सूरदास भक्तिकाल की सगुण धारा के कृष्ण-भक्त कवियों में सर्वोपरि माने जाते हैं। उनका जन्म सन् 1478 में हुआ माना जाता है। जन्मस्थान के विषय में दो प्रमुख मान्यताएँ हैं—पहली मान्यता के अनुसार इनका जन्म मथुरा के निकट रुनकता (या रेणुका क्षेत्र) में हुआ था, जबकि दूसरी मान्यता के अनुसार इनका जन्म स्थान दिल्ली के समीप 'सीही' नामक गाँव माना जाता है।
उन्होंने कृष्ण को अपना आराध्य मानकर उनकी बाल-लीलाओं, रूप-सौंदर्य, संयोग-वियोग तथा श्रृंगार का सुंदर चित्रण किया है। वे पुष्टिमार्गीय अष्टछाप के श्रेष्ठ कवियों में गिने जाते हैं। वे मथुरा और वृंदावन के बीच गऊघाट पर स्थित श्रीनाथ जी के मंदिर में रहकर भजन-कीर्तन किया करते थे। सूरदास जी वल्लभाचार्य के प्रमुख शिष्यों में से एक थे। उनका महाप्रयाण (देहांत) सन् 1583 में पारसौली नामक स्थान पर हुआ।
प्रमुख रचनाएँ:
1. 'सूरसागर' (इनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना)
2. 'साहित्य लहरी'
3. 'सूरसारावली'
भाषा-शैली
सूरदास जी की काव्य-भाषा मुख्यतः ब्रजभाषा है। उन्होंने अपनी कविताओं में ब्रजभाषा के परिमार्जित, मधुर और निखरे हुए रूप का प्रयोग किया है।
काव्य रूप: इनके पदों में कोमलकांत शब्दावली, सरल पद-विन्यास और संगीतात्मकता (गेयता) का गुण विद्यमान है।
रस विधान: सूरदास जी वात्सल्य, श्रृंगार तथा भक्ति रस के अद्वितीय कवि माने जाते हैं। हिंदी साहित्य में उनका वात्सल्य वर्णन अनुपम माना गया है।
अलंकार योजना: इनके काव्य में रसों के साथ-साथ उपमा, रूपक और उत्प्रेक्षा आदि अलंकृत प्रयोग भाषा को सहज और विशिष्ट सौंदर्य प्रदान करते हैं।
भाव पक्ष: इनकी रचनाएँ मन की सूक्ष्म एवं तरङ्गित भाव-अनुभूतियों का सजीव, मनमोहक और अनूठा चित्र प्रस्तुत करती हैं।
पाठ-परिचय ('सूरदास के पद')
प्रस्तुत चारों पद सूरदास जी के प्रसिद्ध महाकाव्य 'सूरसागर' के 'भ्रमरगीत' प्रसंग से लिए गए हैं। इन पदों में उद्धव और गोपियों के बीच हुए संवाद को दर्शाया गया है।
जब श्रीकृष्ण मथुरा चले जाते हैं, तो वे स्वयं न लौटकर उद्धव के माध्यम से गोपियों के पास निर्गुण ब्रह्म और योग का संदेश भेजते हैं। गोपियाँ ज्ञानी उद्धव के शुष्क संदेश की जगह साकार प्रेम-मार्ग पर चलना पसंद करती हैं। उसी समय वहाँ एक भौंरा (भ्रमर) आ जाता है, जिसे माध्यम बनाकर गोपियाँ उद्धव पर तीखे व्यंग्य (उपालंभ) करती हैं।
पदों का मुख्य सार:
प्रथम पद: गोपियाँ उद्धव की निष्ठुरता पर व्यंग्य करते हुए उन्हें भाग्यशाली कहती हैं। वे तंज कसती हैं कि उद्धव कृष्ण के निकट रहकर भी प्रेम के बंधन से अछूते रहे। गोपियाँ अपने अनन्य प्रेम की तुलना गुड़ से चिपटी चींटियों से करती हैं।
द्वितीय पद: गोपियाँ अपनी विरह-व्यथा प्रकट करते हुए कहती हैं कि उनके मन की अभिलाषाएँ मन में ही दबकर रह गईं। कृष्ण के लौटने का इंतज़ार करते-करते अब उनका दुख और बढ़ गया है।
