निबन्ध रचना

निबंध-लेखन क्या है? निबंध गद्य साहित्य का एक प्रमुख रूप है, जिसे 'एस्से' (Essay) भी कहते हैं। 'निबंध' शब्द का अर्थ है—अच्छी तरह बंधा हुआ। इसमें किसी भी विषय पर अपने विचारों को एक सीमित आकार में, स्पष्ट और क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत किया जाता है। भाषा का सरल, सटीक और विषय के अनुकूल होना एक अच्छे निबंध की पहचान है।

एक अच्छे निबंध की मुख्य बातें (विशेषताएं)

  • क्रमबद्धता और स्पष्टता: विचार एक-दूसरे से जुड़े हों और भाषा पढ़ने में आसान व व्याकरण के अनुसार सही हो।
  • रूपरेखा बना कर लिखना: लिखने से पहले मुख्य बिंदुओं (आउटलाइन) का ढांचा तैयार कर लें।
  • सटीक शब्दावली: फालतू की बातें दोहराने से बचें और शब्द-सीमा का ध्यान रखें।
  • प्रभावशाली प्रस्तुति: निबंध को आकर्षक बनाने के लिए सही जगहों पर कहावतों, मुहावरों या सुविचारों (कोटेशन) का प्रयोग करें।
  • निष्कर्ष: अंत में पूरे निबंध का संक्षिप्त सार (उपसंहार) ज़रूर दें।

निबंध के तीन मुख्य अंग

  1. शुरुआत (भूमिका/प्रस्तावना): यह हिस्सा बहुत आकर्षक होना चाहिए ताकि पाठक की रुचि बने। शुरुआत किसी सूक्ति, कविता या विषय से जुड़ी मुख्य बात से कर सकते हैं।
  2. मुख्य भाग (विस्तार): यहाँ विषय की पूरी जानकारी दी जाती है। अपने विचारों को छोटे-छोटे अनुच्छेदों (पैराग्राफ) या उप-शीर्षकों (Sub-headings) में बांटकर लिखें।
  3. समापन (उपसंहार): यह निबंध का अंतिम हिस्सा है, जहाँ पूरे विषय का निचोड़ दिया जाता है और आप अपनी राय भी व्यक्त कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए एक विषय और उसकी रूपरेखा: विषय: साइबर अपराध के बढ़ते कदम / सूचना प्रौद्योगिकी में बढ़ते अपराध

रूपरेखा (संकेत बिंदु):

  1. प्रस्तावना (भूमिका)
  2. साइबर अपराध क्या है और इसके दुष्प्रभाव
  3. इसे रोकने के लिए सरकारी प्रयास
  4. रोकथाम के लिए व्यक्तिगत सुझाव
  5. निष्कर्ष (उपसंहार)

1. साइबर अपराध: कारण, बचाव और समाधान

1. प्रस्तावना (भूमिका) आज का दौर डिजिटल तकनीक और इंटरनेट का है। जैसे-जैसे इंटरनेट ने हमारे दैनिक कामकाज को आसान बनाया है, वैसे ही ऑनलाइन ठगी और अपराध के मामले भी तेजी से बढ़े हैं। चंद पैसों के लालच में आपराधिक प्रवृत्ति वाले लोग डिजिटल माध्यमों का गलत फायदा उठाकर साइबर क्राइम को अंजाम दे रहे हैं।

2. साइबर अपराध क्या है और इसके प्रभाव कंप्यूटर, मोबाइल या इंटरनेट के जरिए किसी व्यक्ति के साथ धोखाधड़ी, ब्लैकमेलिंग या गैर-कानूनी गतिविधि करना साइबर अपराध कहलाता है। इसमें अपराधियों द्वारा पर्सनल डाटा चोरी करना, बैंक खातों से पैसे उड़ाना या सोशल मीडिया पर किसी की छवि खराब करना शामिल है। इस प्रकार की ठगी से लोग न सिर्फ आर्थिक रूप से टूटते हैं, बल्कि वे भारी मानसिक तनाव का शिकार भी हो जाते हैं।

3. सरकार द्वारा किए गए प्रयास साइबर अपराध पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने कई जरूरी कदम उठाए हैं:

  • पोर्टल: राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल शुरू किया गया है, जहाँ पीड़ित सीधे अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
  • हेल्पलाइन: ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी की तुरंत शिकायत दर्ज कराने और ठगे गए पैसों को फ्रीज करवाने के लिए हेल्पलाइन नंबर 1930 जारी किया गया है।

4. साइबर अपराध से बचाव के उपाय

  • मजबूत पासवर्ड: अपने ऑनलाइन खातों के पासवर्ड कठिन रखें और उन्हें समय-समय पर बदलते रहें।
  • गोपनीयता: किसी के साथ भी अपने ओटीपी (OTP), पिन (PIN) या पासवर्ड शेयर न करें।
  • पुराने डिवाइस बेचते समय सावधानी: फोन या लैपटॉप बेचने से पहले अपना अकाउंट पूरी तरह से लॉग-आउट करके डाटा डिलीट कर दें।
  • लालच से बचें: लॉटरी या अचानक पैसे मिलने वाले फर्जी कॉल्स और लिंक से दूर रहें।
  • एंटीवायरस: कंप्यूटर और मोबाइल में हमेशा रजिस्टर्ड एंटीवायरस का प्रयोग करें।

5. निष्कर्ष (उपसंहार) इंटरनेट हमारे लिए एक बेहतरीन साधन है, लेकिन इसका सही इस्तेमाल हमारी सतर्कता पर निर्भर करता है। यदि हम थोड़ी सी सावधानी और जागरूकता बरतें, तो साइबर क्राइम जैसे खतरों से आसानी से खुद को सुरक्षित रख सकते हैं।

2. कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI): वरदान या अभिशाप

1. प्रस्तावना (भूमिका) इंसान को दुनिया का सबसे बुद्धिमान प्राणी माना जाता है, जिसने अपनी समझ से अनगिनत विज्ञान के आविष्कार किए हैं। इसी सोच का आधुनिक रूप है 'कृत्रिम बुद्धिमत्ता' (Artificial Intelligence - AI)। यह एक ऐसी तकनीक है जो मशीनों को इंसानों की तरह सोचने और निर्णय लेने के योग्य बनाती है। आज यह विषय पूरी दुनिया में चर्चा का केंद्र बना हुआ है।

2. AI की शुरुआत और प्रसार कृत्रिम बुद्धिमत्ता का अर्थ है—कंप्यूटर या रोबोट को इंसानी दिमाग की तरह कार्य करने के लिए तैयार करना। इस तकनीक की शुरुआत 1950 के दशक में मानी जाती है, जिसके विकास में 'जॉन मैकार्थी' का योगदान बेहद खास रहा। आज स्वास्थ्य, शिक्षा, ऑटोमोबाइल और अंतरिक्ष विज्ञान जैसे हर क्षेत्र में इसका इस्तेमाल हो रहा है।

3. AI के प्रभाव (लाभ एवं हानि)

  • लाभ (वरदान): एआई के जरिए कठिन से कठिन काम चुटकियों में हो जाते हैं। यह मानवीय गलतियों की गुंजाइश को कम करता है और चिकित्सा व अनुसंधान के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला रहा है।
  • हानि (अभिशाप): एआई पर अत्यधिक निर्भरता से लोगों के रोजगार पर संकट आ सकता है। इसके अलावा, यदि इसका गलत हाथों में दुरुपयोग हुआ, तो यह गोपनीयता और सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

4. सुधार हेतु सुझाव

  • एआई के सही और सीमित उपयोग के लिए वैश्विक स्तर पर कड़े नियम बनाए जाने चाहिए।
  • इस तकनीक का इस्तेमाल इंसान के विकल्प के तौर पर नहीं, बल्कि इंसानी काम को आसान बनाने वाले मददगार के रूप में होना चाहिए।

5. निष्कर्ष (उपसंहार) कृत्रिम बुद्धिमत्ता इंसान द्वारा बनाया गया एक शक्तिशाली टूल है। यह हमारे लिए वरदान साबित होगी या अभिशाप, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम इसका उपयोग मानव कल्याण के लिए करते हैं या विनाश के लिए।

आत्मनिर्भर भारत

प्रस्तावना: किसी भी व्यक्ति या राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी स्वावलंबिता होती है। शास्त्रों में भी कहा गया है कि दूसरों पर निर्भर रहने से दुख मिलता है, जबकि अपने पैरों पर खड़े होना ही सच्चा सुख है। भारत का इतिहास गवाह है कि यहाँ की कला, हस्तशिल्प और संस्कृति में आत्मनिर्भरता हमेशा से मौजूद रही है। अपनी इसी समृद्ध परंपरा को आधुनिक युग में आगे बढ़ाने की दिशा में एक अहम कदम है—'आत्मनिर्भर भारत'।

अभियान की शुरुआत और इसके मुख्य आधार: देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 12 मई 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'आत्मनिर्भर भारत अभियान' की घोषणा की। इस अभियान का मुख्य मकसद भारत को निर्माण और सेवा के क्षेत्र में दुनिया में अग्रणी बनाना है। इसके विकास के पाँच प्रमुख आधार तय किए गए हैं—मजबूत अर्थव्यवस्था, उन्नत इंफ्रास्ट्रक्चर (बुनियादी ढाँचा), आधुनिक तकनीक पर आधारित सिस्टम, सशक्त जनसांख्यिकी (युवा आबादी), और मांग व आपूर्ति श्रृंखला का सही उपयोग।

आत्मनिर्भरता से होने वाले लाभ: जब कोई देश आत्मनिर्भर बनता है, तो वह केवल अपनी जरूरतें पूरी नहीं करता बल्कि विश्व मंच पर भी एक सशक्त राष्ट्र के रूप में उभरता है। इस अभियान से स्वदेशी उद्योगों को प्रोत्साहन मिल रहा है, जिससे युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर बन रहे हैं। विदेशी सामानों के आयात पर निर्भरता कम होने से देश का धन देश में ही सुरक्षित रहता है, जिससे भारत की आर्थिक स्थिति संकट के समय में भी स्थिर बनी रहती है।

वैश्विक स्तर पर भारत का उदाहरण: भारत ने अतीत से लेकर वर्तमान तक हर परिस्थिति में अपनी आत्मनिर्भरता का लोहा मनवाया है। प्राचीन काल में जहाँ हमारी कृषि और पशुपालन व्यवस्था इसका प्रमाण थी, वहीं आधुनिक समय में जब कोरोना महामारी का संकट आया, तो भारत ने पीपीई किट, वेंटिलेटर और स्वदेशी वैक्सीन का रिकॉर्ड समय में निर्माण करके पूरी दुनिया को अचंभित कर दिया। भारत ने न केवल अपनी जरूरतों को पूरा किया, बल्कि अन्य देशों को भी वैक्सीन और दवाइयाँ भेजकर अपनी क्षमता का परिचय दिया।

निष्कर्ष: आत्मनिर्भरता केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि हर नागरिक की सोच और जीवनशैली का हिस्सा बननी चाहिए। जब हम स्थानीय (लोकल) उत्पादों को प्राथमिकता देंगे, तभी देश का उद्योग मजबूत होगा। आर्थिक और सामाजिक स्तर पर आत्मनिर्भर बनकर ही भारत एक बार फिर विश्व गुरु बनने और विश्व पटल पर अपनी पहचान को और अधिक सुदृढ़ करने के सपने को साकार कर सकता है।

युवा वर्ग और फैशन

1. प्रस्तावना: फैशन का शाब्दिक अर्थ किसी काम को करने या पहनने का एक खास तरीका या शैली होता है। मनुष्य खुद को सुंदर, आकर्षक और सभ्य दिखाने के लिए हमेशा से अलग-अलग प्रकार की वेशभूषा और सजावट का सहारा लेता आया है। जब तक फैशन मर्यादा में रहकर व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारता है, तब तक यह कला का एक हिस्सा माना जाता है। लेकिन जब यह केवल दिखावे का जरिया बन जाता है, तो इसके नकारात्मक परिणाम भी सामने आने लगते हैं।

2. पश्चिमी सभ्यता और फैशन का बढ़ता चलन: 20वीं शताब्दी के बाद से पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव से हमारे खान-पान, रहन-सहन और पहनावे में काफी बदलाव आया है। सिनेमा, टेलीविजन और सोशल मीडिया के कलाकारों के पहनावे को युवा पीढ़ी तेजी से अपनाती है। महंगे ब्रांडेड कपड़े, जूते और आधुनिक परिधान पहनना आजकल एक नया ट्रेंड बन गया है, जिससे हमारा समाज और खासकर नई पीढ़ी गहराई से प्रभावित हो रही है।

3. आधुनिक फैशन का बदलता स्वरूप: आजकल फैशन केवल कपड़ों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सौंदर्य प्रसाधनों (कॉस्मेटिक्स), बातचीत के तरीके और जीवनशैली का भी हिस्सा बन चुका है। विज्ञापनों और इंटरनेट के जरिए नए-नए ट्रेंड्स बहुत जल्दी लोकप्रिय हो जाते हैं। कई बार पुरानी पीढ़ी को यह अंधानुकरण हमारी संस्कृति और मर्यादा के विपरीत लगता है, जिससे वैचारिक मतभेद भी पैदा होते हैं। इसके बावजूद युवा वर्ग नए बदलावों को अपनाने में पीछे नहीं रहता।

4. समाज पर प्रभाव: भारत जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश में हर राज्य की अपनी पारंपरिक वेशभूषा और पहचान है। हालाँकि, पश्चिमी परिधानों के बढ़ते प्रभाव ने लोगों के पहनावे में नयापन जरूर लाया है, लेकिन इससे स्थानीय पहचान पर असर पड़ा है। सही मायने में फैशन ऐसा होना चाहिए जो हमारी संस्कृति का सम्मान करते हुए अवसर के अनुकूल हो, न कि केवल दूसरों को प्रभावित करने का एक साधन।

5. निष्कर्ष (उपसंहार): फैशन आधुनिक जीवनशैली का एक अभिन्न अंग बन चुका है जो व्यक्ति के आत्मविश्वास और सोच को भी दर्शाता है। यह जरूरी है कि युवा वर्ग फैशन का चयन समझदारी से करे। किसी भी प्रवृत्ति का अंधानुकरण करने के बजाय अपनी सभ्यता और मर्यादा के भीतर रहकर खुद को प्रस्तुत करना ही सच्चा फैशन है।

मातृभाषा और उसका महत्त्व

1. मातृभाषा का अर्थ एवं परिभाषा: मातृभाषा का साधारण अर्थ है—वह भाषा जिसे बच्चा सबसे पहले अपनी माँ, परिवार और आस-पड़ोस से सीखता है। जन्म के बाद जिस सामाजिक परिवेश में बालक बड़ा होता है, वहाँ बोली और समझी जाने वाली भाषा ही उसकी मातृभाषा बनती है। यह व्यक्ति की अभिव्यक्ति का सबसे स्वाभाविक और सहज माध्यम है।

2. रचनात्मक विकास में योगदान: बालक जितनी तेजी और सहजता से अपनी मातृभाषा में किसी बात को समझ सकता है, उतनी आसानी से किसी अन्य भाषा को नहीं सीख पाता। भाषाविदों और वैज्ञानिकों का भी मानना है कि शुरुआती शिक्षा मातृभाषा में होने से बच्चे की सोचने-समझने और रचनात्मक क्षमता का स्वाभाविक विकास होता है। इसी कारण नई शिक्षा नीति में भी प्राथमिक शिक्षा के साथ-साथ विज्ञान व अन्य विषयों की शिक्षा मातृभाषा में देने पर जोर दिया गया है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी सही कहा है—

"निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को शूल॥"

3. मातृभाषा और राष्ट्रभाषा: भारत अनेकताओं में एकता का देश है, जहाँ सैकड़ों बोलियाँ और मातृभाषाएँ बोली जाती हैं। हमारे संविधान में 22 प्रमुख भाषाओं को मान्यता दी गई है। इनमें से हिंदी भारत में सबसे ज्यादा बोली और समझी जाने वाली भाषा है, जिसे संविधान में राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। यह विभिन्न प्रदेशों को आपस में जोड़ने का काम करती है। अपनी-अपनी क्षेत्रीय मातृभाषाओं का सम्मान करने के साथ-साथ हिंदी को भी उसका उचित स्थान मिलना आवश्यक है।

4. निष्कर्ष (उपसंहार): मातृभाषा केवल बातचीत का साधन नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक पहचान और जड़ों से जोड़कर रखती है। यह व्यक्ति के भीतर आत्मविश्वास जगाती है और विचारों को सही रूप देती है। इसलिए हमें अपनी मातृभाषा पर गर्व करना चाहिए और अपनी भाषाई विरासत को सहेजते हुए अन्य सभी मातृभाषाओं का भी पूरा सम्मान करना चाहिए।

