कक्षा - 12 बसंत आया, तोड़ो कविता ncert प्रश्न



बसंत आया

कवि परिचय: रघुवीर सहाय

रघुवीर सहाय हिंदी साहित्य के प्रमुख कवि, पत्रकार और आलोचक थे। उनका जन्म 9 दिसंबर 1929 को लखनऊ, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. किया। वे 'प्रतीक', 'कल्पना' और 'दिनमान' जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं से जुड़े रहे और 'दिनमान' के संपादक भी रहे। रघुवीर सहाय को उनकी कविताओं के लिए 1982 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी कविताओं में समकालीन जीवन की विसंगतियों, राजनीतिक भ्रष्टाचार और आम आदमी के दुख-दर्द को मुखरता से व्यक्त किया गया है। उनकी भाषा सीधी, सपाट और व्यंग्यात्मक होती है। उनकी प्रमुख काव्य कृतियाँ हैं: 'सीढ़ियों पर धूप में', 'आत्महत्या के विरुद्ध', 'हँसो हँसो जल्दी हँसो', 'लोग भूल गए हैं'। उनका निधन 30 दिसंबर 1990 को हुआ।

कविता परिचय: बसंत आया

'बसंत आया' कविता रघुवीर सहाय की एक व्यंग्यात्मक कविता है। इस कविता में कवि ने आधुनिक शहरी जीवन शैली पर कटाक्ष किया है, जहाँ मनुष्य प्रकृति से कटकर यंत्रवत जीवन जी रहा है। कवि दिखाता है कि किस प्रकार मनुष्य प्रकृति के सबसे मनमोहक ऋतु बसंत के आगमन को भी सहज रूप से महसूस नहीं कर पाता। उसे बसंत के आने की खबर दफ्तर से या कैलेंडर से मिलती है। पेड़ों पर पत्ते आने, कोयल की कूक, हवा का चलना जैसे प्राकृतिक बदलावों को वह अनुभव नहीं कर पाता। कवि के अनुसार, शहरी जीवन की आपाधापी में मनुष्य इतना उलझ गया है कि वह प्रकृति के सहज सौंदर्य का आनंद लेने का समय ही नहीं निकाल पाता। यह कविता प्रकृति और मनुष्य के बीच बढ़ती दूरी को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है।

प्रश्नोत्तर:

  1. बसंत आगमन की सूचना कवि को कैसे मिली?
    कवि को बसंत आगमन की सूचना दफ्तर में कैलेंडर देखकर या दफ्तर के किसी काम से जाते हुए, सहसा सड़क पर पड़े कुछ पत्तों को देखकर मिली। उसे यह सूचना किसी प्राकृतिक संकेत से नहीं, बल्कि एक औपचारिक या आकस्मिक तरीके से प्राप्त हुई।

  2. 'कोई छह बजे सुबह... फिरकी सी आई, चली गई'- पंक्ति में निहित भाव स्पष्ट कीजिए।
    इस पंक्ति में कवि शहरी जीवन की आपाधापी और प्रकृति से अलगाव को व्यक्त करता है। 'कोई छह बजे सुबह' समय की पाबंदी और दिनचर्या के बंधन को दिखाता है। 'फिरकी सी आई, चली गई' का अर्थ है कि बसंत की सुबह की ताज़ी हवा का झोंका आया तो सही, लेकिन वह इतनी तेज़ी से आया और चला गया कि कवि उसे ठीक से महसूस नहीं कर पाया। यह आधुनिक जीवन की व्यस्तता और संवेदनहीनता को दर्शाता है जहाँ मनुष्य के पास प्रकृति के छोटे-छोटे सुखों को अनुभव करने का भी समय नहीं है। यह भाव शहरी मनुष्य की प्रकृति से बढ़ती दूरी और प्राकृतिक सौंदर्य के प्रति उसकी उदासीनता को उजागर करता है।

  3. अलंकार बताइए-
    (क) बड़े-बड़े पीपरावर पते - पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार (बड़े-बड़े)
    (ख) कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो - उपमा अलंकार (सुबह की तुलना गरम पानी से नहाई हुई स्त्री से)
    (ग) खिली हुई हुई हवा आई, फिरको-सी आई, चली गई - उपमा अलंकार (हवा की तुलना फिरकी से)
    (घ) कि दहर-दहर दहके कहीं ढाक के जंगल - पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार (दहर-दहर) और स्वभावोक्ति अलंकार (ढाक के जंगलों का स्वाभाविक वर्णन)

