कवि का साहित्यिक परिचय:
"बारहमासा" मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य "पद्मावत" का एक अंश है। जायसी भक्ति काल के निर्गुण प्रेमाश्रयी शाखा के प्रमुख कवि हैं। उनका जन्म 15वीं शताब्दी के अंत में रायबरेली के जायस नामक स्थान पर हुआ था। वे सूफी संत थे और उनकी रचनाओं में प्रेम, विरह, रहस्यवाद और भारतीय संस्कृति का सुंदर समन्वय मिलता है। उनकी भाषा अवधी है और उन्होंने अपनी रचनाओं में लोकजीवन के अनुभवों को बड़ी सहजता से प्रस्तुत किया है। "पद्मावत" के अलावा उनकी अन्य प्रमुख रचनाएँ "अखरावट" और ""आखिरी कलाम"" हैं।
पदों का सामान्य परिचय:
"बारहमासा" में नागमती के विरह का वर्णन है, जब राजा रत्नसेन उसे छोड़कर सिंघल द्वीप चले जाते हैं। इस अंश में प्रत्येक महीने के अनुसार नागमती की विरह-दशा का मार्मिक चित्रण किया गया है। जायसी ने भारतीय ऋतुओं और प्रकृति के दृश्यों को नागमती के मानसिक और शारीरिक कष्ट से जोड़कर प्रस्तुत किया है। यह वर्णन इतना सजीव है कि पाठक नागमती के दुःख को स्वयं अनुभव करने लगता है।
प्रश्नों के उत्तर:
1. अगहन मास की विशेषता बताते हुए विरहिणी (नागमती) की व्यथा-कथा का चित्रण अपने शब्दों में कीजिए।
अगहन मास में हल्की ठंड पड़ने लगती है, रातें लंबी होने लगती हैं और दिन छोटे। इस महीने में प्रकृति में एक तरह की शांति और शीतलता आती है। नागमती के लिए यह मास और भी कष्टप्रद हो जाता है। उसे लगता है कि उसका प्रिय परदेस में है और उसे अपनी याद भी नहीं आती। नागमती को यह भी चिंता सताती है कि अगर उसके प्रिय लौटते नहीं तो वह कैसे जिएगी। वह अपने प्रियतम के बिना अकेली है और उसे चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा दिखाई देता है।
2. ‘जियत खाए मुएँ नहिं छाँड़ा’ पंक्ति के संदर्भ में नायिका की विरह-दशा का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
इस पंक्ति का अर्थ है कि विरह जीवित को भी खा जाता है और मरने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ता। नागमती की विरह-दशा इतनी भयंकर है कि वह जीने और मरने के बीच झूल रही है। विरह की अग्नि उसे दिन-रात जला रही है, जिससे उसका शरीर सूखकर काँटा हो गया है। वह लगातार अपने प्रियतम की याद में घुल रही है और उसे लगता है कि इस विरह से कभी मुक्ति नहीं मिलेगी, चाहे वह जीवित रहे या मर जाए। यह पंक्ति नागमती के अत्यंत तीव्र और असहनीय विरह-पीड़ा को दर्शाती है।
3. माघ महीने में विरहिणी को क्या अनुभूति होती है?
माघ का महीना अत्यधिक ठंड और पाले का होता है। इस महीने में नागमती को ठंड और विरह दोनों की पीड़ा एक साथ सताती है। उसे अपने प्रियतम की कमी और अधिक खलती है, क्योंकि ऐसे ठंडे मौसम में उसे अपने प्रिय का साथ और अधिक आवश्यक महसूस होता है। ठंड से बचने के लिए वह आग जलाकर अपने शरीर को गर्म करने का प्रयास करती है, लेकिन विरह की अग्नि उसके हृदय को अंदर ही अंदर जलाती रहती है, जिससे उसे कोई शांति नहीं मिलती।
4. वृक्षों से पत्तियाँ तथा वनों से डाँखें किस माह में गिरते हैं? इससे विरहिणी का क्या संबंध है?