इंटरनेट की उपयोगिता

1. प्रस्तावना: आज के आधुनिक युग में इंटरनेट सूचना और संचार क्रांति का सबसे सशक्त माध्यम बन चुका है। यह दुनिया भर के कंप्यूटरों और डिजिटल उपकरणों को आपस में जोड़ने वाला एक ऐसा अदृश्य जाल है, जिसने दूरियों को खत्म कर दिया है। इसके माध्यम से कोई भी जानकारी पलक झपकते ही प्राप्त की जा सकती है।

2. ज्ञान और सूचना का अटूट भंडार: इंटरनेट ज्ञान का एक विशाल समुद्र है। किसी भी विषय की जानकारी, कठिन सवालों के जवाब या दुनिया के किसी भी कोने में घटी घटना की खबर इंटरनेट पर तुरंत उपलब्ध हो जाती है। इसके साथ ही, सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स के ज़रिए लोग देश-विदेश में बैठे अपनों से बिना किसी अतिरिक्त खर्च के आसानी से जुड़े रहते हैं।

3. शिक्षा और विद्यार्थी जीवन में भूमिका: विद्यार्थियों के लिए इंटरनेट एक बेहतरीन शिक्षक साबित हो रहा है। ई-बुक्स, ऑनलाइन क्लासेस और ट्यूटोरियल्स की मदद से छात्र घर बैठे ही अपनी पढ़ाई पूरी कर सकते हैं। जो पुस्तकें या अध्ययन सामग्री महंगी होने के कारण हर किसी की पहुँच में नहीं होतीं, वे इंटरनेट पर आसानी से पढ़ी और डाउनलोड की जा सकती हैं।

4. इंटरनेट के विविध लाभ:

  • घर बैठे सुविधाएँ: ऑनलाइन बैंकिंग, रेलवे व टिकट बुकिंग, होटल आरक्षण और शॉपिंग जैसी सुविधाओं ने समय और श्रम दोनों की बचत की है।
  • रोजगार के अवसर: इंटरनेट ने वर्क फ्रॉम होम और ऑनलाइन फ्रीलांसिंग के जरिए लाखों लोगों के लिए कमाई के नए रास्ते खोले हैं।
  • विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग: व्यापार, चिकित्सा, मौसम विज्ञान और सरकारी कार्यकाजों में पारदर्शिता व गति लाने के लिए इंटरनेट अत्यंत उपयोगी है।

5. दुरुपयोग और हानियाँ: सुविधाओं के साथ-साथ इंटरनेट के कुछ खतरे भी हैं। ऑनलाइन धोखाधड़ी (साइबर क्राइम), पर्सनल डाटा की चोरी और बैंक खातों से पैसों की हेराफेरी जैसी घटनाएँ बढ़ रही हैं। इसके अलावा सोशल मीडिया पर अफवाहें फैलाना और इंटरनेट की लत के कारण किताबों व शारीरिक गतिविधियों से दूरी बनना भी इसके दुष्परिणाम हैं।

6. आधुनिक जीवन में महत्व: आज के दैनिक जीवन में इंटरनेट केवल एक विकल्प न होकर एक बुनियादी जरूरत बन गया है। दफ्तर के काम से लेकर मनोरंजन और ज्ञान प्राप्त करने तक, हर जगह इसकी उपयोगिता बनी हुई है।

7. निष्कर्ष (उपसंहार): इंटरनेट तकनीक का एक ऐसा अनोखा वरदान है जिसने पूरी दुनिया को एक परिवार की तरह जोड़ दिया है। यह एक उपयोगी साधन है, लेकिन इसका लाभ तभी मिलेगा जब हम इसका इस्तेमाल समझदारी, सतर्कता और सही दिशा में करेंगे।

मोबाइल फोन : वरदान या अभिशाप

प्रस्तावना: विज्ञान के नए आविष्कारों ने इंसानी जिंदगी को पूरी तरह बदलकर रख दिया है, जिसमें से मोबाइल फोन सबसे बड़ा साधन बनकर उभरा है। इसने दूरियों को खत्म करके संचार के क्षेत्र में एक नई क्रांति ला दी है। आज के दौर में यह केवल बातचीत का जरिया नहीं रहा, बल्कि हमारी हर छोटी-बड़ी जरूरत को पूरा करने का सबसे सशक्त और आसान माध्यम बन चुका है।

लाभ और उपयोगिता: मोबाइल फोन ने हमारे जीवन को बेहद सुविधाजनक बना दिया है। इसके जरिए देश-विदेश में बैठे किसी भी व्यक्ति से कुछ ही सेकंड में कॉल या वीडियो कॉल के माध्यम से संपर्क किया जा सकता है। घर बैठे ऑनलाइन पेमेंट करना, बैंक खाते का प्रबंधन, बिल जमा करना, ऑनलाइन टिकट बुकिंग और शॉपिंग जैसी सुविधाएँ अब चुटकियों में हो जाती हैं। विद्यार्थियों के लिए यह एक ऑनलाइन क्लासरूम की तरह है, जहाँ पढ़ाई से जुड़ी हर सामग्री आसानी से मिल जाती है। इसके अलावा कैलकुलेटर, घड़ी, टॉर्च, समाचार और मनोरंजन के साधन भी इसमें समाहित हैं।

दैनिक जीवन में भूमिका: पुराने समय में जिस काम के लिए चिट्ठियाँ भेजी जाती थीं या लंबी लाइनों में खड़ा होना पड़ता था, वही काम अब मोबाइल से घर बैठे मिनटों में हो जाता है। आज हर वर्ग के व्यक्ति के पास मोबाइल का होना इसकी अनिवार्यता और उपयोगिता को साबित करता है। यह समय की बचत करने के साथ-साथ हर परिस्थिति में मददगार साबित होता है।

दुष्प्रभाव और हानियाँ: ज़रूरत से ज़्यादा और गलत इस्तेमाल के कारण मोबाइल कई समस्याएँ भी पैदा कर रहा है। खासकर युवा वर्ग और बच्चे गेमिंग तथा सोशल मीडिया की लत के कारण अपना कीमती समय नष्ट कर देते हैं, जिससे उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है। घंटों स्क्रीन पर लगे रहने से आँखों की रोशनी कमज़ोर होना, नींद न आना और मानसिक तनाव जैसी शारीरिक व मानसिक समस्याएँ बढ़ रही हैं। साथ ही, इसके गलत इस्तेमाल से ऑनलाइन ठगी और साइबर अपराध भी तेज़ी से बढ़ रहे हैं।

निष्कर्ष: मोबाइल फोन अपने आप में न तो पूरी तरह वरदान है और न ही अभिशाप; यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम इसका इस्तेमाल किस प्रकार करते हैं। यदि इसका उपयोग संयम और सही कार्य के लिए किया जाए, तो यह जीवन का सबसे उपयोगी साथी है। वहीं इसके प्रति की गई लापरवाही हमारे स्वास्थ्य और समय दोनों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है।

विद्यार्थी जीवन में अनुशासन

"अनुशासन से है जीवन बनता, अनुशासन राष्ट्रों का जीवन है। यह शिक्षित जन का तन मन धन है॥"

प्रस्तावना: जीवन के हर क्षेत्र में नियमों का पालन करना ही अनुशासन कहलाता है। सही समय पर जागना, पढ़ना, भोजन करना और अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से पूरा करना अनुशासन के ही रूप हैं। केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि संपूर्ण प्रकृति भी अनुशासन से बँधी है—सूर्य का समय पर उगना, तारों का चमकना और ऋतुओं का बदलना इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है।

विद्यालय में अनुशासन: विद्यालय में रहकर ही विद्यार्थी का शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास सही दिशा में होता है। जब कोई छात्र गुरुजनों और माता-पिता के मार्गदर्शन को स्वेच्छा से स्वीकार करता है, तो उसके भीतर नम्रता, धैर्य और संयम का भाव जागृत होता है। सच्चा अनुशासन वह है जो किसी बाहरी दबाव से नहीं, बल्कि आंतरिक प्रेरणा से उत्पन्न होता है।

विद्यार्थी और अनुशासन: प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति की सफलता का मुख्य आधार अनुशासन ही था। छात्र गुरुकुल में रहकर कठोर नियमों का पालन करते थे और श्रेष्ठ आचरण सीखते थे। विद्यार्थी जीवन ही वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति के चरित्र की नींव पड़ती है। इस दौरान सीखा गया शिष्टाचार और आचरण जीवनभर उसके साथ रहता है और उसके भविष्य की दिशा तय करता है।

अनुशासनहीनता के कारण व हानियाँ: आज के दौर में विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता की प्रवृत्ति बढ़ती दिखती है। इसके पीछे सही मार्गदर्शन की कमी, सामाजिक माहौल और भटकाव पैदा करने वाले साधन प्रमुख कारण हैं। अनुशासनहीनता के कारण छात्र अपने मार्ग से भटक जाते हैं, जिससे उनका भविष्य अंधकारमय हो जाता है और उन्हें कदम-कदम पर असफलताओं व अपमान का सामना करना पड़ता है।

अनुशासन के लाभ: अनुशासन की पहली सीख भले ही परिवार से मिलती है, लेकिन इसे व्यावहारिक रूप देने का काम विद्यालय करता है। अनुशासित छात्र परिश्रमी, कर्तव्यनिष्ठ और विनम्र बनता है। ऐसा विद्यार्थी न केवल परीक्षाओं में सफलता प्राप्त करता है, बल्कि आगे चलकर समाज और देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनता है।

निष्कर्ष: विद्यार्थियों को दी जाने वाली शिक्षा तभी सार्थक हो सकती है जब उसे व्यावहारिक जीवन के मूल्यों से जोड़ा जाए। देश की प्रगति और छात्र के सर्वांगीण विकास के लिए अनुशासनप्रिय होना बेहद आवश्यक है। अनुशासित जीवन ही सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है।

स्वास्थ्य ही श्रेष्ठ धन है

"पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख घर में हो माया॥"

प्रस्तावना (स्वास्थ्य का अर्थ): मानव जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति उसका अच्छा स्वास्थ्य है। आयुर्वेद में कहा गया है कि अस्वस्थ शरीर में जीवन का आनंद नहीं लिया जा सकता। यदि मनुष्य के पास अपार धन-दौलत भी हो, लेकिन शरीर बीमारियों से घिरा हो, तो वह सुख का अनुभव नहीं कर सकता। इसके विपरीत, एक निर्धन व्यक्ति भी यदि पूरी तरह से स्वस्थ है, तो वह खुशहाल जीवन जी सकता है। इसीलिए सुखी और दीर्घायु जीवन के लिए स्वास्थ्य की रक्षा करना सबसे पहला कर्तव्य माना गया है।

स्वास्थ्यप्रद और संतुलित भोजन: निरोगी रहने के लिए हमारा खान-पान शुद्ध और पौष्टिक होना चाहिए। संतुलित आहार ही शरीर को ऊर्जा और रोगों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है। भोजन में हरी सब्जियाँ, ताजे फल, दालें, दूध और सूखे मेवे शामिल होने चाहिए। कहा भी गया है कि "जैसा अन्न, वैसा मन" और "स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है।" इसलिए सात्विक और पौष्टिक भोजन को ही अपनी प्राथमिकता बनाना चाहिए।

स्वास्थ्य कमजोर होने के कारण: आज के समय में खराब जीवनशैली और खान-पान की गलत आदतें स्वास्थ्य के बिगड़ने का मुख्य कारण बन चुकी हैं। जंक फूड और फास्ट-फूड का अत्यधिक सेवन लोगों को कम उम्र में ही गंभीर बीमारियों की ओर ढकेल रहा है। इसके अलावा स्वच्छता की कमी, शारीरिक श्रम न करना और मानसिक तनाव के कारण भी लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो रही है।

स्वास्थ्य रक्षा के उपाय: अपनी सेहत को बनाए रखने के लिए नियमित दिनचर्या का पालन करना जरूरी है। प्रतिदिन योगाभ्यास, व्यायाम, ताजी हवा में टहलना और बुरी आदतों से दूर रहना स्वास्थ्य रक्षा का सबसे सरल मार्ग है। इसके साथ ही, बीमारियों के समय सही इलाज की सुविधा के लिए सरकार द्वारा आयुष्मान भारत जैसी योजनाएँ चलाई जा रही हैं, जिनसे गरीब और जरूरतमंद वर्गों को समय पर बेहतर इलाज मिल रहा है।

निष्कर्ष (उपसंहार): स्वास्थ्य ही एक ऐसा अनमोल धन है, जो व्यक्ति को वास्तविक सुख और शांति प्रदान करता है। लम्बे और खुशहाल जीवन का रहस्य केवल और केवल निरोगी बने रहने में छुपा है। इसलिए हम सभी को अपने खान-पान और दिनचर्या के प्रति जागरूक रहकर अपने स्वास्थ्य रूपी धन की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि स्वस्थ नागरिक ही एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण करते हैं।

बनारस, दिशा कविता ( हिंदी साहित्य)

जीवन परिचय एवं शिक्षा

  • जन्म वर्ष एवं स्थान: 1934 में बलिया ज़िले के चकिया गाँव में हुआ।
  • निधन: 2018 में।
  • उच्च शिक्षा: काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की।
  • पीएच.डी. विषय: 'आधुनिक हिंदी कविता में बिंब-विधान' विषय पर पीएच.डी. की।
  • कार्यक्षेत्र: गोरखपुर में हिंदी के प्राध्यापक रहे और तत्पश्चात जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में भारतीय भाषा केंद्र में हिंदी के प्रोफेसर पद से अवकाश प्राप्त किया।

काव्यगत विशेषताएँ एवं शैली

  • मूलतः मानवीय संवेदनाओं के कवि हैं।
  • अपनी कविताओं में बिंब-विधान पर अत्यधिक बल दिया है।
  • कविताओं में शोर-शराबा न होकर विद्रोह का शांत और संयत स्वर उभरता है।
  • भाषा नम्य (लचीली), पारदर्शी, ऋजु और बेलौस है। शिल्प में बातचीत की सहजता और अपनापन मिलता है।

प्रमुख रचनाएँ

  • काव्य संग्रह (कुल सात):
    • अभी बिल्कुल अभी
    • ज़मीन पक रही है
    • यहाँ से देखो
    • अकाल में सारस
    • उत्तर कबीर तथा अन्य कविताएँ
    • बाघ
    • टालस्टाय और साइकिल
  • आलोचनात्मक पुस्तकें: कल्पना और छायावाद, आधुनिक हिंदी कविता में बिंब विधान का विकास
  • निबंध संग्रह: मेरे समय के शब्द, कब्रिस्तान में पंचायत
  • प्रतिनिधि कविताएँ: चुनी हुई कविताओं का संग्रह
  • संपादित कार्य: ताना-बाना (विविध भारतीय भाषाओं का हिंदी में अनूदित काव्य संग्रह)

पुरस्कार एवं सम्मान

  • साहित्य अकादमी पुरस्कार: 1989 में 'अकाल में सारस' काव्य संग्रह पर।
  • अन्य प्रमुख सम्मान:
    • मैथिलीशरण गुप्त राष्ट्रीय सम्मान (1994, मध्य प्रदेश शासन)
    • कुमारन आशान पुरस्कार
    • व्यास सम्मान
    • दयावती मोदी पुरस्कार

1. 'बनारस' कविता का सार एवं महत्वपूर्ण बिंदु

  • मुख्य विषय: इस कविता में प्राचीनतम शहर 'बनारस' के सांस्कृतिक वैभव और उसके ठेठ बनारसीपन को दर्शाया गया है।
  • सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्व:
    • बनारस भगवान शिव की नगरी है तथा गंगा नदी के साथ जुड़ी आस्था का केंद्र है।
    • यहाँ काशी और गंगा के सान्निध्य से मोक्ष की अवधारणा जुड़ी हुई है।
  • बनारस की विशेषताएँ/चित्रण:
    • कविता में गंगा, गंगा के घाट, मंदिर तथा घाटों के किनारे बैठे भिखारियों के कटोरों का सुंदर चित्रण किया गया है।
    • शहर के दृश्य: गंगा में बँधी नाव, मंदिरों-घाटों पर जलते दीप, कभी न बुझने वाली चिताग्नि तथा हवन से उठता हुआ धुआँ।
  • बनारस का चरित्र:
    • बनारस में हर कार्य अपनी 'रौ' (अपनी गति/मस्त लय) में होता है।
    • बनारस आस्था, श्रद्धा, विरक्ति, विश्वास, आश्चर्य और भक्ति का मिला-जुला रूप है।
    • यहाँ अति प्राचीनता, आध्यात्मिकता और भव्यता के साथ आधुनिकता का समाहार देखने को मिलता है।
  • शिल्प एवं भाषा-शैली:
    • यह कविता भाषा की दृष्टि से सरल है, लेकिन अर्थ के स्तर पर गहरी है।
    • कविता का शिल्प विवरणात्मक (विवरण देने वाला) है और यह कवि की सूक्ष्म दृष्टि का परिचय देता है।