  4. किन पंक्तियों से ज्ञात होता है कि आज मनुष्य प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य की अनुभूति से वंचित है?
    निम्नलिखित पंक्तियों से ज्ञात होता है कि मनुष्य प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य की अनुभूति से वंचित है:

    • "और यह कैलेंडर से मालूम था
      अमुक दिन / 'बसंत पंचमी' / और दफ्तर की छुट्टी थी।"

    • "और यह शहर अपनी ही धूप में सूख रहा था। / कोई छह बजे सुबह... फिरकी सी आई, चली गई।"

    • "आज जब मैं सुबह की सैर पर निकला / तो देखा / सड़क पर / कुछ नए पत्ते / पीपलों के। / और कुछ ऐसे ही / जैसे कल के / पुराने पत्तों का ढेर।"

    • इन पंक्तियों से स्पष्ट होता है कि कवि को बसंत आगमन की सूचना कैलेंडर और दफ्तर की छुट्टी से मिलती है, न कि प्रकृति के सहज बदलावों से। वह हवा के झोंकों या पत्तों के गिरने को भी सामान्य ढंग से ही देखता है, उनमें कोई विशेष सौंदर्य नहीं खोज पाता।

  5. 'प्रकृति मनुष्य की सहचरी है' इस विषय पर विचार व्यक्त करते हुए आज के संदर्भ में इस कथन की वास्तविकता पर प्रकाश डालिए।
    'प्रकृति मनुष्य की सहचरी है' यह कथन प्राचीन काल से ही सत्य रहा है। मनुष्य का जन्म प्रकृति में हुआ, वह प्रकृति पर ही आश्रित रहा और प्रकृति के सान्निध्य में ही उसका विकास हुआ। प्रकृति ने उसे भोजन, जल, आश्रय और जीवन के लिए आवश्यक हर वस्तु प्रदान की। लेकिन आज के संदर्भ में, विशेषकर शहरी जीवन में, इस कथन की वास्तविकता पर प्रश्नचिह्न लग गया है। आधुनिक मनुष्य ने विकास और भौतिकता की दौड़ में प्रकृति से अपना नाता तोड़ लिया है। वह कंक्रीट के जंगलों में रहता है, प्रदूषण से घिरा है और प्रकृति के सहज सौंदर्य को देखने-अनुभव करने का समय उसके पास नहीं है। 'बसंत आया' कविता इसी बात का प्रमाण है कि आज मनुष्य बसंत जैसे मधुर ऋतु के आगमन को भी कैलेंडर या दफ्तर की छुट्टी से जोड़कर देखता है, न कि पेड़ों पर आए नए पत्तों, कोयल की कूक या हवा की ठंडक से। यह दिखाता है कि मनुष्य ने प्रकृति को अपनी सहचरी मानना बंद कर दिया है और उसे केवल उपयोग की वस्तु बना लिया है। इसके परिणामस्वरुप वह तनाव, अवसाद और कई स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त हो रहा है, क्योंकि प्रकृति से कटाव उसे मानसिक और शारीरिक रूप से भी बीमार कर रहा है।

  6. 'बसंत आया' कविता में कवि की चिंता क्या है?
    'बसंत आया' कविता में कवि की मुख्य चिंता यह है कि आधुनिक मनुष्य प्रकृति से दूर होता जा रहा है और प्रकृति के सहज सौंदर्य को अनुभव करने की उसकी संवेदनशीलता समाप्त होती जा रही है। वह भौतिकवादी जीवन शैली और शहरी आपाधापी में इतना व्यस्त हो गया है कि उसे प्रकृति के बदलावों जैसे बसंत के आगमन का भी सहज बोध नहीं होता। उसे ऋतुओं के परिवर्तन की सूचना कैलेंडर से या औपचारिक माध्यमों से मिलती है। कवि इस बात पर दुख व्यक्त करता है कि मनुष्य अपनी जड़ों से कट गया है और प्रकृति के साथ उसका नैसर्गिक संबंध टूट गया है। यह चिंता सिर्फ प्रकृति के प्रति उदासीनता तक सीमित नहीं है, बल्कि मनुष्य के जीवन की नीरसता, संवेदनहीनता और मशीनीपन को भी दर्शाती है। कवि चाहता है कि मनुष्य प्रकृति से फिर से जुड़े और उसके सौंदर्य का सहज आनंद ले।


तोड़ो

कवि परिचय: रघुवीर सहाय

(कवि परिचय 'बसंत आया' कविता के साथ दिया गया है, जो यहाँ भी लागू होता है।)