तृतीय पद: गोपियाँ उद्धव के योग-संदेश को कड़वी ककड़ी के समान अरुचिकर बताती हैं। वे कहती हैं कि उनका मन तो श्रीकृष्ण के प्रेम में एकनिष्ठ रूप से स्थिर है, इसलिए योग-साधना की आवश्यकता केवल उन लोगों को है जिनका मन चंचल है।
चतुर्थ पद: गोपियाँ व्यंग्य कसते हुए कहती हैं कि कृष्ण ने अब राजनीति की शिक्षा प्राप्त कर ली है। एक राजा का कर्तव्य अपनी प्रजा की रक्षा करना और न्याय करना होता है, किंतु कृष्ण योग का संदेश भेजकर प्रजा पर अत्याचार कर रहे हैं, जो राजधर्म के सर्वथा विरुद्ध है।
1
ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी।
अपररस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी॥
पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी।
ज्यों जल माहँ तेल की गागरि, बूँद न ताकौं लागी॥
प्रीति-नदी में पाउँ न बोर्यो, दृष्टि न रूप परागी।
'सूरदास' अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी॥
कठिन शब्दार्थ: बड़भागी = अत्यधिक भाग्यशाली (व्यंग्य में अभाग), अपररस / अपरस = अनछुआ, नीरस या अलिप्त, सनेह तगा = प्रेम रूपी धागा, अनुरागी = प्रेम में डूबा हुआ / प्रेमी, पुरइनि पात = कमल का पत्ता, दागी = दाग या धब्बा, माहँ = में / अंदर, गागरि = गागर, मटकी, ताकौं = उसको / उस पर, बोर्यो = डुबोया, परागी = मुग्ध होना / मोहित होना, भोरी = भोली-भाली, गुर = गुड़, पागी = लिपटी हुई
सरल भावार्थ:
गोपियाँ उद्धव की प्रेम-हीनता पर व्यंग्य कसते हुए कहती हैं कि हे उद्धव! आप सचमुच बहुत भाग्यशाली हैं जो इतने समय तक श्रीकृष्ण के साथ रहने के बावजूद उनके प्रेम के धागे में नहीं बँधे और न ही आपका मन कभी उनके प्रति आकर्षित हुआ। आपकी स्थिति जल में रहने वाले कमल के पत्ते जैसी है, जो पानी के भीतर रहकर भी अपने ऊपर पानी का एक धब्बा तक नहीं लगने देता। आप तो तेल से भरी उस मटकी के समान हैं, जिसे पानी में डुबोने पर भी जल की एक बूँद उस पर नहीं ठहरती।
गोपियाँ आगे कहती हैं कि आपने तो श्रीकृष्ण की प्रेम रूपी नदी में कभी अपना पैर तक नहीं डुबोया और न ही आपकी दृष्टि कभी उनके मनमोहक रूप पर मुग्ध हुई। आप तो पूरी तरह इस प्रेम-रस से अनछुए रहे। लेकिन हम गोपियाँ तो अत्यंत सीधी-साधी और अबला हैं; हमारा प्रेम श्रीकृष्ण के प्रति वैसा ही गाढ़ा है जैसे गुड़ से चींटियाँ लिपटी रहती हैं, जो एक बार चिपक जाने के बाद अलग नहीं हो पातीं और वहीं अपने प्राण दे देती हैं।
2
मन की मन ही माँझ रही।
कहिए जाइ कौन पै ऊधौ, नाहीं परत कही।
अवधि अधार आस आवन की, तन मन बिथा सही।
अब इन जोग सँदेसनि सुनि-सुनि, बिरहिनि बिरह दही।
चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तैं, उत तैं धार बही।
'सूरदास' अब धीर धरहिं क्यों, मरजादा न लही॥
