कक्षा 12 हिंदी साहित्य: तुलसीदास - भरत-राम का प्रेम और पद
यहाँ गोस्वामी तुलसीदास के 'भरत-राम का प्रेम' और 'पद' पाठ से संबंधित प्रश्नों के उत्तर राजस्थान बोर्ड के अनुसार दिए गए हैं। साथ ही कवि परिचय और कविता परिचय भी शामिल है।
गोस्वामी तुलसीदास: साहित्यिक परिचय
गोस्वामी तुलसीदास हिंदी साहित्य के भक्ति काल की सगुण धारा के रामभक्ति शाखा के प्रमुख कवि हैं। इनका जन्म सन् 1532 ई. (सं. 1589) में बाँदा जिले के राजापुर गाँव में हुआ माना जाता है, जबकि कुछ विद्वान इनका जन्म सोरों (एटा) में भी मानते हैं। इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे और माता का नाम हुलसी था। इनके बचपन का नाम रामबोला था। दुर्भाग्यवश, जन्म के तुरंत बाद ही माता-पिता का साया सिर से उठ गया और इनका पालन-पोषण एक दासी ने किया, बाद में गुरु नरहरिदास ने इन्हें शिक्षा-दीक्षा दी।
तुलसीदास जी का व्यक्तित्व अत्यंत प्रभावशाली था। वे संस्कृत और अवधी के प्रकांड पंडित थे। उनकी रचनाओं में भारतीय संस्कृति, आदर्शों और मर्यादाओं का उत्कृष्ट चित्रण मिलता है। वे लोकनायक कवि थे जिन्होंने जनसामान्य को मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आदर्शों से जोड़ने का कार्य किया।
प्रमुख रचनाएँ:
रामचरितमानस: इनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध और महाकाव्यात्मक रचना है, जो अवधी भाषा में लिखी गई है। यह लोकजीवन का महाकाव्य है और भारतीय समाज में अत्यंत पूजनीय है।
विनय पत्रिका: ब्रजभाषा में रचित यह ग्रंथ भक्ति और दार्शनिक विचारों का संगम है। इसमें भगवान राम और अन्य देवी-देवताओं से की गई विनय प्रार्थनाएँ हैं।
कवितावली: ब्रजभाषा में रचित यह ग्रंथ कविता, सवैया और घनाक्षरी छंदों में रामकथा का वर्णन करता है।
गीतावली: ब्रजभाषा में रचित यह ग्रंथ पदों में रामकथा का वर्णन करता है।
दोहावली: नीतिपरक दोहों का संग्रह है।
कृष्ण गीतावली: भगवान कृष्ण के जीवन से संबंधित पदों का संग्रह।
पार्वती मंगल, जानकी मंगल, बरवै रामायण, रामाज्ञा प्रश्न, वैराग्य संदीपनी आदि अन्य रचनाएँ हैं।
साहित्यिक विशेषताएँ:
भक्ति भावना: तुलसीदास की कविताओं में दास्य भाव की भक्ति प्रमुख है। वे राम को अपना आराध्य और स्वयं को उनका सेवक मानते हैं।
लोक कल्याण की भावना: उनकी रचनाएँ केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक और नैतिक मूल्यों का भी संदेश देती हैं। उन्होंने समाज में आदर्श स्थापित करने का प्रयास किया।
भाषा पर अधिकार: उन्होंने अवधी और ब्रज दोनों भाषाओं पर पूर्ण अधिकार के साथ काव्य रचना की। उनकी भाषा में लालित्य, प्रवाह और मार्मिकता है।
छंद विधान: उन्होंने दोहा, सोरठा, चौपाई, कविता, सवैया, पद जैसे विविध छंदों का सफलतापूर्वक प्रयोग किया है।
अलंकार योजना: उनकी कविताओं में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, दृष्टांत, अनुप्रास जैसे अलंकारों का स्वाभाविक और सुंदर प्रयोग हुआ है।
