कक्षा 11 (अंतरा - भाग 1) - पाठ 1: ईदगाह
(लेखक: मुंशी प्रेमचंद)
प्रश्न-अभ्यास
प्रश्न 1. 'ईदगाह' कहानी के उन प्रसंगों का उल्लेख कीजिए जिनसे ईद के अवसर पर ग्रामीण परिवेश का उल्लास प्रकट होता है।
उत्तर: 'ईदगाह' कहानी में ईद के अवसर पर ग्रामीण परिवेश का उल्लास निम्नलिखित प्रसंगों से प्रकट होता है:
सुबह की चहल-पहल: ईद की सुबह गाँव में अद्भुत चहल-पहल है। बच्चे सबसे ज़्यादा प्रसन्न हैं। उन्हें मेले में जाने की जल्दी है। वे बार-बार अपने पैसे गिन रहे हैं और मेले में क्या-क्या खरीदेंगे, इसकी योजना बना रहे हैं।
तैयारियाँ: सभी लोग ईदगाह जाने के लिए तैयार हो रहे हैं। किसी के कुरते में बटन नहीं है तो वह सुई-धागा लेने दौड़ रहा है, किसी के जूते कड़े हो गए हैं तो वह उन्हें तेल डालकर मुलायम कर रहा है।
बच्चों का उत्साह: बच्चों का उत्साह चरम पर है। महमूद के पास बारह पैसे और मोहसिन के पास पंद्रह पैसे हैं, जिनसे वे अनगिनत चीजें खरीदने के सपने देख रहे हैं। उनका यह उत्साह पूरे माहौल को उल्लासपूर्ण बना देता है।
ईदगाह की ओर यात्रा: जब गाँव के लोग एक टोली बनाकर ईदगाह की ओर चलते हैं, तो बच्चों का उल्लास देखने लायक होता है। वे दौड़कर आगे निकल जाते हैं और शहर की बड़ी-बड़ी इमारतें, गाड़ियाँ और दुकानें देखकर आश्चर्यचकित होते हैं।
प्रश्न 2. “...उसके अंदर प्रकाश है, बाहर आशा। विपत्ति अपना सारा दलबल लेकर आए, हामिद की आनंद-भरी चितवन उसका विध्वंस कर देगी।” - इस कथन से लेखक का क्या आशय है?
उत्तर: इस कथन का आशय है कि हामिद विषम परिस्थितियों के बावजूद भी निराश और हताश नहीं है।
'अंदर प्रकाश' का अर्थ है कि उसके भीतर आत्मविश्वास, विवेक और सकारात्मकता का प्रकाश है। वह अपनी गरीबी और अनाथ होने के अँधेरे से घिरा नहीं है।
'बाहर आशा' का अर्थ है कि वह भविष्य को लेकर बहुत आशान्वित है। वह यह कल्पना करता है कि उसके अब्बाजान रुपए कमाने गए हैं और अम्मीजान अल्लाह के घर से उसके लिए अच्छी-अच्छी चीजें लाने गई हैं। यह आशा उसे जीवित रखती है।
लेखक कहना चाहते हैं कि हामिद की यह आंतरिक शक्ति और बाहरी आशा इतनी प्रबल है कि बड़ी-से-बड़ी विपत्ति भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। उसकी आनंद से भरी नज़र हर मुसीबत को हराने की क्षमता रखती है।
प्रश्न 3. 'उन्हें क्या खबर कि चौधरी आज आँखें बदल लें, तो यह सारी ईद मुहर्रम हो जाए।' - इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इस कथन का आशय यह है कि गाँव के गरीब लोगों की ईद की खुशियाँ भी कर्ज पर निर्भर हैं।
'चौधरी' गाँव का साहूकार है, जिससे लोगों ने ईद मनाने के लिए पैसे उधार लिए हैं।
'आँखें बदल लेना' एक मुहावरा है, जिसका अर्थ है व्यवहार बदल लेना या पहले जैसा स्नेह न रखना।
इस कथन का मतलब है कि यदि चौधरी आज अपना उधार वापस माँग ले या और पैसे देने से मना कर दे, तो इन लोगों की ईद की सारी खुशियाँ मातम में बदल जाएँगी (जैसे मुहर्रम का त्योहार शोक का प्रतीक है)। यह पंक्ति ग्रामीण जीवन की आर्थिक विवशता और साहूकारों पर उनकी निर्भरता को दर्शाती है, जहाँ त्योहार का उल्लास भी कर्ज की नींव पर टिका होता है।
प्रश्न 4. 'मानों भ्रातृत्व का एक सूत्र इन समस्त आत्माओं को एक लड़ी में पिरोए हुए है।' इस कथन के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए कि 'धर्म तोड़ता नहीं, जोड़ता है'।