कविता परिचय: तोड़ो

'तोड़ो' कविता रघुवीर सहाय की एक प्रेरणादायक और सृजनात्मक कविता है। यह कविता सृजन के लिए बाधक तत्वों को तोड़ने और नए निर्माण के लिए भूमि तैयार करने का आह्वान करती है। कवि यह मानता है कि कुछ भी नया रचने या उगाने से पहले पुरानी, अनुपयोगी और बाधक चीजों को हटाना आवश्यक है। यहाँ 'तोड़ना' केवल भौतिक विध्वंस नहीं, बल्कि मानसिक रूढ़ियों, जड़ताओं और अवरोधों को तोड़ने का प्रतीक है। खेत में फसल उगाने के लिए जिस तरह पथरीली जमीन और बंजर भूमि को तोड़कर, उपजाऊ बनाया जाता है, उसी प्रकार मन में नए विचारों, भावनाओं और सृजन के अंकुरण के लिए मन की ऊब, उदासीनता और निराशा जैसी बाधाओं को तोड़ना ज़रूरी है। कविता एक सकारात्मक संदेश देती है कि सृजन के लिए पहले विध्वंस की, बाधाओं को दूर करने की आवश्यकता होती है।

प्रश्नोत्तर:

  1. 'पत्थर' और 'चट्टान' शब्द किसके प्रतीक हैं?
    'पत्थर' और 'चट्टान' शब्द यहाँ उन सभी कठोर, अनुपयोगी और बाधक तत्वों के प्रतीक हैं जो सृजन के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करते हैं। ये खेत की उस बंजर, पथरीली भूमि के प्रतीक हैं जो फसल उगने नहीं देती। मानसिक स्तर पर, ये मन की जड़ता, ऊब, निराशा, रूढ़ियों, परंपराओं और उन नकारात्मक विचारों के प्रतीक हैं जो व्यक्ति को कुछ नया सोचने या करने से रोकते हैं। ये सृजनात्मकता के विरोधी तत्व हैं।

  2. भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए-
    मिट्टी में रस होगा ही जब वह पोसेगी बीज को
    इस पंक्ति में कवि ने सृजन प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण सत्य को उजागर किया है। इसका भाव यह है कि जिस प्रकार खेत की मिट्टी में जब पोषक तत्व (रस) होंगे, तभी वह बीज को पोषण देकर अंकुरित कर पाएगी और उससे फसल उग पाएगी, उसी प्रकार मनुष्य के मन में भी जब सकारात्मक भावनाएँ, उत्साह और उर्वर विचार होंगे, तभी वह किसी नए विचार, भावना या सृजनात्मक कार्य को जन्म दे पाएगा। यदि मिट्टी बंजर है या मन उदासीन और हतोत्साहित है, तो सृजन संभव नहीं है। यह पंक्ति सृजन के लिए अनुकूल परिस्थितियों और आंतरिक प्रेरणा के महत्व को दर्शाती है।

  3. हम इसको क्या कर डालें अपने मन की खोज को?
    तोड़ो तोड़ो तोड़ो
    इन पंक्तियों में कवि मनुष्य के मन में व्याप्त ऊब (boreiyat) और निराशा को तोड़ने का आह्वान करता है। 'मन की खोज' से तात्पर्य है मन की आंतरिक स्थिति, उसकी निराशा, बेचैनी या निष्क्रियता। कवि कहता है कि हमारे मन में जो नीरसता, उदासीनता या सृजनहीनता भरी है, उसे तोड़ना आवश्यक है। जिस प्रकार पथरीली भूमि को तोड़कर उपजाऊ बनाया जाता है, उसी प्रकार मन की इस बांझपन को भी 'तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो' के माध्यम से समाप्त करके, उसे नए विचारों और सृजन के लिए तैयार करना है। यह पंक्तियाँ मन के आंतरिक अवरोधों को दूर करने और उसे सकारात्मक ऊर्जा से भरने की प्रेरणा देती हैं।

  4. कविता का आरंभ 'तोड़ो तोड़ो तोड़ो' से हुआ है और अंत 'गौडो गौडो गौडो' से। विचार कीजिए कि कवि ने ऐसा क्यों किया?
    कविता का आरंभ 'तोड़ो तोड़ो तोड़ो' से और अंत 'गौडो गौडो गौडो' (खोदो खोदो खोदो) से होना कवि के गहन संदेश को दर्शाता है।

