अपना मालवा खाऊ-उजाडू सभ्यता में
प्रश्न 1.
मालवा में जब सब जगह बरसात की झड़ी लगी रहती है तब मालवा के जन-जीवन पर इसका क्या असर पड़ता है?
उत्तर :
मालवा में जब सब जगह बरसात की झड़ी लगी रहती है, तब मालवा का सारा जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। बरसात का पानी घरों में घुस आता है। तब कुएँ, बावड़ी और तालाब-तलैया पानी से लबालब भर जाते हैं। नदी-नाले उफनने लगते हैं। फसलें खूब लहलहाने लगती हैं। इससे गाँव की विपुलता का पता चलता है। तब लगता है मालवा खूब पाक्यो है। इस बरसात से जहाँ जन-जीवन प्रभावित होता है, वहीं यह लोगों के जीवन में समृद्धि लाता है। अब मालवा में वैसी बरसात नहीं होती, जैसी पहले हुआ करती थी। अब तो औसत पानी गिरे तो भी लोगों को लगता है कि ज्यादा बरसात हो गई है। चालीस बरसात को वे अत्ति बोलने लगते हैं। अब तो लोगों द्वारा बरसात की झड़ी लगने पर फोन करके पूछा जाने लगता है कि कहीं खतरा तो नहीं उत्पन्न हो गया।
प्रश्न 2.
अब मालवा में वैसा पानी नहीं गिरता, जैसा गिरा करता था। इसके क्या कारण हैं?
उत्तर :
अब मालवा में वैसी बरसात नहीं होती, जैसी पहले हुआ करती थी। इसके कारण हैं-
- कास की औद्योगिक सभ्यता ने सब कुछ उजाड़कर रख दिया है। इससे पर्यावरण बिगड़ा है। इस पर्यावरणीय विनाश से मालवा भी नहीं बच पाया है।
- वातावरण को गर्म करने वाली कार्बन डाइऑक्साइड गैसों ने मिलकर धरती के तापमान को तीन डिग्री सेल्सियस बढ़ा दिया है। वातावरण के गर्म होने से यह सब गड़बड़ी हो रही है।
- अब मालवा के लोग ही मालवा की धरती को उजाड़ने में लगे हैं।
प्रश्न 3.
हमारे आज के इंजीनियर ऐसा क्यों समझते हैं कि वे पानी का प्रबंध जानते हैं और पहले जमाने के लोग कुछ नहीं जानते थे?
उत्तर :
हमारे आज के इंजीनियर अपने आपको बहुत चतुर और बुद्धिमान मानते हैं। उनके विचारानुसार पहले जमाने के लोग कुछ भी नहीं जानते थे। उन्हें अपने बारे में बहुत बड़ी गलतफहमी है। उनके अनुसार ज्ञान पश्चिम से आया था भारत के लोग कुछ नही जानते-समझत थं। उनके मत में रिनसां के वाद ही लोगों में ज्ञांन फा प्रसार हुआ। वं भांत धारणा के शिकार हैं। यह सब उनकी पाश्चात्य शिक्जा एवं तथाकथित ज्ञान के प्रति अंधमोह है।
प्रश्न 4.
मालवा में विक्रमादित्य, भोज और मुंज रिनेसा के बहुत पहले हो गए। पानी के रखरखाव के लिए उन्होंने क्या प्रबंध किए?
उत्तर :
मालवा में विक्रमादित्य, भोज और मुंज आदि राजा पानी का महत्त्व भली प्रकार समझते थे। ये राजा जानते थे कि पठार पर पानी को रोक कर रखना होगा। उन्होंने इसके लिए भरपूर प्रयास किए। उन्होंने तालाब बनवाए और बड़ी-बड़ी बावड़ियाँ बनवाई ताकि बरसात के पानी को रोककर रखा जा सके और धरती के पानी को जीवंत रखा जा सके। हमारे आज के इंजीनियरों ने तालाबों को गाद से भर जाने दिया गया और जमीन के पानी को पाताल से भी निकाल दिया। इससे नदी नाले सूख गए। जिस मालवा में पग-पग पर पानी था, वही मालव सूखा हो गया है
प्रश्न 5.
‘हमारी आज की सभ्यता इन नदियों को अपने गंदे पानी के नाले बना रही है’ – क्यों और कैसे?
उत्तर :
हमारी आज की सभ्यता इन नदियों को गंदे पानी के नाले बना रही है। इसका कारण है आज का औद्योगिक विकास। उद्योगों का कूड़ा-कचरा इन नदियों में गिर रहा है और नदियों कें पानी को गंदला कर रहा है। हम भी अपने शहर की गंदगी को इन नदियों में बहाकर इन्हें गंदे नाले के रूप में परिणत कर रहे हैं। आज की औद्योगिक सभ्यता ने अपसंस्कृति को बढ़ावा दिया है। यह अपसंस्कृति नदियों की पवित्रता पर ध्यान नहीं देती। अब नदियों के प्रति माँ का भाव मिटता चला जा रहा है।
प्रश्न 6.
लेखक को क्यों लगता है कि ‘हम जिसे विकास की औद्योगिक सभ्यता कहते हैं वह उजाड़ की अपसभ्यता है।’ आप क्या मानते हैं?
उत्तर :
लेखक को ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि हम एक गलतफहमी के शिकार हो रहे हैं। जिसे हम विकास की औद्योगिक सभ्यता समझने का भ्रम पाले हुए हैं, वह वास्तव में विकास न होकर उजाड़ की ओर ले जा रही है। यह अपसभ्यता है। पाश्चात्य दृष्टिकोण से अपनाई जा रही सभ्यता हमें कहीं का नहीं छोड़ेगी। यह हमें उजाड़कर रख देगी। यह बर्बाद करने वाली है। यह मानव जाति और प्रकृति दोनों का विनाश करने पर तुली है।
इस सभ्यता ने पर्यावरणीय असंतुलन पैदा कर दिया है, मौसम का चक्र बिगाड़ कर रख दिया है। यह खाऊ-उजाडू सभ्यता यूरोष और अमेरिका की देन है जिसके कारण विकास की औद्योगिक सभ्यता उजाड़ की अपसभ्ययता बन गई है। इससे पूरी दुनिया प्रभावित हुई है, पर्यावरण बिगड़ा है। लेखक की पर्यावरण संबंधी चिता सिफ्फ मालवा तक सीमित न होकर सार्वभौमिक हो गई है। अमेरिका की खाऊ-उजाडू जीवन पद्धति, संस्कृति, सभ्यता तथा अपनी धरती को उजाड़ने में लगे हुए हैं।
प्रश्न 7.
धरती का वातावरण गर्म क्यों हो रहा है? इसमें यूरोप और अमेरिका की क्या भूमिका है? टिप्पणी कीजिए।
उत्तर :
धरती का वातावरण इसलिए गर्म हो रहा है क्योंकि कार्बन डाइऑक्साइड गैसों ने मिलकर धरती के तापमान को तीन डिग्री सेल्सियस बढ़ा दिया है। इसमें यूरोप और अमेरिका की बड़ी भूमिका है। कार्बन डाइऑक्साइड गैसें सबसे ज्यादा अमेरिका और यूरोप के विकसित देशों से ही निकलती हैं। अमेरिका इन्हें रोकने को तैयार नहीं है। वह इस बात को मानता ही नहीं कि धरती के वातावरण के गर्म होने से यह सब गड़बड़ी हो रही है। वह इस खाऊ-उजाडू जीवन पद्धति पर कोई समझौता नहीं करने वाला। अत: धरती के वातावरण के गर्म होने में इन देशों की बहुत बड़ी भूमिका है।