2. 'दिशा' कविता का सार एवं महत्वपूर्ण बिंदु

  • मुख्य विषय: यह कविता बाल मनोविज्ञान (बच्चों की सोच/मानसिकता) से संबंधित है।
  • मूल घटना/प्रसंग:
    • कवि पतंग उड़ाते हुए एक बच्चे से पूछता है— "हिमालय किधर है?"
    • बालक बाल-सुलभ (सहज) भाव से उत्तर देता है— "हिमालय उधर है, जिधर मेरी पतंग भागी जा रही है।"
  • कविता का मुख्य संदेश/अर्थ:
    • हर व्यक्ति का अपना यथार्थ (सत्य) होता है: बच्चे यथार्थ को अपनी दुनिया और अपने दृष्टिकोण से देखते हैं।
    • कवि को बच्चे की यह बाल-सुलभ समझ (संज्ञान) बहुत प्रभावित करती है।
    • यह कविता यह संदेश देती है कि हम बच्चों से भी कुछ-न-कुछ नया सीख सकते हैं।
  • विशेषता:
    • यह कविता आकार में छोटी (लघु) है और इसकी भाषा अत्यंत सहज एवं सरल है।

इस शहर में वसंत अचानक आता है और जब आता है तो मैंने देखा है लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ़ से उठता है धूल का एक बवंडर और इस महान पुराने शहर की जीभ किरकिराने लगती है

संदर्भ: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'अंतरा (भाग-2)' में संकलित 'बनारस' कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रसिद्ध आधुनिक कवि केदारनाथ सिंह हैं।

प्रसंग: इस पद्यांश में कवि ने बनारस शहर में वसंत के अचानक आगमन और उससे उठने वाले धूल के बवंडर के प्रभाव का वर्णन किया है।

व्याख्या: कवि कहते हैं कि बनारस शहर में वसंत ऋतु किसी पूर्व सूचना के बिना अचानक आ जाती है। जब यहाँ वसंत का आगमन होता है, तो 'लहरतारा' या 'मडुवाडीह' (बनारस के स्थानीय मोहल्ले) की तरफ़ से धूल का एक बड़ा बवंडर उठने लगता है। इस उड़ती हुई धूल के कारण इस प्राचीन और महान शहर के लोगों के मुँह में मिट्टी जम जाती है, जिससे उनकी जीभ किरकिराने लगती है।

विशेष:

● लहरतारा और मडुवाडीह जैसे स्थानीय नामों के उल्लेख से बनारस का यथार्थवादी चित्रण हुआ है।

● भाषा सरल, सहज और आम बोलचाल की खड़ी बोली हिंदी है

● 'धूल का बवंडर' में सुंदर दृश्य-बिंब निर्मित हुआ है  कविता मुक्त छंद में रचित है।

जो है वह सुगबुगाता है जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ आदमी दशाश्वमेध पर जाता है और पाता है घाट का आख़िरी पत्थर कुछ और मुलायम हो गया है सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आँखों में एक अजीब सी नमी है और एक अजीब सी चमक से भर उठा है भिक्षुकों के कटोरों का निचाट खालीपन

  • संदर्भ: पूर्ववत।
  • प्रसंग: इस काव्यांश में वसंत के आगमन से बनारस की प्रकृति, चेतन-अचेतन वस्तुओं, जीव-जंतुओं और भिक्षुकों के जीवन में आए सकारात्मक परिवर्तन का वर्णन है।
  • व्याख्या: कवि कहते हैं कि वसंत आते ही इस शहर में जो भी जीवित (विद्यमान) है, उसमें एक नई सुगबुगाहट या चेतना जाग उठती है। जो पेड़-पौधे सूखे पड़े थे, उनमें भी नई कोंपलें (पचखियाँ) फूटने लगती हैं। जब कोई व्यक्ति दशाश्वमेध घाट की ओर जाता है, तो उसे अहसास होता है कि घाट का आख़िरी कठोर पत्थर भी अब स्पर्श में कुछ अधिक मुलायम और स्नेहयुक्त प्रतीत हो रहा है। घाट की सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आँखों में भी आत्मीयता की एक अजीब सी नमी दिखाई देती है और दान की आस में बैठे भिक्षुकों के कटोरों का निचाट (पूर्ण) खालीपन भी उम्मीद की एक अनोखी चमक से भर जाता है।
  • विशेष:
    • 'अजीब सी नमी' और 'अजीब सी चमक' में उपमा अलंकार का प्रयोग है।
    • निर्जीव पत्थर के मुलायम होने और सुगबुगाने में मानवीकरण अलंकार है।
    • भिक्षुकों के निराशाजनक जीवन में आशा के संचार का अत्यंत संवेदनात्मक अंकन है।
    • 'पचखियाँ' जैसे आंचलिक शब्द का सटीक प्रयोग हुआ है।

तुमने कभी देखा है खाली कटोरों में वसंत का उतरना! यह शहर इसी तरह खुलता है इसी तरह भरता और खाली होता है यह शहर

  • संदर्भ: पूर्ववत।
  • प्रसंग: इसमें कवि ने बनारस शहर के खुलने, श्रद्धालुओं से भरने और फिर शांत होकर खाली होने की निरंतर चलने वाली जीवन-प्रक्रिया का वर्णन किया है।
  • व्याख्या: कवि पाठकों को संबोधित करते हुए प्रश्न शैली में पूछते हैं कि क्या तुमने कभी भिक्षुकों के खाली कटोरों में वसंत को उतरते हुए देखा है? (अर्थात अत्यंत निर्धन व्यक्तियों के खाली जीवन में भी खुशी और आशा की किरण को आते देखा है?) बनारस शहर की दिनचर्या इसी प्रकार रोज़ सुबह नए उल्लास के साथ शुरू होती है (खिलती/खुलती है), दिनभर श्रद्धालुओं और पर्यटकों से भरती है और रात होते-होते फिर से खाली एवं शांत हो जाती है।
  • विशेष:
    • 'खाली कटोरों में वसंत का उतरना' में लाक्षणिकता और मानवीकरण अलंकार की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति है।
    • 'तुमने कभी देखा है' में प्रश्न शैली के माध्यम से पाठकों को विचार करने के लिए प्रेरित किया गया है।
    • बनारस शहर की जीवंतता और उसकी शाश्वत दिनचर्या को रेखांकित किया गया है।

इसी तरह रोज़-रोज़ एक अनंत शव ले जाते हैं कंधे अँधेरी गली से चमकती हुई गंगा की तरफ़

  • संदर्भ: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'अंतरा (भाग-2)' में संकलित 'बनारस' कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रसिद्ध आधुनिक कवि केदारनाथ सिंह हैं।
  • प्रसंग: इस पद्यांश में कवि ने बनारस की संकरी गलियों से गंगा घाट की ओर अंतिम संस्कार के लिए ले जाए जाने वाले शवों और जीवन-मरण के शाश्वत सत्य का चित्रण किया है।
  • व्याख्या: कवि कहते हैं कि बनारस शहर में यह एक नित्य प्रक्रिया है। यहाँ प्रतिदिन असंख्य कंधे एक अनंत (अगणित) शव को बनारस की संकरी और अँधेरी गलियों से निकालकर मोक्षदायिनी, पवित्र और सूर्य की किरणों से चमकती हुई गंगा नदी के घाटों की ओर ले जाते हैं। यह शहर जीवन और मृत्यु दोनों के सह-अस्तित्व को सहजता से स्वीकार करता है।
  • विशेष:
    • जीवन की नश्वरता और मोक्ष की सांस्कृतिक मान्यता का यथार्थवादी अंकन हुआ है।
    • 'अँधेरी गली' (अज्ञान/सांसारिकता) और 'चमकती गंगा' (ज्ञान/मोक्ष) के माध्यम से प्रतीकात्मकता उभरी है।
    • 'रोज़-रोज़' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
    • भाषा अत्यंत सरल और बिंबप्रधान खड़ी बोली है।

इस शहर में धूल धीरे-धीरे उड़ती है धीरे-धीरे चलते हैं लोग धीरे-धीरे बजते हैं घंटे शाम धीरे-धीरे होती है

  • संदर्भ: पूर्ववत।
  • प्रसंग: इसमें कवि ने बनारस की जीवन-शैली के धीमेपन, सहजता और उसकी अपनी अनोखी लय (गति) का वर्णन किया है।
  • व्याख्या: कवि कहते हैं कि बनारस शहर की अपनी एक विशेष गति है। यहाँ की हवा में धूल बहुत धीरे-धीरे उड़ती है, यहाँ के लोग बिना किसी हड़बड़ी के बहुत धीरे-धीरे चलते हैं, मंदिरों के घंटे शांत वातावरण में धीरे-धीरे बजते हैं और यहाँ शाम का आगमन भी बहुत धीरे-धीरे होता है। यहाँ जीवन में कोई भाग-दौड़ या आपाधापी नहीं है।
  • विशेष:
    • 'धीरे-धीरे' शब्द की आवृत्ति से पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार और स्वर-मैत्री बनी है।
    • बनारस के शांत, संयमित और ठहराव युक्त जीवन-मूल्यों को रेखांकित किया गया है।
    • दृश्य और श्रव्य बिंबों का सुंदर संयोजन है।

यह धीरे-धीरे होना धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है कि हिलता नहीं है कुछ भी कि जो चीज़ जहाँ थी वहीं पर रखी है कि गंगा वहीं है कि वहीं पर बँधी है नाव कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँ सैकड़ों बरस से

  • संदर्भ: पूर्ववत।
  • प्रसंग: इस काव्यांश में कवि ने स्पष्ट किया है कि बनारस का यह 'धीमापन' उसकी कमज़ोरी नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक निरंतरता और प्राचीन परंपराओं को सुरक्षित रखने वाली शक्ति है।
  • व्याख्या: कवि कहते हैं कि बनारस की यह 'धीरे-धीरे' चलने वाली सामूहिक लय ही इस पूरे शहर को एक सूत्र में मजबूती से बाँधे हुए है। इसी ठहराव के कारण प्राचीन परंपराएँ और आस्था का ढांचा कभी ढहता नहीं है। सब कुछ अपनी जगह सुरक्षित है—गंगा नदी सदियों से उसी स्थान पर बह रही है, नावें वहीं घाट पर बँधी हैं और संत तुलसीदास की खड़ाऊँ भी सैकड़ों वर्षों से अपने मूल स्थान पर वैसे ही सुरक्षित रखी हुई है। आधुनिकता के दौर में भी बनारस अपनी जड़ों से कटकर हिला नहीं है।
  • विशेष:
    • 'तुलसीदास की खड़ाऊँ' और 'गंगा' के उल्लेख से बनारस की सांस्कृतिक धरोहर की निरंतरता दिखाई गई है।
    • लाक्षणिक भाषा का प्रयोग है, जहाँ धीमापन स्थिरता और आस्था का प्रतीक है।
    • 'सैकड़ों बरस से' में ऐतिहासिकता का बोध है।
    • 'कि' शब्द की बार-बार आवृत्ति से भाषा में एक काव्यात्मक लय निर्मित हुई है।

कभी सही-साँझ बिना किसी सूचना के घुस जाओ इस शहर में कभी आरती के आलोक में

  • संदर्भ: पूर्ववत।
  • प्रसंग: कवि पाठक को शाम के समय (आरती के समय) बनारस की अलौकिक एवं आध्यात्मिक सुंदरता का अनुभव करने का निमंत्रण दे रहे हैं।
  • व्याख्या: कवि कहते हैं कि यदि बनारस के असली रूप को देखना और महसूस करना है, तो किसी दिन ठीक शाम के समय (सही-साँझ) बिना किसी पूर्व योजना या सूचना के अचानक इस शहर में प्रवेश कर जाओ। विशेषकर उस समय, जब गंगा घाटों पर संध्या आरती की जगमगाती रोशनी (आलोक) फैली हुई हो। तब इस शहर का आध्यात्मिक और भव्य स्वरूप खुलकर सामने आता है।
  • विशेष:
    • 'सही-साँझ' जैसे तद्भव व आंचलिक शब्द का सटीक प्रयोग हुआ है।
    • 'आरती के आलोक में' में अनुप्रास अलंकार ('अ' वर्ण की आवृत्ति) है।
    • पाठक को सीधे संबोधित करते हुए वर्णनात्मक शैली अपनाई गई है।

                इसे अचानक देखो अद्भुत है इसकी बनावट यह आधा                      जल में है आधा मंत्र में आधा फूल में है

               आधा शव में आधा नींद में है आधा शंख में अगर ध्यान से                 देखो तो यह आधा है और आधा नहीं है

  • संदर्भ: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'अंतरा (भाग-2)' में संकलित 'बनारस' कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रसिद्ध आधुनिक कवि केदारनाथ सिंह हैं।
  • प्रसंग: इस पद्यांश में कवि ने बनारस शहर की अनूठी आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और द्वंदात्मक बनावट (सरंचना) का सूक्ष्म चित्रण किया है।
  • व्याख्या: कवि कहते हैं कि यदि बनारस शहर को अचानक देखा जाए, तो इसकी बनावट अत्यंत अद्भुत और विलक्षण प्रतीत होती है। यह शहर जीवन और मृत्यु, भौतिकता और आध्यात्मिकता के संगम पर स्थित है। इसका आधा रूप गंगा के जल में डूबा है, तो आधा धार्मिक मंत्रोच्चार में लीन है; आधा पूजा के फूलों की महक में समाया है, तो आधा श्मशान के शवों में मृत्यु के सत्य को प्रकट करता है। इसका आधा भाग अलौकिक शांति की नींद में सोया हुआ है, तो आधा शंखध्वनि की गूँज में जागा हुआ है। यदि कोई इसे गहराई और ध्यान से देखे, तो अनुभव होगा कि यह शहर आधा दिखाई देता है (स्थूल रूप में) और आधा अदृश्य (सूक्ष्म आध्यात्मिक चेतना के रूप में) विद्यमान है।
  • विशेष:
    • बनारस के विरोधाभासी और रहस्यात्मक चरित्र (जीवन-मृत्यु, जाग्रत-सुप्त) का सजीव अंकन हुआ है।
    • 'आधा जल में...', 'आधा मंत्र में...' में आवृत्ति के माध्यम से काव्यात्मक लय और विरोधाभास अलंकार का सुंदर प्रयोग है।
    • भाषा लाक्षणिक, सहज और दर्शन से परिपूर्ण है।
    • मुक्त छंद का प्रयोग है।

जो है वह खड़ा है बिना किसी स्तंभ के जो नहीं है उसे थामे है राख और रोशनी के ऊँचे-ऊँचे स्तंभ आग के स्तंभ और पानी के स्तंभ धुएँ के खुशबू के आदमी के उठे हुए हाथों के स्तंभ

  • संदर्भ: पूर्ववत।
  • प्रसंग: इसमें कवि ने बनारस की अमूर्त आस्था, विश्वास और उसके अद्श्य सम्बल (सहारे) को विभिन्न प्रतीकात्मक 'स्तंभों' के माध्यम से अभिव्यक्त किया है।
  • व्याख्या: कवि कहते हैं कि बनारस में जो कुछ प्रत्यक्ष (विद्यमान) है, वह किसी भौतिक खंभे (स्तंभ) के बिना ही अपनी पूरी दृढ़ता से टिका हुआ है। वहीं, जो अमूर्त है (जो आँखों से नहीं दिखता—जैसे आस्था और संस्कृति), उसे चिता की राख, आरती की रोशनी, मणिकर्णिका की आग, गंगा के पानी, धूप-हवन के धुएँ, पूजा की खुशबू और सूर्य को अर्घ्य देते श्रद्धालुओं के उठे हुए हाथों रूपी अदृश्य और ऊँचे-ऊँचे स्तंभों ने थाम रखा है। अर्थात बनारस की नींव किसी ईंट-पत्थर के सहारे नहीं, बल्कि जन-आस्था के इन प्रतीकात्मक स्तंभों पर टिकी है।
  • विशेष:
    • 'राख', 'रोशनी', 'आग', 'पानी', 'धुआँ' और 'उठे हुए हाथ' को आस्था के स्तंभ मानकर रूपक अलंकार की रचना की गई है।
    • 'ऊँचे-ऊँचे' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
    • बनारस की अभौतिक एवं सांस्कृतिक मजबूती का सुंदर प्रतीकात्मक चित्रण है।
    • दृश्य और घ्राण (सुगंध) बिंबों का उत्कृष्ट समावेश है।

किसी अलक्षित सूर्य को देता हुआ अर्घ्य शताब्दियों से इसी तरह गंगा के जल में अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर अपनी दूसरी टाँग से बिल्कुल बेखबर!