कठिन शब्दार्थ: माँझ = अंदर या मध्य में, कौन पै = किसके पास, नाहीं परत कही = कहते नहीं बनती, अवधि = समय की सीमा, अधार = आधार या सहारा, आस = आशा, आवन की = आने की, बिथा = व्यथा या दुःख, जोग = योग, बिरहिनि = विरह में जीने वाली, दही = जल रही है, हुतीं = थीं, गुहारि = रक्षा के लिए पुकारना, जितहिं तैं = जहाँ से, उत तैं = वहाँ से, धीर = धैर्य, धरहिं = धारण करें, मरजादा = मर्यादा, लही = रखी या धारण की
सरल भावार्थ: गोपियाँ अपने मन की पीड़ा को व्यक्त करते हुए उद्धव से कहती हैं कि हमारे मन की अभिलाषाएँ और बातें मन के अंदर ही दबकर रह गईं। हे उद्धव! अब आप ही बताइए कि हम अपनी यह विरह-व्यथा किसे जाकर सुनाएँ, क्योंकि यह किसी अन्य से कहते भी नहीं बनती। अब तक तो श्रीकृष्ण के वापस लौटने की एक निश्चित समय-सीमा की उम्मीद ही हमारे जीने का सहारा थी, जिसके बल पर हम अपने शरीर और मन के इस दुःख को सहन कर रही थीं।
लेकिन अब आपके द्वारा दिए गए इस योग के संदेशों को सुन-सुनकर हमारी विरह की अग्नि और अधिक भड़क उठी है। हम जिस ओर से रक्षा के लिए पुकार लगाना चाहती थीं, वहीं से योग-साधना की यह धारा बहने लगी है। सूरदास जी कहते हैं कि गोपियाँ दुःखी होकर कह रही हैं कि अब हम किस प्रकार धैर्य रखें, जब श्रीकृष्ण ने ही प्रेम की मर्यादा का पालन नहीं किया है।
3
हमारे हरि हारिल की लकरी।
मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।
जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जक री।
सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी।
सु तौ व्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी।
यह तौ 'सूर' तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चक्री॥
कठिन शब्दार्थ: हारिल = एक ऐसा पक्षी जो हमेशा अपने पंजों में लकड़ी या तिनका पकड़े रहता है, लकरी = लकड़ी, क्रम = कर्म, नंद-नंदन = नंद जी के पुत्र (श्रीकृष्ण), उर = हृदय, दृढ़ करि = मजबूती से / कसकर, पकरी = पकड़ रखी है, दिवस-निसि = दिन और रात, कान्ह-कान्ह = कृष्ण-कृष्ण, जक री = रट लगा रखी है, करुई = कड़वी, ककरी = ककड़ी, व्याधि = बीमारी या रोग, तिनहिं = उन्हें या उनको, सौंपौ = दे दो या सौंप दो, मन चक्री = जिनका मन चकरी के समान चंचल या अस्थिर हो
सरल भावार्थ: गोपियाँ अपने अनन्य प्रेम का वर्णन करते हुए उद्धव से कहती हैं कि हमारे लिए श्रीकृष्ण तो हारिल पक्षी की उस लकड़ी के समान बन गए हैं, जिसे वह पक्षी कभी अपने पंजों से छूटने नहीं देता। हमने भी मन, कर्म और वचन से नंद जी के पुत्र श्रीकृष्ण को अपने हृदय में पूरी मजबूती के साथ धारण कर लिया है। अब तो जागते हुए, सोते हुए, सपने में, दिन हो या रात—हमारा मन निरंतर 'कृष्ण-कृष्ण' की ही धुन लगाए रहता है।
