कक्षा - 10 पद-परिचय



पद-परिचय: विस्तृत अध्ययन

परिचय (Introduction):

हम सभी जानते हैं कि वर्णों के सार्थक समूह को 'शब्द' कहते हैं। जब ये शब्द स्वतंत्र रूप से प्रयोग होते हैं, तो वे 'शब्द' कहलाते हैं। लेकिन, जब ये शब्द किसी वाक्य में प्रयुक्त होते हैं, तो वे वाक्य के नियमों में बंध जाते हैं और अपनी व्याकरणिक पहचान बना लेते हैं। वाक्य में प्रयुक्त यही शब्द 'पद' कहलाते हैं।

पद-परिचय (Grammatical Introduction of a Word):
वाक्य में प्रयुक्त किसी पद (शब्द) का व्याकरणिक परिचय देना 'पद-परिचय' कहलाता है। इसमें हमें यह बताना होता है कि वाक्य में वह पद क्या कार्य कर रहा है, उसका व्याकरणिक स्वरूप क्या है।

पद-परिचय में मुख्य रूप से इन बातों का उल्लेख किया जाता है:

  1. पद का भेद: यह कौन सा शब्द-भेद है (संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया या अव्यय)।

  2. उपभेद: यदि उस भेद का कोई उपभेद है (जैसे संज्ञा में व्यक्तिवाचक, जातिवाचक, भाववाचक)।

  3. लिंग: पद का लिंग (पुल्लिंग या स्त्रीलिंग)।

  4. वचन: पद का वचन (एकवचन या बहुवचन)।

  5. कारक: पद का कारक (कर्ता, कर्म, करण आदि) और कारक चिह्न।

  6. क्रिया से संबंध: वाक्य में उस पद का क्रिया से क्या संबंध है। (संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण के लिए)।

  7. काल: क्रिया के पद-परिचय में काल (भूतकाल, वर्तमानकाल, भविष्यत्काल)।

  8. वाच्य: क्रिया के पद-परिचय में वाच्य (कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य, भाववाच्य)।

  9. विशेष्य/विशेषण का संबंध: विशेषण के पद-परिचय में विशेष्य का उल्लेख।

  10. जिसकी विशेषता/संबंध/क्रिया बताए: अव्यय के विभिन्न भेदों में जिसका संबंध/विशेषता बता रहा है, उसका उल्लेख।


प्रत्येक पद का परिचय विस्तार से (Detailed Introduction of Each Word Type):

वाक्य में प्रयुक्त पद मुख्यतः पाँच प्रकार के होते हैं:

  1. संज्ञा (Noun)

  2. सर्वनाम (Pronoun)

  3. विशेषण (Adjective)

  4. क्रिया (Verb)

  5. अव्यय (Indeclinable)

चलिए, प्रत्येक पद के परिचय को विस्तार से समझते हैं:

1. संज्ञा (Noun)

परिभाषा: किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान या भाव के नाम को संज्ञा कहते हैं।

संज्ञा के भेद (Types of Noun):

  • व्यक्तिवाचक संज्ञा: किसी विशेष व्यक्ति, वस्तु या स्थान का नाम। (जैसे: राम, जयपुर, गंगा, हिमालय)

  • जातिवाचक संज्ञा: पूरी जाति का बोध कराने वाले शब्द। (जैसे: लड़का, नदी, पर्वत, शहर)

    • द्रव्यवाचक संज्ञा: ऐसे पदार्थ जिन्हें मापा या तौला जा सकता है। (जैसे: सोना, पानी, दूध, तेल) - इसे जातिवाचक का ही उपभेद माना जाता है।

    • समूहवाचक संज्ञा: समूह या समुदाय का बोध कराने वाले शब्द। (जैसे: सेना, कक्षा, झुंड, भीड़) - इसे भी जातिवाचक का ही उपभेद माना जाता है।

  • भाववाचक संज्ञा: किसी भाव, गुण, दशा या अवस्था का नाम। (जैसे: बचपन, मिठास, ईमानदारी, बुढ़ापा)