आदर्शों की स्थापना: उन्होंने राम के माध्यम से आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श राजा और सीता के माध्यम से आदर्श पत्नी का चित्रण किया है।
तुलसीदास जी का निधन सन् 1623 ई. (सं. 1680) में काशी में हुआ। वे हिंदी साहित्य के उन कवियों में से हैं जिनकी लोकप्रियता आज भी अक्षुण्ण है।
कविता परिचय
1. भरत-राम का प्रेम:
यह अंश गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 'रामचरितमानस' के अयोध्याकांड से लिया गया है। इस प्रसंग में भगवान राम के वनगमन के बाद भरत अपनी माताओं और अयोध्यावासियों के साथ राम को वापस अयोध्या लाने के लिए चित्रकूट जाते हैं। वहाँ पर भरत राम से वन से लौट आने का विनम्र अनुरोध करते हैं। इस अवसर पर भरत अपने प्रेम, त्याग और पश्चाताप की भावना को व्यक्त करते हैं।
इस कविता में भरत के हृदय की पवित्रता, उनका निश्छल प्रेम, त्याग और भ्रातृ-स्नेह का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया गया है। भरत स्वयं को दोषी मानकर राम से क्षमा याचना करते हैं और उनसे अयोध्या लौट चलने का आग्रह करते हैं। यह प्रसंग भरत के चरित्र को और भी उदात्त बनाता है और उन्हें त्याग, प्रेम तथा कर्तव्यपरायणता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करता है। इसमें राम और भरत के अलौकिक प्रेम और आदर्श भ्रातृ संबंध का दर्शन होता है।
2. पद (वन-गमन के बाद माता कौशल्या की दशा):
यह अंश गोस्वामी तुलसीदास के 'गीतावली' से संकलित है। इन पदों में भगवान राम के वनगमन के बाद अयोध्या में माता कौशल्या की दयनीय और विरह-विगलित दशा का अत्यंत हृदयस्पर्शी चित्रण किया गया है। राम, लक्ष्मण और सीता के वन जाने के बाद माता कौशल्या उनके बचपन की वस्तुओं और स्मृतियों में खोई रहती हैं।
इन पदों में माता के वात्सल्य और विरह-वेदना की पराकाष्ठा दिखाई देती है। वे राम की वस्तुओं को देखकर उन्हें निहारती हैं, उनसे बातें करती हैं और उनके लौटने की प्रतीक्षा में अपना समय बिताती हैं। कवि ने माता कौशल्या के माध्यम से एक माँ के हृदय की पीड़ा, ममता और पुत्र वियोग की असहनीय वेदना का सजीव और मार्मिक चित्रण किया है। इसमें मार्मिकता, कोमलता और वात्सल्य रस की प्रधानता है।
प्रश्न-उत्तर: भरत-राम का प्रेम
1. 'हारहिं खेल जितावहिं मोही' भरत के इस कथन का क्या आशय है?
उत्तर: भरत के इस कथन 'हारहिं खेल जितावहिं मोही' का आशय यह है कि भगवान राम बचपन से ही अत्यंत उदार और स्नेही स्वभाव के थे। वे भरत को हमेशा प्रसन्न देखना चाहते थे। जब दोनों भाई मिलकर कोई खेल खेलते थे, तो राम स्वयं जानबूझकर हार जाते थे और भरत को जिता देते थे। यह कथन राम के असीम प्रेम, त्याग और निश्छल स्वभाव को दर्शाता है, जिसमें वे अपने छोटे भाई को प्रसन्न करने के लिए स्वयं हार स्वीकार कर लेते थे। भरत इस बात को याद करके राम के प्रति अपने गहरे प्रेम और कृतज्ञता को व्यक्त कर रहे हैं।
2. 'मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ।' राम के स्वभाव की किन विशेषताओं की ओर संकेत किया गया है?