  • संदर्भ: पूर्ववत।
  • प्रसंग: इस काव्यांश में कवि ने बनारस की एकाग्र भक्ति-साधना, हठयोग परंपरा और उसकी बेपरवाह/मस्तमौला जीवन-शैली का वर्णन किया है।
  • व्याख्या: कवि कहते हैं कि यह बनारस शहर सदियों (शताब्दियों) से गंगा के पवित्र जल में खड़ा होकर किसी अदृश्य (अलक्षित) सूर्य देव को अर्घ्य (जल अर्पित) दे रहा है। यह शहर एक तपस्वी की भाँति अपनी आध्यात्मिक साधना (एक टाँग) में इतना लीन है कि इसे अपनी भौतिक दुनिया, आपाधापी या दूसरी टाँग (आधुनिकता) की कोई चिंता या खबर ही नहीं है। यह शहर अपनी प्राचीन आस्था में पूरी तरह मग्न होकर अपनी ही धुन में जी रहा है।
  • विशेष:
    • 'अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर' में बनारस का मानवीकरण अलंकार किया गया है (तपस्वी के रूप में)।
    • 'अलक्षित सूर्य', 'शताब्दियों से' शब्द बनारस की प्राचीनता और गभीर आध्यात्मिकता के सूचक हैं।
    • 'दूसरी टाँग से बिल्कुल बेखबर' बनारस के ठेठ 'मस्तमौला और फक्कड़' स्वभाव को दर्शाता है।
    • व्यंग्य, लाक्षणिकता और बिंब-विधान का सटीक प्रयोग है।

दो बैलों की कथा - प्रश्न उत्तर

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास

प्रश्न 1. कांजीहौस में कैद पशुओं की हाज़िरी क्यों ली जाती होगी?
उत्तर- कांजीहौस एक प्रकार से पशुओं की जेल थी। उसमें ऐसे आवारा पशु कैद होते थे जो दूसरों के खेतों में घुसकर फसलें नष्ट करtते थे। अत: कांजीहौस के मालिक का यह दायित्व होता था कि वह उन्हें जेल में सुरक्षित रखे तथा भागने न दे। इस कारण हर रोज उनकी हाजिरी लेनी पड़ती होगी।

प्रश्न 2. छोटी बच्ची को बैलों के प्रति प्रेम क्यों उमड़ आया?

उत्तर- छोटी बच्ची की माँ मर चुकी थी। सौतेली माँ उसे मारती रहती थी। इधर बैलों की भी यही स्थिति थी। गया उन्हें दिनभर खेत में जोतता, मारता-पीटता और शाम को सूखा भूसा डाल देता। छोटी बच्ची महसूस कर रही थी कि उसकी स्थिति और बैलों की स्थिति एक जैसी है। उनके साथ अन्याय होता देखा उसे बैलों के प्रति प्रेम उमड़ आया।

प्रश्न 3. कहानी में बैलों के माध्यम से कौन-कौन से नीति-विषयक मूल्य उभर कर आए हैं?

उत्तर- इस कहानी के माध्यम से निम्नलिखित नीतिविषयक मूल्य उभरकर सामने आए हैं

● सरल-सीधा और अत्यधिक सहनशील होना पाप है। बहुत सीधे इनसान को मूर्ख या ‘गधा’ कहा जाता है।
● इसलिए मनुष्य को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना चाहिए
● आज़ादी बहुत बड़ा मूल्य है। इसे पाने के लिए मनुष्य को बड़े-से-बड़ा कष्ट उठाने को तैयार रहना चाहिए।
● समाज के सुखी-संपन्न लोगों को भी आजादी की लड़ाई में योगदान देना चाहिए।

प्रश्न 4. प्रस्तुत कहानी में प्रेमचंद ने गधे की किन स्वभावगत विशेषताओं के आधार पर उसके प्रति रूढ़ अर्थ ‘मूर्छ प्रयोग न कर किस नए अर्थ की ओर संकेत किया है?
उत्तर- गधा सबसे बुद्धिहीन प्राणी माना जाता है। यदि किसी को मूर्ख कहना चाहते हैं तो हम उसे गधा कह देते हैं। गधा ‘मूर्ख’ के अर्थ में रुढ़ हो गया है परंतु लेखक ने इसे सही नहीं माना क्योंकि गधा अपने सीधेपन और सहनशीलता से किसी को हानि नहीं पहुँचाता है। गाय, कुत्ता और बैल जैसे जानवर कभी-कभी क्रोध कर देते हैं पर गधा ऐसा नहीं करता है। गुणों के विषय में वह ऋषियों-मुनियों से कम नहीं है।

प्रश्न 5. किन घटनाओं से पता चलता है कि हीरा और मोती में गहरी दोस्ती थी?

उत्तर- इस कहानी में अनेक घटनाएँ ऐसी हैं जिनसे पता चलता है कि मोती और हीरा में गहरी दोस्ती थी।

  1. पहली घटना-
    दोनों एक-साथ गाड़ी में जोते जाते थे तो यह कोशिश करते थे कि गाड़ी का अधिक भार दूसरे साथी के कंधे पर न आकर उसके अपने कंधे पर आए।
  2. दूसरी घटना-
    गया ने हीरा के नाक पर डंडा मारा तो मोती से सहा न गया। वह हल, रस्सी, जुआ, जोत सब लेकर भाग पड़ा। उससे हीरा का कष्ट देखा न गया।
  3. तीसरी घटना-
    जब मटर के खेत में मटर खाकर दोनों मस्त हो रहे तो वे सींग मिलाकर एक-दूसरे को ठेलने लगे। अचानक मोती को लगा कि हीरा क्रोध में आ गया है तो वह पीछे हट गया। उसने दोस्ती को दुश्मनी में बदलने से रोक लिया।
  4. चौथी घटना-
    जब उनके सामने विशालकाय साँड आ खड़ा हुआ तो उन्होंने योजनापूर्वक एक-दूसरे का साथ देते हुए उसका मुकाबला किया। साँड एक पर चोट करता तो दूसरा उसकी देह में अपने नुकीले सींग चुभा देता। आखिरकार साँड बेदम होकर गिर पड़ा।
  5. पाँचवीं घटना-
    मोती मटर के खेत में मटर खाते-खाते पकड़ा गया। हीरा उसे अकेला विपत्ति में देखकर वापस आ गया। वह भी मोती के साथ पकड़ा गया।
  6. छठी घटना-
    काँजीहौस में हीरा ने दीवार तोड़ डाली। उसे रस्सियों से बाँध दिया गया। इस पर मोती ने उसका साथ दिया। पहले तो उसने बाड़े की दीवार तोड़कर हीरा का अधूरा काम पूरा किया, फिर उसका साथ देने के लिए उसी के साथ बँध गया

प्रश्न 6. लेकिन औरत जात पर सींग चलाना मना है, यह भूल जाते हो।’-हीरा के इस कथन के माध्यम से स्त्री के प्रति प्रेमचंद के दृष्टिकोण को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:- लेकिन औरत जात पर सींग चलाना मना है। हीरा के इस कथन के माध्यम से पता चलता है कि प्रेमचंद नारी जाति का अत्यधिक सम्मान करते थे। नारी विभिन्न रिश्ते बनाकर समाज में अपनी भूमिका का निर्वहन करती है। वह त्याग, दया, ममता, सहनशीलता का जीता जागता उदाहरण है। विपरीत परिस्थितियों में यदि नारी में क्रोध जैसे भाव आ भी जाते हैं तो इससे उसकी गरिमा कम नहीं हो जाती है और न उसके सम्मान में कमी आ जाती है। लेखक महिलाओं के प्रति अत्यधिक सम्मान रखता है। उसने यह भी कहना चाहा है कि जब पशु भी नारी जाति का सम्मान करते हैं तो मनुष्य को नारी जाति का सम्मान हर स्थिति में करना चाहिए।

प्रश्न 7. किसान जीवन वाले समाज में पशु और मनुष्य के आपसी संबंधों को कहानी में किस तरह व्यक्त किया गया है?

उत्तर- किसान जीवन में पशुओं और मनुष्यों के आपसी संबंध बहुत गहरे तथा आत्मीय रहे हैं।
किसान पशुओं को घर के सदस्य की भाँति प्रेम करते रहे हैं और पशु अपने स्वामी के लिए जी-जान देने को तैयार रहे हैं। झूरी हीरा और मोती को बच्चों की तरह स्नेह करता था। तभी तो उसने उनके सुंदर-सुंदर नाम रखे-हीरा-मोती। वह उन्हें अपनी आँखों से दूर नहीं करना चाहता था। जब हीरा-मोती उसकी ससुराल से लौटकर वापस उसके थाने पर आ खड़े हुए तो उसका हृदय आनंद से भर गया। गाँव-भर के बच्चों ने भी बैलों की स्वामिभक्ति देखकर उनका अभिनंदन किया। इससे पता चलता है कि किसान अपने पशुओं से मानवीय व्यवहार करते हैं।

प्रश्न 8. इतना तो हो ही गया कि नौ दस प्राणियों की जान बच गई। वे सब तो आशीर्वाद देंगें’-मोती के इस कथन के आलोक में उसकी विशेषताएँ बताइए।
उत्तर- इतना तो हो ही गया कि नौ-दस प्राणियों की जान बच गई। वे सब तो आशीर्वाद देंगे। मोती के इस कथन से पता चलता है कि वह परोपकारी स्वभाव वाला प्राणी है। परोपकार की ऐसी भावना वह मन में ही नहीं रखता है बल्कि इसे व्यावहारिक रूप में दर्शाता भी है। वह बाड़े की कच्ची दीवार को तोड़कर नौ-दस प्राणियों को भगाता है ताकि उनकी जान बच जाए। मोती सच्चा मित्र भी है। वह कांजीहौस में हीरा को अकेला छोड़कर नहीं जाता है। वह आशावादी भी है। उसे विश्वास है कि ईश्वर उनकी जान अवश्य बचाएँगे।

प्रश्न 9. आशय स्पष्ट कीजिए

(क) अवश्य ही उनमें कोई ऐसी गुप्त शक्ति थी, जिससे जीवों में श्रेष्ठता का दावा करने वाला मनुष्य वंचित है।
(ख) उस एक रोटी से उनकी भूख तो क्या शांत होती; पर दोनों के हृदय को मानो भोजन मिल गया।
उत्तर-
(क) हीरा और मोती बिना कोई वचन कहे एक-दूसरे के मन की बात समझ जाते थे। प्रायः वे एक-दूसरे से स्नेह की बातें सोचते थे। यद्यपि मनुष्य स्वयं को सब प्राणियों से श्रेष्ठ मानता है किंतु उसमें भी यह शक्ति नहीं होती।

(ख) हीरा और मोती गया के घर बँधे हुए थे। गया ने उनके साथ अपमानपूर्ण व्यवहार किया था। इसलिए वे क्षुब्ध थे। परंतु तभी एक नन्हीं लड़की ने आकर उन्हें एक रोटी ला दी। उस रोटी से उनका पेट तो नहीं भर सकता था। परंतु उसे खाकर उनका हृदय जरूर तृप्त हो गया। उन्होंने बालिका के प्रेम का अनुभव कर लिया और प्रसन्न हो उठे।

प्रश्न 10. गया ने हीरा-मोती को दोनों बार सूखा भूसा खाने के लिए दिया क्योंकि-
(क) गया पराये बैलों पर अधिक खर्च नहीं करना चाहता था।
(ख) गरीबी के कारण खली आदि खरीदना उसके बस की बात न थी।
(ग) वह हीरा-मोती के व्यवहार से बहुत दुखी था।
(घ) उसे खली आदि सामग्री की जानकारी न थी।
(सही उत्तर के आगे (✓) का निराश लगाइए।)
उत्तर-
(ग) वह हीरा-मोती के व्यवहार से दुखी था।

रचना और अभिव्यक्ति

प्रश्न 11. हीरा और मोती ने शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाई लेकिन उसके लिए प्रताड़ना भी सही। हीरा-मोती की इस प्रतिक्रिया पर तर्क सहित अपने विचार प्रकट करें।
उत्तर-
हीरा और मोती शोषण के विरुद्ध हैं। वे हर शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाते रहे हैं। उन्होंने झूरी के साले गयी का विरोध किया तो सूखी रोटियाँ खाई तथा डंडे खाए। फिर कॉजीहौस में अन्याय का विरोध किया तो बंधन में पड़े। उन्हें भूखे रहना पड़ा।
प्रतिक्रिया-मेरा विचार है कि हीरा और मोती का यह कदम बिल्कुल ठीक था। यदि वे कोई प्रतिक्रिया न करते तो उनका खूब शोषण होता। उन्हें गिड़गिड़ाकर, मन मारकर अपने मालिक की गुलामी करनी पड़ती। वे अपने दर्द को व्यक्त भी न कर पाते। परंतु अपना विद्रोह प्रकट करके उन्होंने मालिक को सावधान कर दिया कि उनका अधिक शोषण नहीं किया जा सकता। मार खाने के बदले उन्होंने मालिक के मन में भय तो उत्पन्न कर ही दिया।

प्रश्न 12. क्या आपको लगता है कि यह कहानी आजादी की लड़ाई की ओर भी संकेत करती है?

उत्तर- हाँ, हीरा-मोती ने अपनी परतंत्रता से मुक्ति पाने के लिए जिस तरह से नाना प्रकार की कठिनाइयाँ सहीं और मृत्यु के करीब जाकर भी बच निकले। वे अंततः अपने घर वापस आ गए, इससे यही संकेत मिलता है। हीरा-मोती गया के घर से पहली बार रस्सी तुड़ाकर आ जाते हैं। वे दुबारा गया के घर जाते हैं, तो उन्हें अपमानित और प्रताड़ित होना पड़ता है। और भूखा भी रहना पड़ता है। वहाँ से भागने पर उन्हें साँड रूपी मुसीबत का सामना करना पड़ता है। अंत में कांजीहौस में बंद होना तथा कसाई के हाथों बिकना तथा इसके उपरांत भी बचकर झुरी के पास आ जाना आदि आजादी की लड़ाई की ओर संकेत करती है।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. गधा किस अर्थ में रुढ़ हो गया है? और क्यों?
उत्तर- गधा ‘मूर्ख’ या बेवकूफ के अर्थ में रुढ़ हो गया है। किसी आदमी को जब बेवकूफ़ कहना चाहते हैं तो उसे गधा कहते हैं। ऐसा उसके सीधेपन और सब कुछ सहन करने के कारण कहा जाता है।

प्रश्न 2. सहनशीलता के मामले में गाय और कुत्ता गधे से किस तरह भिन्न हैं?
उत्तर- गाय और कुत्ता गधे जितना सहनशील नहीं है। गाय नाराज होने पर या अपने बच्चे को छेड़े जाते हुए देखकर हिंसक रूप धारण कर लेती है। इसी तरह कुत्ता भी काट लेता है जबकि गधा सब कुछ चुपचाप सहन कर लेता है।

प्रश्न 3. अफ्रीका और अमरीका में भारतीयों की दुर्दशा का क्या कारण है?
उत्तर- अफ्रीका और अमरीका में भारतीयों की दुर्दशा का कारण उनका सीधापन और उनकी सहनशीलता है। वे अपनी सहनशीलता के कारण शोषण और अन्याय के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाते है और गम खाकर रह जाते हैं।

प्रश्न 4. बैल को गधे का छोटा भाई क्यों कहा गया है?
उत्तर- बैल को गधे का छोटा भाई इसलिए कहा गया है क्योंकि बैल भी सीधा-सादा जानवर है। वह भी सहनशील है पर गधे जितना नहीं। बैल सींग चलाकर, अड़ियल रुख अपनाकर तथा कई अन्य तरीके से अपना विरोध एवं असंतोष प्रकट कर देता है।

प्रश्न 5. पशुओं की किस गुप्त शक्ति से मनुष्य वंचित है?
उत्तर- पशु अपने मन के भाव-विचार मूक भाषा में व्यक्त करते हैं जिससे अन्य पशु समझ जाते हैं। इस तरह वे दूसरे के मन की बातें बिना कहे जान-समझ लेते हैं। पशुओं की यह ऐसी गुप्त शक्ति है जिससे मनुष्य वंचित है।

