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सरोज स्मृति प्रश्न उत्तर



पाठ 2: सरोज स्मृति (सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला')

कवि परिचय: सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' (1898-1961) हिंदी साहित्य के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उनका जन्म महिषादल, मेदिनीपुर (बंगाल) में हुआ था। निराला का जीवन संघर्षों और दुखों से भरा रहा, जिसका गहरा प्रभाव उनकी रचनाओं पर भी देखा जा सकता है। उनकी पत्नी मनोहरा देवी और पुत्री सरोज की असमय मृत्यु ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया था।

साहित्यिक विशेषताएँ:

  • क्रांतिकारी कवि: निराला ने पुरानी काव्य-परंपराओं को तोड़कर नए प्रयोग किए। उन्होंने छंद-मुक्त कविता की शुरुआत की, जिसे 'केंचुआ छंद' कहकर उपहास किया गया, लेकिन बाद में यह आधुनिक कविता की पहचान बनी।

  • विषय-वस्तु की विविधता: उनकी कविताओं में प्रेम, प्रकृति, राष्ट्रीयता, सामाजिक यथार्थ, दार्शनिकता और रहस्यवाद जैसे विविध विषय मिलते हैं।

  • भाषा-शैली: उनकी भाषा में संस्कृतनिष्ठ शब्दावली के साथ-साथ बोलचाल के शब्दों का भी प्रयोग मिलता है। उनकी शैली ओजपूर्ण, चित्रात्मक और भावात्मक है।

  • सामाजिक चेतना: निराला ने दीन-हीनों, शोषितों और मजदूरों के प्रति गहरी सहानुभूति व्यक्त की। उनकी कविताओं में सामाजिक विसंगतियों और असमानता के प्रति आक्रोश दिखाई देता है।

  • प्रमुख रचनाएँ:

    • काव्य संग्रह: अनामिका, परिमल, गीतिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नए पत्ते, अर्चना, आराधना।

    • उपन्यास: अप्सरा, अलका, प्रभावती, निरुपमा।

    • कहानी संग्रह: लिली, सखी, चतुरी चमार, सुकुल की बीवी।

    • निबंध संग्रह: प्रबंध पद्म, प्रबंध प्रतिमा।

पाठ 'सरोज स्मृति' का साहित्यिक परिचय:

'सरोज स्मृति' निराला द्वारा रचित एक शोकगीत है, जो उन्होंने अपनी दिवंगत पुत्री सरोज की स्मृति में लिखा था। इसे हिंदी का प्रथम शोकगीत माना जाता है। इस कविता में निराला ने अपनी पुत्री के विवाह, उसके रूप-सौंदर्य, उसके प्रति अपने पितृत्व-प्रेम, अपनी विवशता और दुःख का मार्मिक चित्रण किया है।

  • शोकगीत की विशेषताएँ: कविता में करुणा, वेदना और निराशा का गहरा भाव विद्यमान है। कवि अपनी पुत्री के बचपन से लेकर उसके विवाह तक की स्मृतियों को याद करता है।

  • पितृत्व का मार्मिक चित्रण: निराला ने एक पिता के रूप में अपनी पुत्री के प्रति कर्तव्य और प्रेम को व्यक्त किया है। वे अपनी पुत्री के विवाह में माँ की कमी को महसूस करते हैं और स्वयं ही माँ और पिता दोनों के कर्तव्य निभाते हैं।

  • सामाजिक यथार्थ: कविता में निराला के व्यक्तिगत दुःख के साथ-साथ तत्कालीन समाज की आर्थिक विषमता और कवि के संघर्षमय जीवन का भी संकेत मिलता है।

  • प्रकृति का मानवीकरण: निराला ने प्रकृति के माध्यम से अपनी भावनाओं को व्यक्त किया है, जैसे 'वह लता वहीं की, जहाँ कली तू खिली'।

  • मुक्तछंद का प्रयोग: यह कविता मुक्तछंद में रचित है, जो निराला की काव्य-शैली की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है।


NCERT / राजस्थान बोर्ड के अनुसार प्रश्नोत्तर:

  1. सरोज के नव-वधू रूप का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
    कवि निराला ने अपनी पुत्री सरोज के नव-वधू रूप का अत्यंत मोहक और मार्मिक वर्णन किया है। कवि कहता है कि विवाह मंडप में सरोज ऐसी लग रही थी, जैसे किसी कवि की कल्पना साकार हो उठी हो। उसके नत नयनों से प्रेम का आलोक झर रहा था, उसके अधरों पर मधुर और रहस्यमय मुस्कान थी, जो कवि को अपनी पत्नी मनोहरा देवी की याद दिला रही थी। उसके रूप में सहजता, पवित्रता और एक शांत सौंदर्य था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो शृंगार स्वयं साकार होकर निरंकार हो गया हो। वह इतनी सुंदर लग रही थी कि उसकी तुलना किसी स्वर्गीय अप्सरा से की जा सकती थी। उसका लज्जा से झुका हुआ मुख और नव-यौवन का संचार उसके सौंदर्य को और भी बढ़ा रहा था।

  2. कवि को अपनी स्वर्गीया पत्नी की याद क्यों आई?
    कवि को अपनी स्वर्गीया पत्नी मनोहरा देवी की याद सरोज के विवाह के समय आई। जब उन्होंने अपनी पुत्री सरोज के नव-वधू रूप को देखा, तो सरोज के मुख पर वही लज्जा, वही सहज सौंदर्य और वही मधुर मुस्कान दिखाई दी, जो उनकी पत्नी के मुख पर हुआ करती थी। सरोज का मुख-मंडल, उसकी आँखें और उसकी भाव-भंगिमाएँ इतनी मिलती-जुलती थीं कि कवि को लगा मानो उनकी पत्नी ही सरोज के रूप में पुनः उनके सामने आ गई हो। विशेषकर, सरोज के विवाह में माँ की कमी को स्वयं कवि ने पूरा किया था, और इस पितृत्व-प्रेम और अपनी पुत्री के रूप में पत्नी के अक्स को देखकर उन्हें अपनी स्वर्गीया पत्नी की याद आना स्वाभाविक था।

  3. 'आकाश बदल कर बना मही' में 'आकाश' और 'मही' शब्द किनकी ओर संकेत करते हैं?
    'आकाश बदल कर बना मही' में:

    • 'आकाश' शब्द कवि की स्वर्गीया पत्नी मनोहरा देवी की ओर संकेत करता है। आकाश अनंत, विशाल और निराकार होता है, जो अदृश्य रूप में भी सर्वव्यापी होता है। कवि की पत्नी अब इस संसार में नहीं हैं, लेकिन उनकी उपस्थिति और यादें कवि के मन में सदा बनी रहती हैं, जैसे आकाश हर जगह विद्यमान होता है।

    • 'मही' शब्द कवि की पुत्री सरोज की ओर संकेत करता है। 'मही' का अर्थ पृथ्वी होता है, जो साकार, मूर्त और प्रत्यक्ष होती है। कवि यह कहना चाहता है कि उनकी पत्नी का ही रूप (आकाश) बदलकर उनकी पुत्री सरोज (मही) के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुआ है। सरोज में उन्हें अपनी पत्नी का अक्स दिखाई देता है, जैसे पत्नी की आत्मा ही पुत्री के रूप में साकार हो गई हो।

  4. सरोज का विवाह अन्य विवाहों से किस प्रकार भिन्न था?
    सरोज का विवाह अन्य सामान्य विवाहों से कई मायनों में भिन्न था, जो उसकी विशिष्टता और कवि की विवशता को दर्शाता है:

    • माँ का अभाव: सबसे बड़ा अंतर यह था कि सरोज की माँ का निधन हो चुका था। सामान्यतः विवाह में कन्या की माँ की उपस्थिति और उसके द्वारा किए जाने वाले रीति-रिवाज अत्यंत महत्त्वपूर्ण होते हैं। सरोज के विवाह में माँ की यह कमी कवि ने स्वयं पूरी की।

    • सरलता और आडंबरहीनता: विवाह में किसी प्रकार का तामझाम, शोरगुल या अत्यधिक दिखावा नहीं था। यह अत्यंत सादे तरीके से, शांत और गंभीर वातावरण में संपन्न हुआ। इसमें न कोई बरात आई थी और न ही किसी प्रकार की विशेष साज-सज्जा की गई थी।

    • कवि द्वारा माँ के कर्तव्य का निर्वहन: कवि ने स्वयं एक पिता होते हुए भी माँ के कर्तव्यों का निर्वहन किया। उन्होंने अपनी पुत्री को स्वयं शिक्षा दी, संस्कार दिए और विवाह के समय भी माँ की भाँति उसे आशीर्वाद दिया और जीवन जीने के मंत्र दिए।

