन से बँधी है—सूर्य का समय पर उगना, तारों का चमकना और ऋतुओं का बदलना इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है।

विद्यालय में अनुशासन: विद्यालय में रहकर ही विद्यार्थी का शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास सही दिशा में होता है। जब कोई छात्र गुरुजनों और माता-पिता के मार्गदर्शन को स्वेच्छा से स्वीकार करता है, तो उसके भीतर नम्रता, धैर्य और संयम का भाव जागृत होता है। सच्चा अनुशासन वह है जो किसी बाहरी दबाव से नहीं, बल्कि आंतरिक प्रेरणा से उत्पन्न होता है।

विद्यार्थी और अनुशासन: प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति की सफलता का मुख्य आधार अनुशासन ही था। छात्र गुरुकुल में रहकर कठोर नियमों का पालन करते थे और श्रेष्ठ आचरण सीखते थे। विद्यार्थी जीवन ही वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति के चरित्र की नींव पड़ती है। इस दौरान सीखा गया शिष्टाचार और आचरण जीवनभर उसके साथ रहता है और उसके भविष्य की दिशा तय करता है।

अनुशासनहीनता के कारण व हानियाँ: आज के दौर में विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता की प्रवृत्ति बढ़ती दिखती है। इसके पीछे सही मार्गदर्शन की कमी, सामाजिक माहौल और भटकाव पैदा करने वाले साधन प्रमुख कारण हैं। अनुशासनहीनता के कारण छात्र अपने मार्ग से भटक जाते हैं, जिससे उनका भविष्य अंधकारमय हो जाता है और उन्हें कदम-कदम पर असफलताओं व अपमान का सामना करना पड़ता है।

अनुशासन के लाभ: अनुशासन की पहली सीख भले ही परिवार से मिलती है, लेकिन इसे व्यावहारिक रूप देने का काम विद्यालय करता है। अनुशासित छात्र परिश्रमी, कर्तव्यनिष्ठ और विनम्र बनता है। ऐसा विद्यार्थी न केवल परीक्षाओं में सफलता प्राप्त करता है, बल्कि आगे चलकर समाज और देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनता है।

निष्कर्ष: विद्यार्थियों को दी जाने वाली शिक्षा तभी सार्थक हो सकती है जब उसे व्यावहारिक जीवन के मूल्यों से जोड़ा जाए। देश की प्रगति और छात्र के सर्वांगीण विकास के लिए अनुशासनप्रिय होना बेहद आवश्यक है। अनुशासित जीवन ही सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है।

स्वास्थ्य ही श्रेष्ठ धन है

"पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख घर में हो माया॥"

प्रस्तावना (स्वास्थ्य का अर्थ): मानव जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति उसका अच्छा स्वास्थ्य है। आयुर्वेद में कहा गया है कि अस्वस्थ शरीर में जीवन का आनंद नहीं लिया जा सकता। यदि मनुष्य के पास अपार धन-दौलत भी हो, लेकिन शरीर बीमारियों से घिरा हो, तो वह सुख का अनुभव नहीं कर सकता। इसके विपरीत, एक निर्धन व्यक्ति भी यदि पूरी तरह से स्वस्थ है, तो वह खुशहाल जीवन जी सकता है। इसीलिए सुखी और दीर्घायु जीवन के लिए स्वास्थ्य की रक्षा करना सबसे पहला कर्तव्य माना गया है।

स्वास्थ्यप्रद और संतुलित भोजन: निरोगी रहने के लिए हमारा खान-पान शुद्ध और पौष्टिक होना चाहिए। संतुलित आहार ही शरीर को ऊर्जा और रोगों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है। भोजन में हरी सब्जियाँ, ताजे फल, दालें, दूध और सूखे मेवे शामिल होने चाहिए। कहा भी गया है कि "जैसा अन्न, वैसा मन" और "स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है।" इसलिए सात्विक और पौष्टिक भोजन को ही अपनी प्राथमिकता बनाना चाहिए।

स्वास्थ्य कमजोर होने के कारण: आज के समय में खराब जीवनशैली और खान-पान की गलत आदतें स्वास्थ्य के बिगड़ने का मुख्य कारण बन चुकी हैं। जंक फूड और फास्ट-फूड का अत्यधिक सेवन लोगों को कम उम्र में ही गंभीर बीमारियों की ओर ढकेल रहा है। इसके अलावा स्वच्छता की कमी, शारीरिक श्रम न करना और मानसिक तनाव के कारण भी लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो रही है।

स्वास्थ्य रक्षा के उपाय: अपनी सेहत को बनाए रखने के लिए नियमित दिनचर्या का पालन करना जरूरी है। प्रतिदिन योगाभ्यास, व्यायाम, ताजी हवा में टहलना और बुरी आदतों से दूर रहना स्वास्थ्य रक्षा का सबसे सरल मार्ग है। इसके साथ ही, बीमारियों के समय सही इलाज की सुविधा के लिए सरकार द्वारा आयुष्मान भारत जैसी योजनाएँ चलाई जा रही हैं, जिनसे गरीब और जरूरतमंद वर्गों को समय पर बेहतर इलाज मिल रहा है।

निष्कर्ष (उपसंहार): स्वास्थ्य ही एक ऐसा अनमोल धन है, जो व्यक्ति को वास्तविक सुख और शांति प्रदान करता है। लम्बे और खुशहाल जीवन का रहस्य केवल और केवल निरोगी बने रहने में छुपा है। इसलिए हम सभी को अपने खान-पान और दिनचर्या के प्रति जागरूक रहकर अपने स्वास्थ्य रूपी धन की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि स्वस्थ नागरिक ही एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण करते हैं।

बनारस, दिशा कविता ( हिंदी साहित्य)

जीवन परिचय एवं शिक्षा

  • जन्म वर्ष एवं स्थान: 1934 में बलिया ज़िले के चकिया गाँव में हुआ।
  • निधन: 2018 में।
  • उच्च शिक्षा: काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की।
  • पीएच.डी. विषय: 'आधुनिक हिंदी कविता में बिंब-विधान' विषय पर पीएच.डी. की।
  • कार्यक्षेत्र: गोरखपुर में हिंदी के प्राध्यापक रहे और तत्पश्चात जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में भारतीय भाषा केंद्र में हिंदी के प्रोफेसर पद से अवकाश प्राप्त किया।

काव्यगत विशेषताएँ एवं शैली

  • मूलतः मानवीय संवेदनाओं के कवि हैं।
  • अपनी कविताओं में बिंब-विधान पर अत्यधिक बल दिया है।
  • कविताओं में शोर-शराबा न होकर विद्रोह का शांत और संयत स्वर उभरता है।
  • भाषा नम्य (लचीली), पारदर्शी, ऋजु और बेलौस है। शिल्प में बातचीत की सहजता और अपनापन मिलता है।

प्रमुख रचनाएँ

  • काव्य संग्रह (कुल सात):
    • अभी बिल्कुल अभी
    • ज़मीन पक रही है
    • यहाँ से देखो
    • अकाल में सारस
    • उत्तर कबीर तथा अन्य कविताएँ
    • बाघ
    • टालस्टाय और साइकिल
  • आलोचनात्मक पुस्तकें: कल्पना और छायावाद, आधुनिक हिंदी कविता में बिंब विधान का विकास
  • निबंध संग्रह: मेरे समय के शब्द, कब्रिस्तान में पंचायत
  • प्रतिनिधि कविताएँ: चुनी हुई कविताओं का संग्रह
  • संपादित कार्य: ताना-बाना (विविध भारतीय भाषाओं का हिंदी में अनूदित काव्य संग्रह)