प्रश्न 6. हीरा-मोती एक-दूसरे के प्रति प्रेम और मित्रता कैसे प्रकट करते थे?
उत्तर- हीरा और मोती एक-दूसरे को चाट-चूटकर और सँघकर अपना प्रेम प्रकट करते थे। वे अपनी दोस्ती प्रकट करने के लिए कभी-कभी सींग भी मिला लेते थे। उनके ऐसा करने में विग्रह का भाव नहीं बल्कि मनोविनोद और आत्मीयता का भाव रहता था।

प्रश्न 7. किन बातों से प्रकट होता है कि हीरा-मोती में भाई चारा था।
उत्तर- हीरा-मोती जब हल में जोते जाते थे तब उनकी यही चेष्टा रहती थी कि वे एक-दूसरे का भार अपने कंधे पर ले ले। वे दिन भर के काम के बाद दोपहर या संध्या में चाट-चूटकर अपनी थकान उतारते। वे एक साथ नाँदों में मुँह डालते और हटाते थे। इन बातों से हीरा-मोती का भाई चारा प्रकट होता है।

प्रश्न 8. बैलों को अपने साथ ले जाते हुए गया को क्या परेशानी हो रही थी ?
उत्तर- दोनों बैलों को अपने साथ ले जाते हुए गया को यह परेशानी हो रही थी कि बैल उसके साथ नहीं जाना चाहते थे। यदि वह बैलों को पीछे से हाँकता था तो दोनों बैल दाँए-बाएँ भागते थे और वह पगहे पकड़कर आगे को खींचता तो दोनों पीछे को ज़ोर लगाते।

प्रश्न 9. हीरा-मोती को वाणी की कमी क्यों अखर रही थी?
उत्तर- हीरा-मोती गया के साथ अनिच्छा से जा रहे थे। वे सोच रहे थे कि गया के हाथों उन्हें बेच दिया गया है। वे अपने मालिक झूरी से अपने बेचे जाने का कारण जानना चाहते थे। हीरा-मोती बैल ये जो मूक भाषा में बातें कर सकते थे पर झूरी समझता कैसे। अपनी बात कहने के लिए हीरा-मोती को वाणी की कमी अखर रही थी।

प्रश्न 10. हीरा-मोती की आँखों में विद्रोहमय स्नेह कब झलकता हुआ प्रतीत हुआ और क्यों?
उत्तर- झूरी ने हीरा-मोती को गया के घर काम करने भेजा था पर इन दोनों को वहाँ गाँव, घर तथा मनुष्य सब बेगाने जैसे लग रहे थे। उन्हें गया से भी स्नेह नहीं मिल रहा था। वे दोनों वहाँ से रात में ही भाग आए थे। उन्हें अपने बेचे जाने का भ्रम होने के कारण उनकी आँखों में विद्रोहमय स्नेह झलक रहा था।

प्रश्न 11. हीरा और मोती ने गया के घर स्वयं को अपमानित क्यों महसूस किया?
उत्तर- हीरा और मोती ने गया के घर स्वयं को इसलिए अपमानित महसूस किया क्योंकि गया ने अपने बैलों के चारे में चूनी-चोकर, खली आदि मिलाया परंतु हीरा मोती के सामने सूखा भूसा डाल दिया। इन बैलों के साथ झूरी ने ऐसा कभी नहीं किया था।

प्रश्न 12. गया और उसके घरवाले हीरा-मोती को नियंत्रण में करने के लिए क्या योजना बना रहे थे?
उत्तर- गया और उसके घरवालों का व्यवहार बैलों के प्रति अच्छा न था। वह बैलों को मारता-पीटता था तब भी बैलों पर उसका पूरा नियंत्रण नहीं था। इन्हें नियंत्रित करने के लिए वे बैलों की नाक में नाथ डालने की योजना बना रहे थे।

प्रश्न 13. बालिका ने बैलों को भागने में किस तरह मदद की?
उत्तर- बालिका प्रतिदिन की तरह दो रोटियाँ लेकर हीरा-मोती के पास आई और घरवालों की योजना बताते हुए उनके गले की रस्सी खोल दी। वह चिल्लाने लगी कि फूफा वाले दोनों बैल भागे जा रहे हैं ताकि कोई भी उसपर संदेह न करे। इस तरह उसने बैलों को भागने में मदद की।

प्रश्न 14. हीरा ने कब और कैसे सच्चे मित्र का फर्ज निभाया?
उत्तर- हीरा और मोती भूखे थे। सामने के खेत में हरी मटर नजर आई। अभी उन्होंने दो-चार ग्रास ही खाए थे कि रखवाले लाठी लिए आए। हीरा तो भाग सकता था पर सींचे खेत में खुर धंसने से मोती फँस गया। रखवालों ने उसे पकड़ लिया तो हीरा भागा नहीं। इस तरह उसने सच्चे मित्र का फर्ज निभाया।

प्रश्न 15. कांजीहौस में किन्हें बंद किया जाता है और उनके साथ कैसा व्यवहार किया जाता है?
उत्तर- कांजीहौस में आवारा और लावारिस पशुओं को बंद किया जाता है। वहाँ उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता है। उनकी हालत अत्यंत दयनीय हो जाती है। अधिकांश मरने की कगार पर पहुँच जाते हैं।

प्रश्न 16. दढ़ियल ने जब बैलों के कूल्हे में अँगुली से गोदा तो उन्होंने अपने अंतर्ज्ञान से क्या जान लिया?
उत्तर- नीलामी के लिए खड़े हीरा-मोती के कूल्हे में जब दढ़ियल ने अँगुली से गोदा तो दोनों ने अपने अंतर्ज्ञान से यह जान लिया कि दढ़ियल कसाई है। वह नीलामी में उन्हें खरीदकर उन पर छुरी चलाएगा।

प्रश्न 17. मोती के उस कार्य का वर्णन कीजिए जिसके बदले वह आशीर्वाद पाने की अपेक्षा कर रहा था?
उत्तर- कांजीहौस में बंदी हीरा-मोती ने देखा कि वहाँ गधे, घोड़े बकरियाँ, भैंसें आदि नौ-दस जानवर मुरदों-से ज़मीन पर पड़े हैं। मोती ने रात में बाड़े की दीवार गिरा दी जिससे ये जानवर भाग गए और उनकी जान बच गई। अपने इसी कार्य के बदले वह आशीर्वाद पाने की अपेक्षा कर रहा था।

प्रश्न 18. हीरा-मोती जब दढ़ियल के साथ जा रहे थे तो हार में चरते अन्य जानवरों को देखकर उनकी क्या प्रतिक्रिया हुई ?
उत्तर- दढ़ियल के साथ जाते हीरा-मोती ने जब खेत में प्रसन्नतापूर्वक चर रहे अन्य जानवरों को देखा तो उन्हें वे जानवर स्वार्थी लगे क्योंकि कसाई के हाथों में उन्हें देखकर भी वे चिंता नहीं कर रहे थे। वे अपनी उछल-कूद और खुशी में डूबे थे।

प्रश्न 19. झूरी के पास वापस आए बैलों को देखकर बच्चों ने अपनी खुशी किस तरह व्यक्त की?
उत्तर- झूरी के पास लौटे हीरा-मोती को देखकर बच्चों ने ताली बजाकर उनका स्वागत अभिनंदन किया। वे इन्हें वीरता का प्रशस्ति पत्र देना चाहते थे। बच्चे खुशी-खुशी में भागकर अपने घरों से चूनी, गुड़, चोकर आदि लोकर खिलाने लगे। वे बहुत खुश दिख रहे थे।

प्रश्न 20. दूसरी बार घर आए हीरा-मोती को देखकर मालकिन की प्रतिक्रिया पहली बार से किस तरह भिन्न थी?
उत्तर- हीरा-मोती जब पहली बार गया के घर से लौटकर आए थे तो मालकिन ने उन्हें नमकहराम कहा और उनकी खली-चूनी भूसी आदि बंद करवा दिया, पर दूसरी बार हीरा-मोती के घर आने पर मालकिन हर्षित हुई और बैलों के माथे चूम लिए थे।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. हीरा और मोती अपने मालिक झूरी के साथ किस तरह का भाव रखते थे?
उत्तर- हीरा और मोती अपने मालिक झूरी के साथ अत्यंत गहरा प्रेम एवं आत्मीय व्यवहार रखते थे। वे अपने मालिक से प्रेम करते हुए उसकी हर बात मानते थे। वे झूरी से अलग नहीं रहना चाहते थे। उनकी इच्छा थी उनका मालिक चाहे जितना काम करा ले पर वह उन्हें अपने से अलग न करे। झूरी ने जब गया के साथ उन्हें भेजा तो वे रस्सी पगहे तुड़ाकर गया के घर से भागकर आ गए। इस समय उनकी आँखों में विद्रोहमयी स्नेह झलक रहा था। हीरा-मोती को भागने का अवसर मिलने पर भी वे अंत में भागकर झूरी के पास आ जाते थे जो उनके असीम लगाव का प्रमाण था।

प्रश्न 2. “दो बैलों की कथा’ पाठ में लेखक ने ‘सीधेपन’ के संबंध में क्या कहा है? इसके लिए उसने क्या-क्या उदाहरण दिए हैं?
उत्तर- ‘दो बैलों की कथा’ पाठ में लेखक प्रेमचंद ने ‘सीधेपन’ को इस संसार के लिए उचित नहीं बताया है। इसके लिए उसने गधे और बैलों के सीधेपन का उदाहरण देते हुए दर्शाया है कि अपने सीधेपन के लिए गधा मूर्ख के अर्थ में रूढ़ बन गया है तथा बैल को ‘बछिया का ताऊ’ कहा जाने लगा है। इस पाठ में भी हीरा-मोती के सीधेपन के कारण उन पर अत्याचार किया जाता है परंतु उनके सींग चलाते या अत्याचार का विरोध करते ही उन पर किया जाने वाला अत्याचार कम हो जाता है। इसी तरह अपनी सहनशीलता के कारण भारतीय अफ्रीका और अमेरिका में सम्मान नहीं पाते जबकि जापान ने युद्ध में विजय पाते ही दुनियाभर में सम्मान प्राप्त किया।

प्रश्न 3. हीरा-मोती दो बार झूरी के घर से वापस आए। दोनों बार झूरी की पत्नी की प्रतिक्रिया अलग-अलग क्यों थी? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-

झूरी ने अपने बैलों हीरा और मोती को गया के घर काम के लिए भेजा। हीरा-मोती झूरी से बहुत लगाव रखते थे। वे झूरी को छोड़ कर गया के घर नहीं जाना चाहते थे। गया के साथ वे जैसे-तैसे चले गए पर बेगानापन महसूस होने के कारण वे रात में ही रस्सी पगहे तुड़ाकर चले आए। यह देख झूरी की पत्नी ने उन्हें नमक हराम कहा और उन्हें खली, चूनी-चोकर आदि देना बंद करके सूखा भूसा सामने डाल दिया। दूसरी बार हीरा-मोती कांजीहौस से नीलाम होकर किसी तरह घर पहुँचते हैं तो उनकी दशा देखकर झूरी की पत्नी के मन में उनके प्रति बदलाव आ जाता है। वह बैलों द्वारा सहे कष्ट का अनुमान लगा लिया और उनके माथे चूम लिया। ऐसी प्रतिक्रिया बैलों के द्वारा अपनी स्वतंत्रता के लिए किए गए संघर्ष के कारण थी।

प्रश्न 4. मोती ने बैलगाड़ी को खाई में गिरा देना चाहा पर हीरा ने सँभाल लिया। इस कथन के आलोक में हीरा की स्वाभाविक विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर- हीरा-मोती गया के साथ नहीं जाना चाहते थे, इसलिए गया उन दोनों को बैलगाड़ी में जोतकर ले जा रहा था। अपना विरोध जताने के लिए मोती बैलगाड़ी को खाई में गिरा देना चाहता था, पर हीरा ने रोक लिया। इससे उसकी इन विशेषताओं का पता चलता है-

  • धैर्यवान-हीरा-मोती की तुलना में अधिक धैर्यवान है। वह किसी समस्या का धैर्यपूर्वक सामना करता है।
  • सहनशील-गया ने जब हीरा की नाक पर डंडे बरसाए तो हीरा सहन कर गया। इसी घटना के लिए मोती ने जब गयों को मार गिराना चाहा तो हीरा ने कहा कि यह हमारी जाति का धर्म नहीं है।
  • अहिंसक विद्रोही-कांजीहौस में मार खाकर भी हीरा शांत नहीं होता। यद्यपि उसे मोटी रस्सियों में बाँध दिया जाता है फिर भी वह कहता है ‘ज़ोर तो मारता ही जाऊँगा चाहे कितने ही बंधन पड़ते जाएँ।’
  • सच्चा मित्र-हीरा मोती के साथ सच्ची मित्रता निभाता है। वह रखवालों के हाथ पड़े मोती को अकेला नहीं छोड़ता है।

प्रश्न 5. ‘मोती के स्वभाव में उग्रता है’–उदाहरण द्वारा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- मोती का स्वभाव उग्र है। वह अत्याचार एवं शोषण का विरोध करता है। वह अपने ऊपर ही नहीं हीरा पर भी अत्याचार देखकर क्रोधित हो उठता है और अत्याचार का सामना करने के लिए आक्रमण कर देता है। इसके एक नहीं अनेक उदाहरण हैं। गया जब हीरा की नाक पर डंडे बजाता है तो क्रोधित मोती हल जोत, जुआ लेकर भागता है। गया और उसके साथी जब उसे पकड़ने आते हैं तो वह कहता है-”मुझे मारेगा तो मैं भी एक दो गिरा दूंगा।” इसी तरह वह गया का अत्याचार देखकर एकाध को सींगों पर उठाकर फेंक देने की बात कहता है।

वह गिरे हुए शत्रु पर भी दया दिखाने का पक्षधर नहीं है। वह वेदम साँड को मार डालना चाहता है। उसका विचार है कि वैरी को ऐसा मारना चाहिए कि फिर न उठे। यह मोती के स्वभाव की उग्रता है कि दढ़ियल को सींग दिखाकर गाँव के बाहर इस तरह खदेड़ देता है कि वह लौटकर आने का साहस नहीं जुटा पाता है।

प्रश्न 6. ‘संगठन में शक्ति है’-हीरा-मोती ने इसका नमूना किस तरह प्रस्तुत किया?
उत्तर- यह सर्वविदित है कि संगठन में शक्ति होती है। इसका एक नमूना हीरा-मोती ने अपने से बलशाली साँड को पराजित करके प्रस्तुत किया। गया के घर से भागे हीरा-मोती के सामने रास्ते में विशालकाय, मदमस्त साँड आ गया। हीरा-मोती ने सोच-विचार के बाद अपने से बलशाली शत्रु का मुकाबला करने की योजना बनाई मल्ल युद्ध में माहिर साँड को संगठित शत्रुओं से लड़ने का अनुभव न था। हीरा-मोती ने संगठित होकर साँड से युद्ध किया। एक ने आगे से वार किया तो दूसरे ने पीछे से। साँड जब हीरा को मारने दौड़ता तो मोती उस पर सींग से वार कर देता। वह जब मोती पर वार करता तो हीरा उसके बगल में सींग घुसा देता। इससे साँड जख्मी होकर बेदम हो गया और गिर गया।

प्रश्न 7. हीरा-मोती स्वभाव से विद्रोही तो हैं पर उनके मन में दयाभाव भी है। इसका प्रमाण हमें कब और कहाँ मिलता है? ‘दो बैलों की कथा’ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- हीरा और मोती स्वभाव से विद्रोही हैं। इसी विद्रोह के कारण वे दूसरी बार भी गया के घर से भागते हैं और खेत के रखवालों द्वारा पकड़कर कांजीहौस में बंद कर दिए जाते हैं। कांजीहौस में हीरा-मोती ने देखा कि यहाँ भैसे, घोड़ियाँ, गधे बकरियाँ आदि पहले से बंद हैं। वे चारा न मिलने के कारण मुरदों जैसे जमीन पर पड़े हैं। इन्हें देखकर हीरा-मोती दयार्द्र हो जाते हैं। पहले हीरा ने बाड़े की दीवार गिराना शुरू किया परंतु चौकीदार ने देख लिया और उसे बंधन में डाल दिया। अब मोती ने उग्र रुख अपनाया और दो घंटे के परिश्रम के बाद बाड़ की आधी दीवार गिरा दी। अब उसने सींग मार-मारकर जानवरों को वहाँ से भगा दिया और उनकी जान बचाई। इस प्रकार हीरा-मोती एक ओर जहाँ विद्रोही हैं वहीं दूसरी ओर उनके मन में दयाभाव भी है।