उत्तर: 'मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ' कहकर भरत ने राम के स्वभाव की निम्नलिखित विशेषताओं की ओर संकेत किया है:
अत्यधिक कृपालु और स्नेही: राम बहुत दयालु और स्नेहिल स्वभाव के थे। वे अपने छोटे भाई भरत पर विशेष कृपा रखते थे।
उदारता और निस्वार्थ प्रेम: राम में अगाध उदारता थी। वे अपने सुख से अधिक दूसरों के सुख का ध्यान रखते थे, जैसा कि खेल में जानबूझकर हारकर भरत को जिताने की बात से स्पष्ट होता है।
क्षमाशील और सहिष्णु: राम में सहनशीलता और क्षमा करने का गुण था। वे किसी की गलती पर भी क्रोधित नहीं होते थे।
सरलता और निश्छलता: राम का स्वभाव अत्यंत सरल और निश्छल था। उनके मन में कोई कपट या छल नहीं था।
मर्यादावादी और आदर्शवादी: राम सदैव मर्यादाओं का पालन करते थे और हर संबंध को आदर्श रूप में निभाते थे।
3. राम के प्रति अपने श्रद्धाभाव को भरत किस प्रकार प्रकट करते हैं, स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: राम के प्रति अपने श्रद्धाभाव को भरत निम्नलिखित प्रकार से प्रकट करते हैं:
आत्म-ग्लानि और पश्चाताप: भरत स्वयं को दोषी मानकर आत्म-ग्लानि से भरे हुए हैं। वे कहते हैं कि राम के वनगमन का कारण अप्रत्यक्ष रूप से वे ही हैं, क्योंकि राजसिंहासन की आकांक्षा से ही यह सब हुआ। उनका पश्चाताप उनकी गहरी श्रद्धा को दर्शाता है।
राम के गुणों का बखान: वे राम के बचपन के स्वभाव और उनकी उदारता का स्मरण करते हैं, जैसे 'हारहिं खेल जितावहिं मोही' की बात कहकर। यह उनके मन में राम के प्रति अगाध सम्मान और श्रद्धा को दिखाता है।
विनम्रता और दीनता: वे अत्यंत विनम्र भाव से अपनी बात रखते हैं और स्वयं को राम का सेवक बताते हैं। उनकी वाणी में दीनता और राम के प्रति समर्पण का भाव स्पष्ट झलकता है।
अयोध्या लौट चलने का आग्रह: राम को वापस अयोध्या ले जाने का उनका अनवरत प्रयास और दृढ़ संकल्प उनके अटूट श्रद्धाभाव का परिचायक है। वे मानते हैं कि राम के बिना अयोध्या सूनी है।
अश्रुपूर्ण नेत्र और भावुकता: जब भरत अपने हृदय की व्यथा व्यक्त करते हैं, तो उनके नेत्रों से अश्रुधारा बह निकलती है, जो उनकी गहन भक्ति और श्रद्धा का प्रमाण है।
4. 'महिं सकल अनरथ कर मूला।' पंक्ति द्वारा भरत के विचारों-भावों का स्पष्टीकरण कीजिए।
उत्तर: 'महिं सकल अनरथ कर मूला' (मैं ही समस्त अनर्थों का मूल हूँ) पंक्ति द्वारा भरत के निम्नलिखित विचारों और भावों का स्पष्टीकरण होता है:
अत्यधिक आत्म-ग्लानि: भरत के मन में राम के वनगमन को लेकर गहरी आत्म-ग्लानि है। वे सोचते हैं कि यदि वे जन्म न लेते या राज्य की आकांक्षा न होती, तो राम को वन न जाना पड़ता। वे स्वयं को इस दुखद घटना का मूल कारण मानते हैं।
निर्दोषता सिद्ध करने की चेष्टा नहीं: वे अपनी निर्दोषता सिद्ध करने का कोई प्रयास नहीं करते, बल्कि स्वयं पर ही दोषारोपण करते हैं। यह उनके अहंकारहीन और सरल स्वभाव को दर्शाता है।
अगाध भ्रातृ-प्रेम: इस कथन में राम के प्रति उनका अगाध भ्रातृ-प्रेम झलकता है। वे राम के कष्टों के लिए स्वयं को जिम्मेदार ठहराकर अपनी पीड़ा व्यक्त करते हैं।
त्याग और वैराग्य की भावना: इस आत्म-दोषारोपण के पीछे उनकी त्याग भावना भी छिपी है। वे राज्य या किसी सुख की कामना नहीं करते, बल्कि राम के दुख से अत्यंत दुखी हैं।
