कविता: यह दीप अकेला
कवि: सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'
काव्यांश - 1
यह दीप अकेला स्नेह भरा
है गर्व भरा मदमाता, पर
इसको भी पंक्ति को दे दो।
कठिन शब्दार्थ:
दीप: दीपक (प्रतीक - व्यक्ति)।
स्नेह: तेल (प्रतीक - प्रेम, भावना)।
मदमाता: मस्ती में चूर, स्वाभिमानी।
पंक्ति: कतार (प्रतीक - समाज)।
संदर्भ:
प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'अंतरा भाग-2' में संकलित, प्रयोगवादी काव्यधारा के प्रवर्तक कवि श्री सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' द्वारा रचित कविता 'यह दीप अकेला' से लिया गया है।
प्रसंग:
इस अंश में कवि ने व्यक्ति (व्यष्टि) और समाज (समष्टि) के पारस्परिक संबंध को दर्शाया है। कवि का मानना है कि व्यक्ति कितना भी गुणवान क्यों न हो, उसकी सार्थकता समाज के साथ जुड़ने में ही है।
व्याख्या:
कवि एक अकेले जलते हुए दीपक को व्यक्ति का प्रतीक मानते हुए कहते हैं कि यह दीपक अकेला होकर भी स्नेह अर्थात् प्रेम और संवेदनाओं से परिपूर्ण है। यह अपनी लौ के प्रकाश पर गर्व करता हुआ अपनी ही मस्ती में चूर है, अर्थात् यह व्यक्ति अपनी क्षमताओं और उपलब्धियों के कारण आत्म-गौरव से भरा है। कवि कहते हैं कि इतने गुणों से युक्त होते हुए भी, इस अकेले दीपक को दीपों की पंक्ति में शामिल कर दो। अर्थात्, इस प्रतिभाशाली और स्वाभिमानी व्यक्ति को समाज का अंग बना दो, ताकि उसके गुणों से समाज प्रकाशित हो और व्यक्ति का महत्व भी बढ़े।
विशेष:
व्यष्टि का समष्टि में विलय होने पर ही उसकी सार्थकता है, इस दार्शनिक भाव को प्रकट किया गया है।
भाषा: सरल, सहज, प्रतीकात्मक खड़ी बोली।
प्रतीक: 'दीप' व्यक्ति का, 'पंक्ति' समाज का और 'स्नेह' प्रेम का प्रतीक है।
अलंकार: 'स्नेह' शब्द में श्लेष अलंकार है (तेल और प्रेम)। रूपक अलंकार भी है।
छंद: मुक्त छंद।
काव्यांश - 2
यह जन है—गाता गीत जिन्हें फिर और कौन गाएगा?
पनडुब्बा—ये मोती सच्चे फिर कौन कृती लाएगा?
यह समिधा—ऐसी आग हठीला बिरला सुलगाएगा।
यह अद्वितीय—यह मेरा—यह मैं स्वयं विसर्जित—
यह दीप, अकेला, स्नेह भरा
है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो।
कठिन शब्दार्थ:
जन: व्यक्ति।
पनडुब्बा: गोताखोर।
कृती: कुशल, रचनाकार।
समिधा: यज्ञ की लकड़ी।
बिरला: कोई-कोई, दुर्लभ।
अद्वितीय: जिसके समान कोई दूसरा न हो।
विसर्जित: समर्पित, त्याग देना।
संदर्भ: पूर्ववत्।
प्रसंग:
यहाँ कवि व्यक्ति की अद्वितीय क्षमताओं को विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट कर रहे हैं, जो समाज के लिए अत्यंत उपयोगी हैं।
व्याख्या:
कवि कहते हैं कि यह व्यक्ति उस विशिष्ट गायक के समान है जो ऐसे अनूठे गीत गाता है, जिन्हें कोई और नहीं गा सकता। यह उस कुशल गोताखोर की तरह है जो गहरे सागर में डुबकी लगाकर समाज के लिए सच्चे मोती (ज्ञान, अनुभव, विचार) लाता है। यह यज्ञ की उस पवित्र समिधा के समान है जो स्वयं जलकर समाज रूपी यज्ञ की अग्नि को प्रज्वलित करती है; ऐसा आत्म-त्याग कोई विरला ही कर सकता है। कवि आगे कहते हैं कि यह व्यक्ति अद्वितीय है, उसमें 'मैं' और 'मेरा' का भाव अर्थात् अहंकार भी है, फिर भी वह स्वेच्छा से स्वयं को समाज के लिए समर्पित करने को तैयार है। इसीलिए इस स्नेह और गर्व से भरे अकेले दीपक को समाज रूपी पंक्ति में स्थान दे देना चाहिए।
विशेष:
व्यक्ति की विशिष्ट प्रतिभाओं और समाज के लिए उसके समर्पण के भाव का सुंदर चित्रण है।
भाषा: तत्सम शब्दों (कृती, समिधा, अद्वितीय) से युक्त है।
अलंकार: रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग है (व्यक्ति को पनडुब्बा, समिधा कहा गया है)।
शैली: उदाहरण देकर अपनी बात को पुष्ट किया गया है।
पंक्तियों की पुनरावृत्ति से मुख्य भाव पर बल दिया गया है।
काव्यांश - 3
यह मधु है—स्वयं काल की मौना का युग-संचय,
यह गोरस—जीवन-कामधेनु का अमृत-पूत पय,
यह अंकुर—फोड़ धरा को रवि को तकता निर्भय,
यह प्रकृत, स्वयंभू, ब्रह्म, अयुतः इसको भी शक्ति को दे दो।
यह दीप, अकेला, स्नेह भरा