कक्षा - 9 कबीर की साखियाँ व सबद

दिए गए पृष्ठों के आधार पर कबीरदास जी का कवि-परिचय और पाठ (साखियाँ एवं सबद) का परिचय संक्षेप में प्रस्तुत है:

1. कवि-परिचय: कबीरदास

  • जन्म एवं मृत्यु: कबीर का जन्म सन् 1398 में काशी में माना जाता है तथा सन् 1518 के आसपास मगहर में उनका देहांत हुआ।
  • शिक्षा व ज्ञान: कबीर ने कोई विधिवत (औपचारिक) शिक्षा प्राप्त नहीं की थी। उन्होंने सत्संग, पर्यटन (यात्राओं) तथा व्यावहारिक अनुभवों के माध्यम से ज्ञान प्राप्त किया था।
  • भक्तिधारा: वे भक्तिकालीन निर्गुण संत परंपरा के प्रमुख कवि थे।
  • प्रमुख रचनाएँ:
    • इनकी रचनाएँ मुख्य रूप से 'कबीर ग्रंथावली' में संगृहीत हैं।
    • कबीर पंथ में उनका संग्रह 'बीजक' ही प्रामाणिक माना जाता है।
    • कुछ रचनाएँ 'गुरु ग्रंथ साहब' में भी संकलित हैं।
  • व्यक्तित्व व विचारधारा:
    • कबीर अत्यंत उदार, निर्भय तथा सद्गृहस्थ संत थे।
    • वे 'राम' और 'रहीम' की एकता में विश्वास रखते थे तथा ईश्वर के नाम पर होने वाले पाखंड, भेदभाव और कर्मकांडों का खुलकर खंडन करते थे।
  • काव्यगत विशेषताएँ एवं भाषा:
    • उनके काव्य में ईश्वर-प्रेम, ज्ञान, वैराग्य, गुरुभक्ति, सत्संग, साधु-महिमा और आत्मबोध की अभिव्यक्ति हुई है।
    • उनकी भाषा जनभाषा (लोकभाषा) के अत्यंत निकट और सहज है, जिसमें गूढ़ दार्शनिक चिंतन को भी सरल ढंग से व्यक्त करने की अद्भुत क्षमता है।

2. पाठ-परिचय (साखियाँ एवं सबद)

पाठ में कबीरदास जी के दोहे (साखियाँ) और पद (सबद) संकलित हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य मनुष्य को बाह्य आडंबरों से मुक्त कर सच्ची भक्ति की ओर ले जाना है:

  • साखियाँ (दोहे): इसमें प्रेम का महत्त्व, सच्चे संत के लक्षण, ज्ञान की महिमा, निष्पक्ष भक्ति तथा धार्मिक संकीर्णताओं से ऊपर उठने के भावों का उल्लेख हुआ है।
  • पहला सबद (पद): इसमें बाह्याडंबरों (पूजा-पाठ, काबा-कासी भ्रमण आदि) का विरोध करते हुए यह संदेश दिया गया है कि ईश्वर किसी मंदिर या मस्जिद में नहीं, बल्कि हर प्राणी की साँसों में (उसके भीतर ही) व्याप्त है।
  • दूसरा सबद (पद): इसमें ज्ञान की आँधी का रूपक बाँधकर ज्ञान के महत्त्व का वर्णन किया गया है। जब मनुष्य को सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है, तो उसके मन से अज्ञानता, भ्रम और मोह-माया समाप्त हो जाते हैं तथा वह अपनी दुर्बलताओं से मुक्त हो जाता है।

कबीरदास जी द्वारा रचित 'साखियाँ' (कक्षा 9, NCERT) के प्रत्येक दोहे का कठिन शब्दार्थ एवं सरल भावार्थ प्रस्तुत है:

1.

मानसरोवर सुभर जल, हंसा केलि कराहीं। मुकताफल मुकता चुगैं, अब उड़ि अनत न जाहिं॥1॥

  • कठिन शब्दार्थ:
    • मानसरोवर: हिमालय स्थित पवित्र झील / मन रूपी पवित्र सरोवर
    • सुभर: अच्छी तरह भरा हुआ (स्वच्छ जल)
    • केलि: क्रीड़ा, खेल
    • कराहीं: करते हैं
    • मुकताफल: मोती
    • मुकता: मुक्त होकर / स्वतंत्र
    • अनत: अन्यत्र (दूसरी जगह)
    • नाहिं: नहीं
  • सरल व्याख्या: मानसरोवर के स्वच्छ जल में हंस क्रीड़ा (क्रीड़ा/खेल) कर रहे हैं। वे वहाँ स्वच्छंद होकर आनंद से मोती चुग रहे हैं और अब इस सुख को छोड़कर कहीं और जाना नहीं चाहते। भावार्थ: जीवात्मा (हंस) जब ईश्वर भक्ति और भक्ति-रूपी मन (मानसरोवर) में लीन हो जाती है, तो उसे परम आनंद रूपी मोती प्राप्त हो जाते हैं। फिर उसका मन इस सांसारिक मोह-माया के चक्र में कहीं और भटकना नहीं चाहता।

2.

प्रेमी ढूँढ़त मैं फिरौं, प्रेमी मिले न कोई। प्रेमी कौं प्रेमी मिलै, सब विष अमृत होइ॥2॥

  • कठिन शब्दार्थ:
    • प्रेमी: ईश्वर का भक्त / सच्चा प्रेमी
    • फिरौं: घूमता हूँ / भटकता हूँ
    • कौं: को
    • विष: ज़हर / पाप, वासनाएँ व बुराइयाँ
    • अमृत: भक्ति का आनंद / अच्छाई
  • सरल व्याख्या: कबीर दास जी कहते हैं कि मैं संसार में किसी सच्चे ईश्वर-प्रेमी (सच्चे भक्त) को ढूँढ़ता फिर रहा था, लेकिन मुझे कोई सच्चा प्रेमी नहीं मिला। जब एक सच्चे प्रेमी को दूसरा सच्चा ईश्वर-प्रेमी मिल जाता है, तो मन की सारी विष-रूपी बुराइयाँ, दुर्भावनाएँ और पाप, अमृत रूपी अच्छाइयों और आनंद में बदल जाते हैं।

3.

हस्ती चढ़िए ज्ञान कौ, सहज दुलीचा डारि। स्वान रूप संसार है, भूँकन दे झख मारि॥3॥

  • कठिन शब्दार्थ:
    • हस्ती: हाथी
    • सहज: स्वाभाविक / साधना या ध्यान
    • दुलीचा: छोटा कालीन या आसन
    • डारि: डालकर
    • स्वान: कुत्ता
    • भूँकन दे: भौंकने दो
    • झख मारि: अपना समय व्यर्थ नष्ट करना / मजबूर होना
  • सरल व्याख्या: कबीर जी साधकों को उपदेश देते हैं कि तुम ज्ञान रूपी हाथी पर सहज साधना (ध्यान) रूपी दुलीचा (आसन) बिछाकर निश्चिंत होकर चढ़ो। यह संसार कुत्ते के समान है, जो व्यर्थ ही भौंकता रहता है। लोगों की निंदा और आलोचना की परवाह किए बिना अपनी भक्ति मार्ग पर बढ़ते रहो, वे स्वयं ही थककर चुप हो जाएँगे।

4.

पखापखी के कारनै, सब जग रहा भुलान। निरपख होइ के हरि भजै, सोई संत सुजान॥4॥

  • कठिन शब्दार्थ:
    • पखापखी: पक्ष-विपक्ष / तर्क-वितर्क
    • कारनै: कारण
    • भुलान: भूला हुआ है / भ्रमित है
    • निरपख: निष्पक्ष
    • भजै: भजन करता है / स्मरण करता है
    • सोई: वही
    • सुजान: चतुर / ज्ञानी व्यक्ति
  • सरल व्याख्या: आज सारा संसार पक्ष-विपक्ष (मेरा धर्म सही, तेरा गलत; तर्क-वितर्क) के चक्कर में पड़कर अपने वास्तविक लक्ष्य ईश्वर को भूल गया है। कबीर जी कहते हैं कि जो व्यक्ति इन निष्फल भेद-भावों से ऊपर उठकर 'निष्पक्ष' होकर ईश्वर का भजन-स्मरण करता है, वही वास्तव में सच्चा और ज्ञानी संत है।

5.

हिंदू मूआ राम कहि, मुसलमान खुदाइ। कहै कबीर सो जीवता, जो दुहुँ के निकटि न जाइ॥5॥

  • कठिन शब्दार्थ:
    • मूआ: मर गया / नष्ट हो गया
    • खुदाइ: खुदा / अल्लाह
    • जीवता: जीवित है (सच्चा जीवन जीता है)
    • दुहुँ: दोनों (राम और खुदा के नाम पर किए जाने वाले भेदभाव)
    • निकटि: पास
  • सरल व्याख्या: हिंदू 'राम-राम' कहते हुए और मुसलमान 'खुदा-खुदा' चिल्लाते हुए आपस में लड़-लड़कर नष्ट हो गए, परंतु ईश्वर के सच्चे स्वरूप को न पा सके। कबीर कहते हैं कि वास्तव में वही मनुष्य जीवित है (जिसने जीवन का सच्चा अर्थ समझा है), जो इन दोनों के द्वारा फैलाए गए धार्मिक संकीर्णताओं और भेदभाव से दूर रहता है। ईश्वर तो एक ही है।

6.

काबा फिरि कासी भया, रामहिं भया रहीम। मोट चून मैदा भया, बैठि कबीरा जीम॥6॥

  • कठिन शब्दार्थ:
    • काबा: मुसलमानों का पवित्र तीर्थस्थल
    • कासी: काशी (हिंदुओं का पवित्र तीर्थस्थल)
    • भया: हो गया
    • मोट चून: मोटा आटा (अज्ञानता या संकीर्णता का प्रतीक)
    • मैदा: बारीक आटा (सच्चे ज्ञान व एकता का प्रतीक)
    • जीम: भोजन करना / आनंद लेना
  • सरल व्याख्या: जब मन से धार्मिक भेदभाव और संकीर्णता समाप्त हो जाती है, तो मुसलमानों का पवित्र 'काबा' ही हिंदुओं की 'काशी' बन जाता है और 'राम' ही 'रहीम' बन जाते हैं। जिस प्रकार मोटे आटे को पीस देने पर वह बारीक मैदा बन जाता है और खाने योग्य हो जाता है, उसी प्रकार भेद-भाव समाप्त होने पर अज्ञानता दूर हो जाती है और कबीर निश्चिंत होकर उस प्रभु-भक्ति के आनंद का उपभोग करते हैं।

7.

ऊँचे कुल का जनमिया, जे करनी ऊँच न होइ। सुबरन कलस सुरा भरा, साधू निंदा सोइ॥7॥

  • कठिन शब्दार्थ:
    • कुल: वंश / खानदान
    • जनमिया: जन्म लेने वाला
    • करनी: कर्म / काम
    • सुबरन: सोने का (स्वर्ण)
    • कलस: घड़ा / कलश
    • सुरा: मदिरा / शराब
    • सोइ: उसकी
  • सरल व्याख्या: केवल ऊँचे कुल (खानदान) में जन्म लेने से कोई व्यक्ति महान नहीं बन जाता, यदि उसके कर्म ऊँचे या श्रेष्ठ न हों। ठीक उसी प्रकार, जैसे यदि सोने के कलश (घड़े) में शराब भरी हो, तो भी सज्जन (साधु) पुरुष उसकी निंदा ही करते हैं। मनुष्य अपने कर्मों से महान बनता है, अपने जन्म या कुल से नहीं।

पाठ- 1 सूरदास के पद (व्याख्या+प्रश्न-उत्तर)

                          
                             कवि-परिचय (सूरदास)

सूरदास भक्तिकाल की सगुण धारा के कृष्ण-भक्त कवियों में सर्वोपरि माने जाते हैं। उनका जन्म सन् 1478 में हुआ माना जाता है। जन्मस्थान के विषय में दो प्रमुख मान्यताएँ हैं—पहली मान्यता के अनुसार इनका जन्म मथुरा के निकट रुनकता (या रेणुका क्षेत्र) में हुआ था, जबकि दूसरी मान्यता के अनुसार इनका जन्म स्थान दिल्ली के समीप 'सीही' नामक गाँव माना जाता है।

उन्होंने कृष्ण को अपना आराध्य मानकर उनकी बाल-लीलाओं, रूप-सौंदर्य, संयोग-वियोग तथा श्रृंगार का सुंदर चित्रण किया है। वे पुष्टिमार्गीय अष्टछाप के श्रेष्ठ कवियों में गिने जाते हैं। वे मथुरा और वृंदावन के बीच गऊघाट पर स्थित श्रीनाथ जी के मंदिर में रहकर भजन-कीर्तन किया करते थे। सूरदास जी वल्लभाचार्य के प्रमुख शिष्यों में से एक थे। उनका महाप्रयाण (देहांत) सन् 1583 में पारसौली नामक स्थान पर हुआ।

प्रमुख रचनाएँ:

 1.  'सूरसागर' (इनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना)

2.  'साहित्य लहरी'

3.  'सूरसारावली'

भाषा-शैली

सूरदास जी की काव्य-भाषा मुख्यतः ब्रजभाषा है। उन्होंने अपनी कविताओं में ब्रजभाषा के परिमार्जित, मधुर और निखरे हुए रूप का प्रयोग किया है।

 काव्य रूप: इनके पदों में कोमलकांत शब्दावली, सरल पद-विन्यास और संगीतात्मकता (गेयता) का गुण विद्यमान है।

रस विधान: सूरदास जी वात्सल्य, श्रृंगार तथा भक्ति रस के अद्वितीय कवि माने जाते हैं। हिंदी साहित्य में उनका वात्सल्य वर्णन अनुपम माना गया है।

अलंकार योजना: इनके काव्य में रसों के साथ-साथ उपमा, रूपक और उत्प्रेक्षा आदि अलंकृत प्रयोग भाषा को सहज और विशिष्ट सौंदर्य प्रदान करते हैं।

भाव पक्ष: इनकी रचनाएँ मन की सूक्ष्म एवं तरङ्गित भाव-अनुभूतियों का सजीव, मनमोहक और अनूठा चित्र प्रस्तुत करती हैं।

पाठ-परिचय ('सूरदास के पद')

प्रस्तुत चारों पद सूरदास जी के प्रसिद्ध महाकाव्य 'सूरसागर' के 'भ्रमरगीत' प्रसंग से लिए गए हैं। इन पदों में उद्धव और गोपियों के बीच हुए संवाद को दर्शाया गया है।

जब श्रीकृष्ण मथुरा चले जाते हैं, तो वे स्वयं न लौटकर उद्धव के माध्यम से गोपियों के पास निर्गुण ब्रह्म और योग का संदेश भेजते हैं। गोपियाँ ज्ञानी उद्धव के शुष्क संदेश की जगह साकार प्रेम-मार्ग पर चलना पसंद करती हैं। उसी समय वहाँ एक भौंरा (भ्रमर) आ जाता है, जिसे माध्यम बनाकर गोपियाँ उद्धव पर तीखे व्यंग्य (उपालंभ) करती हैं।

पदों का मुख्य सार:

 प्रथम पद: गोपियाँ उद्धव की निष्ठुरता पर व्यंग्य करते हुए उन्हें भाग्यशाली कहती हैं। वे तंज कसती हैं कि उद्धव कृष्ण के निकट रहकर भी प्रेम के बंधन से अछूते रहे। गोपियाँ अपने अनन्य प्रेम की तुलना गुड़ से चिपटी चींटियों से करती हैं।

द्वितीय पद: गोपियाँ अपनी विरह-व्यथा प्रकट करते हुए कहती हैं कि उनके मन की अभिलाषाएँ मन में ही दबकर रह गईं। कृष्ण के लौटने का इंतज़ार करते-करते अब उनका दुख और बढ़ गया है।

तृतीय पद: गोपियाँ उद्धव के योग-संदेश को कड़वी ककड़ी के समान अरुचिकर बताती हैं। वे कहती हैं कि उनका मन तो श्रीकृष्ण के प्रेम में एकनिष्ठ रूप से स्थिर है, इसलिए योग-साधना की आवश्यकता केवल उन लोगों को है जिनका मन चंचल है।

चतुर्थ पद: गोपियाँ व्यंग्य कसते हुए कहती हैं कि कृष्ण ने अब राजनीति की शिक्षा प्राप्त कर ली है। एक राजा का कर्तव्य अपनी प्रजा की रक्षा करना और न्याय करना होता है, किंतु कृष्ण योग का संदेश भेजकर प्रजा पर अत्याचार कर रहे हैं, जो राजधर्म के सर्वथा विरुद्ध है।