गोपियाँ आगे कहती हैं कि आपके मुँह से योग और साधना की बातें सुनते ही हमें ऐसा लगता है मानो हमने कोई कड़वी ककड़ी खा ली हो, जो अत्यंत ही अरुचिकर है। आप हमारे लिए योग के रूप में ऐसी बीमारी या मुसीबत ले आए हैं, जिसके बारे में न तो हमने कभी पहले सुना था, न देखा था और न कभी ऐसा अनुभव किया था। सूरदास जी कहते हैं कि गोपियों ने उद्धव से स्पष्ट कह दिया कि यह योग रूपी बीमारी आप उन लोगों को जाकर सौंप दीजिए, जिनके मन चकरी की तरह हमेशा चंचल और अस्थिर रहते हैं। हमारा मन तो श्रीकृष्ण के प्रेम में पूरी तरह से स्थिर हो चुका है।
4
हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।
समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए।
इक अति चतुर हुते पहिलेँ ही, अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए।
बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-सँदेस पठाए।
ऊधौ भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए।
अब अपनै मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए।
ते क्यों अनीति करें आपुन, जे और अनीति छुड़ाए।
राज धरम तौ यहै 'सूर', जो प्रजा न जाहिं सताए॥
कठिन शब्दार्थ: पढ़ि आए = सीख आए हैं, मधुकर = भौंरा (यहाँ उद्धव के लिए प्रयुक्त), पठाए = भिजवाए, हुते = थे, पहिलेँ ही = पहले से ही, ग्रंथ = ग्रंथ, पुस्तक या राजनीतिशास्त्र, पर हित = दूसरों की भलाई के लिए, डोलत धाए = घूमते फिरते थे, फेर पाइहैं = फिर से वापस पा लेंगी, हुते चुराए = चुराकर ले गए थे, आपुन = स्वयं, अनीति = अन्याय, जाहिं सताए = सताया जाए
सरल भावार्थ: श्रीकृष्ण द्वारा भेजे गए योग-संदेश को सुनकर गोपियाँ आपस में और उद्धव से कहती हैं कि श्रीकृष्ण ने अब पूरी तरह से राजनीति सीख ली है। उद्धव जी (भौंरे) के बातें शुरू करते ही हम सब समझ गई थीं और हमें वहाँ के सारे समाचार मिल गए थे। श्रीकृष्ण तो पहले से ही अत्यंत चतुर और चालाक थे, और अब तो उन्होंने राजनीति के बड़े-बड़े ग्रंथ भी पढ़ लिए हैं। उनकी बुद्धि अब कितनी बढ़ गई है, इसका अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे हम जैसी बिरहिनों के लिए योग का संदेश भेज रहे हैं।
गोपियाँ आगे कहती हैं कि हे उद्धव! पहले ज़माने के सज्जन लोग तो दूसरों की भलाई के लिए इधर-उधर दौड़ते फिरते थे, लेकिन आज के लोग दूसरों को दुःख पहुँचाने के लिए यहाँ तक चले आए हैं। हम तो बस इतना ही चाहती हैं कि श्रीकृष्ण मथुरा जाते समय हमारा जो मन चुपचाप चुराकर ले गए थे, वह मन हमें वापस मिल जाए। समझ नहीं आता कि जो श्रीकृष्ण दूसरों को अन्याय और अत्याचार से बचाते थे, वे स्वयं हमारे साथ ऐसा अन्याय क्यों कर रहे हैं? सूरदास जी कहते हैं कि गोपियों के अनुसार सच्चा राजधर्म तो वही है, जिसके अंतर्गत राजा अपनी प्रजा को कभी सताए नहीं और उसकी रक्षा करे; परंतु श्रीकृष्ण योग-संदेश भेजकर राजधर्म के विपरीत आचरण कर रहे हैं।
पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-उत्तर
प्रश्न 1. गोपियों द्वारा उद्धव को भाग्यवान कहने में क्या व्यंग्य निहित है?
