बसंत आया
कवि परिचय: रघुवीर सहाय
रघुवीर सहाय हिंदी साहित्य के प्रमुख कवि, पत्रकार और आलोचक थे। उनका जन्म 9 दिसंबर 1929 को लखनऊ, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. किया। वे 'प्रतीक', 'कल्पना' और 'दिनमान' जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं से जुड़े रहे और 'दिनमान' के संपादक भी रहे। रघुवीर सहाय को उनकी कविताओं के लिए 1982 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी कविताओं में समकालीन जीवन की विसंगतियों, राजनीतिक भ्रष्टाचार और आम आदमी के दुख-दर्द को मुखरता से व्यक्त किया गया है। उनकी भाषा सीधी, सपाट और व्यंग्यात्मक होती है। उनकी प्रमुख काव्य कृतियाँ हैं: 'सीढ़ियों पर धूप में', 'आत्महत्या के विरुद्ध', 'हँसो हँसो जल्दी हँसो', 'लोग भूल गए हैं'। उनका निधन 30 दिसंबर 1990 को हुआ।
कविता परिचय: बसंत आया
'बसंत आया' कविता रघुवीर सहाय की एक व्यंग्यात्मक कविता है। इस कविता में कवि ने आधुनिक शहरी जीवन शैली पर कटाक्ष किया है, जहाँ मनुष्य प्रकृति से कटकर यंत्रवत जीवन जी रहा है। कवि दिखाता है कि किस प्रकार मनुष्य प्रकृति के सबसे मनमोहक ऋतु बसंत के आगमन को भी सहज रूप से महसूस नहीं कर पाता। उसे बसंत के आने की खबर दफ्तर से या कैलेंडर से मिलती है। पेड़ों पर पत्ते आने, कोयल की कूक, हवा का चलना जैसे प्राकृतिक बदलावों को वह अनुभव नहीं कर पाता। कवि के अनुसार, शहरी जीवन की आपाधापी में मनुष्य इतना उलझ गया है कि वह प्रकृति के सहज सौंदर्य का आनंद लेने का समय ही नहीं निकाल पाता। यह कविता प्रकृति और मनुष्य के बीच बढ़ती दूरी को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है।
प्रश्नोत्तर:
बसंत आगमन की सूचना कवि को कैसे मिली?
कवि को बसंत आगमन की सूचना दफ्तर में कैलेंडर देखकर या दफ्तर के किसी काम से जाते हुए, सहसा सड़क पर पड़े कुछ पत्तों को देखकर मिली। उसे यह सूचना किसी प्राकृतिक संकेत से नहीं, बल्कि एक औपचारिक या आकस्मिक तरीके से प्राप्त हुई।
'कोई छह बजे सुबह... फिरकी सी आई, चली गई'- पंक्ति में निहित भाव स्पष्ट कीजिए।
इस पंक्ति में कवि शहरी जीवन की आपाधापी और प्रकृति से अलगाव को व्यक्त करता है। 'कोई छह बजे सुबह' समय की पाबंदी और दिनचर्या के बंधन को दिखाता है। 'फिरकी सी आई, चली गई' का अर्थ है कि बसंत की सुबह की ताज़ी हवा का झोंका आया तो सही, लेकिन वह इतनी तेज़ी से आया और चला गया कि कवि उसे ठीक से महसूस नहीं कर पाया। यह आधुनिक जीवन की व्यस्तता और संवेदनहीनता को दर्शाता है जहाँ मनुष्य के पास प्रकृति के छोटे-छोटे सुखों को अनुभव करने का भी समय नहीं है। यह भाव शहरी मनुष्य की प्रकृति से बढ़ती दूरी और प्राकृतिक सौंदर्य के प्रति उसकी उदासीनता को उजागर करता है।
अलंकार बताइए-
(क) बड़े-बड़े पीपरावर पते - पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार (बड़े-बड़े)
(ख) कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो - उपमा अलंकार (सुबह की तुलना गरम पानी से नहाई हुई स्त्री से)
(ग) खिली हुई हुई हवा आई, फिरको-सी आई, चली गई - उपमा अलंकार (हवा की तुलना फिरकी से)
(घ) कि दहर-दहर दहके कहीं ढाक के जंगल - पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार (दहर-दहर) और स्वभावोक्ति अलंकार (ढाक के जंगलों का स्वाभाविक वर्णन)
किन पंक्तियों से ज्ञात होता है कि आज मनुष्य प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य की अनुभूति से वंचित है?
