जीवन परिचय एवं शिक्षा
- जन्म वर्ष एवं स्थान: 1934 में बलिया ज़िले के चकिया गाँव में हुआ।
- निधन: 2018 में।
- उच्च शिक्षा: काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की।
- पीएच.डी. विषय: 'आधुनिक हिंदी कविता में बिंब-विधान' विषय पर पीएच.डी. की।
- कार्यक्षेत्र: गोरखपुर में हिंदी के प्राध्यापक रहे और तत्पश्चात जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में भारतीय भाषा केंद्र में हिंदी के प्रोफेसर पद से अवकाश प्राप्त किया।
काव्यगत विशेषताएँ एवं शैली
- मूलतः मानवीय संवेदनाओं के कवि हैं।
- अपनी कविताओं में बिंब-विधान पर अत्यधिक बल दिया है।
- कविताओं में शोर-शराबा न होकर विद्रोह का शांत और संयत स्वर उभरता है।
- भाषा नम्य (लचीली), पारदर्शी, ऋजु और बेलौस है। शिल्प में बातचीत की सहजता और अपनापन मिलता है।
प्रमुख रचनाएँ
- काव्य संग्रह (कुल सात):
- अभी बिल्कुल अभी
- ज़मीन पक रही है
- यहाँ से देखो
- अकाल में सारस
- उत्तर कबीर तथा अन्य कविताएँ
- बाघ
- टालस्टाय और साइकिल
- आलोचनात्मक पुस्तकें: कल्पना और छायावाद, आधुनिक हिंदी कविता में बिंब विधान का विकास
- निबंध संग्रह: मेरे समय के शब्द, कब्रिस्तान में पंचायत
- प्रतिनिधि कविताएँ: चुनी हुई कविताओं का संग्रह
- संपादित कार्य: ताना-बाना (विविध भारतीय भाषाओं का हिंदी में अनूदित काव्य संग्रह)
पुरस्कार एवं सम्मान
- साहित्य अकादमी पुरस्कार: 1989 में 'अकाल में सारस' काव्य संग्रह पर।
- अन्य प्रमुख सम्मान:
- मैथिलीशरण गुप्त राष्ट्रीय सम्मान (1994, मध्य प्रदेश शासन)
- कुमारन आशान पुरस्कार
- व्यास सम्मान
- दयावती मोदी पुरस्कार
1. 'बनारस' कविता का सार एवं महत्वपूर्ण बिंदु
- मुख्य विषय: इस कविता में प्राचीनतम शहर 'बनारस' के सांस्कृतिक वैभव और उसके ठेठ बनारसीपन को दर्शाया गया है।
- सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्व:
- बनारस भगवान शिव की नगरी है तथा गंगा नदी के साथ जुड़ी आस्था का केंद्र है।
- यहाँ काशी और गंगा के सान्निध्य से मोक्ष की अवधारणा जुड़ी हुई है।
- बनारस की विशेषताएँ/चित्रण:
- कविता में गंगा, गंगा के घाट, मंदिर तथा घाटों के किनारे बैठे भिखारियों के कटोरों का सुंदर चित्रण किया गया है।
- शहर के दृश्य: गंगा में बँधी नाव, मंदिरों-घाटों पर जलते दीप, कभी न बुझने वाली चिताग्नि तथा हवन से उठता हुआ धुआँ।
- बनारस का चरित्र:
- बनारस में हर कार्य अपनी 'रौ' (अपनी गति/मस्त लय) में होता है।
- बनारस आस्था, श्रद्धा, विरक्ति, विश्वास, आश्चर्य और भक्ति का मिला-जुला रूप है।
- यहाँ अति प्राचीनता, आध्यात्मिकता और भव्यता के साथ आधुनिकता का समाहार देखने को मिलता है।
- शिल्प एवं भाषा-शैली:
- यह कविता भाषा की दृष्टि से सरल है, लेकिन अर्थ के स्तर पर गहरी है।
- कविता का शिल्प विवरणात्मक (विवरण देने वाला) है और यह कवि की सूक्ष्म दृष्टि का परिचय देता है।
2. 'दिशा' कविता का सार एवं महत्वपूर्ण बिंदु
- मुख्य विषय: यह कविता बाल मनोविज्ञान (बच्चों की सोच/मानसिकता) से संबंधित है।
- मूल घटना/प्रसंग:
- कवि पतंग उड़ाते हुए एक बच्चे से पूछता है— "हिमालय किधर है?"