    • नज़दीकी संबंधियों की कमी: विवाह में न तो कोई खास सगे-संबंधी थे और न ही कवि के पास अधिक आर्थिक साधन थे कि वे भव्य समारोह आयोजित कर सकें। यह एक एकाकी और निजी आयोजन जैसा था।

    • आँसुओं की विदाई: सामान्य विवाहों में कन्या की विदाई पर जहाँ मंगल गीत गाए जाते हैं, वहीं सरोज को विदा करते समय कवि की आँखों से आँसू ही निकले थे, जो उसके दुर्भाग्य और कवि के दुःख का प्रतीक था।

  5. 'वह लता वहीं की, जहाँ कली तू खिली' पंक्ति के द्वारा किस प्रसंग को उद्घाटित किया गया है?
    'वह लता वहीं की, जहाँ कली तू खिली' पंक्ति के द्वारा कवि ने अपनी पुत्री सरोज के विवाह और उसके जन्म-स्थान के प्रसंग को उद्घाटित किया है।

    • 'लता' यहाँ सरोज की माँ (या स्वयं कवि के जीवन) का प्रतीक है।

    • 'कली' यहाँ सरोज स्वयं है।
      कवि यह कहना चाहता है कि सरोज का विवाह उसी स्थान पर हुआ, जहाँ वह जन्मी थी और पली-बढ़ी थी। उसे न तो ससुराल जाने का सौभाग्य मिला और न ही किसी अन्य स्थान पर विवाह की रस्में पूरी हुईं। यहाँ 'लता' का अर्थ यह भी हो सकता है कि जिस घर-आँगन में सरोज का बचपन बीता, जहाँ उसकी माँ ने उसे जन्म दिया, वहीं उसकी जीवनलीला समाप्त भी हो गई। यह पंक्ति सरोज के अल्पायु और दुर्भाग्यपूर्ण जीवन की ओर भी संकेत करती है, कि वह उसी 'लता' (यानी कवि के दुखमय जीवन और उस परिवार) से जन्मी 'कली' थी, और वहीं मुरझा भी गई। यह पंक्ति विवाह के साधारणपन और माँ के अभाव में पिता द्वारा स्वयं संस्कार देने की बात को भी दर्शाती है कि जहाँ उसका जन्म हुआ, वहीं उसकी विदाई भी हुई।

  6. 'मुझ भाग्यहीन की तू संबल' निराला की यह पंक्ति क्या 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसे कार्यक्रम की माँग करती है?
    नहीं, 'मुझ भाग्यहीन की तू संबल' निराला की यह पंक्ति सीधे तौर पर 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसे कार्यक्रम की माँग नहीं करती। यह पंक्ति मूल रूप से कवि के व्यक्तिगत दुःख, उसकी पुत्री के प्रति प्रेम और उसके अभाव में जीवन के आधार के छिन जाने की पीड़ा को व्यक्त करती है।

    • संदर्भ: इस पंक्ति में कवि अपनी पुत्री सरोज को संबोधित करते हुए कहता है कि उसके दुखमय और संघर्षपूर्ण जीवन में सरोज ही उसका एकमात्र सहारा, उसकी शक्ति और जीवन का आधार थी। सरोज की मृत्यु के बाद कवि स्वयं को नितांत अकेला और भाग्यहीन महसूस करता है।

    • 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' से भिन्नता: 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' एक सामाजिक-राजनीतिक कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य बेटियों को समाज में उचित सम्मान दिलाना, भ्रूणहत्या रोकना, शिक्षा का अधिकार दिलाना और लैंगिक समानता स्थापित करना है। निराला की पंक्ति का संबंध इन व्यापक सामाजिक मुद्दों से न होकर एक पिता के अपनी पुत्री के प्रति अनन्य प्रेम, उससे मिली मानसिक शक्ति और उसके वियोग से उपजे गहन व्यक्तिगत दुःख से है।
      हाँ, अप्रत्यक्ष रूप से यह पंक्ति बेटियों के महत्त्व को तो दर्शाती है। यदि बेटियाँ न हों या वे अल्पायु में ही कालकवलित हो जाएँ, तो पिता का संबल छिन जाता है। इस दृष्टि से, हर बेटी का जीवन मूल्यवान है और उसका संरक्षण व शिक्षा समाज के लिए अत्यंत आवश्यक है, ताकि कोई पिता अपनी बेटी के अभाव में 'भाग्यहीन' और 'निस्संबल' महसूस न करे। लेकिन यह मूलतः व्यक्तिगत भावना का उद्गार है, न कि किसी सामाजिक आंदोलन की सीधी माँग।

