कक्षा 11 (अंतरा - भाग 1) - पाठ: दोपहर का भोजन
(लेखक: अमरकांत)
प्रश्न-अभ्यास
प्रश्न 1. सिद्धेश्वरी ने अपने बड़े बेटे रामचंद्र से मँझले बेटे मोहन के बारे में झूठ क्यों बोला?
उत्तर: सिद्धेश्वरी ने अपने बड़े बेटे रामचंद्र से मँझले बेटे मोहन के बारे में झूठ इसलिए बोला ताकि परिवार में एकता और शांति बनी रहे। रामचंद्र बेरोज़गार होने के कारण चिड़चिड़ा रहता था। सिद्धेश्वरी को डर था कि अगर वह सच बता देगी कि मोहन उसकी कोई इज़्ज़त नहीं करता और उससे बचता फिरता है, तो दोनों भाइयों में कलह हो सकती है। इसलिए, घर में आपसी प्रेम और सौहार्द का माहौल बनाए रखने के लिए उसने झूठ बोला कि मोहन, रामचंद्र को बहुत मानता है और उसे पिता तुल्य समझता है।
प्रश्न 2. कहानी के सबसे जीवंत पात्र के चरित्र की दृढ़ता का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।
उत्तर: कहानी का सबसे जीवंत पात्र सिद्धेश्वरी है। उसकी चारित्रिक दृढ़ता का सबसे बड़ा उदाहरण कहानी के अंत में देखने को मिलता है। दिन भर परिवार के सभी सदस्यों को खाना खिलाने, घर में एकता बनाए रखने के लिए झूठ बोलने और सबकी चिंता करने के बाद, जब वह खुद खाने बैठती है तो उसके लिए केवल एक जली हुई मोटी रोटी बचती है। वह उस एक रोटी को खाने बैठती है, लेकिन अपनी भूख मिटाने के लिए वह आँसू पीकर और लोटे से पानी पीकर ही काम चला लेती है। घोर गरीबी और भूख की इस चरम स्थिति में भी उसका यह त्याग और धैर्य, उसके चरित्र की दृढ़ता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
प्रश्न 3. कहानी के उन प्रसंगों का उल्लेख कीजिए जिनसे गरीबी की विवशता झाँक रही हो।
उत्तर: कहानी में गरीबी की विवशता दर्शाने वाले अनेक प्रसंग हैं:
घर की दयनीय दशा, जहाँ चारों ओर मक्खियाँ भिनभिना रही हैं और दीवारों पर पपड़ियाँ जमी हुई हैं।
भोजन में सिर्फ पानी जैसी पतली दाल, चने की तरकारी और कुछ रोटियाँ होना।
परिवार के सभी सदस्यों (मुंशीजी, रामचंद्र, मोहन) का भूख होने के बावजूद एक-एक रोटी और माँगने में संकोच करना और बहाने बनाना।
सिद्धेश्वरी का यह चिंता करना कि छोटा बेटा प्रमोद दही और चीनी के लिए न मचल पड़े, क्योंकि घर में ये चीजें नहीं हैं।
अंत में सिद्धेश्वरी के हिस्से में सिर्फ एक जली रोटी आना और उसका अपनी भूख मिटाने के लिए पानी पीना।
प्रश्न 4. 'सिद्धेश्वरी का एक से दूसरे सदस्य के विषय में झूठ बोलना परिवार को जोड़ने का अनथक प्रयास था' – इस संबंध में आप अपने विचार लिखिए।
उत्तर: यह कथन पूरी तरह सत्य है। सिद्धेश्वरी द्वारा बोला गया झूठ किसी स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि टूटते हुए परिवार को एक धागे में पिरोए रखने का एक अनथक प्रयास था। गरीबी और बेरोज़गारी के कारण परिवार के सभी सदस्य एक-दूसरे से कटे-कटे और निराश रहते थे। सिद्धेश्वरी जानती थी कि अगर सच सामने आया तो घर में कलह और बढ़ जाएगी। इसलिए, वह एक सदस्य की दूसरे सदस्य से झूठी प्रशंसा करती थी ताकि उनके मन में एक-दूसरे के प्रति सम्मान और स्नेह का भाव बना रहे। उसके ये छोटे-छोटे झूठ परिवार की एकता को बनाए रखने के लिए बोले गए सकारात्मक झूठ थे, जो उसकी ममता और चिंता को दर्शाते हैं।
प्रश्न 5. 'अमरकांत आम बोलचाल की ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं जिससे कहानी की संवेदना पूरी तरह उभरकर आ जाती है।' कहानी के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: अमरकांत की भाषा की यही विशेषता है कि वह सरल और आम बोलचाल की होते हुए भी बहुत प्रभावी होती है। कहानी में उन्होंने 'भिनभिनाना', 'लहकना', 'ओठ चबाना', 'घुड़कियाँ खाना' जैसे सहज शब्दों और मुहावरों का प्रयोग किया है। जब मुंशीजी कहते हैं, "अब उम्र हो गई, हज़म नहीं होता" या सिद्धेश्वरी का चिंता करना कि "कहीं दही-चीनी के लिए न मचल बैठे", तो ये संवाद सीधे हमारे मन को छूते हैं। इस सरल भाषा के कारण ही हम उस परिवार की गरीबी, लाचारी और सिद्धेश्वरी के दर्द को गहराई से महसूस कर पाते हैं और कहानी की संवेदना पूरी तरह उभरकर सामने आती है।
प्रश्न 6. रामचंद्र, मोहन और मुंशी जी खाते समय रोटी न लेने के लिए बहाने करते हैं, उसमें कैसी विवशता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: रामचंद्र, मोहन और मुंशी जी द्वारा रोटी न लेने के लिए बहाने बनाना उनकी गहरी विवशता को दर्शाता है। वे सभी भूखे हैं, लेकिन वे यह भी जानते हैं कि घर में भोजन सीमित है और यदि वे और रोटी ले लेंगे तो शायद दूसरे सदस्य के लिए खाना कम पड़ जाएगा।
रामचंद्र कहता है कि उसका पेट भर गया है।
मोहन भी यही बहाना करता है।
मुंशीजी अपनी उम्र और खराब पाचन का बहाना करते हैं।
यह उनकी गरीबी की विवशता है, जो उन्हें अपनी भूख को दबाकर एक-दूसरे के लिए त्याग करने पर मजबूर करती है। यह एक दर्दनाक स्थिति है जहाँ हर कोई दूसरे की चिंता में अपनी भूख मार रहा है।
प्रश्न 7. सिद्धेश्वरी की जगह आप होते तो क्या करते?