संज्ञा पद का परिचय देने के लिए बिंदु:

  1. संज्ञा का भेद और उपभेद।

  2. लिंग।

  3. वचन।

  4. कारक।

  5. वाक्य में क्रिया के साथ उसका संबंध।

उदाहरण: "राम ने रावण को मारा।"

  • राम: व्यक्तिवाचक संज्ञा, पुल्लिंग, एकवचन, कर्ता कारक, 'मारा' क्रिया का कर्ता।

  • रावण: व्यक्तिवाचक संज्ञा, पुल्लिंग, एकवचन, कर्म कारक, 'मारा' क्रिया का कर्म।


2. सर्वनाम (Pronoun)

परिभाषा: जो शब्द संज्ञा के स्थान पर प्रयोग किए जाते हैं, उन्हें सर्वनाम कहते हैं।

सर्वनाम के भेद (Types of Pronoun):

  1. पुरुषवाचक सर्वनाम: वक्ता, श्रोता या किसी अन्य व्यक्ति के लिए प्रयोग। (मैं, तुम, वह)

    • उत्तम पुरुष (बोलने वाला): मैं, हम।

    • मध्यम पुरुष (सुनने वाला): तू, तुम, आप।

    • अन्य पुरुष (जिसके बारे में बात हो): वह, वे।

  2. निश्चयवाचक सर्वनाम: किसी निश्चित व्यक्ति या वस्तु का बोध। (यह, वह, ये, वे)

  3. अनिश्चयवाचक सर्वनाम: किसी अनिश्चित व्यक्ति या वस्तु का बोध। (कोई, कुछ)

  4. संबंधवाचक सर्वनाम: दो उपवाक्यों के बीच संबंध स्थापित करना। (जो-सो, जैसा-वैसा)

  5. प्रश्नवाचक सर्वनाम: प्रश्न पूछने के लिए। (कौन, क्या, किसे)

  6. निजवाचक सर्वनाम: अपने आप या स्वयं के लिए। (आप, स्वयं, खुद)

सर्वनाम पद का परिचय देने के लिए बिंदु:

  1. सर्वनाम का भेद और उपभेद।

  2. लिंग।

  3. वचन।

  4. कारक।

  5. वाक्य में क्रिया के साथ उसका संबंध।

उदाहरण: "तुम अपना काम स्वयं करो।"

  • तुम: पुरुषवाचक सर्वनाम, मध्यम पुरुष, पुल्लिंग (या स्त्रीलिंग, प्रसंगानुसार), एकवचन, कर्ता कारक, 'करो' क्रिया का कर्ता।

  • स्वयं: निजवाचक सर्वनाम, पुल्लिंग (या स्त्रीलिंग), एकवचन, कर्म कारक, 'करो' क्रिया का कर्म (कर्ता पर बल)।


3. विशेषण (Adjective)

परिभाषा: जो शब्द संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताते हैं, उन्हें विशेषण कहते हैं। जिसकी विशेषता बताई जाती है, उसे 'विशेष्य' कहते हैं।

विशेषण के भेद (Types of Adjective):

  1. गुणवाचक विशेषण: गुण, दोष, रंग, आकार, दशा, अवस्था, स्थान, काल आदि का बोध। (अच्छा, बुरा, लाल, मोटा, बीमार, भारतीय, नया, पुराना)

  2. संख्यावाचक विशेषण: संख्या का बोध।

    • निश्चित संख्यावाचक: (दो, तीसरा, चार गुना, पाँचों)

    • अनिश्चित संख्यावाचक: (कुछ, कई, थोड़े, सब)

  3. परिमाणवाचक विशेषण: मापतोल का बोध।

    • निश्चित परिमाणवाचक: (दो किलो, चार लीटर, दस मीटर)

    • अनिश्चित परिमाणवाचक: (थोड़ा दूध, बहुत पानी, कम चीनी)