उत्तर: यह कथन ईदगाह में एक साथ नमाज़ पढ़ रहे लाखों लोगों के दृश्य से संबंधित है। उस दृश्य में लाखों लोग एक साथ झुकते और एक साथ उठते हैं। वहाँ कोई अमीर-गरीब, ऊँच-नीच या पद का भेद नहीं था; सभी एक समान थे। यह अद्भुत अनुशासन और एकता देखकर ऐसा लगता था मानो भाईचारे (भ्रातृत्व) का कोई अदृश्य धागा उन सभी की आत्माओं को एक माला में पिरो रहा है।
यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि धर्म का वास्तविक स्वरूप लोगों को जोड़ना है, तोड़ना नहीं। जब लोग अपने सच्चे धर्म का पालन करते हैं, तो वे सारे भेदभाव भूलकर एकता और समानता के सूत्र में बँध जाते हैं। इस प्रकार, धर्म मानवता को संगठित करने और प्रेम बढ़ाने का माध्यम बनता है।
प्रश्न 5. निम्नलिखित गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए:
(क) कई बार यही क्रिया होती है...आत्माओं को एक लड़ी में पिरोए हुए है।
प्रसंग: प्रस्तुत गद्यांश मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित कहानी 'ईदगाह' से लिया गया है। इसमें लेखक ने ईदगाह में हो रही सामूहिक नमाज़ के भव्य और एकतापूर्ण दृश्य का वर्णन किया है।
व्याख्या: लेखक बताते हैं कि नमाज़ के दौरान लाखों लोग एक साथ सिजदे में झुकते हैं, घुटनों के बल बैठते हैं और फिर खड़े हो जाते हैं। यह क्रिया कई बार दोहराई जाती है। यह दृश्य इतना अद्भुत और अनुशासित होता है कि मानो बिजली की लाखों बत्तियाँ एक साथ जलें और एक साथ बुझ जाएँ। इस सामूहिक क्रिया में सभी का भेद मिट जाता है और एक गहरी एकता का अनुभव होता है। लेखक को यह दृश्य देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे भाईचारे का एक धागा इन सभी लोगों को एक माला में पिरोए हुए है।
(ख) बुढ़िया का क्रोध...स्वाद से भरा हुआ।
प्रसंग: प्रस्तुत गद्यांश 'ईदगाह' कहानी के अंत से लिया गया है। यह उस क्षण का वर्णन है जब हामिद अपनी दादी अमीना को चिमटा देता है और उसके खरीदने का कारण बताता है।
व्याख्या: जब हामिद बताता है कि उसने चिमटा इसलिए खरीदा ताकि रोटी बनाते समय दादी का हाथ न जले, तो अमीना का सारा क्रोध तुरंत स्नेह में बदल गया। यह स्नेह साधारण नहीं था, बल्कि बहुत गहरा, मूक (बिना शब्दों का) और मजबूत था। लेखक कहते हैं कि यह स्नेह 'रस और स्वाद' से भरा हुआ था, अर्थात् इसमें ममता, वात्सल्य, गर्व और कृतज्ञता जैसे अनेक भाव मिले हुए थे। हामिद के त्याग ने अमीना के हृदय को इस अनोखे और गहरे स्नेह से भर दिया था।
प्रश्न 6. हामिद ने चिमटे की उपयोगिता को सिद्ध करते हुए क्या-क्या तर्क दिए?
उत्तर: हामिद ने अपने दोस्तों के खिलौनों के सामने अपने चिमटे की उपयोगिता सिद्ध करने के लिए निम्नलिखित तर्क दिए:
कंधे पर रखो तो बंदूक हो गया।
हाथ में लिया तो फ़कीरों का चिमटा हो गया।
इससे मंजीरे का काम भी लिया जा सकता है।
उसका चिमटा 'रुस्तम-ए-हिंद' है जो आग, पानी या तूफ़ान में भी डटा रहेगा, जबकि खिलौने टूट जाएँगे।
एक चिमटा ज़मीन पर पटकने से दोस्तों के सारे खिलौने टूट सकते हैं।
प्रश्न 7. गाँव से शहर जानेवाले रास्ते के मध्य पड़नेवाले स्थानों का ऐसा वर्णन लेखक ने किया है मानों आँखों के सामने चित्र उपस्थित हो रहा हो। अपने घर और विद्यालय के मध्य पड़नेवाले स्थानों का अपने शब्दों में वर्णन कीजिए।
उत्तर: (यह प्रश्न छात्रों के व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित है। यहाँ एक उदाहरण दिया जा रहा है।)