पुरस्कार एवं सम्मान

  • साहित्य अकादमी पुरस्कार: 1989 में 'अकाल में सारस' काव्य संग्रह पर।
  • अन्य प्रमुख सम्मान:
    • मैथिलीशरण गुप्त राष्ट्रीय सम्मान (1994, मध्य प्रदेश शासन)
    • कुमारन आशान पुरस्कार
    • व्यास सम्मान
    • दयावती मोदी पुरस्कार

1. 'बनारस' कविता का सार एवं महत्वपूर्ण बिंदु

  • मुख्य विषय: इस कविता में प्राचीनतम शहर 'बनारस' के सांस्कृतिक वैभव और उसके ठेठ बनारसीपन को दर्शाया गया है।
  • सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्व:
    • बनारस भगवान शिव की नगरी है तथा गंगा नदी के साथ जुड़ी आस्था का केंद्र है।
    • यहाँ काशी और गंगा के सान्निध्य से मोक्ष की अवधारणा जुड़ी हुई है।
  • बनारस की विशेषताएँ/चित्रण:
    • कविता में गंगा, गंगा के घाट, मंदिर तथा घाटों के किनारे बैठे भिखारियों के कटोरों का सुंदर चित्रण किया गया है।
    • शहर के दृश्य: गंगा में बँधी नाव, मंदिरों-घाटों पर जलते दीप, कभी न बुझने वाली चिताग्नि तथा हवन से उठता हुआ धुआँ।
  • बनारस का चरित्र:
    • बनारस में हर कार्य अपनी 'रौ' (अपनी गति/मस्त लय) में होता है।
    • बनारस आस्था, श्रद्धा, विरक्ति, विश्वास, आश्चर्य और भक्ति का मिला-जुला रूप है।
    • यहाँ अति प्राचीनता, आध्यात्मिकता और भव्यता के साथ आधुनिकता का समाहार देखने को मिलता है।
  • शिल्प एवं भाषा-शैली:
    • यह कविता भाषा की दृष्टि से सरल है, लेकिन अर्थ के स्तर पर गहरी है।
    • कविता का शिल्प विवरणात्मक (विवरण देने वाला) है और यह कवि की सूक्ष्म दृष्टि का परिचय देता है।

2. 'दिशा' कविता का सार एवं महत्वपूर्ण बिंदु

  • मुख्य विषय: यह कविता बाल मनोविज्ञान (बच्चों की सोच/मानसिकता) से संबंधित है।
  • मूल घटना/प्रसंग:
    • कवि पतंग उड़ाते हुए एक बच्चे से पूछता है— "हिमालय किधर है?"
    • बालक बाल-सुलभ (सहज) भाव से उत्तर देता है— "हिमालय उधर है, जिधर मेरी पतंग भागी जा रही है।"
  • कविता का मुख्य संदेश/अर्थ:
    • हर व्यक्ति का अपना यथार्थ (सत्य) होता है: बच्चे यथार्थ को अपनी दुनिया और अपने दृष्टिकोण से देखते हैं।
    • कवि को बच्चे की यह बाल-सुलभ समझ (संज्ञान) बहुत प्रभावित करती है।
    • यह कविता यह संदेश देती है कि हम बच्चों से भी कुछ-न-कुछ नया सीख सकते हैं।
  • विशेषता:
    • यह कविता आकार में छोटी (लघु) है और इसकी भाषा अत्यंत सहज एवं सरल है।

इस शहर में वसंत अचानक आता है और जब आता है तो मैंने देखा है लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ़ से उठता है धूल का एक बवंडर और इस महान पुराने शहर की जीभ किरकिराने लगती है

संदर्भ: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'अंतरा (भाग-2)' में संकलित 'बनारस' कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रसिद्ध आधुनिक कवि केदारनाथ सिंह हैं।

प्रसंग: इस पद्यांश में कवि ने बनारस शहर में वसंत के अचानक आगमन और उससे उठने वाले धूल के बवंडर के प्रभाव का वर्णन किया है।

व्याख्या: कवि कहते हैं कि बनारस शहर में वसंत ऋतु किसी पूर्व सूचना के बिना अचानक आ जाती है। जब यहाँ वसंत का आगमन होता है, तो 'लहरतारा' या 'मडुवाडीह' (बनारस के स्थानीय मोहल्ले) की तरफ़ से धूल का एक बड़ा बवंडर उठने लगता है। इस उड़ती हुई धूल के कारण इस प्राचीन और महान शहर के लोगों के मुँह में मिट्टी जम जाती है, जिससे उनकी जीभ किरकिराने लगती है।

विशेष:

● लहरतारा और मडुवाडीह जैसे स्थानीय नामों के उल्लेख से बनारस का यथार्थवादी चित्रण हुआ है।

● भाषा सरल, सहज और आम बोलचाल की खड़ी बोली हिंदी है

● 'धूल का बवंडर' में सुंदर दृश्य-बिंब निर्मित हुआ है  कविता मुक्त छंद में रचित है।

जो है वह सुगबुगाता है जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ आदमी दशाश्वमेध पर जाता है और पाता है घाट का आख़िरी पत्थर कुछ और मुलायम हो गया है सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आँखों में एक अजीब सी नमी है और एक अजीब सी चमक से भर उठा है भिक्षुकों के कटोरों का निचाट खालीपन

  • संदर्भ: पूर्ववत।
  • प्रसंग: इस काव्यांश में वसंत के आगमन से बनारस की प्रकृति, चेतन-अचेतन वस्तुओं, जीव-जंतुओं और भिक्षुकों के जीवन में आए सकारात्मक परिवर्तन का वर्णन है।
  • व्याख्या: कवि कहते हैं कि वसंत आते ही इस शहर में जो भी जीवित (विद्यमान) है, उसमें एक नई सुगबुगाहट या चेतना जाग उठती है। जो पेड़-पौधे सूखे पड़े थे, उनमें भी नई कोंपलें (पचखियाँ) फूटने लगती हैं। जब कोई व्यक्ति दशाश्वमेध घाट की ओर जाता है, तो उसे अहसास होता है कि घाट का आख़िरी कठोर पत्थर भी अब स्पर्श में कुछ अधिक मुलायम और स्नेहयुक्त प्रतीत हो रहा है। घाट की सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आँखों में भी आत्मीयता की एक अजीब सी नमी दिखाई देती है और दान की आस में बैठे भिक्षुकों के कटोरों का निचाट (पूर्ण) खालीपन भी उम्मीद की एक अनोखी चमक से भर जाता है।
  • विशेष:
    • 'अजीब सी नमी' और 'अजीब सी चमक' में उपमा अलंकार का प्रयोग है।
    • निर्जीव पत्थर के मुलायम होने और सुगबुगाने में मानवीकरण अलंकार है।
    • भिक्षुकों के निराशाजनक जीवन में आशा के संचार का अत्यंत संवेदनात्मक अंकन है।
    • 'पचखियाँ' जैसे आंचलिक शब्द का सटीक प्रयोग हुआ है।

तुमने कभी देखा है खाली कटोरों में वसंत का उतरना! यह शहर इसी तरह खुलता है इसी तरह भरता और खाली होता है यह शहर