  4. सार्वनामिक विशेषण (संकेतवाचक विशेषण): जब सर्वनाम शब्द संज्ञा से पहले आकर उसकी विशेषता बताएं या उसकी ओर संकेत करें। (यह लड़का, वह घर, कोई व्यक्ति - यहाँ 'कोई' अनिश्चयवाचक सार्वनामिक विशेषण है, 'कोई' सर्वनाम भी होता है)।

विशेषण पद का परिचय देने के लिए बिंदु:

  1. विशेषण का भेद और उपभेद।

  2. लिंग।

  3. वचन।

  4. विशेष्य (जिसकी विशेषता बताई जा रही है)।

उदाहरण: "यह सुंदर फूल है।"

  • सुंदर: गुणवाचक विशेषण, पुल्लिंग, एकवचन, 'फूल' विशेष्य की विशेषता बता रहा है।

  • यह: सार्वनामिक विशेषण, पुल्लिंग, एकवचन, 'फूल' विशेष्य की ओर संकेत कर रहा है।


4. क्रिया (Verb)

परिभाषा: जिन शब्दों से किसी कार्य के होने या करने का बोध होता है, उन्हें क्रिया कहते हैं।

क्रिया के भेद (Types of Verb):

  • कर्म के आधार पर:

    • अकर्मक क्रिया: जिस क्रिया को कर्म की आवश्यकता नहीं होती। (हँसना, रोना, सोना, चलना, उड़ना)

    • सकर्मक क्रिया: जिस क्रिया को कर्म की आवश्यकता होती है। (खाना, पीना, पढ़ना, लिखना, देखना)

  • प्रयोग के आधार पर (कुछ मुख्य भेद):

    • सामान्य क्रिया: एक ही क्रियापद। (वह आया।)

    • संयुक्त क्रिया: दो या अधिक धातुओं के मेल से बनी। (वह पढ़ रहा है।)

    • प्रेरणार्थक क्रिया: कर्ता स्वयं काम न करके किसी और से कराए। (करवाना, लिखवाना, पढ़वाना)

    • पूर्वकालिक क्रिया: मुख्य क्रिया से पहले होने वाली क्रिया। (वह खाकर सो गया।)

    • नामधातु क्रिया: संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण से बनने वाली क्रिया। (हाथ से हथियाना, बात से बतियाना, गरम से गरमाना)

    • सहायक क्रिया: मुख्य क्रिया के साथ आकर अर्थ स्पष्ट करने वाली। (है, था, होगी, रहा है)

क्रिया पद का परिचय देने के लिए बिंदु:

  1. क्रिया का भेद (सकर्मक या अकर्मक)।

  2. लिंग।

  3. वचन।

  4. काल (भूतकाल, वर्तमानकाल, भविष्यत्काल)।

  5. वाच्य (कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य, भाववाच्य)।

  6. धातु (क्रिया का मूल रूप)।

  7. कर्ता और कर्म का उल्लेख (यदि हो तो)।

उदाहरण: "बच्चा खेल रहा है।"

  • खेल रहा है: अकर्मक क्रिया, पुल्लिंग, एकवचन, वर्तमान काल, कर्तृवाच्य, 'खेल' धातु, कर्ता 'बच्चा' है।


5. अव्यय (Indeclinable)

परिभाषा: ऐसे शब्द जिनमें लिंग, वचन, कारक, काल आदि के कारण कोई परिवर्तन नहीं होता, वे अव्यय कहलाते हैं। इन्हें अविकारी शब्द भी कहते हैं।

अव्यय के भेद (Types of Indeclinable):

क. क्रियाविशेषण (Adverb):

  • परिभाषा: जो शब्द क्रिया की विशेषता बताते हैं।

  • भेद:

    • कालवाचक: क्रिया के समय का बोध। (आज, कल, अभी, तुरंत, सुबह, शाम, परसों, हमेशा)

    • स्थानवाचक: क्रिया के स्थान का बोध। (यहाँ, वहाँ, ऊपर, नीचे, बाहर, भीतर, आगे, पीछे)