मेरे घर से विद्यालय का रास्ता बहुत ही रोचक है। घर से निकलते ही पहले एक बड़ा सा पार्क आता है, जहाँ सुबह-सुबह कई लोग टहलते और व्यायाम करते दिखते हैं। पार्क से आगे एक व्यस्त चौराहा है, जहाँ हमेशा ट्रैफिक पुलिस वाला अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद रहता है। चौराहे को पार करते ही सब्जियों और फलों का एक छोटा सा बाज़ार लगता है, जहाँ से ताज़ी सब्जियों की महक आती है। बाज़ार के बाद एक पुराना मंदिर है, जहाँ से सुबह-शाम भजन की ध्वनि सुनाई देती है। मंदिर से कुछ दूर चलने पर मेरा विद्यालय आ जाता है, जिसका बड़ा सा गेट हमेशा खुला हुआ छात्रों का स्वागत करता है। यह रास्ता हर दिन एक जैसा होते हुए भी नया सा लगता है।
(छात्र अपने स्वयं के अनुभव के आधार पर उत्तर लिखें।)
प्रश्न 8. 'बच्चे हामिद ने बूढ़े हामिद का पार्ट खेला था। बुढ़िया अमीना बालिका अमीना बन गई।' इस कथन में 'बूढ़े हामिद' और 'बालिका अमीना' से लेखक का क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इस कथन में लेखक ने हामिद और अमीना की भूमिकाओं के मनोवैज्ञानिक बदलाव को दर्शाया है।
'बूढ़े हामिद' से आशय: इसका आशय है कि हामिद ने अपनी उम्र से कहीं अधिक परिपक्वता, समझदारी और ज़िम्मेदारी का परिचय दिया। जिस तरह एक बूढ़ा या बड़ा व्यक्ति परिवार की ज़रूरतों का ध्यान रखता है और अपने सुख का त्याग करता है, ठीक उसी तरह हामिद ने अपने बचपन की इच्छाओं (खिलौने, मिठाई) का त्याग कर घर की उपयोगिता की वस्तु (चिमटा) खरीदी।
'बालिका अमीना' से आशय: इसका आशय है कि जब अमीना ने हामिद के इस त्याग और गहरे प्रेम को देखा, तो वह अपनी उम्र और भूमिका भूलकर एक बच्ची की तरह भावुक हो गई। उसका गुस्सा स्नेह में बदल गया और वह एक बच्ची की तरह फूट-फूटकर रोने लगी और अपने हाथ फैलाकर हामिद को दुआएँ देने लगी।
प्रश्न 9. “दामन फैलाकर हामिद को दुआएँ देती जाती थी और आँसू की बड़ी-बड़ी बूँदें गिराती जाती थी। हामिद इसका रहस्य क्या समझता!” - लेखक के अनुसार हामिद, अमीना की दुआओं और आँसुओं के रहस्य को क्यों नहीं समझ पाया?
उत्तर: हामिद एक छोटा बच्चा था। वह यह नहीं समझ सकता था कि उसके चिमटा लाने के पीछे कितना बड़ा त्याग, प्रेम और संवेदनशीलता छिपी है। लेखक के अनुसार, हामिद अमीना के आँसुओं के रहस्य को इसलिए नहीं समझ पाया क्योंकि:
वह अपनी बाल-सुलभ दुनिया में था: उसे इस बात की गहराई का अंदाज़ा नहीं था कि तीन पैसे में अपनी सारी इच्छाओं को मारकर दादी के लिए कुछ लाना कितना बड़ा त्याग है।
अमीना के मिश्रित भावों को समझने में असमर्थ: अमीना के आँसू केवल खुशी के नहीं थे, बल्कि उनमें हामिद के बचपन के छिन जाने का दुख, उसके त्याग पर गर्व, और अपनी गरीबी पर पश्चाताप भी शामिल था। इन जटिल भावनाओं के रहस्य को समझना एक छोटे बच्चे के लिए असंभव था।
प्रश्न 10. हामिद की जगह आप होते तो क्या करते?
उत्तर: (यह प्रश्न छात्रों की कल्पना और मूल्य-परख पर आधारित है। इसका उत्तर व्यक्तिगत होगा।)
यदि मैं हामिद की जगह होता, तो शायद मैं भी वही करता जो हामिद ने किया। अपनी दादी के प्रति प्रेम और उनकी तकलीफ का एहसास मुझे किसी भी खिलौने या मिठाई से ज़्यादा महत्वपूर्ण लगता। यह सच है कि मेले में खिलौनों को देखकर मन ललचाता, लेकिन दादी के जलते हुए हाथों का ख्याल आते ही मैं अपनी इच्छाओं को भूल जाता और उनके लिए चिमटा ही खरीदता। परिवार की खुशी और ज़रूरत अपनी व्यक्तिगत खुशी से बढ़कर होती है।
(वैकल्पिक उत्तर)
यदि मैं हामिद की जगह होता तो शायद मैं अपने तीन पैसों में से कुछ पैसे की मिठाई खा लेता और बाकी पैसों से दादी के लिए चिमटा खरीदने की कोशिश करता। एक बच्चे के रूप में अपनी इच्छाओं पर पूरी तरह काबू पाना बहुत मुश्किल है, लेकिन मैं दादी की ज़रूरत को भी अनदेखा नहीं कर पाता। हामिद का त्याग वास्तव में असाधारण है।