- बालक बाल-सुलभ (सहज) भाव से उत्तर देता है— "हिमालय उधर है, जिधर मेरी पतंग भागी जा रही है।"
- कविता का मुख्य संदेश/अर्थ:
- हर व्यक्ति का अपना यथार्थ (सत्य) होता है: बच्चे यथार्थ को अपनी दुनिया और अपने दृष्टिकोण से देखते हैं।
- कवि को बच्चे की यह बाल-सुलभ समझ (संज्ञान) बहुत प्रभावित करती है।
- यह कविता यह संदेश देती है कि हम बच्चों से भी कुछ-न-कुछ नया सीख सकते हैं।
- विशेषता:
- यह कविता आकार में छोटी (लघु) है और इसकी भाषा अत्यंत सहज एवं सरल है।
इस शहर में वसंत अचानक आता है और जब आता है तो मैंने देखा है लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ़ से उठता है धूल का एक बवंडर और इस महान पुराने शहर की जीभ किरकिराने लगती है
संदर्भ: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'अंतरा (भाग-2)' में संकलित 'बनारस' कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रसिद्ध आधुनिक कवि केदारनाथ सिंह हैं।
प्रसंग: इस पद्यांश में कवि ने बनारस शहर में वसंत के अचानक आगमन और उससे उठने वाले धूल के बवंडर के प्रभाव का वर्णन किया है।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि बनारस शहर में वसंत ऋतु किसी पूर्व सूचना के बिना अचानक आ जाती है। जब यहाँ वसंत का आगमन होता है, तो 'लहरतारा' या 'मडुवाडीह' (बनारस के स्थानीय मोहल्ले) की तरफ़ से धूल का एक बड़ा बवंडर उठने लगता है। इस उड़ती हुई धूल के कारण इस प्राचीन और महान शहर के लोगों के मुँह में मिट्टी जम जाती है, जिससे उनकी जीभ किरकिराने लगती है।
विशेष:
● लहरतारा और मडुवाडीह जैसे स्थानीय नामों के उल्लेख से बनारस का यथार्थवादी चित्रण हुआ है।
● भाषा सरल, सहज और आम बोलचाल की खड़ी बोली हिंदी है
● 'धूल का बवंडर' में सुंदर दृश्य-बिंब निर्मित हुआ है कविता मुक्त छंद में रचित है।
जो है वह सुगबुगाता है जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ आदमी दशाश्वमेध पर जाता है और पाता है घाट का आख़िरी पत्थर कुछ और मुलायम हो गया है सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आँखों में एक अजीब सी नमी है और एक अजीब सी चमक से भर उठा है भिक्षुकों के कटोरों का निचाट खालीपन
- संदर्भ: पूर्ववत।
- प्रसंग: इस काव्यांश में वसंत के आगमन से बनारस की प्रकृति, चेतन-अचेतन वस्तुओं, जीव-जंतुओं और भिक्षुकों के जीवन में आए सकारात्मक परिवर्तन का वर्णन है।
- व्याख्या: कवि कहते हैं कि वसंत आते ही इस शहर में जो भी जीवित (विद्यमान) है, उसमें एक नई सुगबुगाहट या चेतना जाग उठती है। जो पेड़-पौधे सूखे पड़े थे, उनमें भी नई कोंपलें (पचखियाँ) फूटने लगती हैं। जब कोई व्यक्ति दशाश्वमेध घाट की ओर जाता है, तो उसे अहसास होता है कि घाट का आख़िरी कठोर पत्थर भी अब स्पर्श में कुछ अधिक मुलायम और स्नेहयुक्त प्रतीत हो रहा है। घाट की सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आँखों में भी आत्मीयता की एक अजीब सी नमी दिखाई देती है और दान की आस में बैठे भिक्षुकों के कटोरों का निचाट (पूर्ण) खालीपन भी उम्मीद की एक अनोखी चमक से भर जाता है।
- विशेष:
- 'अजीब सी नमी' और 'अजीब सी चमक' में उपमा अलंकार का प्रयोग है।
- निर्जीव पत्थर के मुलायम होने और सुगबुगाने में मानवीकरण अलंकार है।
- भिक्षुकों के निराशाजनक जीवन में आशा के संचार का अत्यंत संवेदनात्मक अंकन है।