    • आरंभ में 'तोड़ो': कविता की शुरुआत में 'तोड़ो' शब्द का प्रयोग उन बाधक तत्वों को हटाने पर बल देता है जो सृजन के लिए अनुपयोगी हैं। ये पत्थर, चट्टान, मन की ऊब, निराशा और जड़ता के प्रतीक हैं। कवि कहता है कि कुछ भी नया रचने से पहले, हमें इन अवरोधों को नष्ट करना होगा, उनसे मुक्ति पानी होगी। यह एक प्रकार से भूमि तैयार करने की प्रारंभिक और कठोर प्रक्रिया है।

    • अंत में 'गौडो गौडो गौडो': कविता का अंत 'गौडो गौडो गौडो' (खोदो) से होता है, जो तोड़ने के बाद की प्रक्रिया है। तोड़ने से भूमि समतल और ढीली होती है, लेकिन उसे फसल बोने लायक बनाने के लिए गहराई तक 'गौडना' (खोदना) पड़ता है, ताकि मिट्टी की ऊपरी परत टूटकर उपजाऊ बने और बीज को गहराई में स्थान मिल सके। इसी प्रकार, मन की ऊब को तोड़ने के बाद, मन को और गहराई तक खोजना, उसे समझना और उसमें नए विचारों के लिए जगह बनाना आवश्यक है। यह सृजन के लिए मानसिक और भावनात्मक स्तर पर गहन तैयारी को दर्शाता है।
      कवि ने ऐसा इसलिए किया है ताकि वह यह संदेश दे सके कि सृजन एक बहुआयामी प्रक्रिया है। यह केवल ऊपरी तौर पर बाधाओं को हटाने से नहीं होता, बल्कि एक गहन आंतरिक तैयारी, आत्म-चिंतन और मन को उपजाऊ बनाने की प्रक्रिया से होकर गुजरता है। 'तोड़ो' विध्वंस का प्रतीक है, जो सृजन के लिए आवश्यक है, और 'गौडो' गहराई में जाकर तैयारी का प्रतीक है, जो नए अंकुरण के लिए अनिवार्य है।

  5. ये झूठे बंधन टूटें
    तो धरती को हम जानें
    यहां पर झूठे बंधनों और धरती को जानने से क्या अभिप्राय है?
    इन पंक्तियों में 'झूठे बंधन' से अभिप्राय उन सामाजिक, मानसिक और वैचारिक रूढ़ियों, पूर्वाग्रहों, परंपराओं और संकीर्णताओं से है जो मनुष्य को खुलकर सोचने, समझने और जीवन को यथार्थ रूप में जानने से रोकते हैं। ये ऐसे अनावश्यक बंधन हैं जो मनुष्य की चेतना को सीमित करते हैं और उसे प्रकृति तथा वास्तविकता से दूर ले जाते हैं।
    'धरती को जानने' से अभिप्राय है वास्तविक जीवन को उसके सहज और मौलिक रूप में समझना, प्रकृति से जुड़ना, सत्य को स्वीकार करना और जीवन के गूढ़ रहस्यों व सौंदर्य का अनुभव करना। यह जीवन और अस्तित्व के प्रति एक गहरी समझ और जुड़ाव को दर्शाता है, जो तभी संभव है जब हम उन सभी कृत्रिम और झूठे बंधनों से मुक्त हो जाएँ जो हमारी दृष्टि को धुंधला करते हैं। कवि चाहता है कि मनुष्य इन बंधनों को तोड़कर एक मुक्त और संवेदनशील चेतना के साथ यथार्थ को समझे।

  6. 'आधे-आधे गाने' के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?
    'आधे-आधे गाने' के माध्यम से कवि अधूरेपन, असंतोष और अपूर्णता की स्थिति को व्यक्त करना चाहता है। यह मन की उस ऊब, निराशा और सृजनहीनता की स्थिति का प्रतीक है जहाँ व्यक्ति कुछ पूरा नहीं कर पाता। जब मन में उदासीनता होती है, तो सृजनात्मक ऊर्जा का अभाव होता है, और ऐसे में कोई भी कार्य या भावना पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाती। एक गीत तभी पूरा होता है जब उसमें लय, ताल और भाव का पूर्ण सामंजस्य हो, लेकिन जब मन ही ऊब से भरा हो, तो केवल आधे-अधूरे विचार या भावनाएँ ही पनप पाती हैं, जो पूर्ण सृजन को जन्म नहीं दे पातीं। कवि 'आधे-आधे गाने' को तोड़कर पूर्णता और समग्रता की ओर बढ़ने का आह्वान करता है, जहाँ मन की ऊब समाप्त हो और पूर्ण सृजन संभव हो सके।