1

 ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी।

 अपररस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी॥

 पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी।

 ज्यों जल माहँ तेल की गागरि, बूँद न ताकौं लागी॥

 प्रीति-नदी में पाउँ न बोर्यो, दृष्टि न रूप परागी।

 'सूरदास' अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी॥

कठिन शब्दार्थ: बड़भागी = अत्यधिक भाग्यशाली (व्यंग्य में अभाग),  अपररस / अपरस = अनछुआ, नीरस या अलिप्त,  सनेह तगा = प्रेम रूपी धागा,  अनुरागी = प्रेम में डूबा हुआ / प्रेमी,  पुरइनि पात = कमल का पत्ता,  दागी = दाग या धब्बा,  माहँ = में / अंदर,  गागरि = गागर, मटकी,  ताकौं = उसको / उस पर,  बोर्यो = डुबोया, परागी = मुग्ध होना / मोहित होना, भोरी = भोली-भाली, गुर = गुड़,  पागी = लिपटी हुई

सरल भावार्थ:

गोपियाँ उद्धव की प्रेम-हीनता पर व्यंग्य कसते हुए कहती हैं कि हे उद्धव! आप सचमुच बहुत भाग्यशाली हैं जो इतने समय तक श्रीकृष्ण के साथ रहने के बावजूद उनके प्रेम के धागे में नहीं बँधे और न ही आपका मन कभी उनके प्रति आकर्षित हुआ। आपकी स्थिति जल में रहने वाले कमल के पत्ते जैसी है, जो पानी के भीतर रहकर भी अपने ऊपर पानी का एक धब्बा तक नहीं लगने देता। आप तो तेल से भरी उस मटकी के समान हैं, जिसे पानी में डुबोने पर भी जल की एक बूँद उस पर नहीं ठहरती।

गोपियाँ आगे कहती हैं कि आपने तो श्रीकृष्ण की प्रेम रूपी नदी में कभी अपना पैर तक नहीं डुबोया और न ही आपकी दृष्टि कभी उनके मनमोहक रूप पर मुग्ध हुई। आप तो पूरी तरह इस प्रेम-रस से अनछुए रहे। लेकिन हम गोपियाँ तो अत्यंत सीधी-साधी और अबला हैं; हमारा प्रेम श्रीकृष्ण के प्रति वैसा ही गाढ़ा है जैसे गुड़ से चींटियाँ लिपटी रहती हैं, जो एक बार चिपक जाने के बाद अलग नहीं हो पातीं और वहीं अपने प्राण दे देती हैं।

2

मन की मन ही माँझ रही।

कहिए जाइ कौन पै ऊधौ, नाहीं परत कही।

अवधि अधार आस आवन की, तन मन बिथा सही।

अब इन जोग सँदेसनि सुनि-सुनि, बिरहिनि बिरह दही।

चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तैं, उत तैं धार बही।

'सूरदास' अब धीर धरहिं क्यों, मरजादा न लही॥

कठिन शब्दार्थ: माँझ = अंदर या मध्य में, कौन पै = किसके पास, नाहीं परत कही = कहते नहीं बनती, अवधि = समय की सीमा, अधार = आधार या सहारा, आस = आशा, आवन की = आने की, बिथा = व्यथा या दुःख, जोग = योग, बिरहिनि = विरह में जीने वाली, दही = जल रही है, हुतीं = थीं, गुहारि = रक्षा के लिए पुकारना, जितहिं तैं = जहाँ से, उत तैं = वहाँ से, धीर = धैर्य, धरहिं = धारण करें, मरजादा = मर्यादा, लही = रखी या धारण की

सरल भावार्थ: गोपियाँ अपने मन की पीड़ा को व्यक्त करते हुए उद्धव से कहती हैं कि हमारे मन की अभिलाषाएँ और बातें मन के अंदर ही दबकर रह गईं। हे उद्धव! अब आप ही बताइए कि हम अपनी यह विरह-व्यथा किसे जाकर सुनाएँ, क्योंकि यह किसी अन्य से कहते भी नहीं बनती। अब तक तो श्रीकृष्ण के वापस लौटने की एक निश्चित समय-सीमा की उम्मीद ही हमारे जीने का सहारा थी, जिसके बल पर हम अपने शरीर और मन के इस दुःख को सहन कर रही थीं।

लेकिन अब आपके द्वारा दिए गए इस योग के संदेशों को सुन-सुनकर हमारी विरह की अग्नि और अधिक भड़क उठी है। हम जिस ओर से रक्षा के लिए पुकार लगाना चाहती थीं, वहीं से योग-साधना की यह धारा बहने लगी है। सूरदास जी कहते हैं कि गोपियाँ दुःखी होकर कह रही हैं कि अब हम किस प्रकार धैर्य रखें, जब श्रीकृष्ण ने ही प्रेम की मर्यादा का पालन नहीं किया है।

3

हमारे हरि हारिल की लकरी।

मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।

जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जक री।

सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी।

सु तौ व्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी।

यह तौ 'सूर' तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चक्री॥

कठिन शब्दार्थ: हारिल = एक ऐसा पक्षी जो हमेशा अपने पंजों में लकड़ी या तिनका पकड़े रहता है, लकरी = लकड़ी, क्रम = कर्म, नंद-नंदन = नंद जी के पुत्र (श्रीकृष्ण), उर = हृदय, दृढ़ करि = मजबूती से / कसकर, पकरी = पकड़ रखी है, दिवस-निसि = दिन और रात, कान्ह-कान्ह = कृष्ण-कृष्ण, जक री = रट लगा रखी है, करुई = कड़वी, ककरी = ककड़ी, व्याधि = बीमारी या रोग, तिनहिं = उन्हें या उनको, सौंपौ = दे दो या सौंप दो, मन चक्री = जिनका मन चकरी के समान चंचल या अस्थिर हो

सरल भावार्थ: गोपियाँ अपने अनन्य प्रेम का वर्णन करते हुए उद्धव से कहती हैं कि हमारे लिए श्रीकृष्ण तो हारिल पक्षी की उस लकड़ी के समान बन गए हैं, जिसे वह पक्षी कभी अपने पंजों से छूटने नहीं देता। हमने भी मन, कर्म और वचन से नंद जी के पुत्र श्रीकृष्ण को अपने हृदय में पूरी मजबूती के साथ धारण कर लिया है। अब तो जागते हुए, सोते हुए, सपने में, दिन हो या रात—हमारा मन निरंतर 'कृष्ण-कृष्ण' की ही धुन लगाए रहता है।

गोपियाँ आगे कहती हैं कि आपके मुँह से योग और साधना की बातें सुनते ही हमें ऐसा लगता है मानो हमने कोई कड़वी ककड़ी खा ली हो, जो अत्यंत ही अरुचिकर है। आप हमारे लिए योग के रूप में ऐसी बीमारी या मुसीबत ले आए हैं, जिसके बारे में न तो हमने कभी पहले सुना था, न देखा था और न कभी ऐसा अनुभव किया था। सूरदास जी कहते हैं कि गोपियों ने उद्धव से स्पष्ट कह दिया कि यह योग रूपी बीमारी आप उन लोगों को जाकर सौंप दीजिए, जिनके मन चकरी की तरह हमेशा चंचल और अस्थिर रहते हैं। हमारा मन तो श्रीकृष्ण के प्रेम में पूरी तरह से स्थिर हो चुका है।

4

हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।

समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए।

इक अति चतुर हुते पहिलेँ ही, अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए।

बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-सँदेस पठाए।

ऊधौ भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए।

अब अपनै मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए।

ते क्यों अनीति करें आपुन, जे और अनीति छुड़ाए।

राज धरम तौ यहै 'सूर', जो प्रजा न जाहिं सताए॥

कठिन शब्दार्थ: पढ़ि आए = सीख आए हैं, मधुकर = भौंरा (यहाँ उद्धव के लिए प्रयुक्त), पठाए = भिजवाए, हुते = थे, पहिलेँ ही = पहले से ही, ग्रंथ = ग्रंथ, पुस्तक या राजनीतिशास्त्र, पर हित = दूसरों की भलाई के लिए, डोलत धाए = घूमते फिरते थे, फेर पाइहैं = फिर से वापस पा लेंगी, हुते चुराए = चुराकर ले गए थे, आपुन = स्वयं, अनीति = अन्याय, जाहिं सताए = सताया जाए

सरल भावार्थ: श्रीकृष्ण द्वारा भेजे गए योग-संदेश को सुनकर गोपियाँ आपस में और उद्धव से कहती हैं कि श्रीकृष्ण ने अब पूरी तरह से राजनीति सीख ली है। उद्धव जी (भौंरे) के बातें शुरू करते ही हम सब समझ गई थीं और हमें वहाँ के सारे समाचार मिल गए थे। श्रीकृष्ण तो पहले से ही अत्यंत चतुर और चालाक थे, और अब तो उन्होंने राजनीति के बड़े-बड़े ग्रंथ भी पढ़ लिए हैं। उनकी बुद्धि अब कितनी बढ़ गई है, इसका अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे हम जैसी बिरहिनों के लिए योग का संदेश भेज रहे हैं।

गोपियाँ आगे कहती हैं कि हे उद्धव! पहले ज़माने के सज्जन लोग तो दूसरों की भलाई के लिए इधर-उधर दौड़ते फिरते थे, लेकिन आज के लोग दूसरों को दुःख पहुँचाने के लिए यहाँ तक चले आए हैं। हम तो बस इतना ही चाहती हैं कि श्रीकृष्ण मथुरा जाते समय हमारा जो मन चुपचाप चुराकर ले गए थे, वह मन हमें वापस मिल जाए। समझ नहीं आता कि जो श्रीकृष्ण दूसरों को अन्याय और अत्याचार से बचाते थे, वे स्वयं हमारे साथ ऐसा अन्याय क्यों कर रहे हैं? सूरदास जी कहते हैं कि गोपियों के अनुसार सच्चा राजधर्म तो वही है, जिसके अंतर्गत राजा अपनी प्रजा को कभी सताए नहीं और उसकी रक्षा करे; परंतु श्रीकृष्ण योग-संदेश भेजकर राजधर्म के विपरीत आचरण कर रहे हैं।

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1. गोपियों द्वारा उद्धव को भाग्यवान कहने में क्या व्यंग्य निहित है?

उत्तर: गोपियों द्वारा उद्धव को भाग्यवान (बड़भागी) कहना वास्तव में एक करारा व्यंग्य है। ऊपर से तो वे उद्धव की प्रशंसा करती दिखती हैं, पर असल में वे उन्हें अत्यंत अभागा सिद्ध करना चाहती हैं। गोपियों का आशय यह है कि श्रीकृष्ण के सर्वदा समीप रहकर भी उद्धव उनके असाधारण प्रेम और सौंदर्य से पूरी तरह अछूते रहे। जो व्यक्ति प्रेम की आनंदमयी अनुभूति से वंचित रह जाए, उससे अधिक दुर्भाग्यशाली भला कौन हो सकता है।

प्रश्न 2. उद्धव के व्यवहार की तुलना किस-किस से की गई है?

उत्तर: गोपियों ने उद्धव के विरक्त एवं नीरस व्यवहार की तुलना दो प्रमुख वस्तुओं से की है:

 * कमल के पत्ते से: जिस प्रकार कमल का पत्ता सदैव जल के भीतर रहता है, फिर भी पानी की एक बूँद उस पर नहीं टिकती।

 * तेल से भरी मटकी से: जिस प्रकार तेल चुपड़ी हुई गागर को पानी में डुबोने पर भी जल की बूँदें उस पर नहीं ठहर पातीं।

इसी प्रकार उद्धव भी कृष्ण रूपी प्रेम-सागर के पास रहते हुए भी उनके प्रेम-रस से अनछुए रहे।

प्रश्न 3. गोपियों ने किन-किन उदाहरणों के माध्यम से उद्धव को उलाहने दिए हैं?

उत्तर: गोपियों ने विभिन्न तर्कों एवं उपालंभों के माध्यम से उद्धव को उलाहने दिए हैं:

 * वे कहती हैं कि उनके मन की प्रेम-भावनाएँ मन में ही दबकर रह गईं, वे कृष्ण के सामने प्रकट ही नहीं हो सकीं।

 * वे कृष्ण के लौटने का इंतज़ार कर रही थीं, लेकिन उन्होंने स्वयं न आकर उद्धव के हाथ योग का शुष्क संदेश भिजवा दिया, जिससे उनकी विरह-व्यथा और बढ़ गई।

 * गोपियाँ कृष्ण से अपने दुःख निवारण की उम्मीद कर रही थीं, लेकिन वहीं से योग रूपी उल्टी धारा बहने लगी।

 * उन्होंने उलाहना दिया कि कृष्ण ने प्रेम की मर्यादा का उल्लंघन किया है, जबकि गोपियों ने उनके लिए सर्वस्व त्याग दिया था।

प्रश्न 4. उद्धव द्वारा दिए गए योग के संदेश ने गोपियों की विरहाग्नि में घी का काम कैसे किया?

उत्तर: गोपियाँ इस उम्मीद में श्रीकृष्ण के आने की प्रतीक्षा कर रही थीं कि जब वे वापस लौटेंगे तो उनके दर्शन से विरह की सारी पीड़ा मिट जाएगी। इसी आशा के सहारे वे अपने तन और मन के दुःख को सह रही थीं। परंतु जब कृष्ण ने स्वयं न आकर उद्धव के ज़रिए निर्गुण योग और साधना का संदेश भिजवाया, तो उनकी बची-खुची उम्मीदें भी टूट गईं। योग-साधना का यह अरुचिकर संदेश गोपियों के जलते हुए विरह-हृदय में घी की आहुति साबित हुआ और उनकी विरह-ज्वाला और अधिक भड़क उठी।

प्रश्न 5. 'मरजादा न लही' के माध्यम से कौन सी मर्यादा न रहने की बात की जा रही है?

उत्तर: 'मरजादा न लही' के माध्यम से प्रेम की मर्यादा के टूटने की बात कही गई है। प्रेम का यह शाश्वत नियम है कि प्रेम के बदले प्रेम दिया जाए और दोनों पक्ष परस्पर निष्ठा का पालन करें। गोपियों ने अपने लोक-लाज की परवाह किए बिना केवल श्रीकृष्ण से एकनिष्ठ प्रेम किया। परंतु इसके बदले में कृष्ण ने उन्हें प्रेम देने के बजाय योग का संदेश भेजकर छलावा किया। कृष्ण के इसी आचरण को गोपियों ने प्रेम-मर्यादा का उल्लंघन माना है।

प्रश्न 6. कृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम को गोपियों ने किस प्रकार अभिव्यक्त किया है?

उत्तर: गोपियों ने अपने अनन्य और निष्ठावान प्रेम को निम्नलिखित रूपों में प्रकट किया है:

 * वे स्वयं की तुलना गुड़ से लिपटी हुई उन चींटियों से करती हैं जो जीते-जी उससे अलग नहीं हो सकतीं।

 * वे कृष्ण को हारिल पक्षी की लकड़ी मानती हैं, जिसे वे हर समय अपने पंजों से कसकर पकड़े रहती हैं।

 * उन्होंने मन, वचन और कर्म से कृष्ण की छवि को अपने हृदय में दृढ़ता से बसा रखा है।

 * सोते-जागते, सपने में, दिन-रात उनका मन केवल 'कान्ह-कान्ह' की ही रट लगाता रहता है।

 * वे योग के उपदेश को कड़वी ककड़ी के समान मानकर पूरी तरह से अस्वीकार कर देती हैं।

प्रश्न 7. गोपियों ने उद्धव से योग की शिक्षा कैसे लोगों को देने की बात कही है?

उत्तर: गोपियों के अनुसार योग-साधना की आवश्यकता केवल उन लोगों को होती है जिनका मन चंचल, दुविधाग्रस्त और अस्थिर (चकरी के समान) होता है। जिनका मन एक जगह नहीं ठहरता और भटकाव में रहता है, योग उनके मन को एकाग्र करने का काम करता है। गोपियाँ कहती हैं कि हमारा मन तो पहले से ही श्रीकृष्ण के अनन्य प्रेम में पूरी तरह स्थिर और एकाग्र है, इसलिए हमारे लिए यह योग-शिक्षा व्यर्थ है।

प्रश्न 8. प्रस्तुत पदों के आधार पर गोपियों का योग-साधना के प्रति दृष्टिकोण स्पष्ट करें।

उत्तर: सूरदास के पदों के आधार पर गोपियों का योग-साधना के प्रति दृष्टिकोण अत्यंत उपेक्षापूर्ण और नकारात्मक है:

 * वे योग-साधना को नीरस, निरर्थक और कड़वी ककड़ी के समान अखाद्य एवं अरुचिकर मानती हैं।

 * वे इसे एक ऐसी अज्ञात बीमारी (व्याधि) की संज्ञा देती हैं, जिसके बारे में उन्होंने न कभी पहले सुना था और न अनुभव किया था।

 * गोपियों का मानना है कि जो हृदय साकार प्रेम-रस से लबालब भरा हो, उसमें निर्गुण योग के लिए कोई स्थान नहीं है। वे कृष्ण द्वारा भेजे गए योग-उपदेश को अपनी मति पर कुठाराघात और अन्याय समझती हैं।

प्रश्न 9. गोपियों के अनुसार राजा का धर्म क्या होना चाहिए?