निम्नलिखित पंक्तियों से ज्ञात होता है कि मनुष्य प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य की अनुभूति से वंचित है:
"और यह कैलेंडर से मालूम था
अमुक दिन / 'बसंत पंचमी' / और दफ्तर की छुट्टी थी।"
"और यह शहर अपनी ही धूप में सूख रहा था। / कोई छह बजे सुबह... फिरकी सी आई, चली गई।"
"आज जब मैं सुबह की सैर पर निकला / तो देखा / सड़क पर / कुछ नए पत्ते / पीपलों के। / और कुछ ऐसे ही / जैसे कल के / पुराने पत्तों का ढेर।"
इन पंक्तियों से स्पष्ट होता है कि कवि को बसंत आगमन की सूचना कैलेंडर और दफ्तर की छुट्टी से मिलती है, न कि प्रकृति के सहज बदलावों से। वह हवा के झोंकों या पत्तों के गिरने को भी सामान्य ढंग से ही देखता है, उनमें कोई विशेष सौंदर्य नहीं खोज पाता।
'प्रकृति मनुष्य की सहचरी है' इस विषय पर विचार व्यक्त करते हुए आज के संदर्भ में इस कथन की वास्तविकता पर प्रकाश डालिए।
'प्रकृति मनुष्य की सहचरी है' यह कथन प्राचीन काल से ही सत्य रहा है। मनुष्य का जन्म प्रकृति में हुआ, वह प्रकृति पर ही आश्रित रहा और प्रकृति के सान्निध्य में ही उसका विकास हुआ। प्रकृति ने उसे भोजन, जल, आश्रय और जीवन के लिए आवश्यक हर वस्तु प्रदान की। लेकिन आज के संदर्भ में, विशेषकर शहरी जीवन में, इस कथन की वास्तविकता पर प्रश्नचिह्न लग गया है। आधुनिक मनुष्य ने विकास और भौतिकता की दौड़ में प्रकृति से अपना नाता तोड़ लिया है। वह कंक्रीट के जंगलों में रहता है, प्रदूषण से घिरा है और प्रकृति के सहज सौंदर्य को देखने-अनुभव करने का समय उसके पास नहीं है। 'बसंत आया' कविता इसी बात का प्रमाण है कि आज मनुष्य बसंत जैसे मधुर ऋतु के आगमन को भी कैलेंडर या दफ्तर की छुट्टी से जोड़कर देखता है, न कि पेड़ों पर आए नए पत्तों, कोयल की कूक या हवा की ठंडक से। यह दिखाता है कि मनुष्य ने प्रकृति को अपनी सहचरी मानना बंद कर दिया है और उसे केवल उपयोग की वस्तु बना लिया है। इसके परिणामस्वरुप वह तनाव, अवसाद और कई स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त हो रहा है, क्योंकि प्रकृति से कटाव उसे मानसिक और शारीरिक रूप से भी बीमार कर रहा है।
'बसंत आया' कविता में कवि की चिंता क्या है?
'बसंत आया' कविता में कवि की मुख्य चिंता यह है कि आधुनिक मनुष्य प्रकृति से दूर होता जा रहा है और प्रकृति के सहज सौंदर्य को अनुभव करने की उसकी संवेदनशीलता समाप्त होती जा रही है। वह भौतिकवादी जीवन शैली और शहरी आपाधापी में इतना व्यस्त हो गया है कि उसे प्रकृति के बदलावों जैसे बसंत के आगमन का भी सहज बोध नहीं होता। उसे ऋतुओं के परिवर्तन की सूचना कैलेंडर से या औपचारिक माध्यमों से मिलती है। कवि इस बात पर दुख व्यक्त करता है कि मनुष्य अपनी जड़ों से कट गया है और प्रकृति के साथ उसका नैसर्गिक संबंध टूट गया है। यह चिंता सिर्फ प्रकृति के प्रति उदासीनता तक सीमित नहीं है, बल्कि मनुष्य के जीवन की नीरसता, संवेदनहीनता और मशीनीपन को भी दर्शाती है। कवि चाहता है कि मनुष्य प्रकृति से फिर से जुड़े और उसके सौंदर्य का सहज आनंद ले।
तोड़ो
कवि परिचय: रघुवीर सहाय
(कवि परिचय 'बसंत आया' कविता के साथ दिया गया है, जो यहाँ भी लागू होता है।)
कविता परिचय: तोड़ो
'तोड़ो' कविता रघुवीर सहाय की एक प्रेरणादायक और सृजनात्मक कविता है। यह कविता सृजन के लिए बाधक तत्वों को तोड़ने और नए निर्माण के लिए भूमि तैयार करने का आह्वान करती है। कवि यह मानता है कि कुछ भी नया रचने या उगाने से पहले पुरानी, अनुपयोगी और बाधक चीजों को हटाना आवश्यक है। यहाँ 'तोड़ना' केवल भौतिक विध्वंस नहीं, बल्कि मानसिक रूढ़ियों, जड़ताओं और अवरोधों को तोड़ने का प्रतीक है। खेत में फसल उगाने के लिए जिस तरह पथरीली जमीन और बंजर भूमि को तोड़कर, उपजाऊ बनाया जाता है, उसी प्रकार मन में नए विचारों, भावनाओं और सृजन के अंकुरण के लिए मन की ऊब, उदासीनता और निराशा जैसी बाधाओं को तोड़ना ज़रूरी है। कविता एक सकारात्मक संदेश देती है कि सृजन के लिए पहले विध्वंस की, बाधाओं को दूर करने की आवश्यकता होती है।
प्रश्नोत्तर:
'पत्थर' और 'चट्टान' शब्द किसके प्रतीक हैं?