वृक्षों से पत्तियाँ और वनों से डाँखें फागुन (फरवरी-मार्च) के महीने में पतझड़ के कारण गिरते हैं। इस महीने में पुराने पत्ते झड़ जाते हैं और नए कोंपल आने लगते हैं, जो नवजीवन का प्रतीक है। विरहिणी नागमती का इससे गहरा संबंध है। जिस प्रकार वृक्षों से पत्ते झड़ते हैं, उसी प्रकार विरह की अग्नि ने नागमती के शरीर को भी जीर्ण-शीर्ण कर दिया है। वह भी इन झड़ते पत्तों की तरह स्वयं को अशक्त और निराशा से भरा महसूस करती है, जबकि संसार में अन्य लोग होली और वसंत का आनंद ले रहे होते हैं। उसे लगता है कि जैसे प्रकृति में बदलाव आता है, वैसे ही उसका जीवन भी खुशियों से भर जाएगा, लेकिन उसके प्रिय के बिना यह संभव नहीं है।
5. निम्नलिखित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए:
(क) पिय सों कहेहु संदेसड़ा, ऐ भँवरा ऐ काग।
सो धनि बिरहें जरि मुई, तेहिक धुआँ हम लाग॥
व्याख्या: इन पंक्तियों में नागमती विरह से व्याकुल होकर भँवरे और कौए से अपने प्रियतम तक संदेश पहुँचाने का अनुरोध कर रही है। वह कहती है, "हे भँवरे, हे कौए! मेरे प्रिय से कहना कि तुम्हारी वह प्रियतमा विरह की आग में जलकर मर गई है, और उसी जलने के धुएँ से हम काले हो गए हैं।" इन पंक्तियों में नागमती का अत्यधिक विरह, प्रियतम के प्रति गहरी तड़प और स्वयं के नष्ट होने का भाव स्पष्ट होता है। वह प्रतीकात्मक रूप से कहती है कि उसके विरह की आग इतनी तीव्र है कि उसका धुआँ भँवरे और कौए तक को प्रभावित कर गया है।
(ख) रकत ढरा माँसू गरा, हाड़ भए सब संख।
धनि सारस होइ ररि मुई, आइ समेटहु पंख॥
व्याख्या: इन पंक्तियों में नागमती अपनी दयनीय शारीरिक अवस्था का वर्णन करती है। वह कहती है, "मेरा रक्त ढल गया है (सूख गया है), माँस गल गया है और मेरी हड्डियाँ शंख जैसी (कमजोर और खोखली) हो गई हैं।" आगे वह कहती है, "तुम्हारी प्रियतमा सारस पक्षी की तरह रो-रोकर मर गई है, आकर उसके पंखों को समेट लो।" यहाँ नागमती स्वयं को सारस पक्षी के समान मानती है जो अपने जोड़े से बिछड़कर अत्यंत दुखी है और मर रहा है। यह उसकी विरहजन्य पीड़ा, शारीरिक क्षीणता और प्रियतम के लौटने की अंतिम आशा को दर्शाता है।
(ग) तुम्ह बिनु कंत धनि तन हरुई, तन तिनुवर भा डोला।
तेहि पर बिरह जराइ कै, कहै उड़ावा झोला॥
व्याख्या: इन पंक्तियों में नागमती अपने प्रियतम के बिना अपने शरीर की स्थिति का वर्णन करती है। वह कहती है, "हे प्रियतम! तुम्हारे बिना मेरी पत्नी (मैं) का शरीर इतना हल्का हो गया है कि वह तिनके की तरह डोल रहा है।" आगे वह कहती है, "विरह ने उसे जलाकर राख कर दिया है, अब यह कहो कि उसके शरीर की राख को कौन उड़ाएगा।" इन पंक्तियों में नागमती की विरहजन्य दुर्बलता और मृत्यु के प्रति उसकी आसन्नता का चित्रण है। वह अपने शरीर को तिनके के समान क्षणभंगुर और हल्का मानती है, जिसे विरह की आग ने जलाकर राख कर दिया है।
(घ) यह तन जारौं छार कै, कहौं कि पवन उड़ाउ।
मकु तेहि मारग होइ परौं, कंत धरैं जहाँ पाउ॥
व्याख्या: इन पंक्तियों में नागमती अपने विरह की पराकाष्ठा पर पहुँचकर एक अंतिम इच्छा व्यक्त करती है। वह कहती है, "मैं अपने इस शरीर को जलाकर राख कर दूँगी और कहूँगी कि हवा उसे उड़ा ले जाए।" आगे वह कहती है, "शायद उसी मार्ग पर मैं बिखर जाऊँ, जहाँ मेरे प्रियतम अपने कदम रखते हैं।" इन पंक्तियों में नागमती की प्रेम की चरम सीमा और बलिदान की भावना व्यक्त होती है। वह चाहती है कि उसकी राख भी उसी मार्ग पर पड़े जहाँ से उसका प्रिय गुजरता है, ताकि वह मृत्यु के बाद भी अपने प्रियतम से जुड़ सके।
6. प्रथम दो छंदों में से अलंकार छाँटकर लिखिए और उनसे उत्पन्न काव्य-सौंदर्य पर टिप्पणी कीजिए।
यहाँ हम पहले और दूसरे छंदों (जो प्रश्न 5 के (क) और (ख) में दिए गए हैं) के अलंकारों को देखेंगे:
छंद (क): "पिय सों कहेहु संदेसड़ा, ऐ भँवरा ऐ काग। सो धनि बिरहें जरि मुई, तेहिक धुआँ हम लाग॥"
मानवीकरण अलंकार: भँवरे और कौए को संदेशवाहक के रूप में संबोधित करना। (ऐ भँवरा ऐ काग)
अतिशयोक्ति अलंकार: "तेहिक धुआँ हम लाग" (विरह के धुएँ से भँवरा और कौआ काला हो गया) – यह विरह की पीड़ा की अत्यधिक कल्पना है।
काव्य-सौंदर्य: इन अलंकारों के प्रयोग से नागमती की विरह-दशा की तीव्रता और मार्मिकता बढ़ जाती है। मानवीकरण से प्रकृति भी उसके दुःख में शामिल प्रतीत होती है, और अतिशयोक्ति से उसकी पीड़ा की गहराई का प्रभाव पाठक पर गहरा पड़ता है।
छंद (ख): "रकत ढरा माँसू गरा, हाड़ भए सब संख। धनि सारस होइ ररि मुई, आइ समेटहु पंख॥"
उपमा अलंकार: "हाड़ भए सब संख" (हड्डियाँ शंख जैसी हो गईं) – हड्डियों की सफेदी और खोखलेपन की तुलना शंख से की गई है।
उत्प्रेक्षा अलंकार: "धनि सारस होइ ररि मुई" (प्रियतमा सारस होकर रो-रोकर मर गई) – यहाँ नागमती स्वयं को सारस मानकर अपने विरह को व्यक्त कर रही है।
काव्य-सौंदर्य: उपमा और उत्प्रेक्षा के प्रयोग से नागमती की शारीरिक दुर्बलता और विरह-जनित पीड़ा का सजीव चित्रण हुआ है। सारस का बिछोह भारतीय लोककथाओं में विरह का प्रतीक है, जिससे कविता में भावनात्मक गहराई और करुणा का संचार होता है।