  • संदर्भ: पूर्ववत।
  • प्रसंग: इसमें कवि ने बनारस शहर के खुलने, श्रद्धालुओं से भरने और फिर शांत होकर खाली होने की निरंतर चलने वाली जीवन-प्रक्रिया का वर्णन किया है।
  • व्याख्या: कवि पाठकों को संबोधित करते हुए प्रश्न शैली में पूछते हैं कि क्या तुमने कभी भिक्षुकों के खाली कटोरों में वसंत को उतरते हुए देखा है? (अर्थात अत्यंत निर्धन व्यक्तियों के खाली जीवन में भी खुशी और आशा की किरण को आते देखा है?) बनारस शहर की दिनचर्या इसी प्रकार रोज़ सुबह नए उल्लास के साथ शुरू होती है (खिलती/खुलती है), दिनभर श्रद्धालुओं और पर्यटकों से भरती है और रात होते-होते फिर से खाली एवं शांत हो जाती है।
  • विशेष:
    • 'खाली कटोरों में वसंत का उतरना' में लाक्षणिकता और मानवीकरण अलंकार की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति है।
    • 'तुमने कभी देखा है' में प्रश्न शैली के माध्यम से पाठकों को विचार करने के लिए प्रेरित किया गया है।
    • बनारस शहर की जीवंतता और उसकी शाश्वत दिनचर्या को रेखांकित किया गया है।

इसी तरह रोज़-रोज़ एक अनंत शव ले जाते हैं कंधे अँधेरी गली से चमकती हुई गंगा की तरफ़

  • संदर्भ: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'अंतरा (भाग-2)' में संकलित 'बनारस' कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रसिद्ध आधुनिक कवि केदारनाथ सिंह हैं।
  • प्रसंग: इस पद्यांश में कवि ने बनारस की संकरी गलियों से गंगा घाट की ओर अंतिम संस्कार के लिए ले जाए जाने वाले शवों और जीवन-मरण के शाश्वत सत्य का चित्रण किया है।
  • व्याख्या: कवि कहते हैं कि बनारस शहर में यह एक नित्य प्रक्रिया है। यहाँ प्रतिदिन असंख्य कंधे एक अनंत (अगणित) शव को बनारस की संकरी और अँधेरी गलियों से निकालकर मोक्षदायिनी, पवित्र और सूर्य की किरणों से चमकती हुई गंगा नदी के घाटों की ओर ले जाते हैं। यह शहर जीवन और मृत्यु दोनों के सह-अस्तित्व को सहजता से स्वीकार करता है।
  • विशेष:
    • जीवन की नश्वरता और मोक्ष की सांस्कृतिक मान्यता का यथार्थवादी अंकन हुआ है।
    • 'अँधेरी गली' (अज्ञान/सांसारिकता) और 'चमकती गंगा' (ज्ञान/मोक्ष) के माध्यम से प्रतीकात्मकता उभरी है।
    • 'रोज़-रोज़' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
    • भाषा अत्यंत सरल और बिंबप्रधान खड़ी बोली है।

इस शहर में धूल धीरे-धीरे उड़ती है धीरे-धीरे चलते हैं लोग धीरे-धीरे बजते हैं घंटे शाम धीरे-धीरे होती है

  • संदर्भ: पूर्ववत।
  • प्रसंग: इसमें कवि ने बनारस की जीवन-शैली के धीमेपन, सहजता और उसकी अपनी अनोखी लय (गति) का वर्णन किया है।
  • व्याख्या: कवि कहते हैं कि बनारस शहर की अपनी एक विशेष गति है। यहाँ की हवा में धूल बहुत धीरे-धीरे उड़ती है, यहाँ के लोग बिना किसी हड़बड़ी के बहुत धीरे-धीरे चलते हैं, मंदिरों के घंटे शांत वातावरण में धीरे-धीरे बजते हैं और यहाँ शाम का आगमन भी बहुत धीरे-धीरे होता है। यहाँ जीवन में कोई भाग-दौड़ या आपाधापी नहीं है।
  • विशेष:
    • 'धीरे-धीरे' शब्द की आवृत्ति से पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार और स्वर-मैत्री बनी है।
    • बनारस के शांत, संयमित और ठहराव युक्त जीवन-मूल्यों को रेखांकित किया गया है।
    • दृश्य और श्रव्य बिंबों का सुंदर संयोजन है।

यह धीरे-धीरे होना धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है कि हिलता नहीं है कुछ भी कि जो चीज़ जहाँ थी वहीं पर रखी है कि गंगा वहीं है कि वहीं पर बँधी है नाव कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँ सैकड़ों बरस से

  • संदर्भ: पूर्ववत।
  • प्रसंग: इस काव्यांश में कवि ने स्पष्ट किया है कि बनारस का यह 'धीमापन' उसकी कमज़ोरी नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक निरंतरता और प्राचीन परंपराओं को सुरक्षित रखने वाली शक्ति है।
  • व्याख्या: कवि कहते हैं कि बनारस की यह 'धीरे-धीरे' चलने वाली सामूहिक लय ही इस पूरे शहर को एक सूत्र में मजबूती से बाँधे हुए है। इसी ठहराव के कारण प्राचीन परंपराएँ और आस्था का ढांचा कभी ढहता नहीं है। सब कुछ अपनी जगह सुरक्षित है—गंगा नदी सदियों से उसी स्थान पर बह रही है, नावें वहीं घाट पर बँधी हैं और संत तुलसीदास की खड़ाऊँ भी सैकड़ों वर्षों से अपने मूल स्थान पर वैसे ही सुरक्षित रखी हुई है। आधुनिकता के दौर में भी बनारस अपनी जड़ों से कटकर हिला नहीं है।
  • विशेष:
    • 'तुलसीदास की खड़ाऊँ' और 'गंगा' के उल्लेख से बनारस की सांस्कृतिक धरोहर की निरंतरता दिखाई गई है।
    • लाक्षणिक भाषा का प्रयोग है, जहाँ धीमापन स्थिरता और आस्था का प्रतीक है।
    • 'सैकड़ों बरस से' में ऐतिहासिकता का बोध है।
    • 'कि' शब्द की बार-बार आवृत्ति से भाषा में एक काव्यात्मक लय निर्मित हुई है।

कभी सही-साँझ बिना किसी सूचना के घुस जाओ इस शहर में कभी आरती के आलोक में

  • संदर्भ: पूर्ववत।
  • प्रसंग: कवि पाठक को शाम के समय (आरती के समय) बनारस की अलौकिक एवं आध्यात्मिक सुंदरता का अनुभव करने का निमंत्रण दे रहे हैं।
  • व्याख्या: कवि कहते हैं कि यदि बनारस के असली रूप को देखना और महसूस करना है, तो किसी दिन ठीक शाम के समय (सही-साँझ) बिना किसी पूर्व योजना या सूचना के अचानक इस शहर में प्रवेश कर जाओ। विशेषकर उस समय, जब गंगा घाटों पर संध्या आरती की जगमगाती रोशनी (आलोक) फैली हुई हो। तब इस शहर का आध्यात्मिक और भव्य स्वरूप खुलकर सामने आता है।
  • विशेष:
    • 'सही-साँझ' जैसे तद्भव व आंचलिक शब्द का सटीक प्रयोग हुआ है।
    • 'आरती के आलोक में' में अनुप्रास अलंकार ('अ' वर्ण की आवृत्ति) है।
    • पाठक को सीधे संबोधित करते हुए वर्णनात्मक शैली अपनाई गई है।

                इसे अचानक देखो अद्भुत है इसकी बनावट यह आधा                      जल में है आधा मंत्र में आधा फूल में है

               आधा शव में आधा नींद में है आधा शंख में अगर ध्यान से                 देखो तो यह आधा है और आधा नहीं है

