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सूरदास की झोंपड़ी


सूरदास की झोंपड़ी: पाठ परिचय और उद्देश्य

पाठ परिचय:

'सूरदास की झोंपड़ी' मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित एक मार्मिक कहानी है, जो उनके उपन्यास 'रंगभूमि' का अंश है। यह कहानी एक दृष्टिहीन भिकारी सूरदास के जीवन-संघर्ष और उसकी मानवीय संवेदनाओं का चित्रण करती है। कहानी में सूरदास की झोपड़ी में आग लगने, उसकी जमा पूंजी के चोरी हो जाने और इस त्रासदी के बावजूद उसके अडिग मनोबल को दर्शाया गया है। यह ग्रामीण भारत के सामाजिक ताने-बाने, जातिगत भेदभाव और एक साधारण व्यक्ति की आंतरिक शक्ति को उजागर करती है। कहानी में प्रेमचंद ने मानवीय करुणा, धैर्य, और जीवन के प्रति अटूट आस्था को बड़ी सूक्ष्मता से प्रस्तुत किया है।

पाठ का उद्देश्य:

  1. मानवीय संवेदनाओं का चित्रण: कहानी का मुख्य उद्देश्य मानवीय करुणा, दुख, संघर्ष और उससे उबरने की शक्ति को दर्शाना है। यह पाठ छात्रों को दूसरों की पीड़ा समझने और उनके प्रति संवेदनशील होने की प्रेरणा देता है।

  2. दृढ़ इच्छाशक्ति और सकारात्मकता का महत्व: सूरदास जैसे असहाय व्यक्ति के बावजूद उसके भीतर की अदम्य इच्छाशक्ति और सकारात्मक दृष्टिकोण को प्रस्तुत करना, ताकि छात्र जीवन की कठिनाइयों में भी आशावादी बने रहें।

  3. सामाजिक यथार्थ से परिचय: ग्रामीण जीवन की चुनौतियों, जातिगत भेदभाव और गरीबी जैसे सामाजिक यथार्थों से छात्रों को परिचित कराना, जिससे वे समाज की समस्याओं के प्रति जागरूक हो सकें।

  4. न्याय और अन्याय के प्रश्न पर विचार: भैरों द्वारा सूरदास की झोंपड़ी जलाना और पैसे चुराना, अन्याय का प्रतीक है। पाठ छात्रों को अन्याय के विरुद्ध खड़े होने और न्याय के महत्व पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है।

  5. क्षमा और पुनरुत्थान का संदेश: सूरदास का अंततः 'सौ लाख बार बनाएँगे' का संकल्प लेना यह दर्शाता है कि वह बदले की भावना से ऊपर उठकर क्षमा और पुनरुत्थान में विश्वास रखता है। यह छात्रों को विपरीत परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने का संदेश देता है।


NCERT प्रश्न-उत्तर (कक्षा-12 हिंदी साहित्य, पाठ-1 सूरदास की झोंपड़ी)

यहाँ 'सूरदास की झोंपड़ी' पाठ के कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर दिए गए हैं:

1. 'चूल्हा ठंडा किया होता, तो दुश्मनों के कलेजा कैसे ठंडा होता?' नायकराम के इस कथन में निहित भाव को स्पष्ट कीजिए।

नायकराम के इस कथन में गहरा व्यंग्य और मानवीय द्वेष का भाव निहित है। इसका अर्थ यह है कि यदि सूरदास चुपचाप अपनी झोपड़ी के जलने और अपनी पूंजी के चोरी होने की बात स्वीकार कर लेता, तो उसके दुश्मन (विशेषकर भैरों) को संतोष नहीं मिलता। दुश्मनों का कलेजा तभी ठंडा होता, जब वे सूरदास को टूटते, बिलखते और हार मानते देखते। नायकराम के अनुसार, सूरदास का शांत रहना और अपनी हानि पर शोक न मनाना दुश्मनों के लिए और भी पीड़ादायक था, क्योंकि उन्हें अपनी क्रूरता का अपेक्षित परिणाम (सूरदास का दुख) नहीं मिल रहा था। यह सूरदास के आंतरिक मनोबल और उसके दुश्मनों की क्षुद्र मानसिकता को दर्शाता है।

2. भैरों ने सूरदास की झोंपड़ी क्यों जलाई?