उत्तर: (यह प्रश्न छात्रों के व्यक्तिगत विचार पर आधारित है। यहाँ एक उदाहरण दिया जा रहा है।)
यदि मैं सिद्धेश्वरी की जगह होता/होती, तो शायद मैं भी वही करने की कोशिश करता/करती जो उसने किया। परिवार को जोड़े रखना किसी भी परिस्थिति में पहली प्राथमिकता होती है। हालाँकि, मैं शायद एक बार हिम्मत करके परिवार के सभी सदस्यों को एक साथ बिठाकर घर की वास्तविक आर्थिक स्थिति पर बात करने का प्रयास करता/करती। हो सकता है कि मिलकर बात करने से कोई समाधान निकलता और सबको एक-दूसरे की झूठी तारीफों के बजाय सच्ची सहानुभूति और सहयोग मिलता। लेकिन सिद्धेश्वरी का धैर्य और त्याग सचमुच अनुकरणीय है।
प्रश्न 8. 'रसोई संभालना बहुत ज़िम्मेदारी का काम है' – सिद्ध कीजिए।
उत्तर: 'दोपहर का भोजन' कहानी के आधार पर यह कथन पूरी तरह सिद्ध होता है। सिद्धेश्वरी के लिए रसोई संभालना केवल खाना बनाना नहीं है। यह सीमित संसाधनों में पूरे परिवार का पेट भरने की एक चुनौती है। उसे यह भी ध्यान रखना है कि भोजन सबको पूरा पड़ जाए। इसके अलावा, वह रसोई को एक ऐसे केंद्र के रूप में इस्तेमाल करती है जहाँ से वह परिवार की भावनात्मक एकता को भी संभालती है। वह भोजन परोसते समय ही सबसे बात करती है और घर का माहौल हल्का रखने की कोशिश करती है। इस प्रकार, रसोई संभालना भोजन की व्यवस्था के साथ-साथ परिवार की भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक ज़िम्मेदारी का भी काम है।
प्रश्न 9. आपके अनुसार सिद्धेश्वरी के झूठ सौ सत्यों से भारी कैसे हैं? अपने शब्दों में उत्तर दीजिए।
उत्तर: सिद्धेश्वरी द्वारा बोले गए झूठ सौ सत्यों से भी अधिक भारी (अर्थात मूल्यवान) हैं क्योंकि उनके पीछे का उद्देश्य महान है। एक ऐसा सच जो परिवार को तोड़ दे, सदस्यों के बीच नफ़रत पैदा कर दे, उस सच से कहीं बेहतर वह झूठ है जो परिवार को एकता के सूत्र में बाँधकर रखता है। सिद्धेश्वरी के झूठ किसी को धोखा देने या स्वार्थ के लिए नहीं थे, बल्कि वे प्रेम, त्याग और परिवार को बचाने की ममतामयी भावना से प्रेरित थे। इसलिए, उनकी नीयत और परिणाम को देखते हुए, ये झूठ किसी भी कड़वे सच से कहीं ज़्यादा कीमती और भारी हैं।
प्रश्न 10. आशय स्पष्ट कीजिए –
(क) वह मतवाले की तरह उठी और गगरे से लोटा भर पानी लेकर गट-गट चढ़ा गई।
आशय: इस पंक्ति का आशय सिद्धेश्वरी की तीव्र भूख और शारीरिक कमजोरी से है। दिन भर की मेहनत और तनाव के बाद जब उसे खाने को कुछ नहीं मिला, तो भूख के मारे उसकी हालत ख़राब हो गई थी। वह "मतवाले की तरह" यानी नशे में धुत व्यक्ति की तरह लड़खड़ाते हुए उठी, क्योंकि भूख से उसे चक्कर आ रहे थे। अपनी पेट की आग को शांत करने के लिए उसने जल्दी-जल्दी पानी पिया। यह दृश्य उसकी चरम विवशता और पीड़ा को दिखाता है।
(ख) यह कहकर उसने अपने मँझले लड़के की ओर इस तरह देखा, जैसे उसने कोई चोरी की हो।
आशय: जब रामचंद्र ने पूछा कि मोहन कहाँ है, तो सिद्धेश्वरी ने डरते-डरते कहा कि वह किसी लड़के के यहाँ पढ़ने गया है। यह कहने के बाद उसने अपने बेटे की ओर ऐसे देखा जैसे उसने कोई चोरी की हो। इसका आशय यह है कि वह अपने ही बेटे के सामने झूठ बोलते हुए बहुत अपराध-बोध और डर महसूस कर रही थी। उसे लग रहा था कि उसका झूठ पकड़ा जाएगा, इसलिए वह चोरों की तरह सहमी हुई थी।