  • संदर्भ: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'अंतरा (भाग-2)' में संकलित 'बनारस' कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रसिद्ध आधुनिक कवि केदारनाथ सिंह हैं।
  • प्रसंग: इस पद्यांश में कवि ने बनारस शहर की अनूठी आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और द्वंदात्मक बनावट (सरंचना) का सूक्ष्म चित्रण किया है।
  • व्याख्या: कवि कहते हैं कि यदि बनारस शहर को अचानक देखा जाए, तो इसकी बनावट अत्यंत अद्भुत और विलक्षण प्रतीत होती है। यह शहर जीवन और मृत्यु, भौतिकता और आध्यात्मिकता के संगम पर स्थित है। इसका आधा रूप गंगा के जल में डूबा है, तो आधा धार्मिक मंत्रोच्चार में लीन है; आधा पूजा के फूलों की महक में समाया है, तो आधा श्मशान के शवों में मृत्यु के सत्य को प्रकट करता है। इसका आधा भाग अलौकिक शांति की नींद में सोया हुआ है, तो आधा शंखध्वनि की गूँज में जागा हुआ है। यदि कोई इसे गहराई और ध्यान से देखे, तो अनुभव होगा कि यह शहर आधा दिखाई देता है (स्थूल रूप में) और आधा अदृश्य (सूक्ष्म आध्यात्मिक चेतना के रूप में) विद्यमान है।
  • विशेष:
    • बनारस के विरोधाभासी और रहस्यात्मक चरित्र (जीवन-मृत्यु, जाग्रत-सुप्त) का सजीव अंकन हुआ है।
    • 'आधा जल में...', 'आधा मंत्र में...' में आवृत्ति के माध्यम से काव्यात्मक लय और विरोधाभास अलंकार का सुंदर प्रयोग है।
    • भाषा लाक्षणिक, सहज और दर्शन से परिपूर्ण है।
    • मुक्त छंद का प्रयोग है।

जो है वह खड़ा है बिना किसी स्तंभ के जो नहीं है उसे थामे है राख और रोशनी के ऊँचे-ऊँचे स्तंभ आग के स्तंभ और पानी के स्तंभ धुएँ के खुशबू के आदमी के उठे हुए हाथों के स्तंभ

  • संदर्भ: पूर्ववत।
  • प्रसंग: इसमें कवि ने बनारस की अमूर्त आस्था, विश्वास और उसके अद्श्य सम्बल (सहारे) को विभिन्न प्रतीकात्मक 'स्तंभों' के माध्यम से अभिव्यक्त किया है।
  • व्याख्या: कवि कहते हैं कि बनारस में जो कुछ प्रत्यक्ष (विद्यमान) है, वह किसी भौतिक खंभे (स्तंभ) के बिना ही अपनी पूरी दृढ़ता से टिका हुआ है। वहीं, जो अमूर्त है (जो आँखों से नहीं दिखता—जैसे आस्था और संस्कृति), उसे चिता की राख, आरती की रोशनी, मणिकर्णिका की आग, गंगा के पानी, धूप-हवन के धुएँ, पूजा की खुशबू और सूर्य को अर्घ्य देते श्रद्धालुओं के उठे हुए हाथों रूपी अदृश्य और ऊँचे-ऊँचे स्तंभों ने थाम रखा है। अर्थात बनारस की नींव किसी ईंट-पत्थर के सहारे नहीं, बल्कि जन-आस्था के इन प्रतीकात्मक स्तंभों पर टिकी है।
  • विशेष:
    • 'राख', 'रोशनी', 'आग', 'पानी', 'धुआँ' और 'उठे हुए हाथ' को आस्था के स्तंभ मानकर रूपक अलंकार की रचना की गई है।
    • 'ऊँचे-ऊँचे' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
    • बनारस की अभौतिक एवं सांस्कृतिक मजबूती का सुंदर प्रतीकात्मक चित्रण है।
    • दृश्य और घ्राण (सुगंध) बिंबों का उत्कृष्ट समावेश है।

किसी अलक्षित सूर्य को देता हुआ अर्घ्य शताब्दियों से इसी तरह गंगा के जल में अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर अपनी दूसरी टाँग से बिल्कुल बेखबर!

  • संदर्भ: पूर्ववत।
  • प्रसंग: इस काव्यांश में कवि ने बनारस की एकाग्र भक्ति-साधना, हठयोग परंपरा और उसकी बेपरवाह/मस्तमौला जीवन-शैली का वर्णन किया है।
  • व्याख्या: कवि कहते हैं कि यह बनारस शहर सदियों (शताब्दियों) से गंगा के पवित्र जल में खड़ा होकर किसी अदृश्य (अलक्षित) सूर्य देव को अर्घ्य (जल अर्पित) दे रहा है। यह शहर एक तपस्वी की भाँति अपनी आध्यात्मिक साधना (एक टाँग) में इतना लीन है कि इसे अपनी भौतिक दुनिया, आपाधापी या दूसरी टाँग (आधुनिकता) की कोई चिंता या खबर ही नहीं है। यह शहर अपनी प्राचीन आस्था में पूरी तरह मग्न होकर अपनी ही धुन में जी रहा है।
  • विशेष:
    • 'अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर' में बनारस का मानवीकरण अलंकार किया गया है (तपस्वी के रूप में)।
    • 'अलक्षित सूर्य', 'शताब्दियों से' शब्द बनारस की प्राचीनता और गभीर आध्यात्मिकता के सूचक हैं।
    • 'दूसरी टाँग से बिल्कुल बेखबर' बनारस के ठेठ 'मस्तमौला और फक्कड़' स्वभाव को दर्शाता है।
    • व्यंग्य, लाक्षणिकता और बिंब-विधान का सटीक प्रयोग है।

दो बैलों की कथा - प्रश्न उत्तर

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास

प्रश्न 1. कांजीहौस में कैद पशुओं की हाज़िरी क्यों ली जाती होगी?
उत्तर- कांजीहौस एक प्रकार से पशुओं की जेल थी। उसमें ऐसे आवारा पशु कैद होते थे जो दूसरों के खेतों में घुसकर फसलें नष्ट करtते थे। अत: कांजीहौस के मालिक का यह दायित्व होता था कि वह उन्हें जेल में सुरक्षित रखे तथा भागने न दे। इस कारण हर रोज उनकी हाजिरी लेनी पड़ती होगी।

प्रश्न 2. छोटी बच्ची को बैलों के प्रति प्रेम क्यों उमड़ आया?

उत्तर- छोटी बच्ची की माँ मर चुकी थी। सौतेली माँ उसे मारती रहती थी। इधर बैलों की भी यही स्थिति थी। गया उन्हें दिनभर खेत में जोतता, मारता-पीटता और शाम को सूखा भूसा डाल देता। छोटी बच्ची महसूस कर रही थी कि उसकी स्थिति और बैलों की स्थिति एक जैसी है। उनके साथ अन्याय होता देखा उसे बैलों के प्रति प्रेम उमड़ आया।

प्रश्न 3. कहानी में बैलों के माध्यम से कौन-कौन से नीति-विषयक मूल्य उभर कर आए हैं?