    • रीतिवाचक: क्रिया के तरीके या ढंग का बोध। (धीरे-धीरे, अचानक, ध्यानपूर्वक, तेज, जल्दी, जैसे-तैसे, ध्यान से)

    • परिमाणवाचक: क्रिया की मात्रा का बोध। (कम, ज्यादा, बहुत, थोड़ा, पर्याप्त, इतना, उतना, जरा)

  • परिचय के बिंदु: क्रियाविशेषण का भेद, उपभेद, और जिस क्रिया की विशेषता बता रहा है, उसका उल्लेख।

  • उदाहरण: "वह धीरे-धीरे चलता है।"

    • धीरे-धीरे: रीतिवाचक क्रियाविशेषण, 'चलता है' क्रिया की रीति बता रहा है।

ख. संबंधबोधक अव्यय (Postposition/Preposition):

  • परिभाषा: जो शब्द संज्ञा या सर्वनाम के बाद आकर उनका संबंध वाक्य के अन्य शब्दों से बताते हैं।

  • उदाहरण: (के पास, के ऊपर, के नीचे, के बाहर, के आगे, के पीछे, के लिए, के बिना, के अनुसार, की ओर, के कारण)

  • परिचय के बिंदु: संबंधबोधक अव्यय का भेद (यदि हो), तथा उन दो पदों का उल्लेख जिनके बीच संबंध जोड़ रहा है।

  • उदाहरण: "घर के बाहर पेड़ है।"

    • के बाहर: स्थानवाचक संबंधबोधक अव्यय, 'घर' और 'पेड़' के बीच संबंध बता रहा है।

ग. समुच्चयबोधक अव्यय (Conjunction):

  • परिभाषा: जो शब्द दो शब्दों, वाक्यांशों या वाक्यों को जोड़ते हैं।

  • भेद:

    • समानाधिकरण: समान स्तर के शब्दों/वाक्यों को जोड़ना। (और, तथा, एवं, या, अथवा, किंतु, परंतु, लेकिन, व, इसलिए, अत:)

    • व्यधिकरण: एक मुख्य वाक्य और एक आश्रित वाक्य को जोड़ना। (क्योंकि, इसलिए, यदि-तो, यद्यपि-तथापि, मानो, कि, ताकि, जो)

  • परिचय के बिंदु: समुच्चयबोधक अव्यय का भेद, उपभेद, तथा जिन शब्दों/वाक्यों को जोड़ रहा है, उनका उल्लेख।

  • उदाहरण: "राम और श्याम पढ़ रहे हैं।"

    • और: समानाधिकरण समुच्चयबोधक अव्यय, 'राम' और 'श्याम' शब्दों को जोड़ रहा है।

घ. विस्मयादिबोधक अव्यय (Interjection):

  • परिभाषा: जो शब्द हर्ष, शोक, घृणा, आश्चर्य, भय, प्रशंसा आदि मनोभावों को प्रकट करते हैं। इनके साथ (!) चिह्न लगता है।

  • उदाहरण: (वाह!, अरे!, हाय!, छी!, शाबाश!, ओह!, काश!)

  • परिचय के बिंदु: विस्मयादिबोधक अव्यय का भेद (मनोभाव), तथा जिस भाव को प्रकट कर रहा है, उसका उल्लेख।

  • उदाहरण: "अरे! तुम कब आए?"