उत्तर: गोपियों द्वारा उद्धव को भाग्यवान (बड़भागी) कहना वास्तव में एक करारा व्यंग्य है। ऊपर से तो वे उद्धव की प्रशंसा करती दिखती हैं, पर असल में वे उन्हें अत्यंत अभागा सिद्ध करना चाहती हैं। गोपियों का आशय यह है कि श्रीकृष्ण के सर्वदा समीप रहकर भी उद्धव उनके असाधारण प्रेम और सौंदर्य से पूरी तरह अछूते रहे। जो व्यक्ति प्रेम की आनंदमयी अनुभूति से वंचित रह जाए, उससे अधिक दुर्भाग्यशाली भला कौन हो सकता है।
प्रश्न 2. उद्धव के व्यवहार की तुलना किस-किस से की गई है?
उत्तर: गोपियों ने उद्धव के विरक्त एवं नीरस व्यवहार की तुलना दो प्रमुख वस्तुओं से की है:
* कमल के पत्ते से: जिस प्रकार कमल का पत्ता सदैव जल के भीतर रहता है, फिर भी पानी की एक बूँद उस पर नहीं टिकती।
* तेल से भरी मटकी से: जिस प्रकार तेल चुपड़ी हुई गागर को पानी में डुबोने पर भी जल की बूँदें उस पर नहीं ठहर पातीं।
इसी प्रकार उद्धव भी कृष्ण रूपी प्रेम-सागर के पास रहते हुए भी उनके प्रेम-रस से अनछुए रहे।
प्रश्न 3. गोपियों ने किन-किन उदाहरणों के माध्यम से उद्धव को उलाहने दिए हैं?
उत्तर: गोपियों ने विभिन्न तर्कों एवं उपालंभों के माध्यम से उद्धव को उलाहने दिए हैं:
* वे कहती हैं कि उनके मन की प्रेम-भावनाएँ मन में ही दबकर रह गईं, वे कृष्ण के सामने प्रकट ही नहीं हो सकीं।
* वे कृष्ण के लौटने का इंतज़ार कर रही थीं, लेकिन उन्होंने स्वयं न आकर उद्धव के हाथ योग का शुष्क संदेश भिजवा दिया, जिससे उनकी विरह-व्यथा और बढ़ गई।
* गोपियाँ कृष्ण से अपने दुःख निवारण की उम्मीद कर रही थीं, लेकिन वहीं से योग रूपी उल्टी धारा बहने लगी।
* उन्होंने उलाहना दिया कि कृष्ण ने प्रेम की मर्यादा का उल्लंघन किया है, जबकि गोपियों ने उनके लिए सर्वस्व त्याग दिया था।
प्रश्न 4. उद्धव द्वारा दिए गए योग के संदेश ने गोपियों की विरहाग्नि में घी का काम कैसे किया?
उत्तर: गोपियाँ इस उम्मीद में श्रीकृष्ण के आने की प्रतीक्षा कर रही थीं कि जब वे वापस लौटेंगे तो उनके दर्शन से विरह की सारी पीड़ा मिट जाएगी। इसी आशा के सहारे वे अपने तन और मन के दुःख को सह रही थीं। परंतु जब कृष्ण ने स्वयं न आकर उद्धव के ज़रिए निर्गुण योग और साधना का संदेश भिजवाया, तो उनकी बची-खुची उम्मीदें भी टूट गईं। योग-साधना का यह अरुचिकर संदेश गोपियों के जलते हुए विरह-हृदय में घी की आहुति साबित हुआ और उनकी विरह-ज्वाला और अधिक भड़क उठी।
प्रश्न 5. 'मरजादा न लही' के माध्यम से कौन सी मर्यादा न रहने की बात की जा रही है?