मार्मिकता: यह पंक्ति भरत के हृदय की मार्मिक वेदना और उनके पवित्र चरित्र को उजागर करती है, जहाँ वे अपने प्रिय भाई के दुख के लिए स्वयं को दोषी ठहरा रहे हैं।
5. 'फरि कै कोदव बालि सुसाली। मुकता प्रसव कि संबुक काली।' पंक्ति में छिपे भाव और शिल्प सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भाव सौंदर्य:
इस पंक्ति में भरत अपनी माता कैकेयी और स्वयं के कर्मों पर पश्चाताप करते हुए कहते हैं कि क्या कोदों के खेत में उत्तम धान (साली) उग सकती है? या क्या काली घोंघी से मोती पैदा हो सकते हैं? इसका सीधा अर्थ यह है कि उनकी माता कैकेयी ने जो कुकर्म किया है (राम को वन भिजवाना), उसके कारण वे स्वयं (भरत) कैसे पवित्र और सद्गुणी माने जा सकते हैं। वे अपनी उत्पत्ति और कुल को ही संदेह की दृष्टि से देख रहे हैं। इस पंक्ति में भरत की गहन आत्म-ग्लानि, पश्चाताप, और अपनी माता के कर्मों से उपजी पीड़ा का मार्मिक चित्रण है। वे स्वयं को उस कुल का होकर भी पवित्र नहीं मान पा रहे हैं, जिसके कारण राम को वन जाना पड़ा।
शिल्प सौंदर्य:
भाषा: अवधी भाषा का सुंदर प्रयोग है, जो तुलसीदास की काव्य शैली की विशेषता है।
अलंकार:
दृष्टांत अलंकार: कवि ने अपनी बात को समझाने के लिए दो उदाहरण दिए हैं - कोदों के खेत में धान का न उगना और काली घोंघी से मोती का न उत्पन्न होना। इन उदाहरणों के माध्यम से अपनी बात को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
प्रश्न अलंकार: "मुकता प्रसव कि संबुक काली।" में प्रश्नात्मक शैली का प्रयोग कर भाव की गंभीरता को बढ़ाया गया है।
अनुप्रास अलंकार: 'कोदव बालि', 'संबुक काली' में अनुप्रास की छटा है।
छंद: दोहा-चौपाई छंद का प्रयोग है, जो 'रामचरितमानस' की प्रमुख छंद योजना है।
बिम्ब-योजना: 'कोदव बालि', 'संबुक काली' जैसे बिम्बों का प्रयोग ग्रामीण परिवेश से जुड़े उदाहरणों के माध्यम से बात को अधिक स्पष्ट और ग्राह्य बनाता है।
रस: इसमें करुण रस और शांत रस का समन्वय है, जहाँ भरत की वेदना और पश्चाताप की भावना मुखरित हुई है।
प्रश्न-उत्तर: पद
1. राम के वन-गमन के बाद उनकी वस्तुओं को देखकर माँ कौशल्या कैसा अनुभव करती हैं? अपने शब्दों में वर्णन कीजिए।
उत्तर: राम के वन-गमन के बाद उनकी वस्तुओं को देखकर माँ कौशल्या अत्यंत विरह-विगलित और शोकाकुल अनुभव करती हैं। उनकी दशा किसी भी माँ के पुत्र वियोग की पराकाष्ठा को दर्शाती है। वे राम के बचपन के धनुष-बाण, जूते, वस्त्र आदि को निहारती रहती हैं। उन वस्तुओं को देखकर उन्हें राम का स्मरण हो आता है और वे उन्हीं से बातें करती हैं, जैसे राम अभी उनके सामने ही हों। वे राम की छोटी-छोटी आदतों और उनके व्यवहार को याद करके भावुक हो जाती हैं। कभी वे उनके जूतों को छाती से लगा लेती हैं, तो कभी उनके कपड़ों को छूकर उन्हें महसूस करती हैं। इन वस्तुओं में उन्हें राम की उपस्थिति का आभास होता है और यही उनके जीने का सहारा बन जाता है। उनकी आँखों से लगातार आँसू बहते रहते हैं, और उनका हृदय पुत्र वियोग की अग्नि में जलता रहता है। वे राम के लौटने की आशा में ही दिन बिताती हैं, मानो उनके बिना उनका जीवन अर्थहीन हो गया हो।
2. 'रहि चकि चित्रलिखी सी' पंक्ति का मर्म अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 'रहि चकि चित्रलिखी सी' पंक्ति का मर्म माँ कौशल्या की उस दशा को व्यक्त करता है जब वे राम के वनगमन के बाद उनकी वस्तुओं को देखती हैं। 'चकि' का अर्थ है चकित या स्तब्ध। 'चित्रलिखी सी' का अर्थ है चित्र में बनी हुई मूर्ति के समान, यानी बिल्कुल स्थिर और जड़वत।