    • अरे: विस्मयादिबोधक अव्यय, आश्चर्य का भाव प्रकट कर रहा है।

ङ. निपात (Particle):

  • परिभाषा: वे अव्यय शब्द जो किसी पद या शब्द के साथ लगकर उसके अर्थ में विशेष बल (जोर) प्रदान करते हैं।

  • उदाहरण: (ही, भी, तो, तक, मात्र, केवल, जी, हाँ, नहीं, सा)

  • परिचय के बिंदु: निपात, तथा जिस पद पर बल दे रहा है, उसका उल्लेख।

  • उदाहरण: "तुमने ही यह काम किया है।"

    • ही: निपात, 'तुमने' पद पर बल दे रहा है।


अभ्यास प्रश्न (Practice Questions):

निम्नलिखित वाक्यों में रेखांकित पदों का पद-परिचय दीजिए:

  1. वह आदमी धीरे-धीरे चल रहा है

  2. हमारा विद्यालय शहर से बाहर है।

  3. ईमानदारी सबसे अच्छा गुण है।

  4. मोहन ने खाना खाया

  5. वाह! क्या सुंदर दृश्य है!

  6. बच्चे मैदान में खेल रहे हैं

  7. वह आज भी विद्यालय नहीं आया।

  8. जो मेहनत करेगा, सो सफल होगा।

  9. पुस्तक मेज के ऊपर रखी है।

  10. राम और श्याम भाई हैं।


महत्वपूर्ण बातें (Important Tips):

  • संदर्भ का महत्व: पद का परिचय देते समय हमेशा वाक्य के संदर्भ (Context) को समझें। एक ही शब्द अलग-अलग वाक्यों में अलग-अलग पद-भेद हो सकता है।

    • जैसे: "यह पुस्तक है।" (यह - निश्चयवाचक सर्वनाम)

    • "यह पुस्तक मेरी है।" (यह - सार्वनामिक विशेषण, क्योंकि यह 'पुस्तक' संज्ञा की ओर संकेत कर रहा है)

  • क्रिया से संबंध: संज्ञा, सर्वनाम और कारक का पद-परिचय देते समय क्रिया के साथ उनके संबंध को अवश्य स्पष्ट करें।

  • नियमित अभ्यास: पद-परिचय के नियमों को याद रखने और सही पहचान करने के लिए निरंतर अभ्यास बहुत ज़रूरी है।


निष्कर्ष (Conclusion):

पद-परिचय व्याकरण का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह हमें वाक्य में प्रयुक्त शब्दों की व्याकरणिक पहचान को समझने में मदद करता है। इसके माध्यम से हम भाषा की शुद्धता और उसकी संरचना को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं। नियमित अभ्यास से यह विषय सरल और रोचक बन जाता है और आपकी भाषा पर पकड़ मजबूत होती है।


कक्षा - 12 हिंदी अनिवार्य (अलंकार)

कक्षा - 12 (अलंकार)
परिभाषा: 'अलंकार' शब्द 'अलम्' + 'कार' से बना है, जिसका अर्थ है 'आभूषण' या 'सुंदर बनाने वाला'। जिस प्रकार आभूषण स्त्री के सौंदर्य में वृद्धि करते हैं, उसी प्रकार अलंकार काव्य के सौंदर्य में वृद्धि करते हैं। काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्वों को अलंकार कहते हैं।
अलंकार के भेद (मुख्यतः):
शब्दालंकार: जहाँ शब्दों के प्रयोग से काव्य में सौंदर्य या चमत्कार उत्पन्न होता है। यदि इन शब्दों के स्थान पर उनके पर्यायवाची रख दिए जाएँ तो चमत्कार समाप्त हो जाता है। (उदाहरण: अनुप्रास, यमक, श्लेष, वक्रोक्ति)
अर्थालंकार: जहाँ अर्थ के कारण काव्य में सौंदर्य या चमत्कार उत्पन्न होता है। इसमें शब्द बदलने पर भी अर्थ और अलंकार का सौंदर्य बना रहता है। (उदाहरण: विरोधाभास, अतिशयोक्ति, विभावना, सन्देह, भ्रांतिमान)
शब्दालंकार (Shabdalankar):

1. अनुप्रास अलंकार (Alliteration):