  7. निम्नलिखित पंक्तियों का अर्थ स्पष्ट कीजिए-

    (क) नत नयनों से आलोक उतर
    अर्थ: इस पंक्ति का अर्थ है कि विवाह के मंडप में बैठी नव-वधू सरोज की झुकी हुई आँखों से एक विशेष प्रकार का प्रकाश, आभा या सौंदर्य उतर रहा था। यह आलोक केवल बाहरी चमक नहीं, बल्कि आंतरिक लज्जा, पवित्रता, प्रेम और नवजीवन के उत्साह का प्रकाश था, जो उसकी आँखों की कोरों से झलक रहा था। यह एक पवित्र और मोहक सौंदर्य का सूचक है, जो नव-वधू के रूप को और भी दिव्य बना रहा था।

    (ख) शृंगार रहा जो निरंकार
    अर्थ: इस पंक्ति का अर्थ है कि सरोज का सौंदर्य और उसका शृंगार इतना अलौकिक, सहज और अनुपम था कि वह किसी विशेष रूप या आकार में बंधा हुआ नहीं था। वह शृंगार की साकार मूर्ति होने के बावजूद इतना स्वाभाविक और निश्छल था कि वह निराकार प्रतीत हो रहा था। कहने का तात्पर्य यह है कि सरोज ने कोई विशेष बाह्य शृंगार नहीं किया था, बल्कि उसका अपना नैसर्गिक सौंदर्य ही इतना अद्भुत था कि वह शृंगार के समस्त अलंकरणों से परे, एक दिव्य और अनुपम रूप में प्रकट हो रहा था, जैसे शृंगार का तत्व ही निराकार होकर उसमें समा गया हो।

    (ग) पर पाठ अन्य यह, अन्य कला
    अर्थ: इस पंक्ति में कवि अपनी पुत्री के रूप-सौंदर्य और विवाह की तुलना अपनी पत्नी के सौंदर्य से करते हुए कहते हैं कि हालाँकि सरोज का रूप-सौंदर्य और उसकी लज्जा अपनी माँ के समान थी, फिर भी यह स्थिति कुछ भिन्न थी। यहाँ 'पाठ अन्य' का अर्थ है कि यह विवाह का प्रसंग एक अलग तरह का पाठ था, एक अलग स्थिति थी। 'अन्य कला' का अर्थ है कि इसे संपन्न करने का तरीका या इसमें शामिल भावनाएँ और परिस्थितियाँ भिन्न थीं। यह भिन्नता विशेषकर माँ के अभाव और कवि द्वारा ही माँ-पिता दोनों के कर्तव्यों का निर्वहन करने के कारण थी। यह एक अनोखा और हृदय-विदारक प्रसंग था, जो सामान्य विवाहों से बिलकुल अलग था।

    (घ) यदि धर्म, रहे न सदा माथ
    अर्थ: यह पंक्ति कवि के जीवन के गहन दर्शन और उनकी पीड़ा को व्यक्त करती है। इसका अर्थ है कि यदि मनुष्य धर्म के मार्ग पर चलता है, सच्चाई और नैतिकता का पालन करता है, तो भी यह आवश्यक नहीं कि उसे हमेशा सुख मिले या उसके सिर पर सुख की छाया (माथ) बनी रहे। कवि के जीवन में अनेक दुःख और संघर्ष आए, उनकी पत्नी और पुत्री की मृत्यु हो गई, जबकि वे स्वयं एक धार्मिक और नैतिक व्यक्ति थे। इस पंक्ति के माध्यम से कवि नियति की कठोरता और जीवन की विडंबना को व्यक्त करते हैं कि कभी-कभी धर्म का पालन करने वाले व्यक्ति को भी जीवन भर कष्टों का सामना करना पड़ता है और उसे अपने प्रियजनों को खोना पड़ता है। उनके जीवन में धर्म का पालन करने के बावजूद सुख का माथा नहीं रहा, अर्थात् उनका जीवन दुखों से भरा रहा।