है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो।
कठिन शब्दार्थ:
मधु: शहद।
मौना: मौन, चुप्पी।
युग-संचय: युगों का संग्रह।
गोरस: दूध-दही।
कामधेनु: इच्छा पूरी करने वाली गाय।
अमृत-पूत पय: अमृत के समान पवित्र दूध।
धरा: धरती।
रवि: सूर्य।
प्रकृत: स्वाभाविक, मूल।
स्वयंभू: स्वयं उत्पन्न होने वाला।
ब्रह्म: परम सत्ता।
अयुतः: सबसे अलग, अकेला।
संदर्भ: पूर्ववत्।
प्रसंग:
इस काव्यांश में कवि ने व्यक्ति की तुलना प्रकृति के श्रेष्ठ उपादानों से करते हुए उसके महत्व को और अधिक गहराई से स्थापित किया है।
व्याख्या:
कवि कहते हैं कि यह व्यक्ति उस शहद के समान है, जिसे समय ने युगों तक मौन रहकर संचित किया है, अर्थात् यह अनुभवों और ज्ञान का भंडार है। यह व्यक्ति जीवन रूपी कामधेनु का अमृत के समान पवित्र दूध है, जो सभी का पोषण करता है। यह उस नन्हे अंकुर के समान है जो निर्भय होकर धरती का सीना चीरकर सूर्य की ओर देखता है, अर्थात् उसमें असीम विकास की क्षमता और साहस है। कवि व्यक्ति को 'प्रकृत' (स्वाभाविक), 'स्वयंभू' (स्वयं निर्मित) और 'ब्रह्म' (परम सत्ता का अंश) तथा 'अयुत' (अद्वितीय) बताते हुए कहते हैं कि इस शक्ति-संपन्न व्यक्ति को समाज की शक्ति बनाने के लिए समर्पित कर दो। इस स्नेह और गर्व से भरे अकेले दीपक को पंक्ति में मिला दो।
विशेष:
व्यक्ति के महत्व को स्थापित करने के लिए प्रकृति से गहन और दार्शनिक बिंब लिए गए हैं।
भाषा: तत्सम एवं गंभीर शब्दावली का प्रयोग है।
अलंकार: रूपक अलंकार (जीवन-कामधेनु, काल की मौना) का सुंदर प्रयोग है।
यहाँ पंक्ति के स्थान पर 'शक्ति को दे दो' कहकर कवि ने व्यक्ति के समर्पण से समाज को मिलने वाली शक्ति पर बल दिया है।
काव्यांश - 4
यह वह विश्वास, नहीं जो अपनी लघुता में भी काँपा,
वह पीड़ा, जिस की गहराई को स्वयं उसी ने नापा;
कुत्सा, अपमान, अवज्ञा के धुँधुआते कड़ुवे तम में
यह सदा-द्रवित, चिर-जागरूक, अनुरक्त-नेत्र,
उल्लंब-बाहु, यह चिर-अखंड अपनापा।
जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय, इसको भक्ति को दे दो—
यह दीप, अकेला, स्नेह भरा
है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो।
कठिन शब्दार्थ:
लघुता: छोटापन।
कुत्सा: निंदा, बुराई।
अवज्ञा: तिरस्कार, अनादर।
तम: अंधकार।
सदा-द्रवित: हमेशा करुणा से भरा हुआ।
चिर-जागरूक: हमेशा सचेत।
अनुरक्त-नेत्र: प्रेमपूर्ण आँखों वाला।
उल्लंब-बाहु: ऊपर उठी हुई भुजाओं वाला (सबको गले लगाने को तैयार)।
चिर-अखंड अपनापा: हमेशा बना रहने वाला अटूट अपनापन।
जिज्ञासु: जानने की इच्छा रखने वाला।
प्रबुद्ध: ज्ञानी, जागा हुआ।
श्रद्धामय: श्रद्धा से युक्त।
संदर्भ: पूर्ववत्।
प्रसंग:
कविता के इस अंतिम अंश में कवि व्यक्ति के चारित्रिक और आध्यात्मिक गुणों का वर्णन करते हुए उसके सामाजिक समर्पण को भक्ति का रूप दे देते हैं।
व्याख्या:
कवि कहते हैं कि यह व्यक्ति उस दृढ़ विश्वास का प्रतीक है जो अपनी लघुता या अकेलेपन में भी कभी काँपता या घबराता नहीं है। उसने जीवन में ऐसी पीड़ा सही है जिसकी गहराई को उसने स्वयं ही अनुभव किया है। निंदा, अपमान और तिरस्कार के धुएँ जैसे कड़वे अंधकार में भी वह हमेशा करुणा से भरा, सचेत और प्रेमपूर्ण दृष्टि वाला बना रहा। उसकी भुजाएँ सदा दूसरों को अपनाने के लिए उठी रहती हैं और उसका अपनत्व कभी खंडित नहीं होता। यह व्यक्ति ज्ञान का पिपासु, प्रबुद्ध और सदा श्रद्धा से भरा हुआ है। ऐसे व्यक्ति को भक्तिपूर्वक समाज को समर्पित कर देना चाहिए। कवि अंत में फिर दोहराते हैं कि इस स्नेह और गर्व से भरे अकेले दीपक को समाज रूपी पंक्ति का अंग बना दो।
विशेष:
व्यक्ति के मजबूत चरित्र, करुणा और ज्ञान के गुणों पर प्रकाश डाला गया है।
'इसको भक्ति को दे दो' पंक्ति व्यक्ति के समर्पण को एक आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान करती है।
भाषा: भावों के अनुरूप गंभीर और तत्सम प्रधान है।
बिंब: 'धुँधुआते कड़ुवे तम' में दृश्य और स्वाद बिंब का मिश्रण है।
यह कविता व्यक्ति की महत्ता को स्वीकार करते हुए भी सामाजिकता को सर्वोपरि मानती है।