जब माँ कौशल्या राम की प्रिय वस्तुओं जैसे जूते, धनुष-बाण आदि को देखती हैं, तो वे इतनी भाव-विभोर और शोक-संतप्त हो जाती हैं कि उनकी सारी चेतना शून्य हो जाती है। वे एकटक उन वस्तुओं को निहारती रहती हैं, मानों किसी चित्र में बनी हुई मूर्ति हों। उनकी आँखें खुली रहती हैं, परंतु उनमें कोई हलचल नहीं होती। उनका शरीर निष्क्रिय हो जाता है और वे जड़वत खड़ी या बैठी रह जाती हैं। यह पंक्ति उनकी गहन विरह-वेदना, स्तब्धता और पुत्र वियोग से उत्पन्न असीम पीड़ा को दर्शाता है। वे इतनी अधिक दुखी और खोई हुई हैं कि उन्हें बाहरी संसार का कोई बोध नहीं रहता। यह माँ के हृदय की उस पराकाष्ठा को दिखाता है, जहाँ दुख इतना गहरा होता है कि व्यक्ति सुध-बुध खो बैठता है।
3. गीतावली से संकलित पद 'राघो एक बार फिरि आवौ' में निहित करुणा और संदेश को अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 'गीतावली' से संकलित पद 'राघो एक बार फिरि आवौ' में निहित करुणा और संदेश निम्नलिखित हैं:
करुणा:
इस पद में माता कौशल्या की पुत्र वियोग से व्याकुलता और हृदय विदारक करुणा का चित्रण है। वे राम से एक बार फिर अयोध्या लौट आने की प्रार्थना करती हैं। उनकी वाणी में एक माँ की असीम वेदना, लाचारी और पुत्र के प्रति अनमोल वात्सल्य छलकता है। वे राम की अनुपस्थिति में अयोध्या और अपने जीवन को सूना और अर्थहीन पाती हैं। वे राम को उनके प्रिय हाथी, घोड़े और प्रजा के दुख का वास्ता देकर बुलाती हैं। उनकी आँखों से निरंतर अश्रुधारा बहती रहती है, और वे राम की बचपन की स्मृतियों में खोई रहती हैं। यह पद हर उस माँ की पीड़ा का प्रतीक है जो अपने प्रिय संतान से दूर होती है।
संदेश:
इस पद में निम्नलिखित संदेश निहित हैं:
मातृ-प्रेम की पराकाष्ठा: यह पद एक माँ के अगाध और निस्वार्थ प्रेम की पराकाष्ठा को दर्शाता है, जहाँ माँ का पूरा अस्तित्व अपनी संतान के इर्द-गिर्द घूमता है।
कर्तव्यपरायणता और मर्यादा का द्वंद्व: राम मर्यादा पुरुषोत्तम थे और उन्होंने अपने पिता के वचन को पूरा करने के लिए वनगमन स्वीकार किया। लेकिन इस पद में माँ की करुणा के माध्यम से कर्तव्य और प्रेम के द्वंद्व को दर्शाया गया है।
लोक-कल्याण की भावना: राम के वन में जाने से केवल परिवार ही नहीं, पूरी अयोध्या प्रजा भी दुखी है। माता कौशल्या इस बात का उल्लेख करके राम को लौटने का आग्रह करती हैं, जिससे राम के राजा के रूप में प्रजा के प्रति कर्तव्य का भी बोध होता है।
संतुलन और समन्वय का आदर्श: तुलसीदास ने इस पद के माध्यम से यह संदेश भी दिया है कि जीवन में विभिन्न संबंधों और कर्तव्यों के बीच समन्वय स्थापित करना कितना महत्वपूर्ण है।
संक्षेप में, यह पद विरह-वेदना, वात्सल्य रस और एक आदर्श पुत्र से पुनर्मिलन की तीव्र आकांक्षा से भरा हुआ है, जो पाठक के मन में करुणा जगाता है।
4. (क) उपमा अलंकार के दो उदाहरण छाँटिए।
(ख) उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग कहाँ और क्यों किया गया है? उदाहरण सहित उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(क) उपमा अलंकार के दो उदाहरण:
"रहि चकि चित्रलिखी सी।"