उत्तर: 'मरजादा न लही' के माध्यम से प्रेम की मर्यादा के टूटने की बात कही गई है। प्रेम का यह शाश्वत नियम है कि प्रेम के बदले प्रेम दिया जाए और दोनों पक्ष परस्पर निष्ठा का पालन करें। गोपियों ने अपने लोक-लाज की परवाह किए बिना केवल श्रीकृष्ण से एकनिष्ठ प्रेम किया। परंतु इसके बदले में कृष्ण ने उन्हें प्रेम देने के बजाय योग का संदेश भेजकर छलावा किया। कृष्ण के इसी आचरण को गोपियों ने प्रेम-मर्यादा का उल्लंघन माना है।
प्रश्न 6. कृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम को गोपियों ने किस प्रकार अभिव्यक्त किया है?
उत्तर: गोपियों ने अपने अनन्य और निष्ठावान प्रेम को निम्नलिखित रूपों में प्रकट किया है:
* वे स्वयं की तुलना गुड़ से लिपटी हुई उन चींटियों से करती हैं जो जीते-जी उससे अलग नहीं हो सकतीं।
* वे कृष्ण को हारिल पक्षी की लकड़ी मानती हैं, जिसे वे हर समय अपने पंजों से कसकर पकड़े रहती हैं।
* उन्होंने मन, वचन और कर्म से कृष्ण की छवि को अपने हृदय में दृढ़ता से बसा रखा है।
* सोते-जागते, सपने में, दिन-रात उनका मन केवल 'कान्ह-कान्ह' की ही रट लगाता रहता है।
* वे योग के उपदेश को कड़वी ककड़ी के समान मानकर पूरी तरह से अस्वीकार कर देती हैं।
प्रश्न 7. गोपियों ने उद्धव से योग की शिक्षा कैसे लोगों को देने की बात कही है?
उत्तर: गोपियों के अनुसार योग-साधना की आवश्यकता केवल उन लोगों को होती है जिनका मन चंचल, दुविधाग्रस्त और अस्थिर (चकरी के समान) होता है। जिनका मन एक जगह नहीं ठहरता और भटकाव में रहता है, योग उनके मन को एकाग्र करने का काम करता है। गोपियाँ कहती हैं कि हमारा मन तो पहले से ही श्रीकृष्ण के अनन्य प्रेम में पूरी तरह स्थिर और एकाग्र है, इसलिए हमारे लिए यह योग-शिक्षा व्यर्थ है।
प्रश्न 8. प्रस्तुत पदों के आधार पर गोपियों का योग-साधना के प्रति दृष्टिकोण स्पष्ट करें।
उत्तर: सूरदास के पदों के आधार पर गोपियों का योग-साधना के प्रति दृष्टिकोण अत्यंत उपेक्षापूर्ण और नकारात्मक है:
* वे योग-साधना को नीरस, निरर्थक और कड़वी ककड़ी के समान अखाद्य एवं अरुचिकर मानती हैं।
* वे इसे एक ऐसी अज्ञात बीमारी (व्याधि) की संज्ञा देती हैं, जिसके बारे में उन्होंने न कभी पहले सुना था और न अनुभव किया था।
* गोपियों का मानना है कि जो हृदय साकार प्रेम-रस से लबालब भरा हो, उसमें निर्गुण योग के लिए कोई स्थान नहीं है। वे कृष्ण द्वारा भेजे गए योग-उपदेश को अपनी मति पर कुठाराघात और अन्याय समझती हैं।
प्रश्न 9. गोपियों के अनुसार राजा का धर्म क्या होना चाहिए?
उत्तर: गोपियों के अनुसार एक राजा का परम धर्म अपनी प्रजा के कल्याण की रक्षा करना है। राजा को चाहिए कि वह अपनी प्रजा को किसी भी प्रकार के अत्याचार और अन्याय से बचाए, उनके दुखों को दूर करे और उन्हें कभी किसी भांति न सताए।
प्रश्न 10. गोपियों को कृष्ण में ऐसे कौन-से परिवर्तन दिखाई दिए जिनके कारण वे अपना मन वापस पा लेने की बात कहती हैं?