परिभाषा: जहाँ एक ही वर्ण (अक्षर) की आवृत्ति (दोहराव) दो या दो से अधिक बार होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।
पहचान: वर्ण की पुनरावृत्ति।
उदाहरण:
● "तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।"
● "चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल थल में।"
स्पष्टीकरण:
• पहले उदाहरण में 'त' वर्ण की आवृत्ति बार-बार हुई है।
• दूसरे उदाहरण में 'च' वर्ण की आवृत्ति बार-बार हुई है। अतः यहाँ अनुप्रास अलंकार है।

2. श्लेष अलंकार (Pun/Coalescence):

परिभाषा: जहाँ एक शब्द का प्रयोग एक ही बार होता है, किन्तु उसके दो या दो से अधिक अर्थ निकलते हों, वहाँ श्लेष अलंकार होता है। 'श्लेष' का अर्थ ही 'चिपका हुआ' होता है, अर्थात् एक शब्द में कई अर्थ चिपके हों।
पहचान: एक शब्द, प्रयोग एक बार, अर्थ अनेक।
उदाहरण:
"रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरे, मोती मानुष चून।।"
स्पष्टीकरण: यहाँ 'पानी' शब्द के तीन अर्थ हैं:
मोती के संदर्भ में: चमक या कांति। (मोती बिना चमक के मूल्यहीन है)
मनुष्य के संदर्भ में: मान-सम्मान या प्रतिष्ठा। (मनुष्य बिना मान-सम्मान के व्यर्थ है)
चून (आटा) के संदर्भ में: जल। (आटा बिना पानी के उपयोगहीन है)
अतः एक ही 'पानी' शब्द के अनेक अर्थ होने के कारण यहाँ श्लेष अलंकार है।

3. यमक अलंकार (Repetition with different meanings):

परिभाषा: जहाँ एक शब्द या शब्दांश का प्रयोग दो या दो से अधिक बार होता है और प्रत्येक बार उसका अर्थ भिन्न होता है, वहाँ यमक अलंकार होता है।
पहचान: एक ही शब्द का बार-बार प्रयोग, पर हर बार अर्थ अलग।
उदाहरण:
"कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय।
वा खाए बौराए जग, या पाए बौराए।।"
स्पष्टीकरण: यहाँ 'कनक' शब्द का प्रयोग दो बार हुआ है और दोनों बार इसके अर्थ भिन्न हैं:
पहले 'कनक' का अर्थ है - सोना (gold)।
दूसरे 'कनक' का अर्थ है - धतूरा (a poisonous plant)।
सोना पाने से व्यक्ति मदमस्त हो जाता है और धतूरा खाने से व्यक्ति पागल हो जाता है। अतः यहाँ यमक अलंकार है।

4. वक्रोक्ति अलंकार (Pun/Double Entendre due to intonation or double meaning):

परिभाषा: जहाँ वक्ता (बोलने वाला) किसी बात को किसी और अभिप्राय (इरादे) से कहे, परन्तु श्रोता (सुनने वाला) उसका कोई दूसरा ही अर्थ लगा ले, वहाँ वक्रोक्ति अलंकार होता है। यह अर्थ भेद या तो कंठ-स्वर (काकु) के कारण होता है या शब्द के अनेक अर्थों (श्लेष) के कारण।
पहचान: कही हुई बात का अलग अर्थ निकलना, गलतफहमी।
उदाहरण:
"को तुम? इत आए कहाँ?
घनश्याम हो तो किंतै बरसो।"
स्पष्टीकरण: यहाँ राधा पूछती हैं "तुम कौन हो? यहाँ क्यों आए हो?" कृष्ण उत्तर देते हैं "मैं घनश्याम हूँ।" (घनश्याम का एक अर्थ कृष्ण और दूसरा अर्थ घना काला बादल)। राधा कृष्ण का अर्थ 'घना काला बादल' लगाती हैं और कहती हैं "यदि तुम बादल हो, तो कहीं और जाकर बरसो।" यहाँ कृष्ण के कथन का श्रोता (राधा) ने भिन्न अर्थ लिया, अतः वक्रोक्ति अलंकार है।

अर्थालंकार (Arthalankar):