'पत्थर' और 'चट्टान' शब्द यहाँ उन सभी कठोर, अनुपयोगी और बाधक तत्वों के प्रतीक हैं जो सृजन के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करते हैं। ये खेत की उस बंजर, पथरीली भूमि के प्रतीक हैं जो फसल उगने नहीं देती। मानसिक स्तर पर, ये मन की जड़ता, ऊब, निराशा, रूढ़ियों, परंपराओं और उन नकारात्मक विचारों के प्रतीक हैं जो व्यक्ति को कुछ नया सोचने या करने से रोकते हैं। ये सृजनात्मकता के विरोधी तत्व हैं।
भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए-
मिट्टी में रस होगा ही जब वह पोसेगी बीज को
इस पंक्ति में कवि ने सृजन प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण सत्य को उजागर किया है। इसका भाव यह है कि जिस प्रकार खेत की मिट्टी में जब पोषक तत्व (रस) होंगे, तभी वह बीज को पोषण देकर अंकुरित कर पाएगी और उससे फसल उग पाएगी, उसी प्रकार मनुष्य के मन में भी जब सकारात्मक भावनाएँ, उत्साह और उर्वर विचार होंगे, तभी वह किसी नए विचार, भावना या सृजनात्मक कार्य को जन्म दे पाएगा। यदि मिट्टी बंजर है या मन उदासीन और हतोत्साहित है, तो सृजन संभव नहीं है। यह पंक्ति सृजन के लिए अनुकूल परिस्थितियों और आंतरिक प्रेरणा के महत्व को दर्शाती है।
हम इसको क्या कर डालें अपने मन की खोज को?
तोड़ो तोड़ो तोड़ो
इन पंक्तियों में कवि मनुष्य के मन में व्याप्त ऊब (boreiyat) और निराशा को तोड़ने का आह्वान करता है। 'मन की खोज' से तात्पर्य है मन की आंतरिक स्थिति, उसकी निराशा, बेचैनी या निष्क्रियता। कवि कहता है कि हमारे मन में जो नीरसता, उदासीनता या सृजनहीनता भरी है, उसे तोड़ना आवश्यक है। जिस प्रकार पथरीली भूमि को तोड़कर उपजाऊ बनाया जाता है, उसी प्रकार मन की इस बांझपन को भी 'तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो' के माध्यम से समाप्त करके, उसे नए विचारों और सृजन के लिए तैयार करना है। यह पंक्तियाँ मन के आंतरिक अवरोधों को दूर करने और उसे सकारात्मक ऊर्जा से भरने की प्रेरणा देती हैं।
कविता का आरंभ 'तोड़ो तोड़ो तोड़ो' से हुआ है और अंत 'गौडो गौडो गौडो' से। विचार कीजिए कि कवि ने ऐसा क्यों किया?