अपना मालवा खाऊ उजाडु सभ्यता

अपना मालवा खाऊ-उजाडू सभ्यता में

प्रश्न 1.
मालवा में जब सब जगह बरसात की झड़ी लगी रहती है तब मालवा के जन-जीवन पर इसका क्या असर पड़ता है?
उत्तर :
मालवा में जब सब जगह बरसात की झड़ी लगी रहती है, तब मालवा का सारा जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। बरसात का पानी घरों में घुस आता है। तब कुएँ, बावड़ी और तालाब-तलैया पानी से लबालब भर जाते हैं। नदी-नाले उफनने लगते हैं। फसलें खूब लहलहाने लगती हैं। इससे गाँव की विपुलता का पता चलता है। तब लगता है मालवा खूब पाक्यो है। इस बरसात से जहाँ जन-जीवन प्रभावित होता है, वहीं यह लोगों के जीवन में समृद्धि लाता है। अब मालवा में वैसी बरसात नहीं होती, जैसी पहले हुआ करती थी। अब तो औसत पानी गिरे तो भी लोगों को लगता है कि ज्यादा बरसात हो गई है। चालीस बरसात को वे अत्ति बोलने लगते हैं। अब तो लोगों द्वारा बरसात की झड़ी लगने पर फोन करके पूछा जाने लगता है कि कहीं खतरा तो नहीं उत्पन्न हो गया।

प्रश्न 2.
अब मालवा में वैसा पानी नहीं गिरता, जैसा गिरा करता था। इसके क्या कारण हैं?
उत्तर :
अब मालवा में वैसी बरसात नहीं होती, जैसी पहले हुआ करती थी। इसके कारण हैं-

  • कास की औद्योगिक सभ्यता ने सब कुछ उजाड़कर रख दिया है। इससे पर्यावरण बिगड़ा है। इस पर्यावरणीय विनाश से मालवा भी नहीं बच पाया है।
  • वातावरण को गर्म करने वाली कार्बन डाइऑक्साइड गैसों ने मिलकर धरती के तापमान को तीन डिग्री सेल्सियस बढ़ा दिया है। वातावरण के गर्म होने से यह सब गड़बड़ी हो रही है।
  • अब मालवा के लोग ही मालवा की धरती को उजाड़ने में लगे हैं।

प्रश्न 3.
हमारे आज के इंजीनियर ऐसा क्यों समझते हैं कि वे पानी का प्रबंध जानते हैं और पहले जमाने के लोग कुछ नहीं जानते थे?
उत्तर :
हमारे आज के इंजीनियर अपने आपको बहुत चतुर और बुद्धिमान मानते हैं। उनके विचारानुसार पहले जमाने के लोग कुछ भी नहीं जानते थे। उन्हें अपने बारे में बहुत बड़ी गलतफहमी है। उनके अनुसार ज्ञान पश्चिम से आया था भारत के लोग कुछ नही जानते-समझत थं। उनके मत में रिनसां के वाद ही लोगों में ज्ञांन फा प्रसार हुआ। वं भांत धारणा के शिकार हैं। यह सब उनकी पाश्चात्य शिक्जा एवं तथाकथित ज्ञान के प्रति अंधमोह है।

प्रश्न 4.
मालवा में विक्रमादित्य, भोज और मुंज रिनेसा के बहुत पहले हो गए। पानी के रखरखाव के लिए उन्होंने क्या प्रबंध किए?
उत्तर :
मालवा में विक्रमादित्य, भोज और मुंज आदि राजा पानी का महत्त्व भली प्रकार समझते थे। ये राजा जानते थे कि पठार पर पानी को रोक कर रखना होगा। उन्होंने इसके लिए भरपूर प्रयास किए। उन्होंने तालाब बनवाए और बड़ी-बड़ी बावड़ियाँ बनवाई ताकि बरसात के पानी को रोककर रखा जा सके और धरती के पानी को जीवंत रखा जा सके। हमारे आज के इंजीनियरों ने तालाबों को गाद से भर जाने दिया गया और जमीन के पानी को पाताल से भी निकाल दिया। इससे नदी नाले सूख गए। जिस मालवा में पग-पग पर पानी था, वही मालव सूखा हो गया है 

प्रश्न 5.