- 'पचखियाँ' जैसे आंचलिक शब्द का सटीक प्रयोग हुआ है।
तुमने कभी देखा है खाली कटोरों में वसंत का उतरना! यह शहर इसी तरह खुलता है इसी तरह भरता और खाली होता है यह शहर
- संदर्भ: पूर्ववत।
- प्रसंग: इसमें कवि ने बनारस शहर के खुलने, श्रद्धालुओं से भरने और फिर शांत होकर खाली होने की निरंतर चलने वाली जीवन-प्रक्रिया का वर्णन किया है।
- व्याख्या: कवि पाठकों को संबोधित करते हुए प्रश्न शैली में पूछते हैं कि क्या तुमने कभी भिक्षुकों के खाली कटोरों में वसंत को उतरते हुए देखा है? (अर्थात अत्यंत निर्धन व्यक्तियों के खाली जीवन में भी खुशी और आशा की किरण को आते देखा है?) बनारस शहर की दिनचर्या इसी प्रकार रोज़ सुबह नए उल्लास के साथ शुरू होती है (खिलती/खुलती है), दिनभर श्रद्धालुओं और पर्यटकों से भरती है और रात होते-होते फिर से खाली एवं शांत हो जाती है।
- विशेष:
- 'खाली कटोरों में वसंत का उतरना' में लाक्षणिकता और मानवीकरण अलंकार की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति है।
- 'तुमने कभी देखा है' में प्रश्न शैली के माध्यम से पाठकों को विचार करने के लिए प्रेरित किया गया है।
- बनारस शहर की जीवंतता और उसकी शाश्वत दिनचर्या को रेखांकित किया गया है।
इसी तरह रोज़-रोज़ एक अनंत शव ले जाते हैं कंधे अँधेरी गली से चमकती हुई गंगा की तरफ़
- संदर्भ: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'अंतरा (भाग-2)' में संकलित 'बनारस' कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रसिद्ध आधुनिक कवि केदारनाथ सिंह हैं।
- प्रसंग: इस पद्यांश में कवि ने बनारस की संकरी गलियों से गंगा घाट की ओर अंतिम संस्कार के लिए ले जाए जाने वाले शवों और जीवन-मरण के शाश्वत सत्य का चित्रण किया है।
- व्याख्या: कवि कहते हैं कि बनारस शहर में यह एक नित्य प्रक्रिया है। यहाँ प्रतिदिन असंख्य कंधे एक अनंत (अगणित) शव को बनारस की संकरी और अँधेरी गलियों से निकालकर मोक्षदायिनी, पवित्र और सूर्य की किरणों से चमकती हुई गंगा नदी के घाटों की ओर ले जाते हैं। यह शहर जीवन और मृत्यु दोनों के सह-अस्तित्व को सहजता से स्वीकार करता है।
- विशेष:
- जीवन की नश्वरता और मोक्ष की सांस्कृतिक मान्यता का यथार्थवादी अंकन हुआ है।
- 'अँधेरी गली' (अज्ञान/सांसारिकता) और 'चमकती गंगा' (ज्ञान/मोक्ष) के माध्यम से प्रतीकात्मकता उभरी है।
- 'रोज़-रोज़' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
- भाषा अत्यंत सरल और बिंबप्रधान खड़ी बोली है।
इस शहर में धूल धीरे-धीरे उड़ती है धीरे-धीरे चलते हैं लोग धीरे-धीरे बजते हैं घंटे शाम धीरे-धीरे होती है
- संदर्भ: पूर्ववत।
- प्रसंग: इसमें कवि ने बनारस की जीवन-शैली के धीमेपन, सहजता और उसकी अपनी अनोखी लय (गति) का वर्णन किया है।
- व्याख्या: कवि कहते हैं कि बनारस शहर की अपनी एक विशेष गति है। यहाँ की हवा में धूल बहुत धीरे-धीरे उड़ती है, यहाँ के लोग बिना किसी हड़बड़ी के बहुत धीरे-धीरे चलते हैं, मंदिरों के घंटे शांत वातावरण में धीरे-धीरे बजते हैं और यहाँ शाम का आगमन भी बहुत धीरे-धीरे होता है। यहाँ जीवन में कोई भाग-दौड़ या आपाधापी नहीं है।
- विशेष:
- 'धीरे-धीरे' शब्द की आवृत्ति से पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार और स्वर-मैत्री बनी है।
- बनारस के शांत, संयमित और ठहराव युक्त जीवन-मूल्यों को रेखांकित किया गया है।