उत्तर: गोपियों को लगा कि मथुरा जाने के बाद श्रीकृष्ण के स्वभाव और सोच में भारी बदलाव आ गया है:
* वे अब निष्छल प्रेमी न रहकर कूटनीतिज्ञ और चतुर राजनीतिज्ञ बन गए हैं।
* वे स्वयं मिलने आने के स्थान पर उद्धव के हाथों योग का संदेश भिजवाकर छल-कपट का सहारा ले रहे हैं।
* उन्होंने प्रेम की सादगी को भूलकर राजनीति के ग्रंथों का अध्ययन कर लिया है।
कृष्ण में आए इन्हीं परिवर्तनों और कपटपूर्ण व्यवहार को देखकर गोपियाँ कहती हैं कि मथुरा जाते समय कृष्ण जो मन चुराकर ले गए थे, वे अब उसे वापस प्राप्त करना चाहती हैं।
प्रश्न 11. गोपियों ने अपने वाक्-चातुर्य के आधार पर ज्ञानी उद्धव को परास्त कर दिया, उनके वाक्-चातुर्य की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर: गोपियों का वाक्-चातुर्य (बोलने की कला) अद्वितीय है। ज्ञानी उद्धव भी उनके तर्कों के सामने निरुत्तर हो जाते हैं। उनके वाक्-चातुर्य की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
* तीखा व्यंग्य व कटाक्ष: वे उद्धव को 'बड़भागी' कहकर और कृष्ण को 'राजनीतिज्ञ' बताकर गहरा व्यंग्य करती हैं।
* सटीक एवं व्यावहारिक तर्क: वे कमल के पत्ते, तेल की गागर, कड़वी ककड़ी और हारिल पक्षी जैसे व्यावहारिक उदाहरण देकर उद्धव के योग-ज्ञान को एक ही पल में निरस्त कर देती हैं।
* स्पष्टता एवं निडरता: वे बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी बात रखती हैं तथा कृष्ण के अन्यायी आचरण पर भी सीधे प्रश्न उठाती हैं।
* भावुकता और प्रेम की दृढता: उनके संवाद में छल-कपट नहीं बल्कि सहज प्रेम की ऐसी शक्ति है, जिसके सामने उद्धव का सूखा ज्ञान पराजित हो जाता है।
प्रश्न 12. संकलित पदों को ध्यान में रखते हुए सूर के भ्रमरगीत की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर: सूरदास रचित 'भ्रमरगीत' हिंदी साहित्य की एक अमूल्य धरोहर है। संकलित पदों के आधार पर इसकी प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
* सगुण भक्ति का प्रतिपादन: इसमें निर्गुण ब्रह्म और योग-मार्ग का खंडन करते हुए साकार (सगुण) प्रेम-भक्ति को सर्वोपरि सिद्ध किया गया है।
* वियोग श्रृंगार का मार्मिक वर्णन: इसमें गोपियों की विरह-व्यथा, तड़प और मानसिक स्थिति का अत्यंत संवेदनशील एवं सुंदर सजीव चित्रण है।
* उपालंभ और व्यंग्य प्रधानता: भ्रमर (भौंरे) को माध्यम बनाकर दिए गए उपालंभ (उलाहने) और व्यंग्य काव्यात्मक रूप से बेजोड़ हैं।
* मधुर ब्रजभाषा: रचना में संगीतात्मक, कोमलकांत और परिमार्जित ब्रजभाषा का स्वाभाविक प्रयोग देखने को मिलता है।
* लोक-मर्यादा व राजधर्म का चिंतन: इसमें केवल प्रेम ही नहीं, बल्कि तत्कालीन राजधर्म और प्रजा-हित के सिद्धांतों की भी सुंदर अभिव्यक्ति है।
प्रश्न 13. गोपियों ने उद्धव के सामने तरह-तरह के तर्क दिए हैं, आप अपनी कल्पना से और तर्क दीजिए।
उत्तर: गोपियों के स्थान पर हम अपनी कल्पना से निम्नलिखित तर्क दे सकते हैं:
* स्वाद का तर्क: जिस व्यक्ति ने अमृत (कृष्ण-प्रेम) का स्वाद चख लिया हो, वह योग रूपी नीम की कड़वी निंबौरी कैसे खा सकता है?