उत्तर- इस कहानी के माध्यम से निम्नलिखित नीतिविषयक मूल्य उभरकर सामने आए हैं

● सरल-सीधा और अत्यधिक सहनशील होना पाप है। बहुत सीधे इनसान को मूर्ख या ‘गधा’ कहा जाता है।
● इसलिए मनुष्य को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना चाहिए
● आज़ादी बहुत बड़ा मूल्य है। इसे पाने के लिए मनुष्य को बड़े-से-बड़ा कष्ट उठाने को तैयार रहना चाहिए।
● समाज के सुखी-संपन्न लोगों को भी आजादी की लड़ाई में योगदान देना चाहिए।

प्रश्न 4. प्रस्तुत कहानी में प्रेमचंद ने गधे की किन स्वभावगत विशेषताओं के आधार पर उसके प्रति रूढ़ अर्थ ‘मूर्छ प्रयोग न कर किस नए अर्थ की ओर संकेत किया है?
उत्तर- गधा सबसे बुद्धिहीन प्राणी माना जाता है। यदि किसी को मूर्ख कहना चाहते हैं तो हम उसे गधा कह देते हैं। गधा ‘मूर्ख’ के अर्थ में रुढ़ हो गया है परंतु लेखक ने इसे सही नहीं माना क्योंकि गधा अपने सीधेपन और सहनशीलता से किसी को हानि नहीं पहुँचाता है। गाय, कुत्ता और बैल जैसे जानवर कभी-कभी क्रोध कर देते हैं पर गधा ऐसा नहीं करता है। गुणों के विषय में वह ऋषियों-मुनियों से कम नहीं है।

प्रश्न 5. किन घटनाओं से पता चलता है कि हीरा और मोती में गहरी दोस्ती थी?

उत्तर- इस कहानी में अनेक घटनाएँ ऐसी हैं जिनसे पता चलता है कि मोती और हीरा में गहरी दोस्ती थी।

  1. पहली घटना-
    दोनों एक-साथ गाड़ी में जोते जाते थे तो यह कोशिश करते थे कि गाड़ी का अधिक भार दूसरे साथी के कंधे पर न आकर उसके अपने कंधे पर आए।
  2. दूसरी घटना-
    गया ने हीरा के नाक पर डंडा मारा तो मोती से सहा न गया। वह हल, रस्सी, जुआ, जोत सब लेकर भाग पड़ा। उससे हीरा का कष्ट देखा न गया।
  3. तीसरी घटना-
    जब मटर के खेत में मटर खाकर दोनों मस्त हो रहे तो वे सींग मिलाकर एक-दूसरे को ठेलने लगे। अचानक मोती को लगा कि हीरा क्रोध में आ गया है तो वह पीछे हट गया। उसने दोस्ती को दुश्मनी में बदलने से रोक लिया।
  4. चौथी घटना-
    जब उनके सामने विशालकाय साँड आ खड़ा हुआ तो उन्होंने योजनापूर्वक एक-दूसरे का साथ देते हुए उसका मुकाबला किया। साँड एक पर चोट करता तो दूसरा उसकी देह में अपने नुकीले सींग चुभा देता। आखिरकार साँड बेदम होकर गिर पड़ा।
  5. पाँचवीं घटना-
    मोती मटर के खेत में मटर खाते-खाते पकड़ा गया। हीरा उसे अकेला विपत्ति में देखकर वापस आ गया। वह भी मोती के साथ पकड़ा गया।
  6. छठी घटना-
    काँजीहौस में हीरा ने दीवार तोड़ डाली। उसे रस्सियों से बाँध दिया गया। इस पर मोती ने उसका साथ दिया। पहले तो उसने बाड़े की दीवार तोड़कर हीरा का अधूरा काम पूरा किया, फिर उसका साथ देने के लिए उसी के साथ बँध गया

प्रश्न 6. लेकिन औरत जात पर सींग चलाना मना है, यह भूल जाते हो।’-हीरा के इस कथन के माध्यम से स्त्री के प्रति प्रेमचंद के दृष्टिकोण को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:- लेकिन औरत जात पर सींग चलाना मना है। हीरा के इस कथन के माध्यम से पता चलता है कि प्रेमचंद नारी जाति का अत्यधिक सम्मान करते थे। नारी विभिन्न रिश्ते बनाकर समाज में अपनी भूमिका का निर्वहन करती है। वह त्याग, दया, ममता, सहनशीलता का जीता जागता उदाहरण है। विपरीत परिस्थितियों में यदि नारी में क्रोध जैसे भाव आ भी जाते हैं तो इससे उसकी गरिमा कम नहीं हो जाती है और न उसके सम्मान में कमी आ जाती है। लेखक महिलाओं के प्रति अत्यधिक सम्मान रखता है। उसने यह भी कहना चाहा है कि जब पशु भी नारी जाति का सम्मान करते हैं तो मनुष्य को नारी जाति का सम्मान हर स्थिति में करना चाहिए।

प्रश्न 7. किसान जीवन वाले समाज में पशु और मनुष्य के आपसी संबंधों को कहानी में किस तरह व्यक्त किया गया है?

उत्तर- किसान जीवन में पशुओं और मनुष्यों के आपसी संबंध बहुत गहरे तथा आत्मीय रहे हैं।
किसान पशुओं को घर के सदस्य की भाँति प्रेम करते रहे हैं और पशु अपने स्वामी के लिए जी-जान देने को तैयार रहे हैं। झूरी हीरा और मोती को बच्चों की तरह स्नेह करता था। तभी तो उसने उनके सुंदर-सुंदर नाम रखे-हीरा-मोती। वह उन्हें अपनी आँखों से दूर नहीं करना चाहता था। जब हीरा-मोती उसकी ससुराल से लौटकर वापस उसके थाने पर आ खड़े हुए तो उसका हृदय आनंद से भर गया। गाँव-भर के बच्चों ने भी बैलों की स्वामिभक्ति देखकर उनका अभिनंदन किया। इससे पता चलता है कि किसान अपने पशुओं से मानवीय व्यवहार करते हैं।

प्रश्न 8. इतना तो हो ही गया कि नौ दस प्राणियों की जान बच गई। वे सब तो आशीर्वाद देंगें’-मोती के इस कथन के आलोक में उसकी विशेषताएँ बताइए।
उत्तर- इतना तो हो ही गया कि नौ-दस प्राणियों की जान बच गई। वे सब तो आशीर्वाद देंगे। मोती के इस कथन से पता चलता है कि वह परोपकारी स्वभाव वाला प्राणी है। परोपकार की ऐसी भावना वह मन में ही नहीं रखता है बल्कि इसे व्यावहारिक रूप में दर्शाता भी है। वह बाड़े की कच्ची दीवार को तोड़कर नौ-दस प्राणियों को भगाता है ताकि उनकी जान बच जाए। मोती सच्चा मित्र भी है। वह कांजीहौस में हीरा को अकेला छोड़कर नहीं जाता है। वह आशावादी भी है। उसे विश्वास है कि ईश्वर उनकी जान अवश्य बचाएँगे।

प्रश्न 9. आशय स्पष्ट कीजिए

(क) अवश्य ही उनमें कोई ऐसी गुप्त शक्ति थी, जिससे जीवों में श्रेष्ठता का दावा करने वाला मनुष्य वंचित है।
(ख) उस एक रोटी से उनकी भूख तो क्या शांत होती; पर दोनों के हृदय को मानो भोजन मिल गया।
उत्तर-
(क) हीरा और मोती बिना कोई वचन कहे एक-दूसरे के मन की बात समझ जाते थे। प्रायः वे एक-दूसरे से स्नेह की बातें सोचते थे। यद्यपि मनुष्य स्वयं को सब प्राणियों से श्रेष्ठ मानता है किंतु उसमें भी यह शक्ति नहीं होती।