उत्तर: गोपियों के अनुसार एक राजा का परम धर्म अपनी प्रजा के कल्याण की रक्षा करना है। राजा को चाहिए कि वह अपनी प्रजा को किसी भी प्रकार के अत्याचार और अन्याय से बचाए, उनके दुखों को दूर करे और उन्हें कभी किसी भांति न सताए।

प्रश्न 10. गोपियों को कृष्ण में ऐसे कौन-से परिवर्तन दिखाई दिए जिनके कारण वे अपना मन वापस पा लेने की बात कहती हैं?

उत्तर: गोपियों को लगा कि मथुरा जाने के बाद श्रीकृष्ण के स्वभाव और सोच में भारी बदलाव आ गया है:

 * वे अब निष्छल प्रेमी न रहकर कूटनीतिज्ञ और चतुर राजनीतिज्ञ बन गए हैं।

 * वे स्वयं मिलने आने के स्थान पर उद्धव के हाथों योग का संदेश भिजवाकर छल-कपट का सहारा ले रहे हैं।

 * उन्होंने प्रेम की सादगी को भूलकर राजनीति के ग्रंथों का अध्ययन कर लिया है।

कृष्ण में आए इन्हीं परिवर्तनों और कपटपूर्ण व्यवहार को देखकर गोपियाँ कहती हैं कि मथुरा जाते समय कृष्ण जो मन चुराकर ले गए थे, वे अब उसे वापस प्राप्त करना चाहती हैं।

प्रश्न 11. गोपियों ने अपने वाक्-चातुर्य के आधार पर ज्ञानी उद्धव को परास्त कर दिया, उनके वाक्-चातुर्य की विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर: गोपियों का वाक्-चातुर्य (बोलने की कला) अद्वितीय है। ज्ञानी उद्धव भी उनके तर्कों के सामने निरुत्तर हो जाते हैं। उनके वाक्-चातुर्य की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

 * तीखा व्यंग्य व कटाक्ष: वे उद्धव को 'बड़भागी' कहकर और कृष्ण को 'राजनीतिज्ञ' बताकर गहरा व्यंग्य करती हैं।

 * सटीक एवं व्यावहारिक तर्क: वे कमल के पत्ते, तेल की गागर, कड़वी ककड़ी और हारिल पक्षी जैसे व्यावहारिक उदाहरण देकर उद्धव के योग-ज्ञान को एक ही पल में निरस्त कर देती हैं।

 * स्पष्टता एवं निडरता: वे बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी बात रखती हैं तथा कृष्ण के अन्यायी आचरण पर भी सीधे प्रश्न उठाती हैं।

 * भावुकता और प्रेम की दृढता: उनके संवाद में छल-कपट नहीं बल्कि सहज प्रेम की ऐसी शक्ति है, जिसके सामने उद्धव का सूखा ज्ञान पराजित हो जाता है।

प्रश्न 12. संकलित पदों को ध्यान में रखते हुए सूर के भ्रमरगीत की मुख्य विशेषताएँ बताइए।

उत्तर: सूरदास रचित 'भ्रमरगीत' हिंदी साहित्य की एक अमूल्य धरोहर है। संकलित पदों के आधार पर इसकी प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:

 * सगुण भक्ति का प्रतिपादन: इसमें निर्गुण ब्रह्म और योग-मार्ग का खंडन करते हुए साकार (सगुण) प्रेम-भक्ति को सर्वोपरि सिद्ध किया गया है।

 * वियोग श्रृंगार का मार्मिक वर्णन: इसमें गोपियों की विरह-व्यथा, तड़प और मानसिक स्थिति का अत्यंत संवेदनशील एवं सुंदर सजीव चित्रण है।

 * उपालंभ और व्यंग्य प्रधानता: भ्रमर (भौंरे) को माध्यम बनाकर दिए गए उपालंभ (उलाहने) और व्यंग्य काव्यात्मक रूप से बेजोड़ हैं।

 * मधुर ब्रजभाषा: रचना में संगीतात्मक, कोमलकांत और परिमार्जित ब्रजभाषा का स्वाभाविक प्रयोग देखने को मिलता है।

 * लोक-मर्यादा व राजधर्म का चिंतन: इसमें केवल प्रेम ही नहीं, बल्कि तत्कालीन राजधर्म और प्रजा-हित के सिद्धांतों की भी सुंदर अभिव्यक्ति है।

प्रश्न 13. गोपियों ने उद्धव के सामने तरह-तरह के तर्क दिए हैं, आप अपनी कल्पना से और तर्क दीजिए।

उत्तर: गोपियों के स्थान पर हम अपनी कल्पना से निम्नलिखित तर्क दे सकते हैं:

 * स्वाद का तर्क: जिस व्यक्ति ने अमृत (कृष्ण-प्रेम) का स्वाद चख लिया हो, वह योग रूपी नीम की कड़वी निंबौरी कैसे खा सकता है?

 * साधना का स्थान: योग और ध्यान तो मन की शांति और ईश्वर-प्राप्ति के लिए संन्यासी करते हैं, हम तो ब्रज की गोपियाँ हैं जिन्होंने अपने ईश्वर को साक्षात रूप में देखा और प्रेम किया है।

 * हृदय की एकनिष्ठता: एक हृदय में एक ही समय में दो वस्तुएँ नहीं रह सकतीं। जब हमारा मन पूरी तरह कृष्ण से भरा हुआ है, तो उसमें निर्गुण योग के लिए जगह कहाँ से लाएँ?

 * ज्ञान बनाम प्रेम: यदि ज्ञान इतना ही महान है, तो फिर कृष्ण का विरह हमें क्यों तड़पा रहा है? योग इस विरह-दुःख का इलाज नहीं, बल्कि दवा के नाम पर ज़हर है।

प्रश्न 14. उद्धव ज्ञानी थे, नीति की बातें जानते थे; गोपियों के पास ऐसी कौन सी शक्ति थी जो उनके वाक्-चातुर्य में मुखरित हो उठी?

उत्तर: उद्धव शास्त्रों के प्रकांड पंडित, ज्ञानी और नीतिशास्त्र के ज्ञाता थे। इसके विपरीत गोपियाँ साधारण ग्रामीण बालाएँ थीं। फिर भी वे उद्धव को अपने तर्कों से पछाड़ देती हैं। गोपियों के पास सच्चे, निष्छल और एकनिष्ठ प्रेम की अद्भुत आत्मिक शक्ति थी।

प्रेम में दिखावा या बुद्धि का चातुर्य नहीं होता, बल्कि हृदय का सच्चा समर्पण होता है। गोपियों का यह अटूट प्रेम ही उनकी वाक्-पटुता का आधार बना। बुद्धि और शुष्क ज्ञान का अहंकार जब सच्चे प्रेम के धरातल से टकराया, तो हार ज्ञानी उद्धव की हुई और गोपियों की अनुभूति जीत गई।

प्रश्न 15. गोपियों ने यह क्यों कहा कि 'हरि अब राजनीति पढ़ि आए हैं'? क्या आपको गोपियों के इस कथन का विस्तार समकालीन राजनीति में नजर आता है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: गोपियों ने 'हरि अब राजनीति पढ़ि आए हैं' इसलिए कहा क्योंकि श्रीकृष्ण ने मथुरा जाने के बाद उनसे सीधे न मिलकर उद्धव के माध्यम से योग का संदेश भिजवा दिया। गोपियों को लगा कि कृष्ण अब सीधे-साधे प्रेमी नहीं रहे, बल्कि एक चतुर नेता की तरह छल-कपट और कूटनीति का सहारा लेकर अपनी ज़िम्मेदारियों से बच रहे हैं।

समकालीन राजनीति से तुलना:

गोपियों का यह कथन आज की राजनीति पर भी पूरी तरह खरा उतरता है:

 * झूठे वादे व वादाखिलाफी: आज के राजनेता भी चुनाव से पहले जनता से बड़े-बड़े वादे करते हैं, किंतु सत्ता मिलते ही अपने वादों से मुकर जाते हैं।

 * मध्यस्थों का सहारा: आज के नेता जनता के दुखों को सीधे सुनने के स्थान पर बीच के बिचौलियों या प्रतिनिधियों (उद्धव की भांति) को भेजकर औपचारिकता निभाते हैं।

 * स्वार्थपरता: आधुनिक राजनीति में जन-सेवा का भाव घट गया है और स्वार्थ तथा छल-कपट बढ़ गया है, जहाँ जनता को केवल प्रलोभन या भ्रामक बातें देकर बरगलाया जाता है।

हरिवंशराय बच्चन - आत्मपरिचय, एक गीत

कक्षा - 12 | हरिवंशराय बच्चन (MCQ प्रश्न-बैंक)

(आत्मपरिचय, एक गीत)

(कवि परिचय पर आधारित प्रश्न)

प्रश्न 1: हरिवंशराय बच्चन का जन्म किस वर्ष और कहाँ हुआ था?

(अ) 1907, इलाहाबाद (प्रयागराज)                    (ब) 1911, देहरादून

(ग) 1889, वाराणसी                                      (घ) 1905, अलीगढ़

प्रश्न 2: हरिवंशराय बच्चन हिंदी काव्य की किस धारा के प्रवर्तक माने जाते हैं?

(अ) प्रयोगवाद                                              (ब) प्रगतिवाद

(ग) हालावाद                                               (घ) छायावाद

प्रश्न 3: हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा कितने खंडों में प्रकाशित है?

(अ) दो खंडों में                                             (ब) तीन खंडों में

(ग) चार खंडों में                                            (घ) पाँच खंडों में

प्रश्न 4: निम्नलिखित में से कौन-सी रचना हरिवंशराय बच्चन की नहीं है?

(अ) मधुशाला                                                (ब) निशा निमंत्रण

(ग) कामायनी                                                (घ) क्या भूलूँ क्या याद करूँ

प्रश्न 5: हरिवंशराय बच्चन का लेखन किस दर्शन से प्रभावित माना जाता है?

(अ) मार्क्सवादी दर्शन

(ब) उमर खैय्याम की रुबाइयों (मस्ती का दर्शन)

(ग) गांधीवादी दर्शन

(घ) अस्तित्ववादी दर्शन

(कविता: 'आत्मपरिचय' पर आधारित प्रश्न)

प्रश्न 6: "मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ" - पंक्ति में 'जग-जीवन का भार' से कवि का क्या आशय है?

(अ) सांसारिक रिश्ते-नाते और दायित्व                         (ब) धन-दौलत का बोझ

(ग) अपने यश का भार                                            (घ) अपनी शिक्षा का अभिमान

प्रश्न 7: "मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ।" - इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?

(अ) यमक                (ब) उपमा                   (ग) श्लेष                 (घ) रूपक

प्रश्न 8: कवि संसार के साथ अपना संबंध कैसा बताते हैं?

(अ) पूर्ण मित्रता का                                            (ब) पूर्ण शत्रुता का

(ग) प्रीति-कलह का (प्रेम और संघर्ष का)                 (घ) उदासीनता का

प्रश्न 9: कवि किस अवस्था का उन्माद अपने साथ लिए फिरते हैं?

(अ) वृद्धावस्था का                                             (ब) शैशवावस्था का

(ग) यौवन (जवानी) का                                       (घ) किशोरावस्था का

प्रश्न 10: कवि संसार को अपूर्ण क्यों मानते हैं?

(अ) क्योंकि इसमें धन का अभाव है

(ब) क्योंकि इसमें ज्ञान का अभाव है

(ग) क्योंकि इसमें प्रेम का अभाव है

(घ) क्योंकि इसमें शक्ति का अभाव है

प्रश्न 11: कवि रोदन में क्या लिए फिरते हैं?

(अ) हास               (ब) अवसाद                 (ग) राग              (घ) विराग

प्रश्न 12: कवि के फूट पड़ने को समाज क्या कहता है?

(अ) कविता बनाना                      (ब) गीत बनाना

(ग) छंद बनाना                           (घ) कहानी बनाना

प्रश्न 13: कवि स्वयं को दुनिया का एक नया क्या मानते हैं?

(अ) राजा                                  (ब) दीवाना

(ग) ज्ञानी                                  (घ) भिखारी

प्रश्न 14: 'आत्मपरिचय' कविता की शैली कैसी है?

(अ) व्यंग्यात्मक                          (ब) उपदेशात्मक

(ग) वर्णनात्मक                          (घ) आत्मकथात्मक (गीतात्मक)

प्रश्न 15: "मैं और, और जग और, कहाँ का नाता" - इस पंक्ति में 'और' शब्द की आवृत्ति में कौन-सा अलंकार है?

(अ) अनुप्रास                            (ब) श्लेष

(ग) यमक                                (घ) पुनरुक्ति प्रकाश

(कविता: 'एक गीत - दिन जल्दी-जल्दी ढलता है' पर आधारित प्रश्न)

प्रश्न 16: "हो जाय न पथ में रात कहीं" - यह सोचकर कौन जल्दी-जल्दी चलता है?

(अ) कवि                               (ब) चिड़िया

(ग) बच्चे                                (घ) पंथी (यात्री)

प्रश्न 17: "बच्चे प्रत्याशा में होंगे" - यहाँ 'प्रत्याशा' का क्या अर्थ है?

(अ) निराशा                            (ब) घृणा

(ग) आशा या उम्मीद                 (घ) भय

प्रश्न 18: चिड़िया के पंखों में चंचलता (तेज़ी) किस कारण आ जाती है?

(अ) शिकारी के डर से                                           (ब) भोजन की तलाश में

(ग) अपने बच्चों से मिलने की आतुरता में                  (घ) साथियों से बिछड़ने के कारण

प्रश्न 19: "मुझसे मिलने को कौन विकल?" - यह विचार कवि के कदमों में क्या भर देता है?

(अ) स्फूर्ति और तेज़ी                                           (ब) शिथिलता और धीमापन

(ग) उत्साह और उमंग                                          (घ) प्रेम और वात्सल्य

प्रश्न 20: 'दिन जल्दी-जल्दी ढलता है' गीत किस प्रसिद्ध काव्य-संग्रह से लिया गया है?

(अ) मधुशाला                                                   (ब) एकांत संगीत

(ग) सतरंगिणी                                                  (घ) निशा निमंत्रण

प्रश्न 21: यह गीत जीवन के किस सत्य को उजागर करता है?

(अ) जीवन स्थिर है                                            (ब) जीवन प्रेममय है

(ग) जीवन संघर्षपूर्ण है                                        (घ) जीवन क्षणभंगुर और गतिशील है

प्रश्न 22: गीत के अनुसार, किसके बच्चे नीड़ों से झाँक रहे होंगे?

(अ) पंथी के                      (ब) कवि के

(ग) चिड़िया के                  (घ) हिरण के

प्रश्न 23: कवि के हृदय में विह्वलता (व्याकुलता) का मुख्य कारण क्या है?

(अ) रास्ते की थकावट

(ब) प्रियजनों से बिछोह और अकेलापन

(ग) समाज की उपेक्षा

(घ) धन का अभाव

प्रश्न 24: "दिन जल्दी-जल्दी ढलता है" - पंक्ति की बार-बार आवृत्ति क्या दर्शाती है?

(अ) कवि की निराशा

(ब) समय के निरंतर बीतते जाने का एहसास

(ग) प्रकृति का सौंदर्य

(घ) जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण

प्रश्न 25: इस गीत में वात्सल्य भाव का मार्मिक चित्रण किस प्रसंग में हुआ है?

(अ) कवि के अकेलेपन में

(ब) पंथी के चलने में

(ग) चिड़िया और उसके बच्चों के प्रसंग में

(घ) दिन के ढलने में

उत्तर कुंजी

1. (अ), 2. (ग), 3. (ग), 4. (ग), 5. (ब), 6. (अ), 7. (घ), 8. (ग), 9. (ग), 10. (ग), 11. (ग), 12. (ग), 13. (ब), 14. (घ), 15. (ग), 16. (घ), 17. (ग), 18. (ग), 19. (ब), 20. (घ), 21. (घ), 22. (ग), 23. (ब), 24. (ब), 25. (ग)