5. विरोधाभास अलंकार (Paradox):

परिभाषा: जहाँ काव्य में किसी बात को कहने पर वास्तविक विरोध न होते हुए भी विरोध का आभास (प्रतीत) हो, वहाँ विरोधाभास अलंकार होता है।
पहचान: ऊपरी तौर पर दो विरोधी बातें दिखें, पर वास्तव में उनमें विरोध न हो, बल्कि कोई गहरा अर्थ छिपा हो।
उदाहरण:
"या अनुरागी चित्त की गति समुझै नहिं कोय।
ज्यों ज्यों बूड़े स्याम रंग, त्यों त्यों उज्ज्वल होय।।"
स्पष्टीकरण: यहाँ 'स्याम रंग' (काला रंग) में डूबने से 'उज्ज्वल' (सफेद/साफ) होने की बात कही गई है। सामान्यतः काला रंग किसी को काला ही बनाता है, उज्ज्वल नहीं। परन्तु यहाँ 'स्याम रंग' का अर्थ कृष्ण भक्ति है। कृष्ण भक्ति में डूबने से मन निर्मल और पवित्र होता है, इसलिए यहाँ विरोध का आभास मात्र है, वास्तविक विरोध नहीं। अतः विरोधाभास अलंकार है।

6. अतिशयोक्ति अलंकार (Hyperbole):

परिभाषा: जहाँ किसी वस्तु, व्यक्ति या बात का वर्णन इतना बढ़ा-चढ़ाकर किया जाए कि लोक-मर्यादा (संसार की सीमा) का अतिक्रमण हो जाए या असंभव लगे, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।
पहचान: किसी बात को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कहना, असंभव सा लगना।
उदाहरण:
"हनुमान की पूँछ में लगन न पाई आग।
लंका सगरी जल गई, गए निशाचर भाग।।"
स्पष्टीकरण: यहाँ हनुमान की पूँछ में आग लगने से पहले ही पूरी लंका का जल जाना और राक्षसों का भाग जाना वर्णित है। यह बात इतनी बढ़ा-चढ़ाकर कही गई है कि असंभव लगती है। अतः यहाँ अतिशयोक्ति अलंकार है।

7. विभावना अलंकार (Special Causation/Effect without cause):

परिभाषा: जहाँ कारण के न होते हुए भी कार्य का होना पाया जाए, वहाँ विभावना अलंकार होता है।
पहचान: बिना कारण के ही कार्य का होना।
उदाहरण:
"बिनु पग चलै, सुनै बिनु काना।
कर बिनु कर्म करै विधि नाना।।"
स्पष्टीकरण: यहाँ 'पैर न होते हुए भी चलना' और 'कान न होते हुए भी सुनना' तथा 'हाथ न होते हुए भी अनेक प्रकार के कार्य करना' बताया गया है। ये कार्य बिना अपने अपेक्षित कारणों (पैर, कान, हाथ) के हो रहे हैं। अतः यहाँ विभावना अलंकार है।

8. सन्देह अलंकार (Doubt):

परिभाषा: जहाँ किसी वस्तु में किसी दूसरी वस्तु के होने का सन्देह बना रहे और निश्चय न हो पाए, वहाँ सन्देह अलंकार होता है। इसमें 'क्या यह है, या वह है?' जैसी स्थिति बनी रहती है।
पहचान: दो समान चीजों में भ्रम की स्थिति बनी रहे, निर्णय न हो पाए (प्रायः 'कि', 'या', 'अथवा' जैसे शब्दों का प्रयोग)।
उदाहरण:
"सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है?
सारी ही कि नारी है कि नारी ही की सारी है?"
स्पष्टीकरण: यहाँ द्रौपदी के चीरहरण के समय यह निश्चय नहीं हो पा रहा है कि साड़ी के बीच स्त्री है या स्त्री के बीच साड़ी है, या साड़ी ही स्त्री है या स्त्री ही साड़ी है। सन्देह बना रहता है, निर्णय नहीं हो पाता। अतः यहाँ सन्देह अलंकार है।