(ख) हीरा और मोती गया के घर बँधे हुए थे। गया ने उनके साथ अपमानपूर्ण व्यवहार किया था। इसलिए वे क्षुब्ध थे। परंतु तभी एक नन्हीं लड़की ने आकर उन्हें एक रोटी ला दी। उस रोटी से उनका पेट तो नहीं भर सकता था। परंतु उसे खाकर उनका हृदय जरूर तृप्त हो गया। उन्होंने बालिका के प्रेम का अनुभव कर लिया और प्रसन्न हो उठे।

प्रश्न 10. गया ने हीरा-मोती को दोनों बार सूखा भूसा खाने के लिए दिया क्योंकि-
(क) गया पराये बैलों पर अधिक खर्च नहीं करना चाहता था।
(ख) गरीबी के कारण खली आदि खरीदना उसके बस की बात न थी।
(ग) वह हीरा-मोती के व्यवहार से बहुत दुखी था।
(घ) उसे खली आदि सामग्री की जानकारी न थी।
(सही उत्तर के आगे (✓) का निराश लगाइए।)
उत्तर-
(ग) वह हीरा-मोती के व्यवहार से दुखी था।

रचना और अभिव्यक्ति

प्रश्न 11. हीरा और मोती ने शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाई लेकिन उसके लिए प्रताड़ना भी सही। हीरा-मोती की इस प्रतिक्रिया पर तर्क सहित अपने विचार प्रकट करें।
उत्तर-
हीरा और मोती शोषण के विरुद्ध हैं। वे हर शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाते रहे हैं। उन्होंने झूरी के साले गयी का विरोध किया तो सूखी रोटियाँ खाई तथा डंडे खाए। फिर कॉजीहौस में अन्याय का विरोध किया तो बंधन में पड़े। उन्हें भूखे रहना पड़ा।
प्रतिक्रिया-मेरा विचार है कि हीरा और मोती का यह कदम बिल्कुल ठीक था। यदि वे कोई प्रतिक्रिया न करते तो उनका खूब शोषण होता। उन्हें गिड़गिड़ाकर, मन मारकर अपने मालिक की गुलामी करनी पड़ती। वे अपने दर्द को व्यक्त भी न कर पाते। परंतु अपना विद्रोह प्रकट करके उन्होंने मालिक को सावधान कर दिया कि उनका अधिक शोषण नहीं किया जा सकता। मार खाने के बदले उन्होंने मालिक के मन में भय तो उत्पन्न कर ही दिया।

प्रश्न 12. क्या आपको लगता है कि यह कहानी आजादी की लड़ाई की ओर भी संकेत करती है?

उत्तर- हाँ, हीरा-मोती ने अपनी परतंत्रता से मुक्ति पाने के लिए जिस तरह से नाना प्रकार की कठिनाइयाँ सहीं और मृत्यु के करीब जाकर भी बच निकले। वे अंततः अपने घर वापस आ गए, इससे यही संकेत मिलता है। हीरा-मोती गया के घर से पहली बार रस्सी तुड़ाकर आ जाते हैं। वे दुबारा गया के घर जाते हैं, तो उन्हें अपमानित और प्रताड़ित होना पड़ता है। और भूखा भी रहना पड़ता है। वहाँ से भागने पर उन्हें साँड रूपी मुसीबत का सामना करना पड़ता है। अंत में कांजीहौस में बंद होना तथा कसाई के हाथों बिकना तथा इसके उपरांत भी बचकर झुरी के पास आ जाना आदि आजादी की लड़ाई की ओर संकेत करती है।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. गधा किस अर्थ में रुढ़ हो गया है? और क्यों?
उत्तर- गधा ‘मूर्ख’ या बेवकूफ के अर्थ में रुढ़ हो गया है। किसी आदमी को जब बेवकूफ़ कहना चाहते हैं तो उसे गधा कहते हैं। ऐसा उसके सीधेपन और सब कुछ सहन करने के कारण कहा जाता है।

प्रश्न 2. सहनशीलता के मामले में गाय और कुत्ता गधे से किस तरह भिन्न हैं?
उत्तर- गाय और कुत्ता गधे जितना सहनशील नहीं है। गाय नाराज होने पर या अपने बच्चे को छेड़े जाते हुए देखकर हिंसक रूप धारण कर लेती है। इसी तरह कुत्ता भी काट लेता है जबकि गधा सब कुछ चुपचाप सहन कर लेता है।

प्रश्न 3. अफ्रीका और अमरीका में भारतीयों की दुर्दशा का क्या कारण है?
उत्तर- अफ्रीका और अमरीका में भारतीयों की दुर्दशा का कारण उनका सीधापन और उनकी सहनशीलता है। वे अपनी सहनशीलता के कारण शोषण और अन्याय के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाते है और गम खाकर रह जाते हैं।

प्रश्न 4. बैल को गधे का छोटा भाई क्यों कहा गया है?
उत्तर- बैल को गधे का छोटा भाई इसलिए कहा गया है क्योंकि बैल भी सीधा-सादा जानवर है। वह भी सहनशील है पर गधे जितना नहीं। बैल सींग चलाकर, अड़ियल रुख अपनाकर तथा कई अन्य तरीके से अपना विरोध एवं असंतोष प्रकट कर देता है।

प्रश्न 5. पशुओं की किस गुप्त शक्ति से मनुष्य वंचित है?
उत्तर- पशु अपने मन के भाव-विचार मूक भाषा में व्यक्त करते हैं जिससे अन्य पशु समझ जाते हैं। इस तरह वे दूसरे के मन की बातें बिना कहे जान-समझ लेते हैं। पशुओं की यह ऐसी गुप्त शक्ति है जिससे मनुष्य वंचित है।

प्रश्न 6. हीरा-मोती एक-दूसरे के प्रति प्रेम और मित्रता कैसे प्रकट करते थे?
उत्तर- हीरा और मोती एक-दूसरे को चाट-चूटकर और सँघकर अपना प्रेम प्रकट करते थे। वे अपनी दोस्ती प्रकट करने के लिए कभी-कभी सींग भी मिला लेते थे। उनके ऐसा करने में विग्रह का भाव नहीं बल्कि मनोविनोद और आत्मीयता का भाव रहता था।

प्रश्न 7. किन बातों से प्रकट होता है कि हीरा-मोती में भाई चारा था।
उत्तर- हीरा-मोती जब हल में जोते जाते थे तब उनकी यही चेष्टा रहती थी कि वे एक-दूसरे का भार अपने कंधे पर ले ले। वे दिन भर के काम के बाद दोपहर या संध्या में चाट-चूटकर अपनी थकान उतारते। वे एक साथ नाँदों में मुँह डालते और हटाते थे। इन बातों से हीरा-मोती का भाई चारा प्रकट होता है।

प्रश्न 8. बैलों को अपने साथ ले जाते हुए गया को क्या परेशानी हो रही थी ?
उत्तर- दोनों बैलों को अपने साथ ले जाते हुए गया को यह परेशानी हो रही थी कि बैल उसके साथ नहीं जाना चाहते थे। यदि वह बैलों को पीछे से हाँकता था तो दोनों बैल दाँए-बाएँ भागते थे और वह पगहे पकड़कर आगे को खींचता तो दोनों पीछे को ज़ोर लगाते।

प्रश्न 9. हीरा-मोती को वाणी की कमी क्यों अखर रही थी?
उत्तर- हीरा-मोती गया के साथ अनिच्छा से जा रहे थे। वे सोच रहे थे कि गया के हाथों उन्हें बेच दिया गया है। वे अपने मालिक झूरी से अपने बेचे जाने का कारण जानना चाहते थे। हीरा-मोती बैल ये जो मूक भाषा में बातें कर सकते थे पर झूरी समझता कैसे। अपनी बात कहने के लिए हीरा-मोती को वाणी की कमी अखर रही थी।