‘हमारी आज की सभ्यता इन नदियों को अपने गंदे पानी के नाले बना रही है’ – क्यों और कैसे?
उत्तर :
हमारी आज की सभ्यता इन नदियों को गंदे पानी के नाले बना रही है। इसका कारण है आज का औद्योगिक विकास। उद्योगों का कूड़ा-कचरा इन नदियों में गिर रहा है और नदियों कें पानी को गंदला कर रहा है। हम भी अपने शहर की गंदगी को इन नदियों में बहाकर इन्हें गंदे नाले के रूप में परिणत कर रहे हैं। आज की औद्योगिक सभ्यता ने अपसंस्कृति को बढ़ावा दिया है। यह अपसंस्कृति नदियों की पवित्रता पर ध्यान नहीं देती। अब नदियों के प्रति माँ का भाव मिटता चला जा रहा है।

प्रश्न 6.
लेखक को क्यों लगता है कि ‘हम जिसे विकास की औद्योगिक सभ्यता कहते हैं वह उजाड़ की अपसभ्यता है।’ आप क्या मानते हैं?
उत्तर :
लेखक को ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि हम एक गलतफहमी के शिकार हो रहे हैं। जिसे हम विकास की औद्योगिक सभ्यता समझने का भ्रम पाले हुए हैं, वह वास्तव में विकास न होकर उजाड़ की ओर ले जा रही है। यह अपसभ्यता है। पाश्चात्य दृष्टिकोण से अपनाई जा रही सभ्यता हमें कहीं का नहीं छोड़ेगी। यह हमें उजाड़कर रख देगी। यह बर्बाद करने वाली है। यह मानव जाति और प्रकृति दोनों का विनाश करने पर तुली है।

इस सभ्यता ने पर्यावरणीय असंतुलन पैदा कर दिया है, मौसम का चक्र बिगाड़ कर रख दिया है। यह खाऊ-उजाडू सभ्यता यूरोष और अमेरिका की देन है जिसके कारण विकास की औद्योगिक सभ्यता उजाड़ की अपसभ्ययता बन गई है। इससे पूरी दुनिया प्रभावित हुई है, पर्यावरण बिगड़ा है। लेखक की पर्यावरण संबंधी चिता सिफ्फ मालवा तक सीमित न होकर सार्वभौमिक हो गई है। अमेरिका की खाऊ-उजाडू जीवन पद्धति, संस्कृति, सभ्यता तथा अपनी धरती को उजाड़ने में लगे हुए हैं।

इस बहाने लेखक ने खाऊ-उजाड्ू जीवन पद्धति के द्वारा पर्यावरण विनाश की पूरी तस्वीर खींची है जिससे मालवा भी नहीं बच सका है। आधुनिक औद्योगिक विका ने हमें अपनी जड़-जमीन से अलग कर दिया है सही मायनों में हम उजड़ रहे हैं। लेखक ने पर्यावरणीय सरोकारों को आम जनता से जोड़ दिया है तथा पर्यावरण के प्रति लोगों को सचेत किया है।

प्रश्न 7.
धरती का वातावरण गर्म क्यों हो रहा है? इसमें यूरोप और अमेरिका की क्या भूमिका है? टिप्पणी कीजिए।
उत्तर :
धरती का वातावरण इसलिए गर्म हो रहा है क्योंकि कार्बन डाइऑक्साइड गैसों ने मिलकर धरती के तापमान को तीन डिग्री सेल्सियस बढ़ा दिया है। इसमें यूरोप और अमेरिका की बड़ी भूमिका है। कार्बन डाइऑक्साइड गैसें सबसे ज्यादा अमेरिका और यूरोप के विकसित देशों से ही निकलती हैं। अमेरिका इन्हें रोकने को तैयार नहीं है। वह इस बात को मानता ही नहीं कि धरती के वातावरण के गर्म होने से यह सब गड़बड़ी हो रही है। वह इस खाऊ-उजाडू जीवन पद्धति पर कोई समझौता नहीं करने वाला। अत: धरती के वातावरण के गर्म होने में इन देशों की बहुत बड़ी भूमिका है।


कक्षा - 12 बिस्कोहर की माटी ncert प्रश्न-उत्तर

पाठ परिचय: 'बिस्कोहर की माटी'

'बिस्कोहर की माटी' हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक विश्वनाथ त्रिपाठी द्वारा लिखित एक आत्मकथात्मक निबंध है। यह पाठ लेखक के बचपन और किशोरावस्था से जुड़ी स्मृतियों, अनुभवों और बिस्कोहर नामक उनके गाँव के परिवेश का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करता है। लेखक ने बड़े ही सहज और आत्मीय तरीके से अपने गाँव की मिट्टी, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, लोक-संस्कृति, पारिवारिक संबंधों और जीवन के छोटे-छोटे क्षणों को याद किया है। यह पाठ प्रकृति के साथ मनुष्य के गहरे जुड़ाव और बचपन की मासूमियत को दर्शाता है।