9. भ्रांतिमान अलंकार (Misconception/Illusion):

परिभाषा: जहाँ समानता के कारण एक वस्तु को दूसरी वस्तु समझ लिया जाए और उसी के अनुसार कार्य भी कर लिया जाए, वहाँ भ्रांतिमान अलंकार होता है। इसमें सन्देह की तरह भ्रम बना नहीं रहता, बल्कि एक चीज को दूसरी मान लिया जाता है।
पहचान: किसी एक चीज को गलती से दूसरी चीज मान लेना और उसी के अनुरूप व्यवहार करना।
उदाहरण:
"नाक का मोती अधर की कांति से,
बीज दाड़िम का समझ भ्रांति से।
देख उसको हुआ शुक मौन है,
सोचता है अन्य शुक यह कौन है?।"
स्पष्टीकरण: यहाँ कवि कहता है कि नायिका की नाक में पहने मोती को उसके होंठों की लालिमा (अधर की कांति) के कारण तोते (शुक) ने अनार का दाना (बीज दाड़िम) समझ लिया है। तोते को ऐसी भ्रांति हो गई है कि वह स्वयं को मौन करके सोच रहा है कि यह दूसरा तोता कौन है? यहाँ तोते को 'भ्रांति' हुई है, उसने मोती को अनार का दाना मान लिया है और उसी के अनुसार कार्य (मौन होना और सोचना) कर रहा है। अतः यहाँ भ्रांतिमान अलंकार है।
2 नंबर के प्रश्न के लिए संभावित उत्तर:
प्रश्न: अनुप्रास अलंकार की परिभाषा व एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर: जहाँ एक ही वर्ण (अक्षर) की आवृत्ति (दोहराव) दो या दो से अधिक बार होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।
उदाहरण: "तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।"
प्रश्न: यमक और श्लेष अलंकार में क्या अंतर है?
उत्तर: यमक अलंकार में एक ही शब्द का प्रयोग दो या दो से अधिक बार होता है और प्रत्येक बार उसका अर्थ भिन्न होता है। (जैसे: 'कनक कनक' में सोना और धतूरा)
श्लेष अलंकार में एक शब्द का प्रयोग एक ही बार होता है, किन्तु उसके दो या दो से अधिक अर्थ निकलते हैं। (जैसे: 'पानी' के तीन अर्थ)
प्रश्न: विरोधाभास अलंकार किसे कहते हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर: जहाँ काव्य में किसी बात को कहने पर वास्तविक विरोध न होते हुए भी विरोध का आभास (प्रतीत) हो, वहाँ विरोधाभास अलंकार होता है।
उदाहरण: "ज्यों ज्यों बूड़े स्याम रंग, त्यों त्यों उज्ज्वल होय।।"
(स्पष्टीकरण: यहाँ काले रंग में डूबने से उज्ज्वल होने की बात में विरोध का आभास है, पर इसका अर्थ कृष्ण भक्ति से मन के निर्मल होने से है।)
प्रश्न: सन्देह और भ्रांतिमान अलंकार में मुख्य अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 
सन्देह अलंकार में समानता के कारण किसी वस्तु के विषय में सन्देह बना रहता है और निश्चय नहीं हो पाता। (यह 'क्या यह है, या वह है?' की स्थिति है।)
भ्रांतिमान अलंकार में समानता के कारण एक वस्तु को दूसरी वस्तु समझ लिया जाता है और उसी के अनुरूप कार्य भी कर लिया जाता है। (यह 'यह वह ही है' का भ्रम है, जो सत्य मान लिया जाता है।)
प्रश्न: 'बिनु पग चलै सुनै बिनु काना' पंक्ति में कौन सा अलंकार है और क्यों?
उत्तर: इस पंक्ति में विभावना अलंकार है। क्योंकि यहाँ कारण (पैर, कान) न होते हुए भी कार्य (चलना, सुनना) का होना बताया गया है।