प्रश्न 10. हीरा-मोती की आँखों में विद्रोहमय स्नेह कब झलकता हुआ प्रतीत हुआ और क्यों?
उत्तर- झूरी ने हीरा-मोती को गया के घर काम करने भेजा था पर इन दोनों को वहाँ गाँव, घर तथा मनुष्य सब बेगाने जैसे लग रहे थे। उन्हें गया से भी स्नेह नहीं मिल रहा था। वे दोनों वहाँ से रात में ही भाग आए थे। उन्हें अपने बेचे जाने का भ्रम होने के कारण उनकी आँखों में विद्रोहमय स्नेह झलक रहा था।

प्रश्न 11. हीरा और मोती ने गया के घर स्वयं को अपमानित क्यों महसूस किया?
उत्तर- हीरा और मोती ने गया के घर स्वयं को इसलिए अपमानित महसूस किया क्योंकि गया ने अपने बैलों के चारे में चूनी-चोकर, खली आदि मिलाया परंतु हीरा मोती के सामने सूखा भूसा डाल दिया। इन बैलों के साथ झूरी ने ऐसा कभी नहीं किया था।

प्रश्न 12. गया और उसके घरवाले हीरा-मोती को नियंत्रण में करने के लिए क्या योजना बना रहे थे?
उत्तर- गया और उसके घरवालों का व्यवहार बैलों के प्रति अच्छा न था। वह बैलों को मारता-पीटता था तब भी बैलों पर उसका पूरा नियंत्रण नहीं था। इन्हें नियंत्रित करने के लिए वे बैलों की नाक में नाथ डालने की योजना बना रहे थे।

प्रश्न 13. बालिका ने बैलों को भागने में किस तरह मदद की?
उत्तर- बालिका प्रतिदिन की तरह दो रोटियाँ लेकर हीरा-मोती के पास आई और घरवालों की योजना बताते हुए उनके गले की रस्सी खोल दी। वह चिल्लाने लगी कि फूफा वाले दोनों बैल भागे जा रहे हैं ताकि कोई भी उसपर संदेह न करे। इस तरह उसने बैलों को भागने में मदद की।

प्रश्न 14. हीरा ने कब और कैसे सच्चे मित्र का फर्ज निभाया?
उत्तर- हीरा और मोती भूखे थे। सामने के खेत में हरी मटर नजर आई। अभी उन्होंने दो-चार ग्रास ही खाए थे कि रखवाले लाठी लिए आए। हीरा तो भाग सकता था पर सींचे खेत में खुर धंसने से मोती फँस गया। रखवालों ने उसे पकड़ लिया तो हीरा भागा नहीं। इस तरह उसने सच्चे मित्र का फर्ज निभाया।

प्रश्न 15. कांजीहौस में किन्हें बंद किया जाता है और उनके साथ कैसा व्यवहार किया जाता है?
उत्तर- कांजीहौस में आवारा और लावारिस पशुओं को बंद किया जाता है। वहाँ उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता है। उनकी हालत अत्यंत दयनीय हो जाती है। अधिकांश मरने की कगार पर पहुँच जाते हैं।

प्रश्न 16. दढ़ियल ने जब बैलों के कूल्हे में अँगुली से गोदा तो उन्होंने अपने अंतर्ज्ञान से क्या जान लिया?
उत्तर- नीलामी के लिए खड़े हीरा-मोती के कूल्हे में जब दढ़ियल ने अँगुली से गोदा तो दोनों ने अपने अंतर्ज्ञान से यह जान लिया कि दढ़ियल कसाई है। वह नीलामी में उन्हें खरीदकर उन पर छुरी चलाएगा।

प्रश्न 17. मोती के उस कार्य का वर्णन कीजिए जिसके बदले वह आशीर्वाद पाने की अपेक्षा कर रहा था?
उत्तर- कांजीहौस में बंदी हीरा-मोती ने देखा कि वहाँ गधे, घोड़े बकरियाँ, भैंसें आदि नौ-दस जानवर मुरदों-से ज़मीन पर पड़े हैं। मोती ने रात में बाड़े की दीवार गिरा दी जिससे ये जानवर भाग गए और उनकी जान बच गई। अपने इसी कार्य के बदले वह आशीर्वाद पाने की अपेक्षा कर रहा था।

प्रश्न 18. हीरा-मोती जब दढ़ियल के साथ जा रहे थे तो हार में चरते अन्य जानवरों को देखकर उनकी क्या प्रतिक्रिया हुई ?
उत्तर- दढ़ियल के साथ जाते हीरा-मोती ने जब खेत में प्रसन्नतापूर्वक चर रहे अन्य जानवरों को देखा तो उन्हें वे जानवर स्वार्थी लगे क्योंकि कसाई के हाथों में उन्हें देखकर भी वे चिंता नहीं कर रहे थे। वे अपनी उछल-कूद और खुशी में डूबे थे।

प्रश्न 19. झूरी के पास वापस आए बैलों को देखकर बच्चों ने अपनी खुशी किस तरह व्यक्त की?
उत्तर- झूरी के पास लौटे हीरा-मोती को देखकर बच्चों ने ताली बजाकर उनका स्वागत अभिनंदन किया। वे इन्हें वीरता का प्रशस्ति पत्र देना चाहते थे। बच्चे खुशी-खुशी में भागकर अपने घरों से चूनी, गुड़, चोकर आदि लोकर खिलाने लगे। वे बहुत खुश दिख रहे थे।

प्रश्न 20. दूसरी बार घर आए हीरा-मोती को देखकर मालकिन की प्रतिक्रिया पहली बार से किस तरह भिन्न थी?
उत्तर- हीरा-मोती जब पहली बार गया के घर से लौटकर आए थे तो मालकिन ने उन्हें नमकहराम कहा और उनकी खली-चूनी भूसी आदि बंद करवा दिया, पर दूसरी बार हीरा-मोती के घर आने पर मालकिन हर्षित हुई और बैलों के माथे चूम लिए थे।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. हीरा और मोती अपने मालिक झूरी के साथ किस तरह का भाव रखते थे?
उत्तर- हीरा और मोती अपने मालिक झूरी के साथ अत्यंत गहरा प्रेम एवं आत्मीय व्यवहार रखते थे। वे अपने मालिक से प्रेम करते हुए उसकी हर बात मानते थे। वे झूरी से अलग नहीं रहना चाहते थे। उनकी इच्छा थी उनका मालिक चाहे जितना काम करा ले पर वह उन्हें अपने से अलग न करे। झूरी ने जब गया के साथ उन्हें भेजा तो वे रस्सी पगहे तुड़ाकर गया के घर से भागकर आ गए। इस समय उनकी आँखों में विद्रोहमयी स्नेह झलक रहा था। हीरा-मोती को भागने का अवसर मिलने पर भी वे अंत में भागकर झूरी के पास आ जाते थे जो उनके असीम लगाव का प्रमाण था।