पाठ का उद्देश्य:

'बिस्कोहर की माटी' पाठ के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

  1. ग्राम्य जीवन का चित्रण: शहरीकरण के दौर में ग्रामीण जीवन, उसकी सादगी, चुनौतियाँ और सुंदरता को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करना।

  2. प्रकृति से जुड़ाव: मनुष्य और प्रकृति के अटूट संबंध को रेखांकित करना तथा यह बताना कि कैसे प्रकृति हमारे जीवन को आकार देती है।

  3. स्मृति और Nostalgia: बचपन की मीठी यादों और बीते हुए कल के प्रति एक भावनात्मक लगाव (nostalgia) को जगाना।

  4. लोक संस्कृति का संरक्षण: ग्रामीण अंचलों में प्रचलित लोकगीतों, कहानियों, रीति-रिवाजों और लोक-ज्ञान को महत्व देना।

  5. संवेदनशीलता का विकास: पाठकों में अपने परिवेश, परिवार और अपनी जड़ों के प्रति संवेदनशीलता और प्रेम विकसित करना।

  6. साहित्यिक सौंदर्य: भाषा की सहजता, आत्मीयता और मार्मिकता के माध्यम से साहित्यिक सौंदर्य का बोध कराना।


NCERT प्रश्न-उत्तर (कक्षा-12 हिंदी साहित्य, पाठ-2 बिस्कोहर की माटी, राजस्थान बोर्ड):

यहाँ पाठ में दिए गए प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में प्रस्तुत हैं:

  1. कोइयाँ किसे कहते हैं? उसकी विशेषताएँ बताइए।
    कोइयाँ एक प्रकार का जलीय पौधा होता है, जो तालाबों और पानी में उगता है। इसकी पत्तियाँ कमल जैसी गोल और हरी होती हैं। इसकी विशेषता है कि यह पानी की गंदगी को साफ करता है, इसके फूल सफेद, गुलाबी या लाल रंग के होते हैं, जो अत्यंत सुंदर लगते हैं। इसकी जड़ें, तना और बीज औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं।

  2. ‘बच्चे का माँ का दूध पीना सिर्फ दूध पीना नहीं, माँ से बच्चे के सारे संबंधों का जीवन-चरित होता है’ – टिप्पणी कीजिए।
    यह कथन अत्यंत मार्मिक और गहरा अर्थ लिए हुए है। माँ का दूध सिर्फ बच्चे की शारीरिक भूख शांत नहीं करता, बल्कि यह माँ और बच्चे के बीच एक भावनात्मक सेतु का काम करता है। यह प्रेम, सुरक्षा, दुलार और अपनत्व का प्रतीक है। दूध पीते समय बच्चा माँ के स्पर्श, गंध और आवाज़ से जुड़ता है, जो उसके पूरे जीवन के लिए एक मजबूत भावनात्मक नींव रखता है। यह संबंध केवल पोषण तक सीमित न होकर, जीवन भर के गहरे लगाव और अटूट बंधन का आधार बनता है।

  3. बिसनाथ पर क्या अत्याचार हो गया?
    लेखक बिसनाथ पर बचपन में बिच्छू का डंक लगने का अत्याचार हुआ था। यह उस समय की एक सामान्य घटना थी, जब ग्रामीण परिवेश में बिच्छू, साँप जैसे जीव-जंतुओं का प्रकोप रहता था और उनका डंक लगना आम बात थी। यह घटना उनके बचपन की एक दर्दनाक स्मृति थी।

  4. गरमी और लू से बचने के उपायों का विवरण दीजिए। क्या आप भी उन उपायों से परिचित हैं?
    गरमी और लू से बचने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में कई पारंपरिक उपाय अपनाए जाते हैं। जैसे:

    • प्यास बुझाने के लिए: पानी, कच्ची कैरी का पन्ना, छाछ, नींबू पानी आदि का सेवन।

    • शरीर को ठंडा रखने के लिए: गीले कपड़े से शरीर पोंछना, ठंडे पानी से नहाना, ठंडी जगह पर रहना।

    • बाहर निकलने से बचना: दोपहर में कड़ी धूप में बाहर न निकलना।

    • कपड़े: सूती, ढीले और हल्के रंग के कपड़े पहनना।
      हाँ, मैं भी इन उपायों से परिचित हूँ, खासकर गर्मियों में पर्याप्त पानी पीना और हल्के कपड़े पहनना आज भी शहरों में भी प्रचलित है।