भैरों ने सूरदास की झोंपड़ी कई कारणों से जलाई:

  • ईर्ष्या: भैरों सूरदास से ईर्ष्या करता था क्योंकि सूरदास के पास लोगों का स्नेह और सम्मान था, और उसके पास कुछ जमा पूंजी भी थी।

  • बदले की भावना: भैरों की पत्नी सुभागी, भैरों की मार से बचने के लिए सूरदास की झोपड़ी में शरण लेती थी। भैरों को लगा कि सूरदास ने सुभागी को भगाया है या उसे छिपाया है, इसलिए वह सूरदास से बदला लेना चाहता था।

  • निचता और क्रूरता: भैरों स्वभाव से ही क्रूर और नीच व्यक्ति था। वह दूसरों को दुख पहुँचाकर खुश होता था।

3. 'यह फूस की राख न थी, उसकी अभिलाषाओं की राख थी।' संदर्भ सहित विवेचन कीजिए।

संदर्भ: यह कथन तब आता है जब सूरदास अपनी जली हुई झोपड़ी के राख के ढेर को देख रहा होता है। झोपड़ी के जलने के साथ ही उसकी सारी जमा पूंजी (गाँठ में बँधी पोटली में रखे पाँच सौ रुपए) भी चोरी हो जाती है।

विवेचन: इस कथन का अर्थ है कि जो जलकर राख हुआ, वह केवल घास-फूस की बनी झोपड़ी नहीं थी, बल्कि सूरदास की सारी आशाएँ, सपने और भविष्य की योजनाएँ थीं। उन पैसों से वह अपने बेटे को पढ़ाना चाहता था, मिठुआ का ब्याह करना चाहता था और अपने पितरों का पिंडदान करना चाहता था। झोपड़ी के जलने और पैसे के चोरी हो जाने से उसकी ये सारी अभिलाषाएँ भी राख हो गईं। यह कथन सूरदास की गहरी निराशा और उसके टूटते सपनों को अभिव्यक्त करता है।

4. जगधर के मन में किस तरह का ईर्ष्या-भाव जगा और क्यों?

जगधर के मन में सूरदास के प्रति ईर्ष्या और लोभ का भाव जागा।

  • क्यों: जब उसे पता चला कि भैरों ने सूरदास के पाँच सौ रुपए चुरा लिए हैं, तो जगधर को लगा कि इतने सारे पैसे भैरों के पास नहीं होने चाहिए। वह सोचता है कि यदि सूरदास के पास इतना धन हो सकता है, तो उसके पास क्यों नहीं। वह भैरों से उस धन में हिस्सा पाना चाहता था और स्वयं भी धनी बनने की लालसा रखता था। उसे इस बात की ईर्ष्या थी कि सूरदास जैसा भिखारी इतना धनी कैसे हो सकता है और अब भैरों बिना परिश्रम के इतना धनी कैसे बन गया।

5. सूरदास जगधर से अपनी आर्थिक हानि को गुप्त रखना चाहता था?

नहीं, सूरदास जगधर से अपनी आर्थिक हानि (पैसे चोरी होने की बात) को गुप्त नहीं रखना चाहता था, बल्कि वह सभी से इसे गुप्त रखना चाहता था, विशेषकर जगधर से इसलिए क्योंकि जगधर भैरों का मित्र था और उसे इस चोरी के बारे में पहले से ही पता था। सूरदास अपनी आर्थिक हानि को इसलिए गुप्त रखना चाहता था क्योंकि:

  • लज्जा और बदनामी: उसे डर था कि लोग उसे मूर्ख समझेंगे कि उसने इतनी बड़ी रकम झोपड़ी में क्यों रखी, और लोग उसका मजाक उड़ाएँगे।

  • चोर को मौका देना: यदि सबको पता चल जाता कि उसके पैसे चोरी हुए हैं, तो चोर (भैरों) सतर्क हो जाता और पैसे वापस मिलने की उम्मीद कम हो जाती।

  • पुनर्निर्माण का संकल्प: वह अपनी कमजोरी या हार को प्रदर्शित नहीं करना चाहता था। वह भीतर ही भीतर अपने पुनर्निर्माण का संकल्प ले रहा था और इसके लिए उसे शांत रहने की आवश्यकता थी।

6. 'सूरदास उठ खड़ा हुआ और विजय-गर्व की तरंग में राख के ढेर को दोनों हाथों से उड़ाने लगा।' इस कथन के संदर्भ में सूरदास की मनोदशा का वर्णन कीजिए।

इस कथन में सूरदास की मनोदशा अद्भुत आत्मविश्वास, दृढ़ संकल्प और विजय की भावना से भरी हुई है।

  • निराशा पर विजय: पहले वह अपनी हानि और अपमान से टूट चुका था, लेकिन मिठुआ के "खेल में रोते हैं?" वाक्य ने उसे प्रेरणा दी। उसने अपनी सारी निराशा और दुख को त्याग दिया।

  • आत्मसम्मान की रक्षा: राख को उड़ाने का कार्य एक प्रकार से उसकी विजय की घोषणा थी। वह अपनी हार को स्वीकार नहीं कर रहा था, बल्कि अपनी आंतरिक शक्ति का प्रदर्शन कर रहा था।

  • पुनर्निर्माण का संकल्प: यह उसके भीतर उपजे इस प्रबल संकल्प का प्रतीक है कि वह अपनी हानि की परवाह नहीं करेगा और अपनी जिंदगी को फिर से खड़ा करेगा।

  • आशा और उत्साह: यह मनोदशा दर्शाती है कि वह भविष्य के प्रति आशावादी है और जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए पूर्ण रूप से उत्साहित है। वह जानता है कि हारना नहीं है, बल्कि लड़ना है और फिर से जीतना है।

7. 'तो हम सौ लाख बार बनाएँगे' इस कथन के संदर्भ में सूरदास के चरित्र का विवेचन कीजिए।

'तो हम सौ लाख बार बनाएँगे' - यह कथन सूरदास के चरित्र की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं को उजागर करता है।

  • अदम्य इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प: यह कथन उसके भीतर की अदम्य इच्छाशक्ति का प्रमाण है। वह हार मानने वाला व्यक्ति नहीं है। एक बार नुकसान होने पर भी वह निराश नहीं होता, बल्कि उसे सौ बार बनाने का संकल्प लेता है।

  • आशावाद और सकारात्मकता: विपरीत परिस्थितियों में भी वह सकारात्मक रहता है। वह दुख और हानि को जीवन का एक हिस्सा मानता है और उससे उबरने की शक्ति रखता है।

  • निर्भीकता और आत्मसम्मान: वह भैरों और समाज की क्रूरता से भयभीत नहीं होता। अपनी संपत्ति खोने के बावजूद वह अपने आत्मसम्मान को बचाए रखता है और अपनी हार को स्वीकार नहीं करता।

  • जीवन के प्रति अटूट आस्था: यह दर्शाता है कि उसे जीवन में गहरा विश्वास है। वह जानता है कि भले ही एक दरवाजा बंद हो जाए, लेकिन दूसरे रास्ते हमेशा खुले रहते हैं।

  • क्षमा और बदले की भावना से मुक्ति: उसका यह संकल्प बदले की भावना से मुक्त है। वह अपने अपमान और हानि पर क्रोधित होने के बजाय, अपने भविष्य के पुनर्निर्माण पर ध्यान केंद्रित करता है, जो उसके उदात्त चरित्र को दर्शाता है।