* साधना का स्थान: योग और ध्यान तो मन की शांति और ईश्वर-प्राप्ति के लिए संन्यासी करते हैं, हम तो ब्रज की गोपियाँ हैं जिन्होंने अपने ईश्वर को साक्षात रूप में देखा और प्रेम किया है।
* हृदय की एकनिष्ठता: एक हृदय में एक ही समय में दो वस्तुएँ नहीं रह सकतीं। जब हमारा मन पूरी तरह कृष्ण से भरा हुआ है, तो उसमें निर्गुण योग के लिए जगह कहाँ से लाएँ?
* ज्ञान बनाम प्रेम: यदि ज्ञान इतना ही महान है, तो फिर कृष्ण का विरह हमें क्यों तड़पा रहा है? योग इस विरह-दुःख का इलाज नहीं, बल्कि दवा के नाम पर ज़हर है।
प्रश्न 14. उद्धव ज्ञानी थे, नीति की बातें जानते थे; गोपियों के पास ऐसी कौन सी शक्ति थी जो उनके वाक्-चातुर्य में मुखरित हो उठी?
उत्तर: उद्धव शास्त्रों के प्रकांड पंडित, ज्ञानी और नीतिशास्त्र के ज्ञाता थे। इसके विपरीत गोपियाँ साधारण ग्रामीण बालाएँ थीं। फिर भी वे उद्धव को अपने तर्कों से पछाड़ देती हैं। गोपियों के पास सच्चे, निष्छल और एकनिष्ठ प्रेम की अद्भुत आत्मिक शक्ति थी।
प्रेम में दिखावा या बुद्धि का चातुर्य नहीं होता, बल्कि हृदय का सच्चा समर्पण होता है। गोपियों का यह अटूट प्रेम ही उनकी वाक्-पटुता का आधार बना। बुद्धि और शुष्क ज्ञान का अहंकार जब सच्चे प्रेम के धरातल से टकराया, तो हार ज्ञानी उद्धव की हुई और गोपियों की अनुभूति जीत गई।
प्रश्न 15. गोपियों ने यह क्यों कहा कि 'हरि अब राजनीति पढ़ि आए हैं'? क्या आपको गोपियों के इस कथन का विस्तार समकालीन राजनीति में नजर आता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: गोपियों ने 'हरि अब राजनीति पढ़ि आए हैं' इसलिए कहा क्योंकि श्रीकृष्ण ने मथुरा जाने के बाद उनसे सीधे न मिलकर उद्धव के माध्यम से योग का संदेश भिजवा दिया। गोपियों को लगा कि कृष्ण अब सीधे-साधे प्रेमी नहीं रहे, बल्कि एक चतुर नेता की तरह छल-कपट और कूटनीति का सहारा लेकर अपनी ज़िम्मेदारियों से बच रहे हैं।
समकालीन राजनीति से तुलना:
गोपियों का यह कथन आज की राजनीति पर भी पूरी तरह खरा उतरता है:
* झूठे वादे व वादाखिलाफी: आज के राजनेता भी चुनाव से पहले जनता से बड़े-बड़े वादे करते हैं, किंतु सत्ता मिलते ही अपने वादों से मुकर जाते हैं।
* मध्यस्थों का सहारा: आज के नेता जनता के दुखों को सीधे सुनने के स्थान पर बीच के बिचौलियों या प्रतिनिधियों (उद्धव की भांति) को भेजकर औपचारिकता निभाते हैं।
* स्वार्थपरता: आधुनिक राजनीति में जन-सेवा का भाव घट गया है और स्वार्थ तथा छल-कपट बढ़ गया है, जहाँ जनता को केवल प्रलोभन या भ्रामक बातें देकर बरगलाया जाता है।