  5. लेखक बिसनाथ ने किन आधारों पर अपनी माँ की तुलना बतख से की है?
    लेखक ने अपनी माँ की तुलना बतख से उनकी चलने की शैली के आधार पर की है। वे बताते हैं कि उनकी माँ बिस्कोहर के खेतों में पानी भरे रास्तों पर बतख की तरह धीर-धीरे, सधे हुए कदमों से चलती थीं। यह तुलना माँ की सहनशीलता, धैर्य और ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों में भी सहजता बनाए रखने की क्षमता को दर्शाती है।

  6. बिस्कोहर में हुई बरसात का जो वर्णन बिसनाथ ने किया है उसे अपने शब्दों में लिखिए।
    बिसनाथ ने बिस्कोहर में हुई बरसात का वर्णन अत्यंत सजीवता से किया है। वे बताते हैं कि बरसात से पहले की गर्मी और उमस बहुत असहनीय होती थी। फिर जब बादल घिरते थे, तो पूरा माहौल बदल जाता था। बिजली कड़कती थी, बादलों की गड़गड़ाहट सुनाई देती थी और तेज हवाएँ चलती थीं। पहली बूँदों के पड़ते ही मिट्टी की सौंधी खुशबू फैल जाती थी, जो मन को मोह लेती थी। बरसात होने पर चारों ओर हरियाली छा जाती थी, तालाब और गड्ढे पानी से भर जाते थे। बच्चे और बड़े सभी वर्षा का आनंद लेते थे, खासकर ग्रामीण जीवन में बरसात जीवनदायिनी होती थी।

  7. ‘फूल केवल गंध ही नहीं देते दवा भी करते हैं’, कैसे?
    यह कथन बिल्कुल सत्य है। फूल न केवल अपनी खुशबू और सुंदरता से मन को प्रसन्न करते हैं, बल्कि उनमें अनेक औषधीय गुण भी होते हैं। जैसे:

    • गुलाब: इसकी पंखुड़ियाँ गुलकंद बनाने, त्वचा रोगों में और ठंडक देने के लिए इस्तेमाल होती हैं।

    • गेंदा: इसके फूल एंटीसेप्टिक गुणों वाले होते हैं और चोट पर लगाए जाते हैं।

    • चमेली: इसके फूलों का तेल सिरदर्द और अनिद्रा में लाभकारी होता है।

    • कमल: इसके विभिन्न भाग आयुर्वेद में कई बीमारियों के इलाज में प्रयुक्त होते हैं।
      इस प्रकार, फूल प्राकृतिक चिकित्सा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

  8. ‘प्रकृति सजीव नारी बन गई’ – इस कथन के संदर्भ में लेखक की प्रकृति, नारी और सौंदर्य संबंधी मान्यताएँ स्पष्ट कीजिए।
    यह कथन लेखक की प्रकृति के प्रति गहरी आत्मीयता और नारी सौंदर्य के प्रति उनकी सूक्ष्म दृष्टि को दर्शाता है। लेखक प्रकृति को केवल जड़ वस्तु नहीं, बल्कि एक सजीव, संवेदनशील सत्ता के रूप में देखते हैं, जो नारी के समान ही सुंदर, ममतामयी और जीवनदायिनी है। उनके लिए प्रकृति का सौंदर्य, नारी सौंदर्य से अभिन्न है। जिस प्रकार नारी में कोमलता, लालित्य, शक्ति और सृजन का गुण होता है, उसी प्रकार प्रकृति भी अपने विभिन्न रूपों में ये सभी गुण धारण करती है। यह मान्यता लेखक के प्रकृति और नारी के प्रति सम्मान और उनके गहन भावनात्मक जुड़ाव को उजागर करती है।

  9. ऐसी कौन सी स्मृति है जिसके साथ लेखक को मृत्यु का बोध अजीब तौर से जुड़ा मिलता है?
    लेखक को मृत्यु का बोध बिच्छू के डंक लगने और उसके असहनीय दर्द से जुड़ा मिलता है। बिच्छू के डंक लगने पर जो असह्य पीड़ा होती थी, वह इतनी तीव्र होती थी कि ऐसा लगता था मानो प्राण निकल जाएँगे। इस अनुभव ने उन्हें बचपन में ही मृत्यु के भयावह रूप का एक अजीब सा अहसास करा दिया था।
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