स्पष्टीकरण: यहाँ माँ कौशल्या की स्तब्ध अवस्था की तुलना (सी) चित्र में बनी हुई मूर्ति (चित्रलिखी) से की गई है, जहाँ उपमेय (कौशल्या की दशा) की उपमान (चित्रलिखी) से साधारण धर्म (स्थिरता, जड़ता) के आधार पर तुलना की गई है।
"कंचन-बदन कमल दल लोचन।" (यह राम के वर्णन से संबंधित हो सकता है, यदि पाठ में यह पंक्ति प्रत्यक्ष रूप से न हो तो 'भरत-राम का प्रेम' या 'पद' से संबंधित कोई और उपमा अलंकार दें। यदि पाठ में नहीं है तो एक सामान्य उदाहरण यहाँ दिया गया है, जो तुलसीदास की शैली में फिट बैठता है।)
स्पष्टीकरण: यहाँ राम के मुख की तुलना सोने (कंचन) से और नेत्रों की तुलना कमल के पत्तों (कमल दल) से की गई है, जो राम के सौंदर्य को व्यक्त करता है।
(ख) उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग कहाँ और क्यों किया गया है? उदाहरण सहित उल्लेख कीजिए।
उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग:
उत्प्रेक्षा अलंकार वहाँ होता है जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाती है, और इसे अक्सर 'मनु', 'मानो', 'जनु', 'जानो', 'ज्यों' जैसे वाचक शब्दों से व्यक्त किया जाता है।
उदाहरण:
'भरत-राम का प्रेम' या 'पद' में उत्प्रेक्षा अलंकार का एक प्रमुख उदाहरण यह है:
"देखि सुभाउ सुर तरु सम पाला। मैं केहि हेतु करौं निज कुचाला॥"
*(यहाँ सीधे 'मानो' आदि शब्द नहीं हैं, लेकिन 'सुर तरु सम पाला' में 'सम' उपमा का भी संकेत देता है, उत्प्रेक्षा का स्पष्ट उदाहरण खोजने पर यह पंक्ति मिलेगी - यदि पाठ में मिलती है।)
यदि पाठ में सीधा 'जनु/मनु' वाला उदाहरण न हो, तो हम एक ऐसा उदाहरण दे सकते हैं जहाँ संभावना व्यक्त की गई हो।
एक संभावित उदाहरण (जो गीतावली या रामचरितमानस में मिलता है और पाठ के अनुकूल हो सकता है):
"मनहुँ रंग स्याम स्याम हीं भीजे, जनु कारी घटरंग न भीजै।" (यह थोड़ा भिन्न प्रसंग का है, लेकिन उत्प्रेक्षा का स्पष्ट उदाहरण है)।
पाठ से संबंधित एक और संभावित उदाहरण (यदि प्रत्यक्ष रूप से 'जनु/मनु' न हो तो, संभावना व्यक्त करने पर):
"सकुचि सनेहँ समुझि मन माहीं। तासु करम किधि जाहिं सिराहीं।।" (यह प्रत्यक्ष उत्प्रेक्षा नहीं है, संभावना है।)
यदि पाठ में सीधा उदाहरण न हो, तो तुलसीदास की अन्य रचना से एक प्रसिद्ध उदाहरण दिया जा सकता है, जो उनके शिल्प को दर्शाता है, और संकेत किया जा सकता है कि इस पाठ में प्रत्यक्ष उदाहरण मिलना कठिन है, लेकिन उनकी शैली में इसका प्रयोग बहुतायत से होता है:
"पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े। जनु सानुज धनु भानु अखाड़े।" (रामचरितमानस से)
स्पष्टीकरण: यहाँ राम के शरीर में पुलकन होने पर, उनकी तुलना ऐसी की गई है मानो (जनु) धनुष यज्ञ में सूर्य का साक्षात तेज प्रकट हुआ हो।
प्रयोग और कारण:
उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग काव्य में कल्पनाशीलता, भावों की गहनता और सौंदर्य वृद्धि के लिए किया जाता है। यह पाठक को एक सामान्य वस्तु में असाधारण गुण या स्थिति की कल्पना करने पर विवश करता है, जिससे काव्य अधिक प्रभावशाली और अर्थपूर्ण बन जाता है। इससे कवि अपनी बात को और अधिक सजीव और मार्मिक बना पाते हैं। यह किसी स्थिति की गंभीरता या किसी व्यक्ति के गुणों की उत्कृष्टता को बढ़ा-चढ़ाकर व्यक्त करने में सहायक होता है।
5. पठित पदों के आधार पर सिद्ध कीजिए कि तुलसीदास का भाषा पर पूरा अधिकार था?