प्रश्न 2. “दो बैलों की कथा’ पाठ में लेखक ने ‘सीधेपन’ के संबंध में क्या कहा है? इसके लिए उसने क्या-क्या उदाहरण दिए हैं?
उत्तर- ‘दो बैलों की कथा’ पाठ में लेखक प्रेमचंद ने ‘सीधेपन’ को इस संसार के लिए उचित नहीं बताया है। इसके लिए उसने गधे और बैलों के सीधेपन का उदाहरण देते हुए दर्शाया है कि अपने सीधेपन के लिए गधा मूर्ख के अर्थ में रूढ़ बन गया है तथा बैल को ‘बछिया का ताऊ’ कहा जाने लगा है। इस पाठ में भी हीरा-मोती के सीधेपन के कारण उन पर अत्याचार किया जाता है परंतु उनके सींग चलाते या अत्याचार का विरोध करते ही उन पर किया जाने वाला अत्याचार कम हो जाता है। इसी तरह अपनी सहनशीलता के कारण भारतीय अफ्रीका और अमेरिका में सम्मान नहीं पाते जबकि जापान ने युद्ध में विजय पाते ही दुनियाभर में सम्मान प्राप्त किया।

प्रश्न 3. हीरा-मोती दो बार झूरी के घर से वापस आए। दोनों बार झूरी की पत्नी की प्रतिक्रिया अलग-अलग क्यों थी? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-

झूरी ने अपने बैलों हीरा और मोती को गया के घर काम के लिए भेजा। हीरा-मोती झूरी से बहुत लगाव रखते थे। वे झूरी को छोड़ कर गया के घर नहीं जाना चाहते थे। गया के साथ वे जैसे-तैसे चले गए पर बेगानापन महसूस होने के कारण वे रात में ही रस्सी पगहे तुड़ाकर चले आए। यह देख झूरी की पत्नी ने उन्हें नमक हराम कहा और उन्हें खली, चूनी-चोकर आदि देना बंद करके सूखा भूसा सामने डाल दिया। दूसरी बार हीरा-मोती कांजीहौस से नीलाम होकर किसी तरह घर पहुँचते हैं तो उनकी दशा देखकर झूरी की पत्नी के मन में उनके प्रति बदलाव आ जाता है। वह बैलों द्वारा सहे कष्ट का अनुमान लगा लिया और उनके माथे चूम लिया। ऐसी प्रतिक्रिया बैलों के द्वारा अपनी स्वतंत्रता के लिए किए गए संघर्ष के कारण थी।

प्रश्न 4. मोती ने बैलगाड़ी को खाई में गिरा देना चाहा पर हीरा ने सँभाल लिया। इस कथन के आलोक में हीरा की स्वाभाविक विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर- हीरा-मोती गया के साथ नहीं जाना चाहते थे, इसलिए गया उन दोनों को बैलगाड़ी में जोतकर ले जा रहा था। अपना विरोध जताने के लिए मोती बैलगाड़ी को खाई में गिरा देना चाहता था, पर हीरा ने रोक लिया। इससे उसकी इन विशेषताओं का पता चलता है-

  • धैर्यवान-हीरा-मोती की तुलना में अधिक धैर्यवान है। वह किसी समस्या का धैर्यपूर्वक सामना करता है।
  • सहनशील-गया ने जब हीरा की नाक पर डंडे बरसाए तो हीरा सहन कर गया। इसी घटना के लिए मोती ने जब गयों को मार गिराना चाहा तो हीरा ने कहा कि यह हमारी जाति का धर्म नहीं है।
  • अहिंसक विद्रोही-कांजीहौस में मार खाकर भी हीरा शांत नहीं होता। यद्यपि उसे मोटी रस्सियों में बाँध दिया जाता है फिर भी वह कहता है ‘ज़ोर तो मारता ही जाऊँगा चाहे कितने ही बंधन पड़ते जाएँ।’
  • सच्चा मित्र-हीरा मोती के साथ सच्ची मित्रता निभाता है। वह रखवालों के हाथ पड़े मोती को अकेला नहीं छोड़ता है।

प्रश्न 5. ‘मोती के स्वभाव में उग्रता है’–उदाहरण द्वारा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- मोती का स्वभाव उग्र है। वह अत्याचार एवं शोषण का विरोध करता है। वह अपने ऊपर ही नहीं हीरा पर भी अत्याचार देखकर क्रोधित हो उठता है और अत्याचार का सामना करने के लिए आक्रमण कर देता है। इसके एक नहीं अनेक उदाहरण हैं। गया जब हीरा की नाक पर डंडे बजाता है तो क्रोधित मोती हल जोत, जुआ लेकर भागता है। गया और उसके साथी जब उसे पकड़ने आते हैं तो वह कहता है-”मुझे मारेगा तो मैं भी एक दो गिरा दूंगा।” इसी तरह वह गया का अत्याचार देखकर एकाध को सींगों पर उठाकर फेंक देने की बात कहता है।

वह गिरे हुए शत्रु पर भी दया दिखाने का पक्षधर नहीं है। वह वेदम साँड को मार डालना चाहता है। उसका विचार है कि वैरी को ऐसा मारना चाहिए कि फिर न उठे। यह मोती के स्वभाव की उग्रता है कि दढ़ियल को सींग दिखाकर गाँव के बाहर इस तरह खदेड़ देता है कि वह लौटकर आने का साहस नहीं जुटा पाता है।

प्रश्न 6. ‘संगठन में शक्ति है’-हीरा-मोती ने इसका नमूना किस तरह प्रस्तुत किया?
उत्तर- यह सर्वविदित है कि संगठन में शक्ति होती है। इसका एक नमूना हीरा-मोती ने अपने से बलशाली साँड को पराजित करके प्रस्तुत किया। गया के घर से भागे हीरा-मोती के सामने रास्ते में विशालकाय, मदमस्त साँड आ गया। हीरा-मोती ने सोच-विचार के बाद अपने से बलशाली शत्रु का मुकाबला करने की योजना बनाई मल्ल युद्ध में माहिर साँड को संगठित शत्रुओं से लड़ने का अनुभव न था। हीरा-मोती ने संगठित होकर साँड से युद्ध किया। एक ने आगे से वार किया तो दूसरे ने पीछे से। साँड जब हीरा को मारने दौड़ता तो मोती उस पर सींग से वार कर देता। वह जब मोती पर वार करता तो हीरा उसके बगल में सींग घुसा देता। इससे साँड जख्मी होकर बेदम हो गया और गिर गया।

प्रश्न 7. हीरा-मोती स्वभाव से विद्रोही तो हैं पर उनके मन में दयाभाव भी है। इसका प्रमाण हमें कब और कहाँ मिलता है? ‘दो बैलों की कथा’ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- हीरा और मोती स्वभाव से विद्रोही हैं। इसी विद्रोह के कारण वे दूसरी बार भी गया के घर से भागते हैं और खेत के रखवालों द्वारा पकड़कर कांजीहौस में बंद कर दिए जाते हैं। कांजीहौस में हीरा-मोती ने देखा कि यहाँ भैसे, घोड़ियाँ, गधे बकरियाँ आदि पहले से बंद हैं। वे चारा न मिलने के कारण मुरदों जैसे जमीन पर पड़े हैं। इन्हें देखकर हीरा-मोती दयार्द्र हो जाते हैं। पहले हीरा ने बाड़े की दीवार गिराना शुरू किया परंतु चौकीदार ने देख लिया और उसे बंधन में डाल दिया। अब मोती ने उग्र रुख अपनाया और दो घंटे के परिश्रम के बाद बाड़ की आधी दीवार गिरा दी। अब उसने सींग मार-मारकर जानवरों को वहाँ से भगा दिया और उनकी जान बचाई। इस प्रकार हीरा-मोती एक ओर जहाँ विद्रोही हैं वहीं दूसरी ओर उनके मन में दयाभाव भी है।