- दृश्य और श्रव्य बिंबों का सुंदर संयोजन है।
यह धीरे-धीरे होना धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है कि हिलता नहीं है कुछ भी कि जो चीज़ जहाँ थी वहीं पर रखी है कि गंगा वहीं है कि वहीं पर बँधी है नाव कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँ सैकड़ों बरस से
- संदर्भ: पूर्ववत।
- प्रसंग: इस काव्यांश में कवि ने स्पष्ट किया है कि बनारस का यह 'धीमापन' उसकी कमज़ोरी नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक निरंतरता और प्राचीन परंपराओं को सुरक्षित रखने वाली शक्ति है।
- व्याख्या: कवि कहते हैं कि बनारस की यह 'धीरे-धीरे' चलने वाली सामूहिक लय ही इस पूरे शहर को एक सूत्र में मजबूती से बाँधे हुए है। इसी ठहराव के कारण प्राचीन परंपराएँ और आस्था का ढांचा कभी ढहता नहीं है। सब कुछ अपनी जगह सुरक्षित है—गंगा नदी सदियों से उसी स्थान पर बह रही है, नावें वहीं घाट पर बँधी हैं और संत तुलसीदास की खड़ाऊँ भी सैकड़ों वर्षों से अपने मूल स्थान पर वैसे ही सुरक्षित रखी हुई है। आधुनिकता के दौर में भी बनारस अपनी जड़ों से कटकर हिला नहीं है।
- विशेष:
- 'तुलसीदास की खड़ाऊँ' और 'गंगा' के उल्लेख से बनारस की सांस्कृतिक धरोहर की निरंतरता दिखाई गई है।
- लाक्षणिक भाषा का प्रयोग है, जहाँ धीमापन स्थिरता और आस्था का प्रतीक है।
- 'सैकड़ों बरस से' में ऐतिहासिकता का बोध है।
- 'कि' शब्द की बार-बार आवृत्ति से भाषा में एक काव्यात्मक लय निर्मित हुई है।
कभी सही-साँझ बिना किसी सूचना के घुस जाओ इस शहर में कभी आरती के आलोक में
- संदर्भ: पूर्ववत।
- प्रसंग: कवि पाठक को शाम के समय (आरती के समय) बनारस की अलौकिक एवं आध्यात्मिक सुंदरता का अनुभव करने का निमंत्रण दे रहे हैं।
- व्याख्या: कवि कहते हैं कि यदि बनारस के असली रूप को देखना और महसूस करना है, तो किसी दिन ठीक शाम के समय (सही-साँझ) बिना किसी पूर्व योजना या सूचना के अचानक इस शहर में प्रवेश कर जाओ। विशेषकर उस समय, जब गंगा घाटों पर संध्या आरती की जगमगाती रोशनी (आलोक) फैली हुई हो। तब इस शहर का आध्यात्मिक और भव्य स्वरूप खुलकर सामने आता है।
- विशेष:
- 'सही-साँझ' जैसे तद्भव व आंचलिक शब्द का सटीक प्रयोग हुआ है।
- 'आरती के आलोक में' में अनुप्रास अलंकार ('अ' वर्ण की आवृत्ति) है।
- पाठक को सीधे संबोधित करते हुए वर्णनात्मक शैली अपनाई गई है।
इसे अचानक देखो अद्भुत है इसकी बनावट यह आधा जल में है आधा मंत्र में आधा फूल में है
आधा शव में आधा नींद में है आधा शंख में अगर ध्यान से देखो तो यह आधा है और आधा नहीं है
- संदर्भ: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'अंतरा (भाग-2)' में संकलित 'बनारस' कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रसिद्ध आधुनिक कवि केदारनाथ सिंह हैं।
- प्रसंग: इस पद्यांश में कवि ने बनारस शहर की अनूठी आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और द्वंदात्मक बनावट (सरंचना) का सूक्ष्म चित्रण किया है।
- व्याख्या: कवि कहते हैं कि यदि बनारस शहर को अचानक देखा जाए, तो इसकी बनावट अत्यंत अद्भुत और विलक्षण प्रतीत होती है। यह शहर जीवन और मृत्यु, भौतिकता और आध्यात्मिकता के संगम पर स्थित है। इसका आधा रूप गंगा के जल में डूबा है, तो आधा धार्मिक मंत्रोच्चार में लीन है; आधा पूजा के फूलों की महक में समाया है, तो आधा श्मशान के शवों में मृत्यु के सत्य को प्रकट करता है। इसका आधा भाग अलौकिक शांति की नींद में सोया हुआ है, तो आधा शंखध्वनि की गूँज में जागा हुआ है। यदि कोई इसे गहराई और ध्यान से देखे, तो अनुभव होगा कि यह शहर आधा दिखाई देता है (स्थूल रूप में) और आधा अदृश्य (सूक्ष्म आध्यात्मिक चेतना के रूप में) विद्यमान है।