उत्तर: पठित पदों 'भरत-राम का प्रेम' और 'पद' के आधार पर यह सिद्ध होता है कि गोस्वामी तुलसीदास का भाषा पर पूर्ण अधिकार था। इसके प्रमाण निम्नलिखित हैं:
अवधी और ब्रज दोनों पर अधिकार: 'भरत-राम का प्रेम' अंश अवधी भाषा में है, जबकि 'पद' ब्रजभाषा में रचित है। तुलसीदास ने दोनों भाषाओं में समान कुशलता से रचनाएँ की हैं, जो उनकी बहुभाषाविदता और भाषा पर गहरी पकड़ को दर्शाता है। वे आवश्यकतानुसार दोनों भाषाओं का प्रयोग कर सकते थे।
भावानुरूप भाषा का प्रयोग:
'भरत-राम का प्रेम' में भरत के हृदय की पीड़ा, पश्चाताप और मर्यादा को व्यक्त करने के लिए संयत, गंभीर और कहीं-कहीं तर्कपूर्ण अवधी का प्रयोग किया गया है।
'पद' में माता कौशल्या के वात्सल्य, विरह और करुण भावों को व्यक्त करने के लिए ब्रजभाषा की मधुरता, कोमलता और मार्मिकता का सफल प्रयोग किया गया है। यह दर्शाता है कि वे भाव के अनुरूप भाषा का चयन करने में सक्षम थे।
शब्दावली का चयन: उन्होंने संस्कृत के तत्सम शब्दों के साथ-साथ तद्भव और लोकप्रचलित शब्दों का भी सुंदर प्रयोग किया है, जिससे भाषा में सहजता और ग्राह्यता आती है। उदाहरण के लिए, 'अनरथ', 'सुभाऊ', 'सरु', 'चित्रलिखी', 'कोदव', 'साली' आदि।
छंदों पर अधिकार: उन्होंने दोहा, चौपाई (भरत-राम का प्रेम) और पद (पद) जैसे विभिन्न छंदों का सफल प्रयोग किया है। प्रत्येक छंद की अपनी गति, यति और लय होती है, जिस पर उनका पूर्ण नियंत्रण था।
अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग: उनकी कविताओं में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, दृष्टांत, अनुप्रास जैसे अलंकारों का प्रयोग केवल सौंदर्य वृद्धि के लिए नहीं, बल्कि भावों को अधिक प्रभावी ढंग से व्यक्त करने के लिए स्वाभाविक रूप से हुआ है। वे अलंकारों का प्रयोग ठूँसकर नहीं करते, बल्कि वे काव्य का सहज हिस्सा बन जाते हैं।
मुहावरों और लोकोक्तियों का प्रयोग: उनकी भाषा में मुहावरे और लोकोक्तियों का भी सुंदर प्रयोग मिलता है, जो उनकी भाषा को जीवंत और प्रभावशाली बनाता है।
इन सभी विशेषताओं से स्पष्ट है कि तुलसीदास ने अपनी भावनाओं और विचारों को व्यक्त करने के लिए भाषा को एक सशक्त माध्यम के रूप में प्रयुक्त किया। उनका भाषा पर इतना अधिकार था कि वे उसे अपनी इच्छानुसार मोड़ सकते थे, जिससे काव्य में अपेक्षित प्रभाव और सौंदर्य का सृजन हो सके।