कविता का आरंभ 'तोड़ो तोड़ो तोड़ो' से और अंत 'गौडो गौडो गौडो' (खोदो खोदो खोदो) से होना कवि के गहन संदेश को दर्शाता है।
आरंभ में 'तोड़ो': कविता की शुरुआत में 'तोड़ो' शब्द का प्रयोग उन बाधक तत्वों को हटाने पर बल देता है जो सृजन के लिए अनुपयोगी हैं। ये पत्थर, चट्टान, मन की ऊब, निराशा और जड़ता के प्रतीक हैं। कवि कहता है कि कुछ भी नया रचने से पहले, हमें इन अवरोधों को नष्ट करना होगा, उनसे मुक्ति पानी होगी। यह एक प्रकार से भूमि तैयार करने की प्रारंभिक और कठोर प्रक्रिया है।
अंत में 'गौडो गौडो गौडो': कविता का अंत 'गौडो गौडो गौडो' (खोदो) से होता है, जो तोड़ने के बाद की प्रक्रिया है। तोड़ने से भूमि समतल और ढीली होती है, लेकिन उसे फसल बोने लायक बनाने के लिए गहराई तक 'गौडना' (खोदना) पड़ता है, ताकि मिट्टी की ऊपरी परत टूटकर उपजाऊ बने और बीज को गहराई में स्थान मिल सके। इसी प्रकार, मन की ऊब को तोड़ने के बाद, मन को और गहराई तक खोजना, उसे समझना और उसमें नए विचारों के लिए जगह बनाना आवश्यक है। यह सृजन के लिए मानसिक और भावनात्मक स्तर पर गहन तैयारी को दर्शाता है।
कवि ने ऐसा इसलिए किया है ताकि वह यह संदेश दे सके कि सृजन एक बहुआयामी प्रक्रिया है। यह केवल ऊपरी तौर पर बाधाओं को हटाने से नहीं होता, बल्कि एक गहन आंतरिक तैयारी, आत्म-चिंतन और मन को उपजाऊ बनाने की प्रक्रिया से होकर गुजरता है। 'तोड़ो' विध्वंस का प्रतीक है, जो सृजन के लिए आवश्यक है, और 'गौडो' गहराई में जाकर तैयारी का प्रतीक है, जो नए अंकुरण के लिए अनिवार्य है।
ये झूठे बंधन टूटें
तो धरती को हम जानें
यहां पर झूठे बंधनों और धरती को जानने से क्या अभिप्राय है?
इन पंक्तियों में 'झूठे बंधन' से अभिप्राय उन सामाजिक, मानसिक और वैचारिक रूढ़ियों, पूर्वाग्रहों, परंपराओं और संकीर्णताओं से है जो मनुष्य को खुलकर सोचने, समझने और जीवन को यथार्थ रूप में जानने से रोकते हैं। ये ऐसे अनावश्यक बंधन हैं जो मनुष्य की चेतना को सीमित करते हैं और उसे प्रकृति तथा वास्तविकता से दूर ले जाते हैं।
'धरती को जानने' से अभिप्राय है वास्तविक जीवन को उसके सहज और मौलिक रूप में समझना, प्रकृति से जुड़ना, सत्य को स्वीकार करना और जीवन के गूढ़ रहस्यों व सौंदर्य का अनुभव करना। यह जीवन और अस्तित्व के प्रति एक गहरी समझ और जुड़ाव को दर्शाता है, जो तभी संभव है जब हम उन सभी कृत्रिम और झूठे बंधनों से मुक्त हो जाएँ जो हमारी दृष्टि को धुंधला करते हैं। कवि चाहता है कि मनुष्य इन बंधनों को तोड़कर एक मुक्त और संवेदनशील चेतना के साथ यथार्थ को समझे।
'आधे-आधे गाने' के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?
'आधे-आधे गाने' के माध्यम से कवि अधूरेपन, असंतोष और अपूर्णता की स्थिति को व्यक्त करना चाहता है। यह मन की उस ऊब, निराशा और सृजनहीनता की स्थिति का प्रतीक है जहाँ व्यक्ति कुछ पूरा नहीं कर पाता। जब मन में उदासीनता होती है, तो सृजनात्मक ऊर्जा का अभाव होता है, और ऐसे में कोई भी कार्य या भावना पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाती। एक गीत तभी पूरा होता है जब उसमें लय, ताल और भाव का पूर्ण सामंजस्य हो, लेकिन जब मन ही ऊब से भरा हो, तो केवल आधे-अधूरे विचार या भावनाएँ ही पनप पाती हैं, जो पूर्ण सृजन को जन्म नहीं दे पातीं। कवि 'आधे-आधे गाने' को तोड़कर पूर्णता और समग्रता की ओर बढ़ने का आह्वान करता है, जहाँ मन की ऊब समाप्त हो और पूर्ण सृजन संभव हो सके।