- विशेष:
- बनारस के विरोधाभासी और रहस्यात्मक चरित्र (जीवन-मृत्यु, जाग्रत-सुप्त) का सजीव अंकन हुआ है।
- 'आधा जल में...', 'आधा मंत्र में...' में आवृत्ति के माध्यम से काव्यात्मक लय और विरोधाभास अलंकार का सुंदर प्रयोग है।
- भाषा लाक्षणिक, सहज और दर्शन से परिपूर्ण है।
- मुक्त छंद का प्रयोग है।
जो है वह खड़ा है बिना किसी स्तंभ के जो नहीं है उसे थामे है राख और रोशनी के ऊँचे-ऊँचे स्तंभ आग के स्तंभ और पानी के स्तंभ धुएँ के खुशबू के आदमी के उठे हुए हाथों के स्तंभ
- संदर्भ: पूर्ववत।
- प्रसंग: इसमें कवि ने बनारस की अमूर्त आस्था, विश्वास और उसके अद्श्य सम्बल (सहारे) को विभिन्न प्रतीकात्मक 'स्तंभों' के माध्यम से अभिव्यक्त किया है।
- व्याख्या: कवि कहते हैं कि बनारस में जो कुछ प्रत्यक्ष (विद्यमान) है, वह किसी भौतिक खंभे (स्तंभ) के बिना ही अपनी पूरी दृढ़ता से टिका हुआ है। वहीं, जो अमूर्त है (जो आँखों से नहीं दिखता—जैसे आस्था और संस्कृति), उसे चिता की राख, आरती की रोशनी, मणिकर्णिका की आग, गंगा के पानी, धूप-हवन के धुएँ, पूजा की खुशबू और सूर्य को अर्घ्य देते श्रद्धालुओं के उठे हुए हाथों रूपी अदृश्य और ऊँचे-ऊँचे स्तंभों ने थाम रखा है। अर्थात बनारस की नींव किसी ईंट-पत्थर के सहारे नहीं, बल्कि जन-आस्था के इन प्रतीकात्मक स्तंभों पर टिकी है।
- विशेष:
- 'राख', 'रोशनी', 'आग', 'पानी', 'धुआँ' और 'उठे हुए हाथ' को आस्था के स्तंभ मानकर रूपक अलंकार की रचना की गई है।
- 'ऊँचे-ऊँचे' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
- बनारस की अभौतिक एवं सांस्कृतिक मजबूती का सुंदर प्रतीकात्मक चित्रण है।
- दृश्य और घ्राण (सुगंध) बिंबों का उत्कृष्ट समावेश है।
किसी अलक्षित सूर्य को देता हुआ अर्घ्य शताब्दियों से इसी तरह गंगा के जल में अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर अपनी दूसरी टाँग से बिल्कुल बेखबर!
- संदर्भ: पूर्ववत।
- प्रसंग: इस काव्यांश में कवि ने बनारस की एकाग्र भक्ति-साधना, हठयोग परंपरा और उसकी बेपरवाह/मस्तमौला जीवन-शैली का वर्णन किया है।
- व्याख्या: कवि कहते हैं कि यह बनारस शहर सदियों (शताब्दियों) से गंगा के पवित्र जल में खड़ा होकर किसी अदृश्य (अलक्षित) सूर्य देव को अर्घ्य (जल अर्पित) दे रहा है। यह शहर एक तपस्वी की भाँति अपनी आध्यात्मिक साधना (एक टाँग) में इतना लीन है कि इसे अपनी भौतिक दुनिया, आपाधापी या दूसरी टाँग (आधुनिकता) की कोई चिंता या खबर ही नहीं है। यह शहर अपनी प्राचीन आस्था में पूरी तरह मग्न होकर अपनी ही धुन में जी रहा है।
- विशेष:
- 'अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर' में बनारस का मानवीकरण अलंकार किया गया है (तपस्वी के रूप में)।
- 'अलक्षित सूर्य', 'शताब्दियों से' शब्द बनारस की प्राचीनता और गभीर आध्यात्मिकता के सूचक हैं।
- 'दूसरी टाँग से बिल्कुल बेखबर' बनारस के ठेठ 'मस्तमौला और फक्कड़' स्वभाव को दर्शाता है।
- व्यंग्य, लाक्षणिकता और बिंब-विधान का सटीक प्रयोग है।